दुनियावी क्षतिज पर वैचारिक इंद्रधनुष सरीखी है आईएएस डॉ दिनेश चंद्र की कालजयी कृति "कर्मकुम्भ"
दुनियावी क्षतिज पर वैचारिक इंद्रधनुष सरीखी है आईएएस डॉ दिनेश चंद्र की कालजयी कृति "कर्मकुम्भ"
@ पुस्तक समीक्षा/परमेश्वर सिंह, लेखक व प्रकाशक
मशहूर लेखक व प्रशासक आईएएस डॉ० दिनेशचन्द्र सिंह जी, जिलाधिकारी, जौनपुर, यूपी, की नई बहुचर्चित पुस्तक "कर्म-कुंभ" का अवलोकन किया। इससे पूर्व भी आपकी दो पुस्तकों- "काल-प्रेरणा" और "कर्म-निर्णय" को पढ़ चुका हूँ। इसलिए कह सकता हूँ कि "कर्म-कुंभ" आपकी तीसरी सारगर्भित कृति है जिसके विषयवस्तु की फलक बहुत व्यापक है। विभिन्न प्रासंगिक तथ्यों व आंकड़ों से भरपूर यह कृति ज्ञान का भंडार है।
इस कृति में भारत के धार्मिक, आध्यात्मिक और सांस्कृतिक चेतना की सफल प्रस्तुति के द्वारा इस देश की विविधता में एकता का दर्शन कराया गया है। परम पुनीत सनातन धर्म दुनिया का प्राचीनतम धर्म है। समग्रतावादी भारतीय संस्कृति इसी की कोख से जन्मी है। हिन्दू संस्कृति मातृभूमि की ललाट और एकत्व की मेरुदण्ड है। प्रोएक्टिव स्वभाव सिनर्जी के सिद्धान्त पर कार्य करने का तरीका डॉ० दिनेश चन्द्र सिंह IAS का वैशिष्ट्य है।
बहुमुखी प्रतिभा के धनी डॉ० सिंह ऊर्जावान, उत्साही, सुविज्ञ, सर्वसुलभ, कर्मठ और गतिशील जिलाधिकारी हैं।
आप जनहित में अच्छे से अच्छा और जल्दी से जल्दी करना चाहते हैं। एक सुभाषित में कहा गया है-
"उद्यमं साहसं धैर्यं बुद्धिः शक्ति: पराक्रमः।
षडेते यत्र वर्तन्ते तत्र देवः सहायकृत।।"
अर्थात कठोर परिश्रम की आदत, साहस, धैर्य, बुद्धि, शक्ति और पराक्रम से युक्त आदमी की मदद ईश्वर स्वयं करते हैं। गीता में योग को ही कर्म कहा गया है। गीता में निष्काम कर्म योग का निरुपण किया गया है।
योगेश्वर कृष्ण ने पलायन और संन्यास की ओर प्रवृत्त युधिष्ठिर को समझाते हुए कहा था-
कहूँ जो पाल उसको, कर्म है यह
हनन कर शत्रु का, सत्कर्म है यह।
क्रिया को छोड़ चिन्तन में फंसेगा
उलट कर काल तुझको ही ग्रसेगा।
x x x x x x x x
"धर्मराज कर्मठ मनुष्य का पथ संन्यास नहीं है।"
डॉ० दिनेशचन्द्र सिंह जी, आईएएस की सुविचारित अवधारणा है कि उद्वेग रहित कर्म और संकल्प से ही सिद्धि प्राप्त होती है। उनका कथन है- इस संसार में सब दुखों का क्षय करने के लिए पुरुषार्थ (यत्न) के अतिरिक्त दूसरा कोई मार्ग नहीं है। संसार रूपी कोश में ऐसा कोई रत्न नहीं है जो शुभ पुरुषार्थ से किए गये शुभ कर्म के द्वारा प्राप्त न हो सके। वस्तुत: तीनों लोकों में ऐसा कोई पदार्थ नहीं है जो उद्वेग रहित पुरुषार्थ के द्वारा प्राप्त न किया जा सके। सब कुछ सदा ही इस संसार में सबसे अच्छी भाँति किए हुए पुरुषार्थ के द्वारा प्राप्त किया जा सकता है।
"वस्तुतः पुरुषार्थ आत्मा की चैतन्य शक्ति है, जबकि भाग्य जड़ कर्मों का समुदाय है। जिस तरह से एक सूर्य सारे संसार का अंधेरा मिटा देता है, ठीक उसी तरह से एक पल का पुरुषार्थ भी कई जन्मों के भाग्य पर भारी पड़ता है।" स्वामी दयानंद सरस्वती- "पुरुषार्थ हिन्दू सामाजिक व्यवस्था के प्राण तत्व हैं। पुरुषार्थ के सुदृढ़ सोपानों पर आरूढ़ होकर ही सनातन संस्कृति ने प्रौढता प्राप्त की है।"
भगवान श्रीराम आजीवन उद्वेग रहित कर्म करते रहे। श्री राम आकाश धर्मा सोच और महान संकल्प के महापुरुष थे। उद्यम, संघर्ष, तप-क्रम और पुरुषार्थ की भट्ठी में तपकर ही श्रीराम नर से नारायण बने थे। ठीक ही कहा गया है-
"नरता का आदर्श तपस्या के भीतर पलता है, देता वही प्रकाश आग में जो अभीत जलता है।" - रामधारी सिंह दिनकर
भारत के यशस्वी प्रधानमन्त्री नरेन्द्र मोदी और धुन के पक्के व कर्मठ मुख्यमन्त्री योगी आदियनाथ जी के उद्वेग रहित कर्म और महान संकल्प का सुपरिणाम था बीता हुआ भव्य व दिव्य महाकुंभ 2025.
