शरारती दुनिया की क्षुद्र चालों को समझिए और इनकी मजबूत काट करते रहिए

शरारती दुनिया की क्षुद्र चालों को समझिए और इनकी मजबूत काट करते रहिए
@ कमलेश पांडेय/वरिष्ठ पत्रकार व राजनीतिक विश्लेषक

भले ही अमेरिका पिछले एक सौ सालों से अंतरराष्ट्रीय महाशक्ति रहा है और उसने ग्रेट ब्रिटेन को पीछे धकेलकर यह महारत हासिल की है। वहीं, पूरी दुनिया में अपना एक छत्र राज बनाए रखने के लिए उसने हर उस देश को नष्ट कर दिया, जिसने उसे चुनौती दी, या फिर देने की हिमाकत की। उसके पूंजीपतियों की लॉबी इतनी मजबूत है कि अपने हथियार उद्योग को बढ़ावा देने के लिए इनलोगों ने पूरी दुनिया में अशांति और रक्तपात बांटी है। भारत एक मात्र ऐसा देश है, जिसने रूस के सहयोग से उसे टक्कर दी और महफूज रहा।

उदाहरण स्वरूप, जब बीसवीं सदी के पूर्वार्द्ध में जब जापान ने उन्हें यानी अमेरिका-ब्रिटेन आदि की साम्राज्यवादी शक्तियों को चुनौती दी और भारत में सुभाष चन्द्र बोस जैसे उनके धुर विरोधियों को आर्थिक व सैन्य मदद दी तो उन्होंने परस्पर मिलकर जापान पर परमाणु बम गिराकर उसको घुटने टेकने पर मजबूर कर दिया। तब उनके इस पाप में सोवियत संघ (यूएसएसआर) भी भागीदार बना था। 

लेकिन बीसवीं सदी के उत्तरार्द्ध में जब सोवियत संघ (यूएसएसआर) ने उन्हें यानी अमेरिकी नेतृत्व वाले पश्चिमी राष्ट्रों को चुनौती दी, तो अमेरिका के नेतृत्व वाले नाटो ने यूएसएसआर को 17 टुकड़ों में तोड़ दिया। इसके लिए उसने सैन्य अभियान के साथ-साथ तथाकथित पूंजीवादी विकास का भी सहारा लिया। इसी प्रकार ने जब 
जब इराक के सैन्य तानाशाह सद्दाम हुसैन ने अमेरिका के विरूद्ध अपना सिर उठाया, तो उन्होंने सद्दाम हुसैन के विरूद्ध कई लांछन लगाकर उनपर हमला किया, उनको गिरफ्तार करके फांसी दी और इराक को भी लगभग नष्ट कर दिया। 

इसके अलावा उन्होंने ईरान के साथ भी कुछ ऐसा ही किया, जिससे जुड़ी रस्साकशी आज तक जारी है। इजरायल के सहारे अमेरिका अरब देशों को परस्पर तोड़कर उनके तेल व्यवसाय पर अपना कब्जा जमाए हुए है। उसी तरह से जब इक्कीसवीं सदी में अमेरिका को चीन से चुनौती मिली तो वह हाथ धोकर चीन के पीछे पड़ गया। इसकी कड़ी में उसने भारत को भी चीन के खिलाफ खड़ा करने की कोशिश की। लेकिन भारत ने अपनी समझदारी दिखाई और अपने वैश्विक स्वार्थों के मुकाबले अमेरिका की एक नहीं चलने दी। यही वजह है कि आज भारत-रूस सम्बन्ध और भारत-चीन सम्बन्ध अमेरिकी प्रशासन के लिए गम्भीर चुनौती बने हुए हैं। लगे हाथ भारत ने न केवल आशातीत विकास किया, बल्कि अमेरिका, रूस, चीन से अधिक भू-राजनीतिक महत्व प्राप्त कर लिया।

