उपराष्ट्रपति जगदीप धनखड़ के अप्रत्याशित इस्तीफे के मायने को ऐसे समझिए


उपराष्ट्रपति जगदीप धनखड़ के अप्रत्याशित इस्तीफे के मायने को ऐसे समझिए

@ कमलेश पांडेय/वरिष्ठ पत्रकार व राजनीतिक विश्लेषक

यह अजीबोगरीब संयोग है कि आधुनिक समाजवादी-राष्ट्रवादी पत्रकारिता के भीष्म पितामह और राष्ट्रीय कला केंद्र, नई दिल्ली के अध्यक्ष राम बहादुर राय ने गत रविवार को सत्याग्रह मंडपम, गांधी दर्शन राजघाट में दिग्गज पत्रकार प्रभाष जोशी की याद में आयोजित एक विशिष्ट कार्यक्रम में एक केंद्रीय मंत्री व एक उपमुख्यमंत्री की मौजूदगी में इशारों ही इशारों में पिछली आधी सदी से नई दिल्ली में जारी जिस "बौद्धिक प्रपंच" का अनायास ही जिक्र किया, उसके महज 24 घण्टे बाद ही देश के उपराष्ट्रपति और राज्यसभा के सभापति जगदीप धनखड़ ने अप्रत्याशित रूप से निज स्वास्थ्य के आधार पर अपने पद से इस्तीफा देकर यहां जारी एक और नए "बौद्धिक प्रपंच" की आशंकाओं पर अपनी दो टूक मुहर लगा दी। जिससे यह साफ हो चुका है कि आरएसएस-भाजपा में जारी रस्साकशी से ऊपर से लेकर नीचे तक के लोग प्रभावित हो रहे हैं और आगे भी हो सकते हैं, चाहे कोई कितना भी बड़ा क्यों न हो!

कहना न होगा कि जिस तरह से उपराष्ट्रपति व राज्यसभा के सभापति जगदीप धनखड़ ने अपने फेयरवेल से इंकार कर दिया और विदाई संबोधन तक देने को राजी नहीं हुए, उससे उनके दिल को पहुंची गहरी चोट का अंदाजा सहज ही लगाया जा सकता है। चर्चा है कि देर शाम एक फोन पर उनकी किसी कद्दावर राजनेता से तीखी बहस हुई, जिसके बाद वो अपने मौजूदा निर्णय तक पहुंचे और फिर अडिग रहे। ऐसा करके वह समकालीन भारतीय राजनेताओं के लिए एक प्रकाश स्तम्भ बन चुके हैं। ऐसा इसलिए कि उन्होंने संसद और सर्वोच्च न्यायालय के बीच जारी वर्चस्व की लड़ाई में संसद को सर्वोच्च बताने का राजनीतिक साहस प्रदर्शित किया है।

यही नहीं, उन्होंने सुप्रीम कोर्ट को उसकी सीमाएं बताई और न्यायिक भ्रष्टाचार की लीपापोती करने के न्यायिक व प्रशासनिक 'कर्मकांडों' की खुलेआम आलोचना की। इससे वह जनता की पसंद भी बन गए। इसके अलावा भी उनकी बेबाकी व साफगोई से समकालीन सियासत विभिन्न मायनों में समृद्ध हुई है, क्योंकि विभिन्न जटिल मुद्दों पर उन्होंने जो कुछ खुलकर बोला और कड़ा स्टैंड लिया, उससे भारतीय संविधान के नाम पर लुकाछिपी खेलने वाले लोगों की चूलें तक हिल गईं। पश्चिम बंगाल के राज्यपाल के रूप में उनकी उल्लेखनीय भूमिका के चलते ही तो उन्हें देश का उपराष्ट्रपति बना दिया गया, जो राज्यसभा के पदेन सभापति होते हैं। यहां भी उन्होंने एक बड़ी लकीर खींच दी। उन्होंने हर तरह के बौद्धिक प्रपंच को आईना दिखाने का दुस्साहस किया। हालांकि, ऐसा करके वो प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की आंखों में भी खटक रहे थे, क्योंकि उनकी बेबाकी से मोदी सरकार भी प्रभावित हो रही थी। 

