सभ्यता के गागर में सांस्कृतिक सागर सरीखा है कर्मकुम्भ
सभ्यता के गागर में सांस्कृतिक सागर सरीखा है कर्मकुम्भ
# लेखन कला और संपादकीय कौशल की बनी अद्भुत मिशाल है कर्मकुम्भ,
@ पुस्तक समीक्षा/ प्रो (डॉ) मनोज मिश्र, संकायाध्यक्ष, जौनपुर विश्वविद्यालय, जौनपुर
डॉ. दिनेश चन्द्र सिंह, आई.ए.एस. द्वारा सृजित पुस्तक कर्मकुम्भ, आर्ष परम्परा में गोस्वामी तुलसीदास जी की उन महनीय पंक्तियों का मुझे स्मरण करा रही है जिसमें उन्होंने लिखा है कि- कीरति भनिति भूति भलि सोई। सुरसरि सम सब कहँ हित होई। अर्थात कीर्ति, कविता और सम्पत्ति वही उत्तम है, जो गंगाजी की तरह सबका हित करने वाली हो। मुझ अल्प विषया मतिः के लिए पुस्तक कर्मकुम्भ की समीक्षा चुनौतीपूर्ण कार्य है जिसे यथा सम्भव पूरी करने की कोशिश कर रहा हूँ।
कुल 24 अध्यायों से अलंकृत इस पुस्तक में महाकुंभ का शुभ कलश, मंगलकारी चेतना और विराट स्वरूप का दिग्दर्शन, प्रशासनिक तैयारियां अब शोध अनुसंधान का विषय, उत्कृष्ट प्रबंधकीय व्यवस्था का अनुपम उदाहरण, संगम स्नान की दिव्य अनुभूति, प्रयागराज से जुड़ी महत्वपूर्ण अनुभूतियाँ, महाकुंभ की आस्था और जलवायु परिवर्तन घोषणा पत्र, अनुपम व अविस्मरणी योग्यता, सनातन धर्म के अस्तित्व से आबद्ध हैं देवाधिदेव महादेव और भगवान विष्णु के अवतार श्रीराम और श्रीकृष्ण, प्रयागराज महाकुंभ के सामाजिक-सांस्कृतिक मायने, संकल्प से सिद्धि-उद्वेग रहित कर्म, जौनपुर महोत्सव 2025 : विकास लोक कल्याण व कलाकारों की मेधा का सम्मान, भक्ति और प्रेम रस की दिव्य अनुभूति, चीनियों और अमेरिकियों की तुलना में भारतीयों को बौद्धिक रूप से मजबूत बनाते हैं। सनातनी धार्मिक संस्कार, गरीबों का मसीहा सुल्ताना डाकू : एक प्रगतिशील नजरिया, धर्मपूर्वक राजनीति का संधान कीजिए राष्ट्रहित सधेगा, भारतीय संस्कृति में राष्ट्र प्रेम-परिवार प्रेम सर्वोपरि, पक्षी राज मयूर सद प्रेरणा और मन मयूर नृत्य, वृक्षारोपण, गौ-सेवा और पशु पक्षी सेवा के लिए समर्पित एक वैवाहिक वर्षगांठ, शुभकामनाओं से बढ़ा आत्मसम्बल, हृदय से आभार पूर्वक धन्यवाद, अधर्मी पाकिस्तान को कड़वे सबक सिखाने होंगे यदि पुनः सीज फायर टूटा तो?, अधर्म का नाश होगा, धर्म की विजय होगी, अपने मन कछु और है करता के मन कछु और..., जैविक खेती को प्रोत्साहित करने के लिए
जिलाधिकारी डॉ. दिनेश चन्द्र सिंह ने लिया ढेंचा खेती का सहारा, मैं हिमालय हूँ... मीडिया कवरेज और अंत में फोटो फीचर शामिल हैं।
लेखक ने अपनी कृति कर्मकुम्भ को प्रभु जी तथा अभूतपूर्व महाकुम्भ-दिव्य कुम्भ के ऐतिहासिक आयोजन की भव्यता एवं सफल सम्पादन के लिए लोक पुरुष माननीय प्रधानमन्त्री श्री नरेंद्र मोदी जी एवं उत्तर प्रदेश के तपस्वी एवं यशस्वी माननीय मुख्यमंत्री श्री योगी आदित्यनाथ जी को केंद्र बिंदु में रखते हुए सादर समर्पित किया है जो निश्चित रूप से विराट महाकुम्भ में एक लोकसेवक के रूप में अपने दायित्व एवं सेवा भाव के साथ महाकुम्भ में अलौकिक दृश्यों के साक्षी बने और उन दिव्य पलों को अन्तर्मन में महसूस किया है।