इसप्रकार, ऐसा नीतिगत करिश्मा करने के साथ ही अमेरिका की नजर में अब भारत की भी बारी आ गई है। सुनियोजित पहलगाम आतंकी हमले के बाद भारत द्वारा शुरू किए गए निर्णायक 'ऑपरेशन सिंदूर' से हुई पाकिस्तान की जबरदस्त धुनाई के बाद अमेरिका बौखलाया हुआ है। वहीं, चीन व अरब देशों की भी पोल खुल गई है। भारत के तेवर से साफ है कि वह अब किसी के सामने झुकेगा नहीं और ईंट का जवाब पत्थर से देगा। इससे विश्व राजनय में हड़कंप मच गया है, क्योंकि गुटनिरपेक्ष देश भारत की संतुलित नीति अब महाशक्तियों पर भारी पड़ने लगी है।

दरअसल, पिछले एक सौ सालों से अमेरिकी उद्योगपतियों ने दुनिया के टॉप टेन उद्योगपतियों की लिस्ट में अपना दबदबा कायम रखा है, क्योंकि टॉप 10 में से 8, 9 तो सिर्फ अमेरिकी उद्योगपति हैं, कोई और दूर-दूर तक नहीं। ऐसा इसलिए कि उन्हें मानवीयता व गुणवत्ता नहीं, बल्कि लाभ चाहिए और हर हाल में अमेरिका व अमेरिकी लोगों के हित सुरक्षित रहने चाहिए। यही वजह है कि जब चीन के "जेक मा" ने तीसरा स्थान हासिल किया तो उनके खिलाफ "लॉबिंग" शुरू हो गई और उन्हें भागना पड़ा। इसी प्रकार से वे अब अडानी और अंबानी जैसे भारतीय कारोबारियों के पीछे पड़े हैं, जिनकी धाक पूरी दुनिया में जम रही है। क्योंकि भारत सरकार का बरदहस्त उनके ऊपर है।

इस बात में कोई दो राय नहीं कि अमेरिका की ताकत उसका निजी उद्योग है, जो तकनीक और व्यापार के बल पर पूरी दुनिया को नियंत्रित करता है। ऐसे में यदि कोई देश या उद्योगपति उनसे मुकाबला करेगा या उन्हें चुनौती देगा तो वे अरबों रुपए खर्च करके उन्हें बर्बाद कर देंगे। यही इनकी फितरत है। इनकी तथाकथित सफलता का राज भी यही है। तभी तो पिछले पांच-सात सालों में भारतीय उद्योगपति "अडानी" ऊंची उड़ान भर रहे थे और पिछले दो साल पहले ही वे दुनिया के दूसरे सबसे बड़े उद्योगपति बन गए थे। अगर उनकी यही रफ्तार जारी रहती तो वे 2024 में दुनिया के सबसे बड़े उद्योगपति बन गए होते और दुनिया भारत की तरफ देखती। लेकिन अमेरिकी लॉबी ने हिंडन वर्ग की रिपोर्ट की आड़ में उनके साथ भी कैसा घृणित खेल खेला, यह बात किसी से छिपी हुई नहीं है।

यूँ तो ऊर्जा पर निर्भरता भारत की कमजोरी रही है, जिसके कारण 1991 में भी भारत को कथित आर्थिक तंगी का सामना करना पड़ा था। तब भारत के तेल आयात बिल में भारी वृद्धि के कारण संकट और गहरा गया था। वहीं, अडानी भारत की सबसे महत्वाकांक्षी परियोजना यानी दुनिया की सबसे कम लागत वाली ग्रीन हाइड्रोजन परियोजना स्थापित करके भारत की ऊर्जा को सुरक्षित करने की दिशा में काम कर रहे हैं, जो समय के साथ तेल और गैस की जगह ले लेगी। यही वजह है कि उन्हें कमजोर करने के लिए अमेरिकी हिंडनबर्ग द्वारा उनपर बार-बार नीतिगत हमले किये गए, जिससे उनकी अंतरराष्ट्रीय साख प्रभावित हुई। हालांकि हिन्डनवर्ग द्वारा किए गए हमलों की पूरी पृष्ठभूमि इस बात की व्याख्या करता है कि सबकुछ सुनियोजित और षड्यंत्र कारी मिजाज से किया हुआ कर्म था। इसी तरह से 2 साल पहले सीएनबीसी द्वारा अडानी के दुनिया के दूसरे ट्रिलियनेयर बनने के पूर्वानुमान के साथ, समूह पर हमले यहां से और तेज हो गए थे।

