धर्म' के बाद अब 'जाति' बनी पूंजीवादी हथियार, इस विभाजनकारी मानसिकता को ऐसे समझिए

'धर्म' के बाद अब 'जाति' बनी पूंजीवादी हथियार, इस घृणित विभाजनकारी लोकतंत्र की मानसिकता को ऐसे समझिए
@ कमलेश पांडेय/वरिष्ठ पत्रकार व राजनीतिक विश्लेषक

यदि आपको नहीं पता है तो यह जान लीजिए कि दुनियावी वामपंथियों की वर्गवादी राजनीति को विफल करने अंतर्राष्ट्रीय पूंजीवादी ताकतों ने धर्म, जाति और क्षेत्र की सियासत का जो अंतरराष्ट्रीय एजेंडा तैयार किया था, भारत की कांग्रेस और भाजपा आदि दल सिर्फ उसका मोहरा मात्र हैं। चूंकि भारत में सवर्ण विरोधी आरक्षण को बेअसर करना है, इसलिए भाजपा ने पहले धर्म आधारित हिन्दू कार्ड (रामजन्मभूमि आंदोलन) खेला और अब इन्हीं हिंदुओं को एकजुट रखने के लिए जाति कार्ड (जातीय जनगणना आधारित) खेल चुकी है, ताकि चीनी शह पर इंडिया गठबंधन की धर्म और जाति के आधार पर गृहयुद्ध कराने की जो योजना है, उसे टांय-टांय फिस्स किया जा सके।

दिलचस्प बात तो यह है कि जब भूमि और राष्ट्रीय संसाधनों का एक समान बंटवारा करके देश में राष्ट्रवादी भावना को मजबूत किए जाने की जरूरत है, तब पहले कांग्रेस और अब भाजपा ने पूंजीपतियों को भूमि और तमाम राष्ट्रीय संसाधन सौंपने को मन बना चुके हैं, ओबीसी-दलित समर्थक समाजवादी पार्टी-बहुजन समाजवादी पार्टी सरीखे दल भी अपना-अपना हिस्सा लेकर उन्हीं जनविरोधी नीतियों को आगे बढ़ाने में अपना योगदान दे रहे हैं। दो राष्ट्रों के बीच हमेशा युद्ध का वातावरण बनाए रखना, आतंकवाद, नक्सलवाद और संगठित अपराध को प्रोत्साहन देना भी पूंजीवादी खेल है, जिसे अंतरराष्ट्रीय पूंजीपति, देशज पूंजीपतियों के साथ खेल रहे हैं। देश का दुर्भाग्य यह है कि मध्यम वर्ग को शराब-शबाब में मदहोश कर दिया गया है और जबतक इनका जाति-धर्म-भाषा-क्षेत्र का नशा टूटेगा, तब तक बहुत देर हो चुकी होगी। इसलिए धर्म' के बाद अब जब 'जाति' पूंजीवादी हथियार बन चुकी है, तो इसके पीछे छिपी घृणित विभाजनकारी लोकतंत्र की मानसिकता को समझना जनमानस के लिए बहुत जरूरी है।

इसलिए समझा जा रहा है कि केंद्र सरकार का अगली जनगणना के साथ जाति जनगणना कराने का निर्णय जितना बड़ा है, उतना ही चुनौतीपूर्ण भी। क्योंकि उसका यह कदम देश के राजनीतिक और सामाजिक समीकरणों को बदल सकता है। साथ ही यह भी तय है कि जाति जनगणना के बाद जातीय आबादी के हिसाब से आरक्षण प्रतिशत के पुनर्निर्धारण की मांग भी विभिन्न जातियां करेंगी। वहीं, भाजपा नीत एनडीए सरकार के इस कदम के साथ ही विपक्ष के कांग्रेस नीत इंडिया गठबंधन के हाथ से एक बड़ा मुद्दा भी निकल गया है, जिसे उसने पिछले आम चुनाव 2024 में भुनाने की कोशिश की थी और भाजपा नीत एनडीए को कमजोर कर दिया था।

उल्लेखनीय है कि भारत में जनगणना की आधिकारिक शुरुआत अंग्रेजी हुकूमत के दौर में, सन 1872 में हुई थी। वहीं, 1931 तक हुई हर जनगणना में जाति से जुड़ी जानकारी को भी दर्ज किया गया था। जबकि आजादी के बाद सन 1951 में जब पहली बार जनगणना कराई गई, तो कांग्रेस के नेतृत्व में यह तय हुआ था कि अब जाति से जुड़े आंकड़े नहीं जुटाए जाएंगे। इस प्रकार से स्वतंत्र भारत में हुई जनगणनाओं के तहत जातीय जनगणना को मंजूरी में केवल अनुसूचित जाति और जनजाति से जुड़े डेटा को ही प्रकाशित किया गया। वहीं, 2011 के सामाजिक आर्थिक और जातिगत जनगणना (एसईसीसी) में जाति के आंकड़ों को सरकार ने इसलिए सार्वजनिक नहीं किया, क्योंकि इसमें कई विसंगतियां बताई गई थीं।

यही वजह है कि समाजवादी सियासत करने वाले विपक्षी दलों ने जाति जनगणना की मांग इसलिए उठाई थी ताकि इस आधार पर आगे आरक्षण को तर्कसंगत बनाया जाए और जातीय गोलबंदी कर चुनावी फायदा लिया जाए। बाद में कांग्रेस नेता राहुल गांधी अपनी ही पार्टी के पुराने और परिपक्व स्टैंड को बदल दिए और जातीय आरक्षण के लिए 
जातीय जनगणना की वकालत  शुरू कर दी। यही वजह है कि बीजेपी पहले तो इसे लेकर दुविधा में थी, लेकिन भारत विरोधी चीनी-पाकिस्तानी षड्यंत्र को कुचलने के लिए उसने जाति जनगणना का ऐलान कर अब उसने इस मुद्दे पर बढ़त बना ली है। लेकिन यह भी देखना होगा कि इसके आंकड़े आने के बाद आबादी के अनुपात में आरक्षण की मांग से वह कैसे निपटती है। इसके अलावा, इस तरह की पहल जिन राज्यों में हुई है, वहां भी इसे लेकर विवाद चल रहा है।