आज जब सामाजिक ताने-बाने स्वार्थ केन्द्रित हो रहे हों, डिज़िटल होती दुनिया में संयुक्त परिवार एक स्वप्न हों, आपसी संबंधों में विघटन हो रहा हो तथा बाजारवाद के प्रभाव नें मानवीय संवेदनाओं को कुचल दिया हो, तब भारतीय संस्कृति के सुनहरे पृष्ठों को हमारे सामने विभिन्न अध्यायों/रंगों में सजे कर्म कुम्भ के रूप प्रदर्शित करती यह कृति संग्रहणीय बन जाती है। गंगाजल लिए मनोभावों से सृजित यह कृति स्वर्णिम अतीत की बाँकी-झांकी प्रस्तुत करते हुए समाज को जागरूक करने के लिए संकल्पित है।
वस्तुतः लेखक डॉ. दिनेश चन्द्र सिंह साहित्यिक चेतना से ओतप्रोत हैं तथा आपके हृदय में रचना का सृजन, सुविचारित रचना धर्मिता है। इस सृजन के विविध अध्यायों में जहाँ एक ओर सरलता और निष्कपटता दृष्टिगोचर है तो वहीं वसुधैव कुटुम्बकम और भारतीय संस्कृति की विविधता का सम्मान भी। आपकी लेखनी नें कर्म कुम्भ के जरिए न केवल भारतीय जीवन पद्धति, परम्परा और संस्कारों ही दिखाया है अपितु आपने यथार्थ के धरातल पर आपने भावों को लेखनी भी दी है। आप कालिदास जी की आर्ष वाणी 'सरस्वती श्रुति महती महीयताम्' को चरितार्थ करते है। आपका लम्बे समय तक प्रशासनिक पदों पर रहने का अनुभव, पूरब के आक्सफोर्ड कहे जाने वाले इलाहाबाद विश्वविद्यालय में ज्ञान के सागर गुरुजनों के सानिध्य में रह कर अन्तेवासी शिष्य के रूप में ज्ञान प्राप्त करने के सुयोग्य का प्रतिबिम्बन भी इस पुस्तक में दृष्टिगोचर है। इस कृति में महाकुम्भ की व्यापकता-उसकी तैयारी और सफल क्रियान्वयन के साथ भारतीय संस्कृति की विराटता और महनीयता, इलाहाबादी अमरुद की चर्चा, अमर बलिदानी पं. चंद्रशेखर आजाद जी को श्रद्धा सुमन, इलाहाबादी दिनों की झांकी, प्रयागराज के सभी ऐतिहासिक स्थलों की चर्चा, आदरणीय गुरुजनों का स्मरण आपके श्रेष्ठ संस्कारों से परिचित कराता है। इस पुस्तक की इकलौती रचना "मैं हिमालय हूँ" में हिमालय की आवश्यकता और व्यापकता के बोध के साथ भारत के मस्तक के आत्मकथ्य को रूपक के रूप में बुलंदी से निरूपण किया गया है, जो प्रारंभ के साथ साथ उत्तरोत्तर भाव - भाषा, बिंब और प्रवाह में हिमालय की अडिगता का बोध कराती है।
वस्तुतः विद्यार्थी जीवन से ही गागर में सागर भरने की कला, सदैव विमर्श के लिए प्रस्तुत रहने वाला नजरिया, अतीत और भविष्य के बीच सेतु निर्माण कर चलने का संकल्प और लोक मंगल की भावना आपका सहज मौलिक गुण है। आप विद्यार्थी जीवन से ही साधक-साध्य जीवन के निर्वाहक, निर्भीक, जागरूक, संवेदनशील एवं बहु आयामी व्यक्तित्व के धनी रहे हैं। प्रशासनिक सेवा में भी लोकमंगल की भावना लिए हुए आप साधुमना रहे हैं। कर्म पथ पर निरंतर गतिमान रहने के कारण अपने मित्रों, शुभेच्छुओं, सहकर्मियों एवं आम जनमानस