राष्ट्रीय सुरक्षा को मजबूती प्रदान करने के लिए देशवासियों को वोकल फ़ॉर लोकल बनना पड़ेगा, अन्यथा आएगी मुश्किल

राष्ट्रीय सुरक्षा को मजबूती प्रदान करने के लिए देशवासियों को वोकल फ़ॉर लोकल बनना पड़ेगा, अन्यथा आएगी मुश्किल
@ कमलेश पांडेय/वरिष्ठ पत्रकार व राजनीतिक विश्लेषक

भारत के पड़ोसियों को शह देकर हिंसा व उत्पात मचवाने वाले और सनातनी भू-भाग पर हिन्दू विरोधी रणनीतियों को बढ़ावा देेेेकर अपने-अपने साम्राज्यवादी हित साधने वाले
अमेरिका और चीन जैसे देशों एवं यूरोप व अरब के कतिपय राष्ट्रों के खिलाफ प्रधानमंत्री मोदी ने अपनी कमर कस ली है। उन्होंने चेतावनी भरे लहजे में एलान किया है कि अब काँटों से ही कांटे निकले जाएंगे। इससे एक दिन पहले ही उन्होंने दो टूक कहा था कि जो चैनपूर्वक अपने हिस्से की रोटी नहीं खाएंगे, उनके लिए गोली खाने की दावत दी जाएगी।

इस तरह से देखा जाए तो जिस प्रकार से हिन्दू विरोधी गोधरा रेल अग्निकांड के बाद मुस्लिम विरोधी पोस्ट गोधरा
दंगा के 'प्रमुख सूत्रधार' बनकर उभरे गुजरात के तत्कालीन मुख्यमंत्री नरेन्द्र मोदी ने जो प्रादेशिक सियासत की धारा बदली, तब उसकी अनुगूँज पूरे देश-प्रदेश में सुनाई दी थी। उसी प्रकार से हालिया हिन्दू विरोधी पहलगाम आतंकी  नृशंस हिंसा के बाद पाकिस्तान प्रेरित आतंकियों के खिलाफ जो पोस्ट पहलगाम वार एक्शन यानी ऑपरेशन सिंदूर चलाया गया और पाकिस्तानी आतंकियों समेत पाकिस्तान की वायु सेना को जो भारी क्षति पहुंचाई गई, उसके मुख्य योजनाकार के तौर पर प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने जो साहसिक और सफल कार्रवाई की, उसकी अनुगूंज अब पूरे देश में ही नहीं, बल्कि समूची दुनिया में सुनाई दे रही है।

भारत के लिए यह गर्व की बात है और उसके सुपर पावर बनने का संकेत भी। उसने किसी परमाणु संपन्न देश के खिलाफ सैन्य कार्रवाई करने का जो साहस दिखाया है, आतंकवाद के विश्वव्यापी दमन के लिए भी अनुकरणीय उदाहरण बन चुका है। लेकिन इसके बाद भी पीएम मोदी चुप नहीं बैठे हैं, बल्कि वह भारत को अधिक से अधिक मजबूत बनाने की अपनी कोशिशों में जुटे हुए हैं।

इसी कड़ी में बीते दिनों अपने गृह राज्य गुजरात की राजधानी गांधीनगर में एक रोड शो के बाद उन्होंने एक महती जनसभा को संबोधित करते हुए जो कुछ कहा है, वह अभिजात्य और सामान्य दोनों प्रकार के भारतीयों के लिए किसी चेतावनी से कम नहीं है। उन्होंने कहा है कि ऑपरेशन सिंदूर की सफलता सिर्फ सैनिकों के जिम्मे नहीं है, बल्कि इसमें 140 करोड़ भारतीयों की स्पष्ट भागीदारी होनी चाहिए| मोदी ने लोगों से मेड इन इंडिया को बढ़ावा देने और विदेशी सामान का परहेज करने की अपील की। यानी पुनः वोकल फ़ॉर लोकल का आह्वान किया। पहले भी वो ऐसा कई बार कर चुके हैं।

