तो क्या उपराष्ट्रपति जगदीप धनखड़ ने पर्दे के पीछे से विपक्षी पिच पर खेलने की भारी कीमत चुकाई?

 तो क्या उपराष्ट्रपति जगदीप धनखड़ ने पर्दे के पीछे से विपक्षी पिच पर खेलने की भारी कीमत चुकाई?


@ कमलेश पांडेय/वरिष्ठ पत्रकार व राजनीतिक विश्लेषक

मैंने अपने आलेखों के माध्यम से समय रहते ही आरएसएस-भाजपा को आगाह कर दिया था कि केंद्र सरकार, भाजपा और संघ के महत्वपूर्ण लोगों के बीच दरार डालने के लिए अमेरिकी, चीनी व पाकिस्तानी खुफिया एजेंसियां सक्रिय हैं, ताकि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की सरकार, उनकी पार्टी भाजपा और उनके पथप्रदर्शक-मार्गदर्शक आरएसएस को हर हाल में कमजोर बनाया जा सके। हैरत की बात है कि इसका सहज शिकार खुद जगदीप धनखड़ ही हो गए। अन्य किन-किन लोगों पर एजेंसियों ने पर्दे के पीछे से डोरा डाला है, यह तो किसी अन्य खुलासे या कार्रवाई के बाद ही पता चलेगा।

ऐसा इसलिए कि केंद्र सरकार जब जस्टिस यशवंत वर्मा के खिलाफ लोकसभा में महाभियोग लेकर आई, तो उस समय तक केंद्र सरकार की योजना थी कि लोकसभा स्पीकर की अगुवाई में जस्टिस वर्मा को हटाने की प्रक्रिया शुरू होगी और ये कार्य केंद्र सरकार सर्वसम्मति से करेगी, ताकि न्यायपालिका में और न्यायपालिका के प्रति जनमानस में कोई गलत संदेश नहीं जा सके। लेकिन तभी राज्यसभा में वो हुआ, जिसने भाजपा रणनीतिकारों से लेकर केंद्र सरकार तक को हिला कर रख दिया। दरअसल, उपराष्ट्रपति व राज्यसभा के सभापति जगदीप धनखड़ ने अचानक से राज्यसभा में जस्टिस वर्मा के ख़िलाफ़ विपक्ष द्वारा लाए गए महाभियोग के नोटिस को स्वीकार कर लिया और बताया कि इस नोटिस पर 63 सांसदों के हस्ताक्षर थे और ये सभी सांसद विपक्ष के थे। 

चर्चा है कि जगदीप धनखड़ ने ये सब तब किया, जब राज्यसभा में नेता सदन जेपी नड्डा और संसदीय कार्य मंत्री किरण रिजिजू अनुपस्थित थे। वहीं, सिर्फ क़ानून मंत्री अर्जुन राम मेघवाल और जी किशन रेड्डी ही सदन में मौजूद थे। लिहाजा जैसे ही सभापति जगदीप धनखड़ ने विपक्ष का प्रस्ताव स्वीकार किया, तो मेघवाल और रेड्डी के चेहरे की हवाइयां उड़ गई। ऐसा इसलिए कि जगदीप धनखड़ ने केंद्र सरकार को भरोसे में लिए बिना ही विपक्ष का प्रस्ताव स्वीकार कर लिया था। 

बताया जाता है कि केंद्र सरकार जहां लोकसभा में प्रस्ताव लाकर जस्टिस वर्मा को हटाने की प्रक्रिया का नेतृत्व कर प्रस्तावित न्यायिक सुधार की एक बड़ी मिसाल पेश करने जा रही थी, वहीं जगदीप धनखड़ ने राज्यसभा के माध्यम से इसमें विपक्ष की भी एंट्री करा दी, जो सरकार को नागवार गुजरी। वहीं, केंद्र सरकार के भरोसेमंद लोगों की मानें तो ये सबकुछ जस्टिस वर्मा को बचाने की एक गुप्त योजना का हिस्सा था, क्योंकि विपक्ष के कई नेता जस्टिस वर्मा को हटाने के विरोध में बोल चुके थे। इस प्रकार चर्चा है कि जो सभापति धनखड़ मीडिया के सामने न्यायिक गंदगी के खिलाफ हुंकार भर रहे थे, वही जगदीप धनखड़ राज्यसभा में विपक्ष के एजेंडे को आगे बढ़ाकर जस्टिस वर्मा को बचाने की प्रक्रिया का हिस्सा भी बन गए थे। आखिर उन्होंने ऐसा जोखिम क्यों लिया, यह तो वही बता सकते हैं।