चाहे महाकुंभ के अमृत स्नान से जुड़ी हुई व्यवस्था हो या विश्व योग दिवस के नैमित्तिक कार्यक्रम हो, हर स्थान पर डॉ० दिनेश चंद्र सिंह की भूमिका प्रशंसनीय रही है। योग दिवस पर जौनपुर में 1803 स्थानों पर लगभग 5 लाख लोगों ने सूर्यनमस्कार किया। डॉ० दिनेशचन्द्र सिंह जी द्वारा किया गया शीर्षासन विशेष रूप से चर्चित रहा।
कुल 144 वर्ष बाद महाकुंभ का शुभ अवसर आया था। विश्व के सबसे बड़े उस आयोजन में 66 करोड़ लोगों ने अमृत स्नान किया था। जनसुविधाओं की पूर्ति के लिए 400 हेक्टेयर क्षेत्र में विस्तृत डिजिटल महाकुंभ का क्षेत्र 25 सेक्टर में विभाजित किया गया था। संगम तट पर स्नान के लिये 10 पक्के और 31 अस्थाई घाट बनाए गये थे।
आवास, शौचालय, पार्किंग, प्रकाश व्यवस्था, 30 पांटून ब्रिज, फ्लाई ओवर ब्रिज, आवागमन के लिए बस और सेवा की प्रचुर व्यवस्था, एयरपोर्ट टर्मिनल आदि की व्यवस्था अनुपम और अभूतपूर्व थी।
महाकुंभ आस्था, आध्यात्म, परम्परा, सनातन और अधुनातन, विविधता और एकरुपता तथा अनेकता में एकता का महासंगम था। भारत धर्मप्राण देश है। इस सनातन देश के बारे में कहा गया है- "India is spiritual country and religion is back bone of India."
धर्म मानव की खोज है। यह मानव निर्मित नहीं है। धर्म एक अविनाशी और भारतीय तत्व है। धर्म से ही शक्ति, मुक्ति और भक्ति मिलती है। वेदों में धर्म और विज्ञान का मणि- कांचन संयोग पाया जाता है। वेदों के गहन अध्येता W.D. Brown के अनुसार- "Vedic religion is thoroughly scientific religion where sconce and religion go hand to hand." अर्थात तप, स्वाध्याय और प्रार्थना में अध्यात्म उद्भूत होता है। अध्यात्म पवित्र और परिशोधित चित्त से अवतरित होता है। "अध्यात्म जीवन की सर्वांग दृष्टि और समग्र विज्ञान है।" कहा गया है- गंगा तव दर्शनात मुक्ति' अर्थात गंगा के दर्शन मात्र से ही मुक्ति मिल जाती है।
गंगा, यमुना और अदृश्य सरस्वती के संगम में अमृत स्नान हेतु 45 दिनों तक श्रद्धालुओं का तांता लगा रहा। महाकुंभ जिला विश्व भर के श्रद्धालुओं और पर्यटकों के आकर्षण का केंद्र बना रहा। वेदों के विश्व प्रसिद्ध विद्वान मैक्समूलर ने अपनी कृति "India what can teach us? में इस महान देश की महनीयता का बखान करते हुए लिखा है- "यदि आप कला, साहित्य, दर्शन, संस्कृति, पुराण, इतिहास, धर्म और अध्यात्म जैसे विषयों का गूढ़तम रूप से अवगाहन करना चाहते हो तो आप भारत आइये, जहां आप अपने को ज्ञान के उत्स में निमज्जित पायेंगे।" भारत रीति, नीति, उत्सव, पर्व और परम्पराओं का महान देश है। कामायनी की निम्नवत प्रासंगिक पंक्तियां उल्लेखनीय हैं-
यह नीड़ मनोहर कृतियों का
यह विश्वकर्मा रंग स्थल है।
है परंपरा लग रही यहाँ,
ठहरा जिसमें जितना बल है॥
हिन्दू धर्म में सनातन संस्कृति के ध्वजवाहक अखाड़ों का वन्दनीय स्थान है। आदि शंकराचार्य ने दसनामी अखाड़ों का सुजन हिन्दू धर्म और संस्कृति के रक्षार्थ दिया था। वर्तमान में भारत में 13 अखाड़े हैं। अखाड़ों की तीन श्रेणियां हैं- (1) शैव, (2) वैष्णव, और (3) उदासीन। इनमें शैव सम्प्रदाय 7, वैष्णव और उदासीन संप्रदाय के 3-3 अखाड़े हैं। सबसे बड़े जुनागढ़ अखाड़े में 5 लाख साधु हैं। ये भगवान दत्तात्रेय को अपना ईष्ट देव मानते हैं। जूनागढ़ अखाड़े में कई महामंडलेश्वर और संन्यासी हैं। जूनागढ़ अखाड़े का मुख्यालय वाराणसी में है। हरिद्वार और उज्जैन में इनके आश्रम हैं। प्रयागराज का पंचायती निरंजनी अखाड़ा दूसरा सबसे बड़ा अखाड़ा है। महामंडलेश्वर का पद बड़ा गौरवपूर्ण माना जाता है। ये चांदी के सिंहासन पर विराजते हैं और छत्र-चंवर धारण करते हैं। जूनागढ़ के आचार्य महामंडलेश्वर अवधेशानन्द गिरी जी महाराज है। शंकराचार्य का पद सबसे बड़ा माना जाता है। अखाड़ों का महाकुंभ स्थल में प्रवेश बड़े ही शान-शौकत और गाने-बाजे के साथ होता है। 45 दिवसीय महाकुंभ में छह शाही स्नान संपन्न हुए थे।
शाही स्नान में विभिन्न अखाड़ों के महामंडलेश्वरों, साधू-संन्यासियों और भक्तों का क्रमशः भव्य-दिव्य प्रदर्शन बड़ा ही चित्ताकर्षक और दर्शनीय होता है। लाखों लोग शोभा-यात्रा देखने और चरण-धूल लेने को लालायित रहते हैं।
महाकुंभ के छह शाही स्नान निम्नवत थे-
पहला, 13 जनवरी (पौष पूर्णिमा); दूसरा, 14 जनवरी (मकर संक्रान्ति); तीसरा, 29 जनवरी (मौनी अमावस्या); चौथा, 3 फरवरी (बसन्त पंचमी); ,पांचवां,12 फरवरी (माधी पूर्णिमा); और छठा, 26 फरवरी (महाशिवरात्रि).