जानकार बताते हैं कि एक बार एक समारोह में उनसे मिलने पर पीएम मोदी ने उन्हें इंगित करते हुए एक कटाक्ष भी कर दिया था, जिससे वो भीतर ही भीतर आहत रह रहे थे। चूंकि वो एक किसान पुत्र, विद्वान वकील, सफल राजनेता, कुशल प्रशासक और हरदिल अजीज इंसान थे, इसलिए उनकी तल्ख टिप्पणियों से भारतीय लोकतंत्र को सद्बुद्धि और मजबूती दोनों मिली है, भले ही पीएम की नाराजगी भी उन्हें क्यों नहीं झेलनी पड़ी हो? इसलिए उनके इस्तीफे के पीछे कारण क्या हैं? समझना मुश्किल नहीं है! क्या यह किसी तरह के आसन्न राजनीतिक संकट का परिचायक है? इससे इंकार भी नहीं किया जा सकता है! इसलिए इन सभी बातों का पोस्टमार्टम जरूरी है, ताकि सच्चाई की पड़ताल संभव हो सके।

कहना न होगा कि उनके अकस्मात इस्तीफे के सियासी मायने बहुत उलझे हुए हैं, जिसे सुलझाने और पाठकों को समझाने के लिए उनसे जुड़ी कुछ अप्रत्याशित परिस्थितियों, बयानबाजियों और उन घटनाओं का उल्लेख करना यहां उचित समझता हूं, जिससे यह स्पष्ट हो सके कि निज स्वास्थ्य से इस्तीफा तो एक बहाना था, बल्कि उनके निज स्वाभिमान को जो चोट पहुंचाई गई, उसका करारा जवाब देना उनका निजधर्म था, जिसका उन्होंने अंतरात्मा से पालन किया। इससे अपना असली हिसाब-किताब भी उन्होंने एक झटके में ही चुकता कर लिया। यही वजह है कि जितनी मुख, उतनी बातें सुनी जा रही हैं। 

देश के बौद्धिक गलियारों में इस बात की चर्चा शुरू हो चुकी है कि भारत में उपराष्ट्रपति जगदीप धनखड़ का त्याग पत्र यह बताने के लिए प्रयाप्त है कि निकट भविष्य में और कई बड़े पदों पर शीघ्र ही नए-नए चेहरे सुशोभित होने वाले हैं, जिसकी यह एक अदद शुरुआत भर है। चूंकि यह भाजपा सरकार है और यहां आरएसएस ही 'सर्वोच्च न्यायालय' है, जहां की मौलिक नीति में राष्ट्रहित सर्वोपरि है। राष्ट्र भी सर्वोपरि है। तो क्या यह समझा जाए कि उनके इस्तीफे के पीछे भी कोई बड़ी रणनीति छिपी हुई है। दरअसल, अस्ताचलगामी सूर्य को कोई प्रणाम नहीं करता! सिर्फ बिहार वासी ही एक दिन सालाना जलसे की तरह नमस्कार करते हैं। इसलिए जगदीप धनखड़ जैसे घाघ राजनेता एक तीर से कई शिकार कर चुके हैं। इसका पता तब चलेगा, जब सियासी रूप से घायल लोगों की पीड़ाएं खुद ब खुद अभिव्यक्त होकर सामने आएंगी।

बताते चलें कि गत 21 जुलाई, दिन सोमवार को 11.00 बजे तब राज्यसभा की कार्यवाही शुरू हुई, जब सभापति जगदीप धनखड़ पहुंचे। फिर 11.16 बजे जगदीप धनखड़ ने राज्यसभा में नेता विपक्ष मल्लिकार्जुन खड़गे को उनके जन्मदिन पर शुभकामनाएं दीं। राज्यसभा के दिवंगत सांसदों को सदन में श्रद्धांजलि दी। पहलगाम हमले की निंदा के साथ मारे गए लोगों को श्रद्धांजलि दी गई। पुनः
12.30 बजे उप राष्ट्रपति ने राज्यसभा के पांच नए मनोनीत सांसदों को उच्च सदन की सदस्यता की शपथ दिलाई। ये सांसद बीरेंद्र प्रसाद बैश्य, कनाड पुरकायस्थ, मीनाक्षी जैन, सदानंदन मास्टर और पूर्व विदेश सचिव हर्षवर्धन शृंगला शामिल हैं। 