इसके अलावा, विपक्ष प्रयागराज हाईकोर्ट के जज जस्टिस शेखर यादव को हटाने के लिए भी महाभियोग प्रस्ताव लाने जा रहा था, जिन्होंने विश्व हिंदू परिषद के एक कार्यक्रम में दो टूक शब्दों में कहा था कि यह देश कठमुल्लों से नहीं बल्कि कानून के हिसाब से चलेगा। ऐसे में सुलगता हुआ सवाल है कि आखिर उपराष्ट्रपति धनखड़ विपक्ष के इस आपत्तिजनक प्रस्ताव को स्वीकार करने को तैयार कैसे हो गए थे? चर्चा थी कि मंगलवार को विपक्ष का यह प्रस्ताव आना था, जबकि केंद्र सरकार को इसकी कोई जानकारी नहीं थी। 

इसका साफ अर्थ यह हुआ कि जो केंद्र सरकार लोकसभा के माध्यम से जस्टिस वर्मा को हटाने जा रही थी, उसी के एक अहम अंग समझे जाने वाले उपराष्ट्रपति व राज्यसभा के सभापति जगदीप धनखड़ ने राज्यसभा के माध्यम से उसमें विपक्ष को शामिल कर जस्टिस वर्मा को बचाने की पिच तैयार कर दी थी। वहीं जो केंद्र सरकार जस्टिस शेखर यादव को बचाने में लगी थी, जगदीप धनखड़ ने केंद्र को बताए बिना ही विपक्ष के महाभियोग प्रस्ताव को स्वीकार कर जस्टिस यादव को हटाने की प्रक्रिया शुरू करने वाले थे। कहने का तातपर्य यह कि जगदीप धनखड़ विपक्ष की उस प्रक्रिया का हिस्सा बन गए थे, जिसके तहत नोटों के बोरे के मामले में फंसे जस्टिस वर्मा को बचाया जाना था और संघ के आनुषंगिक संगठन वीएचपी के मंच से हिंदुत्व की हुंकार भरने वाले जस्टिस शेखर यादव को हटाया जाना था।

हैरत की बात है कि यह उस भाजपा की सरकार में किए जाने का षड्यंत्र रचा गया था, जो भाजपा आरएसएस का ही एक आनुषंगिक संगठन है। चूंकि धनखड़ पहले समाजवादी, फिर कांग्रेसी सियासत करते हुए भाजपा में आए थे, इसलिए भाजपा और संघ के रणनीतिकारों को यह शक हुआ कि कहीं ये किसी षड्यंत्र का हिस्सा तो नहीं बन रहे हैं! इसलिए अविलंब उन्हें चलता करवाया गया। जरा सोचिए कि ये आरएसएस, बीजेपी, वीएचपी और खुद पीएम नरेंद्र मोदी के लिए कितनी शर्म की बात होती कि वीएचपी के मंच से हिंदुत्व की बात करने वाले जज को बीजेपी की सरकार में विपक्ष द्वारा बीजेपी के बनाए उपराष्ट्रपति के सहयोग से हटा दिया जाता? 

यही कारण था कि विपक्ष पिछले दो-तीन महीने से उपराष्ट्रपति धनखड़ के खिलाफ आक्रामक था, क्योंकि राज्यसभा के सभापति जगदीप धनखड़ अंदरखाने में शायद उनके अपने हो चुके थे, जबकि दिखावा कुछ और कर रहे थे। संभवतः विपक्ष की योजना थी कि राज्यसभा में केंद्र सरकार के बिल रोके जाएंगे। सरकार को राष्ट्र के सामने शर्मशार किया जाएगा। हालांकि, सरकार को समय रहते ही इसकी भनक लग गई, जिसके बाद उपराष्ट्रपति जगदीप धनखड़ को हटाने का मन सरकार ने बना लिया। इसके बाद रक्षा मंत्री राजनाथ सिंह के कार्यालय में 10-10 के ग्रुप में एनडीए के सांसद बुलाए गए और कोरे कागज पर उनसे साइन कराए गए। ये साइन उस स्थिति के लिए थे कि अगर जगदीप धनखड़ इस्तीफे के लिए नहीं माने तो उन्हें सरकार महाभियोग लाकर तुरंत हटा देगी, ताकि विपक्षी एजेंडा पूरे न होने पाए।