डीएम डॉ० दिनेश चन्द्र सिंह के अनुसार, हमारे पर्व-त्यौहार, रीति-परंपरा में और प्रकृति की गोद में प्रवाहित हो रही लोकमाता नदियां हमारी सनातन संस्कृति की बुनियाद हैं। दुनिया में तमाम सभ्यताएं नदियों के तट पर ही पोषित हुई हैं। नदियों में श्रेष्ठ गंगा को उत्तर भारत की सुषुम्ना नाड़ी कहा गया है। इसके तट पर अनेक तीर्थ स्थल और धार्मिक संस्थान विद्यमान हैं। ठीक ही कहा गया है-
वेदों का यह देश हमारा
सुन्दर स्वर्ग समान है।
उसकी नदियों में अमृत है,
कण कण में भगवान हैं।
महापर्व में आने वाले अनेक समुदायों, पंथों, सम्प्रदायों और शांति के पर्यटकों, सन्त, महात्माओं, कल्पवासियों का दर्शन समरसता का नयनाभिराम दृश्य प्रस्तुत कर रहा था। प्राचीन मंदिरों के जीर्णोद्धार और कोरिडोर के विकास से प्रयागराज की शोभा में चार चांद लग गए थे। महाकुंभ का बहुरंगी जन समुदाय विविधता में एकरूपता का दृश्य प्रस्तुत कर रहा था। सप्तर्षियों में एक भारद्वाज ऋषि वेदों के ज्ञाता, विद्वान अर्थशास्त्री, चिकित्सक और व्याकरणाचार्य थे। भगवान श्रीराम ने वनवास जाते और लौटते समय ऋषिराज का दर्शन और शुभाशीष प्राप्त किया था। जाते समय इस दिव्य और भव्य आश्रम में निवास कर उनका मार्गदर्शन प्राप्त किया था। भरत जी ने भी चित्रकूट यात्रा के समय यहां सेना सहित रात्रि विश्राम किया था। शोक निरत भरत को सांत्वना देते हुए भरत के प्रति श्रीराम के अखंड प्रेम को ऋषि भारद्वाज ने उजागर किया था। यथा- जाना मरमु नहात प्रयागा। मगन होहिं तुम्हरे अनुरागा।। तुम पर अस सनेहु रघुवर के। सुख जीवन जग जस जड़ नर के।।
"महाकुंभ का शाश्वत चिंतन, धवल अतीत, जिज्ञासु वर्तमान और सुमधुर भविष्य को दर्शाता है।"- कमलेश पांडेय, इस कृति के संपादक का चिंतन समय प्रवर्तक है। महाकुंभ के धार्मिक, आध्यात्मिक और सांस्कृतिक आयोजन में देश-विदेश और अनेक पंथ-परम्परा के लोगों की प्रतिभागिकता से वहां वसुधैव कुटुंबकम, यत्र विश्वं भवत्येक नीड़म और स्वदेशो भुवन त्रयता की संकल्पना चरितार्थ हो रही है। हमारी सनातन संस्कृति आज अंदर और बाहर के आघात का दंश झेल रही है। दक्षिण के राज्य तमिलनाडु के मौजूदा मुख्यमन्त्री मुथुवेल करूणानिधि 'स्टालिन' द्वारा सनातन को डेंगू कहा जाना बड़ा ही दुर्भाग्यपूर्ण है। इसके उत्तर में परमार्थ निकेतन के परमाचार्य चिदानन्द जी सरस्वती मुनि जी महाराज के ये उद्गार उल्लेखनीय हैं- पहला, सनातन डेंग नहीं डिवाइन है। दूसरा, सनातन रोग नहीं योग है। तीसरा, सनातन बीमारी नहीं इलाज है। चौथा, सनातन समस्या नहीं समाधान है। पांचवां, सनातन ही सबका जन्मदाता, पुरातन आदि और अनन्त है।
2025 के ही डिजिटल और विराट महाकुंभ स्थल पर कथा व्यास पंडित देवकीनन्दन ठाकुर के संयोजकत्व में सन्त- महात्माओं, श्रद्धालु भक्तों, विद्वानों और हिन्दू संस्कृति के पक्षकारों का महाजुटान हुआ। वक्ताओं और प्रतिभागियों ने एक स्वर से सनातन की रक्षा और संरक्षण का संकल्प व्यक्त किया। राष्ट्रीय एकता के लिये सनातन की प्रतिष्ठा को अपरिहार्य बताया गया।
इस कृति के लेखक डॉ० दिनेशचन्द्र सिंह, आईएएस इलाहाबाद विश्वविद्यालय, प्रयागराज के मेधावी छात्र रहे हैं। इस विश्वविद्यालय को 'पूरब का आक्सफोर्ड' कहा जाता है। इसका जिक्र होते ही वे भावुक हो उठते हैं, क्योंकि "अतीत की स्मृतियां बहुत मधुर होती हैं।" अपने गुरुजनों का वंदन करते हुए श्री सिंह ने अश्रुपूरित नेत्रों से प्रभागराज की महिमा तथा शिक्षा, साहित्य, न्याय, राजनीति और प्रशासनिक क्षेत्र में विशिष्ट अवदान करने वाली विभूतियों हृदय से स्मरण और वन्दन किया। सारस्वत साधना के क्षेत्र में अग्रणी महामनीषियों के तौर पर उन्होंने धर्मवीर भारती, अज्ञेय जी, सूर्यकान्त त्रिपाठी निराला, पंत जी, महादेवी वर्मा जैसी काव्य सृजन करने वाली प्रतिभाओं तथा नामवर सिंह और केदारनाथ सिंह जैसे भाषा विज्ञ समालोचकों का श्रद्धापूर्वक स्मरण किया।