उसके बाद, 02.00 बजे उप राष्ट्रपति जगदीप धनखड़ ने जस्टिस यशवंत वर्मा के खिलाफ महाभियोग प्रस्ताव से संबंधित विपक्षी सांसदों के नोटिस को स्वीकार कर लिया। इससे सत्ता पक्ष में हैरानी का भाव दिखा। हालांकि सरकार की ओर से लोकसभा में इसी तरह का नोटिस दिया था और विपक्ष को भी इस पर भरोसे में लिया था। फिर 4:07 बजे राज्यसभा के सभापति जगदीप धनखड़ ने महाभियोग प्रस्ताव पर 63 विपक्षी सांसदों से नोटिस मिलने की पूरी जानकारी दी। उन्होंने ऐसे प्रस्ताव पर दोनों सदनों में नोटिस दिए जाने से जुड़े नियमों का हवाला दिया। सवाल है कि क्या महाभियोग के आरोपों से बचने के लिए उन्होंने इस्तीफा दे दिया? क्योंकि संभव था कि उनके अपने ही उनके विरुद्ध चाल चलवा देते, जिसे उन्होंने समय पूर्व ही भांप लिया था।

बताया तो यह भी जाता है कि सोमवार को ही 4.30 बजे की उपराष्ट्रपति जगदीप धनखड़ की कार्य सलाहकार समिति की बैठक में केंद्रीय मंत्री जेपी नड्डा और संसदीय कार्य मंत्री किरेन रिजिजू नहीं पहुंचे। जिससे धनखड़ का मन खिन्न हो गया। ततपश्चात शाम 05 बजे विपक्षी सांसद यानी कांग्रेस सांसद जयराम रमेश, प्रमोद तिवारी और अखिलेश प्रसाद सिंह धनखड़ से मिले। फिर शाम 7:30 बजे कांग्रेस के वरिष्ठ नेता और मुख्य सचेतक जयराम रमेश की उपराष्ट्रपति धनखड़ से फोन पर बातचीत हुई। तबतक किसी को अगले अप्रत्याशित घटना क्रम की भनक नहीं लगी थी। लेकिन अचानक 9.05 बजे तक ऐसा क्या हो गया कि धनखड़ ने इस्तीफा दे दिया। प्राप्त जानकारी के मुताबिक, उपराष्ट्रपति जगदीप धनखड़ बिना अपॉइंटमेंट लिए राष्ट्रपति भवन पहुंचे और राष्ट्रपति श्रीमती द्रौपदी मुर्मू को अपना इस्तीफा सौंप दिया। 

उसके कुछ देर बाद ही उप राष्ट्रपति कार्यालय की ओर से  एक ट्वीट भी आया, जिसमें उनके त्यागपत्र का पूरा ब्योरा दिया था। इससे दिल्ली के सियासी गलियारों में भूकंप का गया। समझा जाता है कि जस्टिस यशवंत वर्मा के खिलाफ महाभियोग प्रस्ताव से संबंधित विपक्षी सांसदों के नोटिस को स्वीकार कर लिया जाना ही सरकार से उनकी तकरार की वजह बना, जिसके चलते रिजिजू और नड्डा उनकी बैठक में नहीं पहुंचे। चर्चा है कि सरकार जस्टिस यशवंत वर्मा के खिलाफ महाभियोग प्रस्ताव से संबंधित विपक्षी सांसदों के नोटिस को इतनी जल्दी स्वीकार करने के मूड में नहीं थी। क्योंकि सरकार को इस बात का डर है कि खुद उसका मंत्रिमंडल ही बेदाग नहीं है, इसलिए इस मुद्दे को टलवाने के पक्ष में वह थी और लोकसभा में ऐसा ही हुआ। लेकिन राज्यसभा में उपराष्ट्रपति धनखड़ ने इसे जल्द ही स्वीकार करके अपनी ही सरकार के अघोषित स्टैंड के खिलाफ कार्य किया, जिससे सरकार के रणनीतिकार आगबबूला हो उठे और उन्हें खरी-खोंटी सुनाने का दुस्साहस किया। हालांकि इसकी पुष्टि किसी ने नहीं की है।

