अमेरिका-इंग्लैंड के 'लोकतांत्रिक आतंकवाद' और चीन-रूस के 'साम्यवादी आतंकवाद' के बीच पिसते भारत-इजरायल के 'वैश्विक मानवतावाद' को ऐसे समझिए
अमेरिका-इंग्लैंड के 'लोकतांत्रिक आतंकवाद' और चीन-रूस के 'साम्यवादी आतंकवाद' के बीच पिसते भारत-इजरायल के 'वैश्विक मानवतावाद' को ऐसे समझिए
@ कमलेश पांडेय/वरिष्ठ पत्रकार व राजनीतिक विश्लेषक
दुनिया के थानेदार अमेरिका-इंग्लैंड के 'लोकतांत्रिक आतंकवाद' और उनके धुर विरोधी चीन-रूस के 'साम्यवादी आतंकवाद' के बीच पिसते भारत-इजरायल के 'वैश्विक मानवतावाद' को बचाना आज तीसरी दुनिया के देशों की पहली प्राथमिकता होनी चाहिए, अन्यथा पूरा मुल्क ईरान-अफगानिस्तान जैसे आतंकियों के सरगनाओं के द्वारा शासित किया जाएगा और इनकी घिनौनी सांप्रदायिक हरकतों के खिलाफ जो भी आवाज उठाएगा, वह कुचला जाएगा।
यहां पर भारत के साथ इजरायल का जिक्र करना इसलिए जरूरी है कि दोनों देश भले ही इस्लामिक कट्टरवाद के खिलाफ लड़ रहे हैं, लेकिन दोनों के तौर तरीके अलग-अलग हैं। एक तरफ इजरायल जहां डंके की चोट पर यहूदियों को समाप्त करने के ख्वाब देखने वालों के ऊपर चोट करता है, वहीं भारत की नीतियां इतनी अस्पष्ट हैं कि हिंदुओं के खिलाफ लगातार विषबमन करने वाले पाकिस्तान-बंगलादेश जैसे 'हरामी मुल्कों' व उनके सहयोगियों के खिलाफ निर्णायक कदम उठाने के बावजूद वह पीछे चला जाता है, ताकि 56 मुस्लिम देशों को एकजुटता का कोई बहाना न मिल जाए। वहीं, ईसाई मुल्क अमेरिका की दोगली नीति और बौद्ध मुल्क चीन के अनवरत षड्यंत्रों के चलते भी भारत को मन मारकर रहना पड़ता है। इससे इन कुचक्र कारियों के हौसले बढ़ते हैं।
लेकिन, बहुत कम लोगों को पता होगा कि एशिया-यूरोप-अफ्रीका की इस्लामिक दुनिया सिया और सुन्नी नामक दो खेमों में बंटी हुई है, जिसमें सिया समर्थक मुस्लिम देशों का नेतृत्व जहां ईरान करता है, वहीं सुन्नी समर्थक मुस्लिम देशों का नेतृत्व सऊदी अरब-यूएई करता है। वहीं, अमेरिका-चीन दोनों के हाथों बिका हुआ पाकिस्तान एक ऐसा हरामी मुल्क है, जो आतंकवादियों को पैदा करके पूरे मुस्लिम वर्ल्ड को बदनाम कर चुका है। चूंकि कभी अमेरिकी गुट और कभी चीनी गुट के इशारे पर वह विभिन्न देशों में आतंकवादी घटनाओं को अंजाम दिलवाता रहता है, इसलिए यह पूरी मानवता के लिए कलंक समझा जा रहा है।
चूंकि सुन्नी बहुल देश पाकिस्तान और सिया बहुल देश ईरान एक दूसरे के पड़ोसी हैं, इसलिए वो अपने अपने इस्लामिक हितों के हिसाब से कट्टर आतंकवादी पैदा करते-करवाते रहते हैं। एक तरफ ईरान की आतंकी हरकतों से यहूदी देश इजरायल तबाह हो रहा है तो दूसरी तरफ पाकिस्तान की आतंकी हरकतों से हिन्दू देश भारत तबाह हो रहा है। इस मामले में पाकिस्तान इतना शातिर देश है कि वह अमेरिका, यूरोपीय देशों व एशियाई देशों में भी आतंकी हमले करवाकर अपनी महत्ता बरकरार रखने की कोशिश करता आया है। बावजूद इसके, पाकिस्तान को अमेरिका, इंग्लैंड, फ्रांस, जर्मनी, इटली जैसे मुल्क खुलेआम संरक्षण और वित्तीय मदद देते दिलवाते हैं, तो ईरान को रूस-चीन की मदद मिलती रहती है।
सच कहा जाए तो दुनियाभर की इन्हीं महाशक्तियों के दो परस्पर विरोधाभाषी गुटों के चलते, इनके पारस्परिक कुचक्रों के बीच भारत-इजरायल जैसे प्रगतिशील देश पीस रहे हैं, जो अंतरराष्ट्रीय चिंता की बात होनी चाहिए। लेकिन ऐसा नहीं है। अमेरिका इन्हें हथियारों के बड़े बाजार के रूप में देखता है और रूस-चीन को भी यही नजरिया विकसित करने के लिए उकसाता भी रहता है। इनकी इस घिनौनी अंतरराष्ट्रीय प्रवृति का कोई चेक एंड बैलेंस नहीं है। यदि सच कहूं तो दुनिया को सुव्यवस्था व सुशासन देने के प्रयासों में राष्ट्रसंघ की तरह ही संयुक्त राष्ट्र संघ की विफल हो चुका है और अमेरिकी-यूरोपीय नाटो देशों की मनमानी और चीन-रूस की पलटमार नीतियों से दूसरी पंक्ति के कई देश या तो बर्बाद हो चुके हैं, या फिर बर्बादी के कगार पर खड़े हैं।
यदि अमेरिका-वियतनाम युद्ध, अमेरिका-लीबिया युद्ध, अमेरिका-इराक युद्ध, अमेरिका-अफगानिस्तान रस्साकशी की बातें भुला भी दी जाएं तो अमेरिकी शह पर छिड़ने वाले रूस-यूक्रेन युद्ध, इजरायल-फिलिस्तीन युद्ध, इजरायल-ईरान युद्ध के बहाने जिस तरह से अमेरिका व यूरोपीय देशों की फितरत को चीन-रूस के द्वारा चुनौती दी गई है, उससे कई वैश्विक सवाल खड़े हो रहे हैं। पहला, क्या हथियारों की आपसी होड़ पैदा करके भारी मुनाफ़ा कमाना और लोकतांत्रिक मूल्यों को कुचलना चिंता की बात नहीं है?