वहीं, विज्ञान के क्षेत्र में परम श्रद्धेय रज्जू भइया (प्रो. राजेन्द्र सिंह) और सत्य प्रकाश जी का विशेष रूप से स्मरण करते हैं। इस प्रकार से श्री सिंह अपने गुरुजनों का बड़े ही भावुक मन से उल्लेख करते हैं। गुरुवर मास्टर श्री यशपाल सिंह, डॉ डी कुमार, डॉ. सैन, प्रो. पी. सी. गुप्त, प्रो. राजेन्द्र अग्रवाल, प्रो.एच.पी. तिवारी आदि उनके सम्मानित गुरुजन थे।
डॉ. दिनेशचन्द्र सिंह जी ने प्रयाग को ज्ञान, कर्म और प्रेम की त्रिवेणी कहकर तीर्थराज प्रयाग का वन्दन किया।
महाकुंभ में श्रद्धालुओं को सक्षम सुविधा और अद्यतन जानकारी के लिए निम्नवत सुविधायें प्रदान की गईं:- 1. श्रद्धालुओं और पर्यटकों की मदद के लिए ट्रेवल गाइड तैयार किए गए। 2. इनके मार्गदर्शन के लिए एआई चैटबॉट विकसित किया गया। भक्तों की मानसिक शांति के लिए हाईसाउंड थैरेपी की व्यवस्था की गई। 3. देश भर के कारीगरों और हस्तशिल्पियों का मिलन हुआ, जिससे लोगों को तरह-तरह के सामानों की जानकारी मिली। 4.श्रद्धालुओं को वोट राइड की सुविधा सुलभ कराई गई। 5. वेद-पुराणों की कथा का बखान करते चौराहे लोगों को दर्शनीय और प्रीतिकर लगते। 6. सांस्कृतिक मंचों पर गायन-वादन व नृत्य प्रस्तुतियां श्रद्धालुओं का मनोरंजन करतीं और प्राचीन काल के दिव्य भारत से जोड़ती थीं। 7.प्रत्येक दिशा में पार्किंग की व्यवस्था थी। 8. हाईवे के थानों पर चिकित्सा व्यवस्था कराई गई थी।
इस कृति के सम्पादक और वरिष्ठ पत्रकार कमलेश पांडेय के अनुसार जलवायु परिवर्तन सम्पूर्ण मानवता के लिए अभिशाप बनता जा रहा है। उत्तरप्रदेश के श्रद्धेय मुख्यमंत्री
योगी आदित्यनाथ ने लोकहित में 2025 के महाकुम्भ के विशाल धार्मिक, आध्यात्मिक और सांस्कृतिक आयोजन में आध्यात्मिक आस्था के साथ के जलवायु परिवर्तन से जोड़कर सम्पूर्ण प्राणि जगत पर उपकार किया है। अध्यात्म और विज्ञान के अनूठे समागम में पूज्य सन्त-महात्माओं की प्रतिभागिता बहुत ही उपयोगी और सुखद रही। ग्रीन हाउस गैसों का बढ़ता उष्मीय प्रभान (Global warming) जलवायु परिवर्तन का मूल कारण है।
वस्तुतः ग्लोबल वार्मिंग गैसों के कारण पृथ्वी के चारों ओर एक मोटी पट्टी जैसा आवरण बन गया है। इस मोटी पट्टी में सौरर विकिरण तो प्रवेश पा लेता है, लेकिन मोटे घने आवरण को पार कर सूर्य की किरणें वापस नहीं जा पाती। इससे पृथ्वी तथा गायुमंडल दोनों तपने लगते हैं। कार्बन डाइऑक्साइड यानी सीओ 2 की पट्टी पृथ्वी को चारों ओर से एक कम्बल की तरह लपेटे हुए है। ज्यों-ज्यों सीओ 2 सहित अन्य हरिगृह गैसें बढ़ने लगती हैं त्यों-त्यों भूमंडलीय तापन बढ्ने लगता है। वायुमंडल में गैसों की मात्रा प्रकृति द्वारा निर्धारित रहती है जो निम्नवत से समझा जा सकता है:- Co2-कार्बन डाईआक्साइड -55%
No2- नाइट्रस ऑक्साइड -6%
CHU- मीथेन- 15%
CFC - क्लोरोफ्लोरो कार्बन-24%
03- ओजोन
जीवाश्म ईंधन, जैसे- पेट्रोलियम, कोयला, प्राकृतिक गैस के दहन से प्रतिवर्ष 300 करोड़ टन से कहीं अधिक Co2 वायुमंडल में पहुंच रही है। वनों की अन्धाधुन्ध कटान, औद्योगीकरण, मशीनीकरण और शहरीकरण से 0.05% की दर से CO2 की वृद्धि हो रही है। यदि स्थिति में सुधार नहीं हुआ तो 2050 तक Co2 का उत्सर्जन दो गुना बढ़ जाएगा। भूमंडलीय तापन (Global warming) से जलवायु बुरी तरह से प्रभावित होगी। इससे समुद्री जलस्तर में 18 से. मी. में 56 से.मी तक की वृद्धि संभावित है। 9 पीसीसी की रिपोर्ट में आशंका व्यक्त की गई है कि 2080 तक विश्व के 3.2 अरब लोग पानी के लिए तरसेंगे। 60 करोड लोग भुखमरी के शिकार होंगे। है हिन्द-प्रशान्त क्षेत्र के कई द्वीप जलमग्न हो जायेंगे। ब्रिटिश वैज्ञानिकों के अध्ययन दल ने धरती के तापमान में 3℃ से 6℃ तक की वृद्धि की आशंका व्यक्त की है, जबकि तबाही मचाने के लिए 2 डिग्री सेंटीग्रेड की वृद्धि ही काफी है। गंगोत्री ग्लेशियर प्रति वर्ष अपने मूल स्थान से 23 मीटर पीछे खिसक रहा है। भारत नेपाल और चीन में बहने वाली 7 नदियां जिनमें गंगा, सिन्धु और ब्रह्मपुत्र का अस्तित्व संकट में है। भारत, चीन, पेरू, ब्राजील आदि देशो के पशु-पक्षियों की अनेक प्रजातियां विलुप्त हो रही हैं। ग्लोबल वार्मिंग में USA का 30.3%, यूरोप का 27.7%, रूस का 13.7% और भारत तथा चीन का 12.2% योगदान है। सधन वृक्षारोपण कर हरित पट्टी विकसित करने से वन क्षेत्रों का विस्तार होगा जिससे हम Co2 और O2 के बीच सम्यक सन्तुलन स्थापित कर सकेंगे। प्रदूषण के परिणाम नीरज जी