इसलिए समझा जाता है कि उपराष्ट्रपति पद से इस्तीफा देने के बाद धनखड़ की अंतरात्मा तो संतुष्ट हुई, भले ही सरकार के रणनीतिकार उनके खिलाफ हो गए। क्योंकि न्यायपालिका को छेड़ने के मूड में सरकार नहीं थी, चाहे उस पर कितना भी जनदबाव हो। आखिर विधायिका, कार्यपालिका और न्यायपालिका के बीच सत्तागत संतुलन के लिए कई बार यह जरूरी हो जाता है कि विवादास्पद  मामले को टाल दिया जाए। एक-दूसरे पर कीचड़ नहीं उछाला जाए। क्योंकि भारतीय लोकतांत्रिक हमाम में सभी नंगे हैं! लेकिन उपराष्ट्रपति जगदीप धनखड़ ने सरकार की गुप्त भावनाओं को दरकिनार कर दिया। फिर जो हुआ, ऊपर चर्चा की जा चुकी है। लिहाजा, अब इसी सच्चाई को छिपाने के लिए सत्ता प्रतिष्ठान द्वारा बनावटी बातें सजाई व परोसी जा रही हैं, लेकिन विपक्ष व मीडिया अब बात का बतंगड़ बना रहे हैं। इससे मोदी सरकार की साख पर भी बट्टा लगा है। कुछ लोग बता रहे हैं कि संघ के इशारे पर यह इस्तीफा हुआ है ताकि मोदी सरकार पर वह दबाव बना सके। बता दें कि समाजवादी राजनीति, कांग्रेसी राजनीति करके राष्ट्रवादी राजनीति में सफल हुए धनखड़ आरएसएस के भी चहेते बन चुके हैं। ऐसा इसलिए कि वो बेखौफ रहकर उसके मूल एजेंडे को बढ़ा रहे थे। इसलिए पीएम मोदी भी उन्हें पसंद करते थे।

वहीं, सर्वाधिक गौर करने वाली बात यह है कि 22 जुलाई दिन मंगलवार को 10.30 बजे उपराष्ट्रपति जगदीप धनखड़ के परिवार की ओर से जानकारी सामने आई कि वो आज राज्यसभा नहीं आएंगे। इसमें पुष्टि की गई कि स्वास्थ्य कारणों से उन्होंने इस्तीफा दे दिया है। यह भी कहा गया कि फेयरवेल (विदाई समारोह) जैसा कुछ नहीं होगा। इससे साफ है कि उपराष्ट्रपति सियासी कोपभवन में प्रवेश कर चुके हैं। अब उनसे मानवीय भूल हुई या अपने स्वभाव के मुताबिक न्यायपालिका को सबक सिखाने के लिए उन्होंने जानबूझकर ऐसा किया, यह उनकी अंतरात्मा ही जाने और सरकार के वे रणनीतिकार जानें, जिन्होंने अपनी तल्ख टिप्पणियों से उन्हें इस कदर नाराज कर दिया। 