गौरतलब है कि हाल में ही कर्नाटक में जाति जनगणना की
रिपोर्ट लीक हो गई। इसने वहां कांग्रेस सरकार के लिए मुश्किलें खड़ी कर दीं। क्योंकि रिपोर्ट में ओबीसी के लिए आरक्षण को 32 फीसदी से बढ़ाकर 51 प्रतिशत और मुस्लिम समुदाय के लिए 4 फीसदी से 8 प्रतिशत करने की सिफारिश की गई थी। वहीं, राज्य में प्रभावशाली लिंगायत और वोक्कालिगा समुदायों की आबादी उनकी उम्मीद से कम निकली। इसलिए सर्वे के तरीके पर भी सवाल उठाए गए। वहीं, बिहार और तेलंगाना में कास्ट सर्वे के नाम पर सत्ताधारी दलों ने कैसे-कैसे खेल किए, यह बात पब्लिक डोमेन में आ चुकी है।

वहीं, केंद्रीय मंत्री अश्विनी वैष्णव ने कहा कि जाति जनगणना से समाज आर्थिक-सामाजिक दृष्टि से मजबूत होगा। लेकिन, अगर इसे सही ढंग से नहीं संभाला गया, तो यह विवाद भी खड़े कर सकता है। चाहे कर्नाटक हो या बिहार, पुराने सर्वे यही बताते हैं कि कभी भी, हर कोई पूरी तरह संतुष्ट नहीं हुआ। यह भी तय है कि इससे आरक्षण का मुद्दा जोर पकड़ सकता है। यही वजह है कि बिहार में होने वाले विधानसभा चुनाव से पहले बड़ा फैसला करते हुए केंद्र सरकार ने ऐलान किया कि अगली जनगणना में साफतौर पर यह भी दर्ज किया जाएगा कि कौन व्यक्ति किस जाति का है। 

इसलिए सुलगता हुआ सवाल है कि आखिर किसी भी अभिवंचित भारतीय को उसका वाजिब हक देने के लिए एकसमान कानून बनाने के बजाय कभी धर्म, कभी जाति, कभी भाषा, कभी क्षेत्र आदि का विभाजनकारी कार्ड स्वतंत्र भारत में क्यों खेला जा रहा है? क्योंकि यह तो इस्लामिक राजाओं और ईसाई नौकरशाहों का हिन्दू विरोधी खेल रहा है! इसके अलावा, जो जो राजनीतिक दल यह खेल खेल रहे हैं, उनके संगठनात्मक पदों में यह आरक्षण क्यों नहीं लागू किया जा रहा है? 

वहीं, देश के जाति-धर्म विशेष के पूंजीपतियों को बजटीय प्रोत्साहन देते समय इस जातीय आरक्षण की बात क्यों नहीं उठाई जाती! आखिर प्रधानमंत्री या मुख्यमंत्री की जाति के मुताबिक उनके जातीय करीबियों को प्रोत्साहित करने की प्रवृत्ति के खिलाफ कोई आरक्षण क्यों लागू नहीं किया जाता। वहीं, आरक्षण यदि बहुत जरूरी है तो फिर न्यायपालिका और सेना में भी यह ऊपर से और एकल पदों पर भी लागू होना चाहिए। सरकार अपने सभी विभागों के सरकारी कर्मचारियों के जातिगत आंकड़े पब्लिक डोमेन में लाए और इससे वंचित भारतीयों को उन जगहों पर बिठाए।

मेरा स्पष्ट विचार है कि भारत के राजनीतिक दल एक दूसरे को मात देने के चक्कर में परंपरागत भारतीय मूल्यों और सनातन संस्कृति के समता भाव से खिलवाड़ कर रहे हैं। इनकी सच्चाई जनता जितनी जल्दी समझ लेगी, उसी में उनकी भलाई है, अन्यथा उनकी वोट बैंक की मृगमरीचिका से भारत अंतरराष्ट्रीय स्तर पर लगातार कमजोर हुआ है। इसलिए 'संविधान', 'लोकतंत्र' और पारिवारिक राज आदि की देश-समाज द्रोही प्रवृत्ति की जनसमीक्षा बहुत जरूरी है।
अन्यथा भारत पुनः इस्लामिक मुल्कों का गुलाम हो जाएगा। आज भी यह रूस और अमेरिका जैसे ईसाई मुल्कों का पिछलग्गू ही है, जो चीनी बौद्ध अनुयायियों के खिलाफ उसे खड़ा करके अपना उल्लू सीधा कर रहे हैं। इसलिए भारतीय बुद्धिजीवियों का यह कर्तव्य है कि मति भ्रष्ट भारत में राष्ट्रीय पुनर्जागरण की एक नई पहल हो और विभाजनकारी लोकतंत्र को समाप्त करके सर्वसम्मत लोकतंत्र का बीजारोपण किया जाए। जबतक किसी नेता को पड़े हुए वरीयता मत का 90 प्रतिशत मत प्राप्त नहीं हो जाए, तबतक उसे निर्वाचित घोषित नहीं किया जाए, ऐसे कानून बनाने की आज सख्त जरूरत है।

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