की निम्न पंक्तियों में अवलोकनीय है-
यह ध्वस्त धरा यह बम्ब धुएं से घायल नभ,
विज्ञान इसी को कहता क्या मानव विकास।
लोहे के कपड़े पहन शांति बिलखती है,
ढोते ढोते बारूद थक गया विकास।
उत्तर प्रदेश सरकार के तत्कालीन मुख्य सचिव श्री मनोज कुमार सिंह ने जलवायु परिवर्तन पर महाकुंभ में घोषणा करते हुए कहा कि धर्म और समाज दोनों के गहरे सम्बन्ध हैं। इस सम्मेलन से जो भी निष्कर्ष आए हैं, उसे यूपी सरकार अपने एक्शन प्लान का हिस्सा बनाएगी।
परमार्थ निकेतन के परमाचार्य चिदानन्द जी सरस्वती मुनि जी महाराज ने जोर देकर कहा कि यदि हम अब भी नहीं चेते और ऐसे ही सब चलता रहा तो न गंगा रहेगी और न यमुना। यदि कारगर कदम नहीं उठाए गए तो अगला महाकुंभ रेत पर होगा, नदी पर नहीं। हमें यूज एंड थ्रो कल्चर के स्थान पर यूज एण्ड ग्रो कल्चर की दिशा में काम करना होगा। धर्म और आस्था में समाज को प्रभावित करने की अपार शक्ति होती है। कोई भी कार्यवाही तबतक सफल नहीं हो सकती, जबतक यह समाज से सांस्कृतिक और भाबनात्मक रूप से नहीं जुड़ती।
डीएम डॉ. दिनेशचन्द्र सिंह जी के ये उद्गार विशेष रूप से उल्लेखनीय हैं कि हमारी सनातन संस्कृति कालजयी है, अनेक बाधाओं और प्रतिकूलताओं का सामना करते हुए यह आज भी जीवन्त है। राम और कृष्ण भी सनातन संस्कृति के उत्पाद हैं, उसके जनक नहीं। सनातन संस्कृति तब से है जब ईसा, सूसा और मोहम्मद कोई को अस्तित्व ही नही था।
पाश्चात्य चिन्तक और लेखक Mark Twain के अनुसार-"India is cradle of human race, birth place of human speech, mother of history, grand mother of legends and traditions"
भारत में विषम और नाजुक परिस्थितियों में राम और कुष्ण जैसे महापुरुषों का अवतरण हुआ। मुश्किलों का दौर समाप्त होते ही सनातन संस्कृति पहले भी अधिक मजबूत बनकर उभरती रही है। रामायण, महाभारत और भगवद्गीता जैसे धर्मग्रंथों ने मानवीय आचार संहिता का काम करते हुए सदैव इसे ऊर्जावान और जीवन्त बनाये रखा है।
गीता को greatest work on psychotherapy and new testament of India कहा गया है। मानव और मानवता को दिशा देने वाली भगवद गीता विश्व का सर्वश्रेष्ठ सर्वश्रेष्ठ आचार शास्त्र है। हिंदुत्व जैन और बौद्ध धर्म में समाया हुआ है। जैन, बौद्ध और हिन्दू धर्म का डीएनए बिल्कुल एक ही है।
पापों से मुक्ति और पुण्य अर्जित करने के लिए लोग कुंभ में अमृत स्नान करने के लिए जाते हैं। इस कृति डॉ सिंह ने कुंभ के पौराणिक और ऐतिहासिक पृष्ठभूमि पर प्रकाश डाला है। कुंभ के अभिप्राय और महत्व पर डॉ. दिनेशचन्द्र सिंह जी ने बड़े ही सुन्दर ढंग से प्रकाश डाला है। कुंभ का आध्यात्मिक महत्व के साथ ही ऐतिहासिक महत्व भी है।
ऋग्वेद और स्कन्द पुराण में ऐसे मेलों का जिक्र मिलता है। ह्वेनसांग नामक बुद्धिमान चीनी यात्री (भिक्षु) ने 5 वर्ष तक भारत भ्रमण किया। इस बीच उसने नालन्दा विश्वविद्यालय में संस्कृत विषय की पढ़ाई भी की।
644 ई. सन में ह्वेनसांग सम्राट हर्षबर्द्धन के साथ कुंभ मेले में गया था। वह उस विराट मानव समागम (मेले) को देख कर दंग रह गया। उस समय कुंभ में श्रदालुओं की संख्या करीब 5 लाख थी। कुंभ के सुअवसर पर दान शिरोमणि दाता हर्षबर्धन ने अपनी सम्पूर्ण सम्पत्ति (अर्जित धन), यहाँ तक कि अपने शरीर के वस्त्राभूषण भी दान कर दिया था।
वह अपनी बहन राजश्री से वस्त्र लेकर शरीर पर धारण करता था। 8वीं सदी के महान हिन्दू सन्त और विद्वान दार्शनिक आदि शंकराचार्य ने चार स्थान पर कुंभ मेले के आयोजन को औपचारिक रुप प्रदान किया। यथा-
पहला, प्रयागराज; दूसरा, हरिद्वार; तीसरा, नासिक और चौथा, उज्जैन।
12 वीं शताब्दी के भक्ति आन्दोवन से जुड़े नायनार और आलवर सन्तों तथा उनके लाखों शिष्यों ने इस धार्मिक महाआयोजन की महनीयता का बखान कर उसे जन-जन के श्रद्धा का केन्द्र बना दिया।