इसके बाद ही रात 8 बजे के बाद जगदीप धनखड़ को एक कॉल गया। इसी कॉल पर उनकी बहस हुई। इसके मार्फ़त जगदीप धनखड़ को यह संदेश दिया गया कि सांसदों के साइन हो चुके हैं। अब आपको तय करना है कि इस्तीफा दीजियेगा या फिर महाभियोग द्वारा आपको हटा दिया जाए।.इसके बाद ही जगदीप धनखड़ ने स्वास्थ्य कारणों का हवाला देते हुए इस्तीफ़ा दे दिया। सवाल है कि जो विपक्ष जगदीप धनखड़ को झुकी कमर, संघी जाट, लोकतंत्र का भक्षक आदि बता रहा था, उनके इस्तीफे पर वही विपक्ष उन्हें लोकतंत्र का रक्षक बताते हुए रुदन कर रहा है। 

वहीं, दूसरी ओर जिन पीएम मोदी ने हामिद अंसारी जैसे पीएफआई समर्थक उपराष्ट्रपति की विदाई पर उनके सम्मान में भाषण दिया था, ग़ुलाम नबी आज़ाद की विदाई पर भावुक हो गए थे, उन पीएम मोदी ने जगदीप धनखड़ की विदाई पर सिर्फ़ ये लिखा कि उन्हें बहुत से बड़े पदों पर काम करने का मौक़ा मिला है, वो जल्दी स्वस्थ हों। पीएम मोदी ने न तो धनखड़ साहब के योगदान की सराहना की और न ही कुछ ज़्यादा लिखा। और तो और, पीएम मोदी के अलावा बीजेपी के किसी नेता ने जगदीप धनखड़ के इस्तीफे पर एक शब्द भी नहीं लिखा है।

इससे आप समझ सकते हैं कि केंद्र सरकार जगदीप धनखड़ से पीछा छूटने पर कितना राहत महसूस कर रही है, क्योंकि केंद्र को लगता है कि जगदीप धनखड़ तो शायद उन्हें धोखा पर धोखा दे रहे थे। कभी न्यायपालिका पर हमला करते, तो कभी किसी अन्य मुद्दों पर। हालांकि, अब भाजपा को शायद यह समझ आ जाए कि जब किसी नेता को निर्णायक जिम्मेदारी दी जाए तो उसका बैकग्राउंड आरएसएस का हो न कि किराए का आयातित नेता। क्योंकि भाजपा ने दूसरे दलों से जितने भी नेता आयातित किए हैं, उनमें 80 प्रतिशत से अधिक ने या तो नकारा है या फिर एक समय पर धोखा दे गए हैं।

दरअसल, एक चर्चा के मुताबिक प्रश्न यह नहीं कि उपराष्ट्रपति जगदीप धनखड़ ने 800 लोगों को जन्मदिन की पार्टी सरकारी खर्चे पर की, बल्कि हैरान करने वाली बात यह है कि उनके द्वारा दी जाने वाली यह पार्टी इस प्रकार की थी जैसे वह उनकी फेयरवेल पार्टी हो, यानी अंतिम मेल मिलाप! जिसमें स्टाफ के सभी लोगों को भी बुलाया जाता है। इसके अलावा, वह कुछ बड़ा करने भी जा रहे थे, सो पार्टी में भी बड़े-बड़े विपक्षी नेता बुलाए गए, क्योंकि भविष्य की राजनीति के लिए एक नई राह भी बनाई जा रही थी। 

चर्चा है कि उपराष्ट्रपति धनखड़ सुप्रीम कोर्ट के दिनों के अपने पुराने मित्र व राज्यसभा सांसद कपिल सिब्बल से अपने पुराने संबंधों को सक्रिय किया और खड़गे के नेतृत्व में विपक्ष भी सफलतापूर्वक मैनेज हो चुका था। इससे प्रथम दृष्टया तो यही प्रतीत हुआ कि राज्यसभा में अल्पमत में रहने वाली भाजपा जगदीप धनखड़ के सहारे अपने बहुमत के एजेंडे को पूरा करवाना चाहती है। लेकिन अब जब वह पूर्ण बहुमत में आ चुकी है तो फिर ऐसी कवायद के मायने क्या निकल रहे हैं? समझा जा सकता है।

वहीं, आपने सुना होगा कि संसद सत्र के बीच एक साधारण मंत्री भी दिल्ली छोड़कर नहीं जाता है, पर यहां सदन के सभापति चल रहे सत्र के बीच में अपने गृहराज्य राजस्थान के दौरे पर जा रहे थे। वह भी किसी सरकारी कार्यक्रम में नहीं, बल्कि उनके कार्यालय द्वारा बताया गया कि एक रीयल इस्टेट कारोबारी के यहां बिजनेस इवेंट में शिरकत करने जा रहे हैं।

