आपकी शुभकामनाओं से हमारा आत्मसंबल बढ़ा है, हृदय से आभार!
आपकी शुभकामनाओं से हमारा आत्मसंबल बढ़ा है, हृदय से आभार!
@ डॉ दिनेश चन्द्र सिंह, आईएएस, डीएम, जौनपुर, यूपी
किसी ने जीवन के विविधता भरे पलों को इंगित करते हुए बहुत ही सटीक कहा है कि “सुनहू भरत भावी प्रबल बिलखि कहेऊ मुनिनाथ| हानि लाभु जीवनु मरनु जसु अपजसु विधि हाथ||” वहीं जीवन में प्रेम के महत्व को दर्शाते हुए कहा गया है कि “प्रेम न खेतौं नीपजै, प्रेम न दृष्टि बिकाइ। राजा परजा जिस रुचै, सिर दे सो ले जाइ॥“ दरअसल उपरोक्त प्रेरणादायक उद्धरण सभी की जीवन यात्रा के लिए उत्साहवर्द्धक एवं उपयोगी है, वशर्ते कि वह संवेदनशील प्राणी हो| मुझे सबका प्रेम आज मिला, यह ईश्वर की कृपा एवं मेरा संस्कार है| इसलिए मैं सभी लोगों का हृदय से कृतज्ञ हूँ| क्योंकि आज 12 मई 2025 को मेरे वैवाहिक जीवन के 30 वर्ष पूर्ण हो चुके हैं|
बताया जाता है कि निज कल्याण, परिवार कल्याण एवं लोक कल्याण हेतु स्त्री-पुरुष का विवाह युगों से चली आ रही सनातन धर्म की सभ्यता-संस्कृति का एक मंगलमय क्षण है, जिससे सदैव उस मंगलमय क्षण की ऊर्जा, ऊष्मा, प्रेम, स्नेह, मिलन की अनुभूति ताउम्र होती रहती है| खासकर वैवाहिक वर्षगांठ पर, क्योंकि शादी-विवाह से प्राप्त सम्वेदनाओं की अनोखी, प्रकृति पूज्य संस्कृति और संतति के विकास की एक ऐसी यात्रा शुरू होती है, जिससे यह सृष्टि गतिमान है| विवाह के शुभ परिणय सूत्र का यह एक ऐसा मिलन सनातन धर्म में है, जिसमें पति-पत्नी की रोज लड़ाई और रोज वेवफाई के किस्से कहानी प्रचलित एवं अधर्मी लोगों द्वारा बढ़ा-चढ़ा कर प्रस्तुत किए गए हैं, से सम्बन्धित दम्पति अप्रभावित रहते हैं|
वाकई सनातन धर्म के मंगलमय परिणय सूत्र में बंधे स्त्री-पुरुष (वर-वधु) हमेशा समुद्र के ज्वार-भाटा की तरह उठे सम्वेदनात्मक वैचारिक मतभेद से यदा कदा अछूते नहीं रह पाते हैं| परन्तु वे एक-दूसरे के साथ भी जीवन-मृत्यु के अनंत कथानक की असीमित प्रेम ऊर्जा के साथ आप्लावित रहते हैं| निःसंदेह हिंदुत्व की वैचारिक भावना एवं सनातन धर्म में दीक्षित परिवारों के लड़के-लड़की जीवन जगत के ज्वार-भाटा के तेज प्रवाह की नुकसान से भी अप्रभावित हुए सदैव साथ साथ रहते हैं| यही हमारे सनातन धर्म में स्त्री-पुरुष के वैवाहिक जीवन के परिणय सूत्र में बंधने की सभ्यता एवं संस्कृति है, जो बहुप्रचलित है|
वहीं, अन्य धर्मों में भी सभी कुछ अच्छा होता है| परन्तु वहां वैवाहिक मिलन सभ्यता और संस्कृति की अनुभूति और सहचर्य का मिलन नहीं अपितु संविदात्मक निर्णय होता है| अत: संविदा में शर्तों के उल्लंघन का जो परिणाम होता है, वह संविदा के निरस्त्रीकरण की हद तक जाता है| जबकि ऐसा सनातन धर्म में यदा कदा ही संभव हो पाता है| परन्तु अब कुछ लिव इन रिलेशनशिप के अंतर्गत रहने वाले जोड़े की परिणय सूत्र की कहानी भारतीय सभ्यता एवं संस्कृति के अनुरूप न होने के कारण संविदात्मक हो रही है, जिससे हमें बचना होगा| अन्यथा सनातन धर्म भी संविदात्मक वैवाहिक मिलन के कुठाराघात से वंचित नहीं रह पाएगा| वरिष्ठ पदों पर पहुंचकर विभिन्न धर्म और विभिन्न जातियों में हुए मांगलिक कार्य इस संविदात्मक परिणय सूत्र की कसौटी पर बहुत कम खरे उतरते हैं|
चूँकि आज मेरे वैवाहिक वर्षगांठ के शुभ अवसर पर लोगों से मिले शुभेच्छाओं से प्राप्त आशीर्वाद एवं सदकामना ही मेरे जीवन की अमूल्य निधि हैं, परन्तु हम संविदा में नहीं बंधे हैं, बल्कि संस्कार पूर्वक आबद्ध किए गए हैं| भले ही हमारे बीच भी लड़ाई-झगड़ा रोज होता है| परन्तु सनातन धर्म के संस्कार हमदोनों को सदैव एक साथ रखते आए हैं और हमलोग सदैव ही परस्पर एक ही सिक्के के दो पहलू मानिंद है| ऐसा इसलिए कि पति एवं पत्नी का रिश्ता संस्कार की नींव पर होता है, संविदा पर नहीं|
आज अनवरत सोशल मीडिया पर मेरे वैवाहिक जीवन की खुशहाली की कामना ढेर सारे लोगों द्वारा की गई जिसके लिए हमलोग सभी शुभेच्छु लोगों के शुक्रगुजार हैं| मसलन परिणय सूत्र में बंधे हम दोनों पति-पत्नी के रिश्तों को आपके आशीर्वाद, प्यार और असीम स्नेह से जो ऊर्जा मिली है, उसे मैं शब्दों में बयाँ नहीं कर सकता हूँ अथवा अन्य किसी भी प्रकार की कृतज्ञता पद्धति से ऋण मुक्त होने का प्रयास करूँ, ऐसा मेरे लिए भी संभव नहीं है| अतः मैं मन-वचन-कर्म से आप सभी लोगों का सदैव आभारी एवं ऋणी हूँ, क्योंकि आप लोगों ने मुझे और मेरे परिवार को इतना असीम प्यार, स्नेह और आशीर्वाद से अभिसिंचित किया है, जिससे हमारा मनोबल भी बढ़ा है| सधन्यवाद!
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