महाकुंभ का धार्मिक आध्यात्मिक, सांस्कृतिक और सामाजिक महत्व के साथ-साथ आर्थिक महत्व भी है। करोड़ों श्रद्धालुओं की जरूरतों को पूरा करने के लिए सामानों की उचित मूल्य पर उपलब्धता हेतु व्यापार और कारोबार की समुचित व्यवस्था की गई थी। इस दुनिया के सबसे बड़े समागम में 66 करोड़ श्रद्धालुओं का आगमन हुआ था। 2025 के इस महाआयोजन से उत्तर प्रदेश सरकार को 3.5 लाख करोड़ रुपये का लाभ हुआ था। इसमें 60 लाख लोगों को रोजगार मिला।
साधु-सन्तों की भव्य दिव्य शोभा यात्रा, गूंजते मन्त्रोच्चार, संगम तट के हवन-पूजन, पुण्य-दान, धार्मिक अनुष्ठान, कथा, प्रवचन, सत्संग, संवाद, सांस्कृतिक कार्यक्रम और योग-साधना के दृश्य बहुत ही प्रेरणास्पद, अनुकरणीय और प्रीतिकर लगते थे।
डॉ दिनेशचन्द्र सिंह जी, आईएएस जौनपुर के सुयोग्य, कर्मठ, हरदिल अजीज और प्रतिभासम्पन्न जिलाधिकारी हैं। आप हर कार्य निष्ठा, तन्मयता, लगन और जुनून के साथ सम्पन्न करके एक मिसाल प्रस्तुत करते हैं। 10,11, 12 मार्च 2015 को जौनपुर के शाही किले (ऐतिहासिक इमारत) में जौनपुर महोत्सव सादगी पूर्ण तरीके के साथ सम्पन्न हुआ। इस कार्यक्रम में 1001 कन्याओं का कन्यादान उ०प्र० के यशस्वी मुख्यमन्त्री योगी आदित्यनाथ जी के कर कमलों से सम्पन्न हुआ। यह पुनीत, पुण्यबर्द्धक और परोपकार का कार्य वन्दनीय था। कार्यक्रम में मन्त्री गिरीशचन्द्र यादव जी भी उपस्थित थे। करीब 1000 स्थानीय कलाकारों और छात्र-छात्राओं को मंच प्रदान किया गया। शिक्षा के क्षेत्र में जौनपुर का मूलनाम मननपुर बताया जाता है।
फिरोजशाह तुगलक ने अपने भाई जूना खां के नाम से जौनपुर का नामकरण किया था। जौनपुर का शर्की राजवंश मध्यकालीन भारत का एक मुस्लिम राज्य था जिसकी स्थापना 1394 में मलिक सरवर ने की थी। अटाजा मस्जिद और जामा मस्जिद यहाँ की प्रसिद्ध इमारतें हैं।
जननी और जन्मभूमि को स्वर्ग में भी महान बताया गया है।
अपने गृह जनपद बिजनौर के उल्लेख के साथ डीएम डॉ सिंह बताते है कि बिजनौर में ही गंगा और
मसिनी नदी के संगम पर स्थित महर्षि कण्व के ही आश्रम में दुष्यन्त-शकुन्तला का गंधर्व विवाह हुआ था। इसी युगल जोड़ी से भरत का जन्म हुआ था। कालांतर में इन्ही के नाम से अपना देश भारत कहलाया। इस महान चक्रवर्ती नरेश ने गंगा तट पर 55 और यमुना के तट पर 78 अश्वमेध यज्ञ सम्पन्न किये थे।
भगवान कृष्ण के अनन्य भक्त, दार्शनिक और नीतिशास्त्र के ज्ञाता व सृजेता महात्मा विदुर का आश्रम आज भी बिजनौर में विद्यमान है।
डॉ० सिंह संस्कार विहीन मौजूदा शिक्षा पद्धति के स्थान पर गुरुकूल की शिक्षा को प्राथमिकता देते हैं। मैकाले की शिक्षा व्यवस्था ने देश के महापुरुषों, नीति, संस्कार और परम्पराओं के प्रति अनास्था पैदाकर गहरा आधात पहुंचाया है। 1823 के दौरान देश में साढ़े सात लाख गाँव और 7 लाख 32000 गुरुकुल थे। गुरुकुल में 18 नियम पढ़ाए जाते थे। इन्हें very high learning institute कहा जाता था। बच्चा और देशभक्ति, धर्म, संस्कृति और परंपराओं तथा अन्य विषयों की शिक्षा दी जाती थी।
डॉ० सिंह ने निष्काम कर्म और कर्तव्य को ही अनुकरणीय बताया है। लेखक ने बिजनौर में जन्मे सुल्ताना डाकू के कार्य-व्यवहार पर भी इस कृति में प्रकाश डाला है। घुमंतू भातू जनजाति के सुल्ताना डाकू ने 17 वर्ष की आयु में अंग्रेजों द्वारा धर्मपरिवर्तन को मजबूर किये जाने पर डकैती का मार्ग अपनाया। वह एक बड़े गिरोह के साथ अमीरों को लूटकर प्राप्त धन को गरीबों में बांट देता था। सुल्ताना को गरीबों का मसीहा और भारत का रॉबिन हुड कहा गया।
वह उत्तर प्रदेश, मौजूदा उत्तराखंड,, पंजाब, वर्तमान हरियाणा और दिल्ली तक के क्षेत्रों में डकैती करता था। गरीब जनता उसे दिल से चाहती थी। एक बार एसपी फ्रेडी यंग- सुल्ताना के गिरफ्त में आ गया था, पर बाद में उस पर दया करके छोड़ दिया था। नाजीबाबाद का किला उसका मुख्य ठिकाना था। अंग्रेज पुलिस ऑफिसर फ्रेडी यंग सुल्ताना के गिरोह के कुछ लोगों को मिलाकर उसके मुखबिरों को तोड़ने में सफल हो गया।