दूसरा, अमेरिका-सोवियत संघ (रूस) की रस्साकशी अब भले ही अमेरिका-रूस व अमेरिका-चीन की रस्साकशी में तब्दील हो चुकी हैं, लेकिन इनकी साम्राज्यवादी नीतियों के कुचक्र में जो देश फंसे, वो युद्ध और आपसी संघर्ष में बर्बाद ही हो गए। वियतनाम, लीबिया, इराक, ईरान, सीरिया, अफगानिस्तान, यूक्रेन आदि देशों का नाम प्रमुखता से लिया जा सकता है। वहीं, फिलिस्तीन, ताइवान, तिब्बत, कश्मीर, पाकिस्तान, बंगलादेश, म्यांमार, दक्षिण चीन सागर आदि देशों/इनसे जुड़े इलाकों के सवाल को जिस तरह से भड़काया/भड़कवाया जा रहा है, उससे निकट भविष्य में आपसी युद्ध के कई और मोर्चे खुलने की संभावनाएं बलवती है। इनमें इजरायल, चीन, भारत, वियतनाम, फिलीपींस, इंडोनेशिया, जापान आदि देशों की चुनौतियां बढ़ सकती हैं, क्योंकि इससे अमेरिका-चीन-भारत के हित सीधे जुड़े हुए हैं।
चूंकि भारत एक गुटनिरपेक्ष देश है और वह तीसरी दुनिया के देशों यानी ग्लोबल साउथ के विभिन्न हितों की वकालत वैश्विक मंचों पर करता आया है, इसलिए भारत की जिम्मेदारी बड़ी है। लेकिन अकेला चना भाड़ नहीं फोड़ सकता वाली कहावत उसकी गुटनिरपेक्षता पर भी लागू होती है। आज वह अमेरिका और रूस, दोनों के खेमों में है और दोनों के इशारों पर थिरकने वाले मुस्लिम देशों से भी मधुरतम सम्बन्ध बनाये रहता है। ऐसा इसलिए कि मोदी प्रशासन सबका साथ, सबका विकास व सबका विश्वास वाली देशी नीतियों को भी ग्लोबल परिवेश में भी अपना लिया और बढ़ावा दिया। इससे दुनियाभर के गुटबाज देश भी यह नहीं समझ पा रहे हैं कि भारत आखिर चाहता क्या है?
जहां तक मैं समझता हूं कि भारत सबका हित चाहता है। यदि सभी देश एक दूसरे से लड़कर बर्बाद हो जाएंगे, फिर भी भारत उफ तक नहीं करेगा। क्योंकि दुनियाभर में ईसाइयों की तादात सबसे ज्यादा है जो धनी व तकनीकी संपन्न भी हैं। वहीं मुस्लिमों की आबादी दूसरे पायदान पर है जो अपनी वैश्विक कट्टरता के लिए जाने जाते हैं। चूंकि हिंदुओं की आबादी तीसरे नम्बर पर है, इसलिए भारत खुद को किसी खेमे से नहीं जोड़ता और गुटनिरपेक्ष बना रहता है। यह स्थिति भारत के लिए अनुकूल कम, प्रतिकूल ज्यादा है, क्योंकि विगत 150 सालों में वह अपने कई महत्वपूर्ण भूभाग पड़ोसियों के हाथों गंवा चुका है। इसलिए यूनिफिकेशन ऑफ इंडिया/भारत जरूरी है।
कहना न होगा कि बृहत्तर भारत यानी ग्रेटर इंडिया बनाने के लिए हमारे राष्ट्रीय नेतृत्व को प्रतिबद्धता और दूरदर्शिता दोनों दिखानी चाहिए। रूस-इजरायल जैसे बहुमूल्य साथियों को नहीं खोना चाहिए। बसुधैव कुटुंब कम अच्छा सिद्धांत है, लेकिन जैसे को तैसा की तर्ज पर जवाब दिए बिना इसका भी कोई महत्व नहीं है। यही अकाट्य सत्य है। अमेरिका-इंग्लैंड के 'लोकतांत्रिक आतंकवाद' और चीन-रूस के 'साम्यवादी आतंकवाद' के बीच पिसते भारत-इजरायल के 'वैश्विक मानवतावाद' को इसी तरीके से पुनर्स्थापित किया जा सकता है, अन्यथा मार्ग कंटकाकीर्ण बना रहेगा।
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