ऐसे में यदि भारत 'आत्मनिर्भर भारत' और 'मेक इन इंडिया' अभियान चला रहा है, तो इसका मतलब है कि भारत एक बहुत बड़ा बाजार है, जिसमें दुनिया की 20 प्रतिशत आबादी रहती है, जो किसी भी अन्य अर्थव्यवस्था की तुलना में तेजी से बढ़ रही है। ऐसे में अगर भारत आने वाले 20 सालों में आत्मनिर्भर हो जाता है, तो अमेरिका, यूरोप, चीन के साथ-साथ अरब जगत को भी भारी नुकसान उठाना पड़ेगा।  इससे भारतीय रुपया एक डॉलर के मुकाबले और मजबूत होता रहेगा।

यही वजह है कि भारत में भी अडानी-अम्बानी की कम्पनियों के विरूद्ध लॉबिंग शुरू हो गई है, जिसमें विपक्षी नेतागण महत्वपूर्ण भूमिका अदा कर रहे हैं। वैसे भी हर देश में "सफेद कुरता धारी पप्पुओं" की कमी नहीं है, पूंजीवादी मीडिया को भी खरीदा जा सकता है, इसलिए विदेशी शतरंज की चाल पर भारत के लोकतंत्र में सबकुछ संभव है। देखा जाए तो यही सियासी लॉबिंग वाला समूह एक दशक पहले कृष्णा गोदावरी (केजी) बेसिन में भारत की तेल और गैस परियोजना को समाप्त करने वाली शक्ति का कारण बना था। क्योंकि यूट्यूब, फेसबुक, गूगल, एक्स (पूर्व नाम ट्विटर) जैसे सभी प्लेटफॉर्म अमेरिका के हैं, इसलिए वो जब चाहे किसी के खिलाफ अभियान चला सकता है।

दुर्भाग्य की बात है कि भारत में मूर्खों, पप्पुओं, जयचंदों, देशद्रोहियों की कोई कमी नहीं है, जबकि चीन में ये सब आसान नहीं है, क्योंकि भारत में लोकतंत्र है, जबकि चीन में लोकतंत्र नहीं है। लिहाजा चीन में प्रोपेगेंडा, झूठ फैलाना आसान नहीं है। वहीं चीन खुद भारत को आगे बढ़ने से रोक रहा है, क्योंकि अमेरिका उसको उकसाता रहता है। बता दें कि जब यूएसए-यूएसएसआर में शीत युद्ध चरम पर था, अभी अमेरिका के प्रशासन ने चीन को मजबूत करके रूस-भारत गठजोड़ को कमजोर करने की रणनीति बनाई थी, लेकिन रूसी केजीबी ने चीन को अपने पाले में करके सीआईए के प्लान को बुरी तरह से फेल कर दिया था। वहीं रूस, चीन, भारत त्रिकोण और ब्रिक्स समूह अमेरिका के नेतृत्व वाले पश्चिमी देशों के लिए मजबूत चुनौती बन चुके हैं।

 यही वजह है कि अमेरिकी इशारे पर आने वाले समय में "भारत"के लिए और भी चुनौतियाँ खड़ी की जाएंगी। देखा जाए तो अमेरिका ने अफगानिस्तान में रूस के खिलाफ "तालिबान" जैसे संगठन खड़े करने में अरबों-खरबों डॉलर खर्च किए थे, लेकिन यहां भी रूसी-चीनी समझदारी ने उसके पांव उखाड़ दिए। इसलिए अमेरिका फिर पाकिस्तान से पींगे बढ़ा रहा है। क्योंकि पाकिस्तान को साधकर भारत को अस्थिर करना उसके लिए और भी आसान काम है, क्योंकि यहाँ के देशद्रोहियों और गद्दारों की आईएसआई से सांठगांठ है। 

भारत के कुछ नेताओं के बयानों को देखिए, जिससे स्पष्ट प्रतीत होगा कि वे खुलेआम विदेशी एजेंट की तरह काम कर रहे हैं, उनके इशारे परकतिपय 'जज' बिक चुके हैं, कतिपय मीडिया बिक चुकी है, प्रशासन में कई गुट बन चुके हैं। चूंकि नेता बिकाऊ हैं, इसलिए भारतीय लोकतंत्र भी खतरे में है। आतंकवादियों, नक्सलियों, अपराधियों, तस्करों को राजनीतिक संरक्षण तक प्राप्त है। इससे प्रशासन भी कभी-कभी किंकर्तव्यविमूढ़ बन जाता है।