फिर उसने बड़ी होशियारी से सुल्ताना के छिपने के स्थान पर छापा मार कर उसे गिरफ्तार कर लिया। 23 जून 1923 को सुल्ताना डाकू को गिरफ्तार कर लिया गया। 7 जुलाई 1924 को उसे आगरा सेंट्रल जेल में फांसी की सजा दी गई। फांसी से एक दिन पहले फ्रेडी यंग जेल में सुल्ताना से मिला और उसकी अन्तिम इच्छा जाननी चाही। इस पर सुल्ताना ने फ्रेडी यंग से निवेदन करते हुए कहा कि उसके एकमात्र पुत्र को इज्जतदार जिन्दगी जीने योग्य बनाया जाये।
फ्रेडी यंग ने सुल्ताना की इच्छा को पूरी करते हुए उसके बेटे को गोद लेकर बच्चे की पढ़ाई लन्दन में कराकर उसे सुयोग्य बनाने के बाद पुलिस विभाग में ही अधिकारी के रूप में तैनात करवा दिया।
डॉ दिनेशचन्द्र सिंह जी के अनुसार, बिजनौर के पवित्र मिट्टी की यह तासीर ही थी कि उसके प्रभाव से एक डाकू भी गरीबों का मसीहा बन गया। एक अनपढ़ व घुमन्तू जाति में पैदा होने के बावजूद भी सुल्ताना ने एक परिपक्व सनातनी हिन्दू की पहचान बनाई थी। वह अंग्रेजों के चाटुकार मुस्लिम और हिन्दू अमीरों और गरीबों का खून चूसने वाले सेठ-साहूकारों को ही लूटता था और लूट का माल गरीबों में बांट देता था।
बहरहाल बहुत ही पिछड़े, खस्ताहाल और घुमन्तू भातू जनजाति (कंजर) के बहुत सारे लोग मुरादाबाद की सदर तहसील और कांट तहसील में स्थायी रूप से बस चुके हैं। सदर तहसील का नवादा मोहल्ला अब आदर्श कालोनी के रूप में जाना जाता है। मूल निवासियों से इनके पारिवारिक सम्बन्ध बन चुके हैं। पहले ये लोग शिकारी, शराब की भट्टी चलाने वाले, चोरी और राहजनी आदि करने वाले लोगों के रूप में जाने जाते थे।
डॉ. दिनेशचन्द्र सिंह, आईएएस ने 12 मई 2025 को पड़ने वाली वैवाहिक वर्षगांठ को वृक्षारोपण, गौ सेवा और पशु-पक्षियों को समर्पित क कर एक अभिनव मिसाल कायम की है। धर्मग्रंथों में वृक्षारोपण को पुण्य कार्य बताया गया है।
कहा गया है कि "To cultivate a garden is to walk with Good!" वृक्ष भूतल के लिये एक प्राकृतिक छतरी का निर्माण करते हैं। ऊष्मीय सन्तुलन बनाये रखते हैं। हरितगृह प्रभाव को कम करते हैं। वन और जैव विविधत और ईको सिस्टम की मूलाधार है। वृक्ष सारे जन्तु जगत के जीवन के आधार हैं। ये प्राकृतिक संतुलन को बनाये रखते हैं।
ऋग्वेद की एक ऋचा में कहा गया है-
"यतते भूमो विश्व नामि, सिक्तं तदपि रोहतु।"
अर्थात विश्व भर में जितनी भी खाली भूमि पड़ी हुई है, सब पर वृक्ष लगाओ।
गौ सेवा सबसे बड़ी सेवा है। "Without reference of cow no function and ceremony was ever perfomed.
It was given status of mother. Indian cow is treasure of medicine and moving hospital." गौमूत्र को आयुर्वेद में संजीवनी कहा गया है।
गौ माता से प्राप्त होने वाला पंचगव्य जीवन को स्वस्थ और निरोग बनाता है। गाय के दूध में बड़ी मात्रा में पोषक तत्व पाने जाते हैं, इसलिये दूध को सन्तुलित आहार कहा गया है।
डीएम दिनेश चन्द्र सिंह जी की वैवाहिक वर्षगांठ पर हार्दिक शुभकामनाओं के साथ उनके सुन्दर स्वास्थ्य, आनन्दमय जीवन और यशस्वी भविष्य की मंगलकामना करता हूँ। विवाह केवल शर्तों का बन्धन नहीं है, यह जन्म-जन्मान्तर का पवित्र रिश्ता है, जो शाश्वत प्रेम के धागे से दो दिलों को जोड़ता है। यह प्रेम और मिलन का अनूठा संगम है। ठीक ही कहा गया है- "यह जीवन दान और प्राप्ति का अनुबन्ध है, जितना लुटाओगे, आगे अधिक पाओगे।"
पाकिस्तान और भारत के बीच में इस समय युद्धविराम (Cease fire) चल रहा है। डॉ० दिनेशचन्द्र सिंह, आईएएस का इस प्रकरण पर कहना है कि यदि अब पुनः सीजफायर
टूटा तो इसके परिणाम पाकिस्तान के लिए बड़े ही भयावह होंगे। पहले अल्लाह, आर्मी और अमेरिका पाकिस्तान के मूलाधार थे। बाद में चीनी अजगर पाकिस्तान से ताल-मेल स्थापित कर उसके बहुत बड़े भूभाग को निगल गया। वर्तमान में पुनः पाकिस्तान की पीठ पर अमेरिका का हाथ है। भारत के पास जहाँ अपनी एक शक्तिशाली सेना है, वहीं पाकिस्तानी सेना के पास एक देश है। पाकिस्तानी सेना के शोषण से वहां त्राहि-त्राहि मची हुई है।