फिर 10.15 बजे संसद में वरिष्ठ केंद्रीय मंत्रियों की बैठक हुई, जिसमें जगदीप धनखड़ के त्यागपत्र और ऑपरेशन सिंदूर के बारे में चर्चा पर सहमति बनी। ततपश्चात 12.07 बजे  राष्ट्रपति द्रौपदी मुर्मू ने उप राष्ट्रपति पद से जगदीप धनखड़ का इस्तीफा स्वीकार कर लिया। तब जाकर 12.19 बजे  जगदीप धनखड़ के त्यागपत्र पर प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी का ट्वीट आया, जिसमें उन्होंने कहा कि, जगदीप धनखड़ को भारत के उपराष्ट्रपति समेत कई भूमिकाओं में देश की सेवा करने का मौका मिला है। इसलिए उनके अच्छे स्वास्थ्य की कामना है। वहीं, उपराष्ट्रपति धनखड़ के इस्तीफे के बाद उपसभापति हरिवंश ने राज्यसभा की कार्यवाही की अध्यक्षता की। इससे पहले राज्यसभा के उपसभापति हरिवंश सिंह राष्ट्रपति द्रौपदी मुर्मु से मिले।

सियासी हल्के में चर्चा है कि जब जगदीप धनखड़ ने 4:20 तक राज्यसभा का संचालन किया तो उन्हें बीमार कैसे मान लिया जाए। हां, सरकार के घोषित स्टैंड के विरुद्ध जाकर उन्होंने अपनी मानसिक बीमारी को स्पष्ट कर दिया है। हालांकि, यह भी गौरतलब है कि उस दिन लोकसभा भले ही नहीं चल पाई, लेकिन राज्यसभा में कुछ कामकाज हुआ, जो कि उनकी कार्यकुशलता का तकाजा है। ऐसे व्यक्ति को मानसिक रूप से बीमार बतलाना भी नाइंसाफी होगी। 

वहीं, यह भी ठीक है कि बीते मार्च माह में वो बीमार हुए थे, लेकिन इसी आधार पर अगर उन्हें इस्तीफा देना था तो वो पहले दे देते। आखिर संसद सत्र शुरू होने का इंतजार उन्होंने क्यों किया? और यदि किया भी तो संसद सत्र समाप्त होने के बाद भी वो ऐसा कर सकते थे। उन्हें यह भी मालूम होगा कि वह एक उपराष्ट्रपति ही नहीं, बल्कि राज्यसभा के सभापति भी हैं। इसलिए मानसून सत्र के पहले दिन अचानक रात में उनका इस्तीफा दे देना कोई सामान्य सियासी घटना नहीं हो सकती है। उनके जैसा समझदार आदमी इतनी बड़ी मूर्खतापूर्ण फैसला कदापि नहीं कर सकता है, लेकिन उन्हें ऐसा ही करना पड़ा, जो  किसी के दबाववश करवाया गया अप्रत्याशित फैसला है, और यह बेहद निंदनीय फैसला है। 

ऐसा इसलिए भी कि शाम को 6:00 बजे उन्होंने विपक्षी नेताओं के साथ बैठक भी की। तबतक सबकुछ सामान्य था। वहीं, देर शाम में पीआईबी की रूटीन प्रेस विज्ञप्ति आई, जिसमें कहा गया कि उपराष्ट्रपति 23 जुलाई को 2 दिन के दौरे पर राजस्थान जाने वाले हैं। फिर अचानक ऐसा क्या हुआ कि फोन पर उनकी हॉट टॉक हुई और उन्होंने स्वाभिमान वश इस्तीफा दे दिया। सवाल है कि आखिर उनकी हॉट टॉक किससे हुई। क्या जेपी नड्डा से, जिनकी भाजपाध्यक्ष की कुर्सी जाने वाली है? या फिर किरण रिजिजू से, जो तिब्बत गुरु दलाईलामा की तरफदारी करके पहले चीन और फिर अपनी सरकार की ही नजरों में चढ़ गए हैं। या फिर उनके 'जूनियर बॉस' नरेंद्र मोदी या अमित शाह से, जिनकी नड्डा या रिजिजू की तरफदारी करने वाली बात उन्हें बेहद नागवार गुजरी। वैसे भी उत्तर भारत के जाट बहुत अक्खड़ मिजाज के होते हैं। इस बार भाजपा नेताओं को उनका यह रूप भी दिख गया। 