यही नहीं, संसद में उन्होंने विपक्षी सांसदों के साथ बंद कार्यालय में बैठक की, जो कई घंटों तक चली। हालांकि, बैठक के भीतर क्या तय हो रहा था, यह धनकड़ स्वयं जानें या वहां मौजूद कांग्रेस सांसद, पर इसी बैठक के कुछ घंटों के बाद ही उन्होंने प्रोटोकॉल तोड़ते हुए इस्तीफा देने पहुंचे। इस प्रकार अचानक इस्तीफा देने पहुंचे उपराष्ट्रपति जगदीप धनखड़ को देखकर तो एक बार राष्ट्रपति सचिवालय भी संकट में पड़ गया और सचिवालय को आनन फानन में उनकी मुलाकात राष्ट्रपति द्रौपदी मुर्मू से रखवानी पड़ी। वो भी देर रात।

वहीं, हैरतअंगेज यह भी कि आम तौर पर इस्तीफे की कॉपी सोशल मीडिया में नहीं डाली जाती, जबकि यहां धनखड़ की सोशल मीडिया टीम ने यह कॉपी सोशल मीडिया में डाल दी। जाहिर है, जैसा ऊपर से निर्देश मिला, उन्होंने चुपचाप उसका पालन किया, जैसी कि चर्चा है। कहा जाता है कि उपराष्ट्रपति जगदीप धनखड़ के असहज व्यवहार की खबरें तो काफी सालों से आ रही थी। लेकिन कहते हैं कि बड़ा परिवर्तन उनमें तब आया, जब अमरीकी उपराष्ट्रपति जे डी वेंस भारत दौरे पर आते हैं और इनकी यानी उपराष्ट्रपति धनखड़ की आपस में मुलाकात होती है।

वैसे भी अमरीकी राजनयिक और राजनेता दुनिया में इस चीज के लिए प्रसिद्ध हैं कि वह जिन जिन देशों में जाते हैं, वहां की सरकारों में शामिल उच्च पदों के लोगों में फॉल्ट लाइन, यानी कि उनकी कमजोर नस ढूंढते हैं। और सरकार के लोगों का सरकार के ही लोगों से मतभेद पैदा करवाकर उनसे विशेष काम लिया जाता है। वहीं, आवश्यकता पड़ने पर तख्तापलट और राजनीतिक भीतरघात करवाना भी आसान बना देते हैं।

सवाल यह भी है कि अमरीकी उपराष्ट्रपति जे डी वेंस जब विदेश मंत्री एस. जयशंकर से मुलाकात कर रहे थे।  तो उस मुलाकात के बाद जगदीप धनखड़ विदेशमंत्री से कहते हैं कि वो जे डी वेंस से हुई अपनी मुलाकात की ब्रीफिंग करें मुझे आकर, यानि आपकी जेडी वेंस के साथ हुई मुलाकात में क्या बातें हुई है, इसकी जानकारी दो! कहते हैं कि इस चीज से एस. जयशंकर काफी हैरान हुए और इसकी शिकायत पीएमओ में किए थे। 

वैसे भी अमरीकी उपराष्ट्रपति जे डी वेंस का भारत दौरा कुछ लिहाज से बुरा रहा है। क्योंकि उनके दौरे के क्रम में और उसके बाद भारत में कई महत्वपूर्ण घटनाक्रम घटित हुई हैं, जिनमें से 3 तो बड़ी घटनाएं हुईं- पहला, उनके दौरे के समय ही पहलगाम आतंकी हमले की घटना होती है। दूसरा, कुछ दिनों बाद संदिग्ध परिस्थितियों में विमान दुर्घटना हुई। और तीसरा, पूर्व उपराष्ट्रपति द्वारा संसद में जानबूझकर राजनीतिक संकट पैदा किया गया। इसलिए इससे बचने के लिए समुचित उपाय करना अब संगठन की जिम्मेदारी है।

चूंकि पीएम मोदी के भविष्य को लेकर तरह तरह की चर्चाएं संघ के गलियारे में चल रही हैं, इसलिए यह सरकार ऐसी कोई भी गलती नहीं करना चाहती, जिससे उसे बाद में अफसोस हो। इस सरकार के अंदरूनी नेटवर्क की भी आपको दाद देनी होगी, क्योंकि इतनी मुश्किल भरा फैसला कितनी सहजता व चतुराई से ली गई कि सांप भी मर गया और लाठी भी नहीं टूटी।

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