भारत और पाकिस्तान के बीच अब तक चार युद्ध हो चुके हैं। पाकिस्तान निरन्तर परमाणु बम गिराने की धमकी दे रहा है। पाकिस्तान को मालूम होना चाहिए कि उससे कहीं अधिक शक्तिशाली बम भारत के पास है। मोदी जी की अरखण्ड और अटूट देशभक्ति, अदम्य साहस और अक्षय ध्येयनिष्ठा से सर्व समर्थ बन चुका भारत अब पहले जैसा नही रहा।
22 अप्रैल 2025 को पहलगाम में हुए दिल दहला देने वाले क्रूरतम आतंकी हमले में 26 नागरिकों को उनका धर्म पूछकर मौत के घाट उतार दिया गया। इसका करारा जबाब आपरेशन सिन्दूर के द्वारा दिया गया। विंग कमाण्डर व्योमिका सिंह के अनुसार- भारत ने आपरेशन सिन्दूर द्वारा पाकिस्तान के 9 आतंकी ठिकानों को मात्र 22 मिनट में ध्वस्त कर तबाही मचा दी। इसमें सैकड़ों आतंकवादी मौत के शिकार हुए। 7 मई को आपरेशन सिन्दूर लांच किया गया। 4 दिन के भीषण संघर्ष के दौरान पाकिस्तान के हवाई बेस, हवाई अड्डों और सेना की छावनियों पर तुफानी मिसाइल हमले हुए। पाकिस्तान दहशत में आ गया। घुटने के बल आकर पाकिस्तान जब युद्ध विराम, शांति और समझौते के लिए गिड़गिड़ाने लगा तो 10 मई को दोनों देशों के बीच युद्ध विराम हो गया। यदि पाकिस्तान ने युद्ध विराम को तोड़ा तो वह जबाबी कार्रवाई में बर्बाद हो जायेगा।
ज्ञातव्य है कि पाकिस्तान से घुरहू बिन्द के पार्थिव शरीर को प्राप्त करके उसे जौनपुर के उसके पैतृक गाँव भेजवाकर जिलाधिकारी डॉ दिनेशचन्द्र सिंह जी ने उल्लेखनीय कार्य किया। घुरहू बिन्द गुजरात की एक फिशरीज कम्पनी के माध्यम से समुद्र में महली पकड़ने का कार्य कर रहे थे। एक दिन संयोग से उसकी नाव एन पाकिस्तान की सीमा में पकड़ ली गई। मानसिक और शारीरिक संत्रास एवं उत्पीड़न से उसकी मृत्यु हो गई। सरकार और अधिकारियों से डॉ दिनेशचन्द्र जी, डीएम ने कारगर सम्पर्क साधकर घुरहू बिन्द के शव को उसके पैतृक गाँव भेजवाने का करिश्माई और प्रशंसनीय कार्य संपन्न किया।
डॉ दिनेश चन्द्र सिंह ने कई जिलों के जिलाधिकारी के रूप में कार्य करते समय जैविक खेती पर विशेष रूप से ध्यान केन्द्रित किया। उसके लिए उन्होंने किसान गोष्ठियों के माध्यम से ढैंचा की बुवाई हेतु किसानों को प्रोत्साहित किया। बुवाई के 45 दिन बाद तैयार ढैंचा के खेत में जुताई कर मिट्टी और ढैंचा को एक में मिला दिया जाता है।
ढैंचा से मिट्टी में नाइड्रोजन, फास्फोरस और पोटाश की मात्रा बढ़ जाती है। ढैंचा की गाठों में नाइट्रोजन भरा रहता है। मिट्टी की उर्वरा शक्ति बढ़ाने के लिए एक बढ़िया प्राकृतिक उर्वरक का उत्पादन ढैंचा से किया जा सकता है।
विशेष रूप से उल्लेखनीय है कि महाकुंभ में भगदड़ के दौरान प्रयागराज जाने वाले सभी मार्गों को बन्द कर दिया गया था। जौनपुर सहित मार्ग में पड़ने वाले सभी जनपदों की सीमा सील कर दी गई थी। वैरिकेटिंग कर वाहन रोक दिए गये थे। एक दिन के लिए कक्षा आठ तक के विद्यालय बन्द कर दिए गये थे। जिलाधिकारी डॉ० दिनेशचन्द्र सिंह जी ने मार्ग (जौनपुर) के हर सम्बन्धित स्थान पर जाकर बड़ी तत्परता के साथ निरीक्षण किया और बड़े ही आत्म भाव से श्रद्धालुओं का हाल-चाल सुनकर आवास, जलपान, भोजन, शौचालय और विश्राम की व्यवस्था तत्काल सुनिश्चित करने हेतु सम्बन्धित अधिकारियों को आदेश दिए। त्वरित गति से व्यवस्था हेतु सक्षम अधिकारी नियुक्त किये गये। कई स्थानों पर जिलाधिकारी स्वयं जलपान आदि का वितरण कराते हुए देखे गये। अनेक स्वयंसेवी संगठनों ने भी व्यवस्था में प्रतिभाग किया। जिलाधिकारी महोदय ने श्रद्धालुओं और सेवा में लगे हुए लोगों से संवाद कर उन्हें प्रोत्साहित किया। मार्ग खुलने पर प्रयागराज जाने की समुचित व्यवस्था कराई गई।
सच कहूं तो "दुर्लभ तथ्यों से भरपूर यह असाधारण कृति ज्ञान की भंडार है। आशा करता हूँ कि लेखक के उत्कृष्ट मनीषा की परिचायक यह कृति प्रभु श्रीराम की कृपा से विद्वानों और आमजनों में समान रूप से सम्मानित होगी। यह कृति आपको लोकप्रियता की बुलन्दी प्रदान करेगी।"
# परमेश्वर सिंह, परमेन्द्रा कुटीर, कोट बाजार पयागपुर, बहराइच (उ०प्र०)
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