वहीं, इस नाटकीय घटनाक्रम के बाद देश की प्रमुख विपक्षी पार्टी कांग्रेस पार्टी और उनके सहयोगियों द्वारा जगदीप धनखड़ के उपराष्ट्रपति पद से त्यागपत्र देने पर छाती पीटना और उनका महिमामंडन करना ठीक वैसे ही है, जैसे आप किसी की मौत की कामना कर रहे हैं, उसके विरुद्ध महाभियोग का प्रस्ताव ले आने की योजना है और उसके अकस्मात त्यागपत्र यानी उसकी कथित 'मृत्यु' के बाद छाती पीट कर आंसू बहाने लगे। देखा जाए तो राज्यसभा में जगदीप धनखड़ के आसन पर बैठने के बाद कई बार सरकार से ज्यादा टकराव कांग्रेस पार्टी और विपक्ष के नेताओं के साथ ही हुआ और ऐसी ऐसी अपमानजनक टिप्पणियां की गईं जो पहले संसद के इतिहास में नहीं हुईं हैं। उनके विरुद्ध अविश्वास प्रस्ताव लाने की घोषणा कर दी गई और कुछ सांसदों के हस्ताक्षर भी कराए गए। 

ऐसे में गत सोमवार की रात्रि में वह अपने निजी स्वास्थ्य जनित कारणों से जब पद त्यागने को विवश हुए हैं तो विपक्ष उन्हें महान, कठिन परिस्थिति में विपक्ष को बात रखने का मौका देने वाला और न जाने क्या-क्या कह रहा है। आप कांग्रेस पार्टी के अधिकृत सोशल मीडिया हैंडल या जयराम रमेश जैसे कतिपय अन्य कांग्रेसी नेताओं के पहले के पोस्ट को देख लीजिए। ऐसा भी दोहरा व्यवहार सियासत में हो सकता है क्या? यक्ष प्रश्न है।

उपराष्ट्रपति जगदीप धनखड़ के इस्तीफे के बाद पूरी रात चुप्पी रही और मंगलवार को लगभग दोपहर में पीएम नरेंद्र मोदी महज तीन लाइन की एक पोस्ट एक्स पर लिखी। उन्होंने लिखा, 'श्री जगदीप धनखड़ जी को भारत के उपराष्ट्रपति सहित कई भूमिकाओं में देश की सेवा करने का अवसर मिला है। मैं उनके उत्तम स्वास्थ्य की कामना करता हूं।' बताया जाता है कि तकरीबन 15 घंटे बाद पीएम नरेंद्र मोदी का रिएक्शन आया। इससे पहले उन्होंने महाराष्ट्र के सीएम देवेंद्र फडणवीस और डिप्टी सीएम अजित पवार को जन्मदिन की शुभकामनाएं दीं। लेकिन इस मसले पर उनकी ओर से कोई बयान नहीं आया। यही नहीं नितिन गडकरी, अमित शाह, राजनाथ सिंह, जेपी नड्डा, निर्मला सीतारमण समेत तमाम वरिष्ठ मंत्री भी चुप रहे। सोशल मीडिया से लेकर प्रत्यक्ष तौर पर भी किसी तरह का संदेश जारी नहीं किया गया। रवि किशन जैसे तीसरी पंक्ति के नेता ही बाइट देते नजर आए और कहा कि किसी के स्वास्थ्य को लेकर विपक्ष को राजनीति नहीं करनी चाहिए। हालांकि जानकार मानते हैं कि सरकार के शीर्ष नेताओं की चुप्पी में ही इस्तीफे का शोर कहीं छिपा है। उन्होंने उपराष्ट्रपति धनखड़ की किसी मानवीय भूल को ही बात का बतंगड़ बना दिया गया, जो उन्हें नागवार गुजरी।

मसलन, यदि उनका इस्तीफा सामान्य कारण से होता तो उनके लिए एक अच्छा विदाई संदेश जरूर आता। इसके अलावा विपक्ष की आलोचनाओं पर भी कोई सीनियर नेता अवश्य जवाब देता। यही नहीं, खुद जगदीप धनखड़ ही राज्यसभा जाते और फेयरवेल स्पीच देकर अपने कार्यकाल का समापन करते। हालांकि इस बीच चर्चाएं हैं कि विपक्ष की ओर से जस्टिस यशवंत वर्मा के खिलाफ महाभियोग प्रस्ताव को स्वीकार करने से सरकार असहज थी। क्योंकि सरकार चाहती थी कि विपक्ष के प्रस्ताव को इतनी जल्दी ना स्वीकार किया जाए। इससे सरकार को न्यायपालिका के खिलाफ आक्रामक होकर खेलने का मौका नहीं मिल पाया।