में लोकप्रिय हैं। भारतीय संस्कृति के अनुसरण, अमृत सरोवरों की स्थापना एवं विलुप्त हो रही सदा नीरा पीली नदी के अविरल प्रवाह को बनाए रखने की पहल, सुशासन एवं नैतिक मूल्यों के उन्नयन के लिए आप सदैव सक्रिय है। एक भले मानुष की तरह माँ गंगा से प्रेरणा लेकर आपने सभी के लिए अपने द्वार खोले हैं जो कि जनमानस के लिए प्रेरक और अनुसरण योग्य है। सर्वजन हिताय- सर्व जन सुखाय को आदर्श वाक्य मान कर उसी रीति-नीति पर आपने एक प्रशासनिक अधिकारी के रूप में स्वयं को संचालित करने का विनम्र प्रयास किया है।
कर्म कुम्भ के उत्तरोत्तर अध्यायों से लेखक का सरल व्यक्तित्व और सहज विनीत जीवन शैली उनके उच्चतम आदर्शों का प्रतिबिम्बन करता है जो आदर्श मानव जीवन संहिता का प्रतीक है। आपके उदबोधन और व्यक्तित्व की गरिमा, प्रशासनिक दायित्वों के साथ आपके सारस्वत अध्यवसाय को भी द्योतित करती है। एक जिलाधिकारी के रूप में जन सेवा का व्रत आपके संस्कारों का प्रतिबिम्बन है। प्राचीन उक्ति है कि केवल संस्कार युक्त वाणी से ही व्यक्ति की शोभा होती है। सभी आभूषण नष्ट हो जाते हैं लेकिन वाणी रूपी आभूषण सदा विद्यमान रहता है। आपके कार्यस्थल सूदूर क्षेत्रों से न्याय की आशा लिए आने वाले आम-जन द्वारा आपकी कार्यशैली की प्रशंसा भी इसी बात का द्योतक है।
पुस्तक के पुरोवाक में अष्टावक्र गीता के कल्याणकारी सन्देश में भी आपकी लेखनी के सारस्वत साधना का नैरन्तर्य परिलक्षित है। लेखक के लेखन की सार्थकता पाठक या श्रोता ही समझता है। आपकी पुस्तक में यथार्थ का निरूपण है। यथार्थ का आलोड़न-विलोड़न और रस निष्पत्ति के लिए सन्निहित अध्यायों में विभाव, अनुभाव और संचारी भाव की निरंतरता भी सदा गतिमान है। पुस्तक में जीवन के विविध रंगों के सन्देश के साथ साथ ही जीवन की विविधताओं का साक्षात्कार भी समाहित है। यह कृति निश्चित रूप से जन-जागरण और जन-संग्रहण के मानस पक्ष को और सुप्रतिष्ठित करेगी। आपकी लेखनी में सदा मां सरस्वती विराजमान रहें, आप सदा स्वस्थ रहें- शतायु हों, यही कामना है।
सच कहूं तो यह पुस्तक सभ्यता के गागर में सांस्कृतिक सागर सरीखा है, जो परिपक्व राष्ट्रवादी सांस्कृतिक
लेखन कला और सूक्ष्म संपादकीय कौशल की अद्भुत मिशाल समझी जा रही है। इस दृष्टि से वरिष्ठ पत्रकार व राजनीतिक विश्लेषक कमलेश पांडेय की संपादकीय कौशल से इसके तेवर व कलेवर में एक सतत अंदाज परिलक्षित होता है, जो आधुनिक संपादन कला का अद्भुत नमूना प्रस्तुत करता है। लेखक डॉ दिनेश चंद्र सिंह की कृतियों- कर्मकुम्भ, कर्मनिर्णय, कालप्रेरणा में इसकी स्पष्ट छाप दृष्टिगोचर होती है।
# प्रोफ़ेसर (डॉ) मनोज मिश्र, संकायाध्यक्ष, अनुप्रयुक्त सामाजिक विज्ञान एवं मानविकी संकाय विभागाध्यक्ष,
जनसंचार एवं पत्रकारिता विभाग, वीर बहादुर सिंह पूर्वांचल विश्वविद्यालय, जौनपुर (उ.प्र.)
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