ऐसे में जब तक भारत के लोग समझदार और चतुर नहीं बनेंगे, तब भारत "महाशक्ति" नहीं बन सकता और न ही बनाया जा सकता है। जबकि भारत में महाशक्ति बनने की असीम संभावनाएं छिपी हुई हैं। ऐसा इसलिए कि भारत एक बहुत बड़ा बाजार है और कोई भी देश नहीं चाहेगा कि भारत आत्मनिर्भर बने, इसलिए ऐसी बातें कहने वाली सरकारों को हराना/गिराना होगा। चूंकि भारत में सक्रिय 
विदेशी ताकतें अक्सर यहां पर "मिश्रित/कमजोर" सरकार चाहती हैं, जिसके गिरने का हमेशा डर बना रहता है। इसलिए उनका नेतृत्व विदेशी दबाव समूहों के प्रभाव में आ जाता है।

चूंकि भारत में पिछले 12 सालों से स्थिर और मजबूत सरकार है। ऐसे में विदेशियों को इस बात से परेशानी है कि भारत सरकार अपने ही उद्योगपतियों को मजबूत बना रही है। इसलिए इनकी सोच है कि इनके पंख काटने हैं, क्योंकि किसी भी देश की ताकत उसके "उद्योगपति" भी होते हैं जो अपने देश के हुनर ​​और चीजों को विदेशों में बेचते हैं, इसलिए उनके हितों की रक्षा करना राष्ट्रवादी सरकार का काम है। यदि आज "अडानी, अंबानी, टाटा, महिंद्रा" दुनिया को चुनौती दे रहे हैं तो क्या इनकी बर्बादी का प्रार्थना करने  वाले हमारे देश के कुछ गद्दार विदेशी एजेंट नहीं हैं?

इसलिए पहचानिए इन्हें, क्योंकि ये वही जयचंद हैं जो भारत की पराधीनता के सबब बन चुके हैं। ये जयचंद आस्तीन के इतने जहरीले सांप हैं कि इन्हें हर भारत विरोधी बात में खुशी मिलती है। देखा जाए तो ये देश की तरक्की से जुड़े किसी भी आंकड़े या रिपोर्ट को मानने को तैयार नहीं हैं, लेकिन अगर इन्हें कहीं भी भारत देश के खिलाफ कुछ भी दिख जाए तो ये खुशी से पागल हो जाते हैं। यहां की मीडिया लाचार है, बिकाऊ है! लिहाजा ये इन गद्दार नेताओं से सवाल नहीं पूछेगी, लेकिन हम लाचार नहीं हैं।

हमारे देश का एक-एक व्यक्ति कुछेक इलेक्ट्रॉनिक मीडिया के माध्यम से देश को विभाजित करने के अमेरिका के अभियान को समझ रहा है और उनको परास्त करने की क्षमता भी रखता है। बस इसके लिए हमें कड़ी मेहनत करनी होगी, क्योंकि यह देश हमारा है, प्रधानमंत्री हमारे हैं, और इस देश से जुड़ा वर्तमान और भविष्य हमारा और हमारी पीढ़ियों का है। मुझे यकीन है कि समान विचारधारा वाले देशभक्त समाने आएंगे और विदेशियों के षड्यंत्र से भारतीयों को आगाह करते रहेंगे। क्योंकि जब देश की जनता जागरूक रहेगी, तब कोई भी षड्यंत्र सफल नहीं होगा। 

मसलन, भारत और भारतीय दोनों को सिर्फ अपने उद्दंड पड़ोसियों पर नजर रखनी है और महत्वपूर्ण सूचना पुलिस तक पहुंचा देनी है। वहीं भारत के पड़ोसियों को उनकी क्षुद्रता की सजा उनके अस्तित्व को समाप्त करके देना है। जिस दिन भारत और भारतीय यह बात ठान लेंगे, भारत महाशक्ति बन जाएगा। ऐसा किये बिना वसुधैव कुटुंबकम और सर्वे भवंतु सुखिनः का भाव सिर्फ किताबी ज्ञान बनकर रह जाएगा, उसे व्यवहारिक अमलीजामा नहीं पहनाया जा सकेगा।

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