इस चर्चा के पीछे दलील यह है कि विपक्ष का प्रस्ताव स्वीकार होने के बाद ही जो मीटिंग थी, उसमें केंद्रीय मंत्री जेपी नड्डा और किरेन रिजिजू नहीं पहुंचे। इसके अलावा जगदीप धनखड़ को एक फोन आने की बात भी चल रही है। कहा जा रहा है कि इस तरह फोन पर विपक्ष के प्रस्ताव स्वीकार करने पर आपत्ति जताए जाने और फिर मंत्रियों के ना पहुंचने से वह अपमानित महसूस कर रहे थे। अंत में उन्होंने पद से इस्तीफा ही दे दिया। इसप्रकार अपने मजाकिया अंदाज के लिए चर्चित रहे जगदीप धनखड़ अपने सख्त तेवरों के लिए भी जाने जाते हैं। माना जा रहा है कि सरकार के ऐतराज पर उन्होंने भी तेवर ही दिखाए और सोमवार रात को अचानक इस्तीफा दे दिया।

वहीं, कुछ लोग यह भी बता रहे हैं कि संसद टीवी के 200 कर्मचारी उनके खिलाफ हाई कोर्ट चले गए हैं। इनकी मांगों को वे पूरा करने वाले थे, लेकिन किसी ने उनपर अड़ंगा डलवा दिया। इससे भी धनखड़ अपनी ही सरकार से नाराज चल रहे थे। हालांकि इसकी भी पुष्टि नहीं हो पाई है।

इसके बाद ही यह सवाल उठने लगा कि अब बीजेपी आखिर किसे बनाएगी अगला उप राष्ट्रपति? क्या किसी सवर्ण को मौका देगी, क्योंकि राष्ट्रपति, उपराष्ट्रपति, प्रधानमंत्री, उपप्रधानमंत्री जैसे चार अहम पदों में एक उपप्रधानमंत्री के पद पर पिछले लगभग 12 वर्षों में कोई नियुक्ति ही नहीं हुई है और अन्य तीन महत्वपूर्ण पदों पर एक आदिवासी और दो ओबीसी नेता काबिज थे। इसलिए उपप्रधानमंत्री का पद किसी सवर्ण नेता को दिया जाना तय है। आरएसएस भी यही चाहता है, क्योंकि सवर्ण भाजपा के हार्डकोर वोटर समझे जाते हैं। इस रेस में राजनाथ सिंह का नाम सबसे ऊपर है। वहीं, बिहार के मुख्यमंत्री नीतीश कुमार का नाम इसलिए नेपथ्य में चला गया, क्योंकि वह भी ओबीसी हैं।

हालांकि, आरएसएस अभी वेट एंड वाच की स्थिति में है। वह आगामी 18 सितंबर को 75 वर्ष की आयु पूर्ण करने वाले प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी से भी इस्तीफा चाहता है, उनके अलावा उन मंत्रियों के भी इस्तीफे चाहता है, जो 75 वर्ष की आयु पूरे करने वाले हैं। क्योंकि इसी आधार पर उन्होंने 2014 में केंद्रीय सत्ता हासिल करने के बाद तत्कालीन वरिष्ठ नेताओं को पार्टी के मार्गदर्शक मंडल में भेज दिया था और उन्हें अपनी मंत्रिमंडल में जगह नहीं दी थी। इसलिए अब भाजपा और आरएसएस के लोग भी प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और रक्षामंत्री राजनाथ सिंह के रिटायरमेंट की बाट जोह रहे हैं। संभव है कि केंद्रीय मंत्रिमंडल का विस्तार भी बिहार चुनाव से पहले हो।

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