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने लोगों से विदेशी चीजों का इस्तेमाल नहीं करने और देश में बने सामान को बढ़ावा देने का आह्वान किया है। उन्होंने साफ-साफ कहा है कि हमें विदेशी सामान खरीदने और बेचने से परहेज करना चाहिए और मेड इन इंडिया पर गर्व करना चाहिए। प्रधानमंत्री ने कहा कि ऑपरेशन सिंदूर देश के सैन्य बलों ने शुरू किया था लेकिन इसे आगे बढ़ाने की जिम्मेदारी देश के 140 करोड़ लोगों की है। देश को बनाने में सभी का सहयोग जरूरी है। 
संभवतया पहली बार उन्होंने दुकानदारों और बिजनसमेन से भारत में बना सामान बेचने का आग्रह किया। इससे साफ है कि पाकिस्तान के शुभचिंतक तुर्किये के सामानों के बहिष्कार का अभियान जो पिछले दिनों चलाया गया था, उसकी जद में अब चाइनीज और अमेरिकी प्रॉडक्ट भी आ चुके हैं। कुछ यूरोपीय व अरबी प्रॉडक्ट भी इस लपेटे में आएंगे। इससे भारत विरोधी इन देशों को कड़ी सबक मिलेगी।

मोदी ने ठीक ही कहा है कि, 'जब मैंने 2014 में कार्यभार संभाला था, तब भारत 11वीं सबसे बड़ी अर्थव्यवस्था था, आज वह चौथे स्थान पर है। जब भारत ने ब्रिटेन को पीछे छोड़ा तो हम खुश हुए क्योंकि ब्रिटेन ने हम पर शासन किया था। अब दबाव है कि जर्मनी को पछाड़कर हम कब तीसरे नंबर की अर्थव्यवस्था बनेंगे।' फिर चीन को दूसरे नम्बर से पछाड़ने का अभियान चलेगा। उल्लेखनीय है कि भारत हाल में जापान को पीछे छोड़कर दुनिया की चौथी बड़ी अर्थव्यवस्था बन गया है। अब भारत से आगे अमेरिका, चीन और जर्मनी हैं। इससे साफ है कि मोदी हैं तो मुमकिन है और योगी हैं तो यकीन का नारा कोई जुमला नहीं, बल्कि कड़वी हकीकत है।

प्रधानमंत्री ने याद दिलाते हुए कहा है कि अगर 1947 में हमने कश्मीर में घुसने वाले मुजाहिदीनों को मार गिराया होता तो आज हमें ऐसी स्थिति का सामना नहीं करना पड़ता। तब केंद्रीय गृह मंत्री सरदार वल्लभभाई पटेल (साल 1947 में) चाहते थे कि सेना पाकिस्तान के कब्जे वाले कश्मीर को वापस ले ले, जो नहीं किया गया। वहीं सिंधु जल संधि पर बहुत खराब तरीके से बातचीत की गई, जिसमें कश्मीर में बांधों से गाद निकालने तक की अनुमति नहीं थी। इसलिए अब हमने सिंधु जल संधि को स्थगित कर दिया है, और अपनी तरफ बांधों की क्षमता बढ़ानी शुरू कर दी है। इससे पाकिस्तान परेशानी महसूस कर रहा है।

 प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने कहा कि 'वोकल फॉर लोकल' एक अनूठी सोच है जो देश के नागरिकों से स्थानीय स्तर पर बने उत्पादों का समर्थन करने, आर्थिक उन्नति एवं आत्मनिर्भरता को प्रोत्साहित करने का आग्रह करती है। यह अभियान, नागरिकों से स्थानीय स्तर पर तैयार वस्तुओं को प्राथमिकता देने तथा बढ़ावा देने का आग्रह करता है, जिससे घरेलू उद्योगों को मजबूती मिलती है। उन्होंने कहा कि यह विचार स्वदेशी आंदोलन के युग की तरह ही, यह भविष्योन्मुखी दृष्टि (विजन) हमारे स्थानीय उत्पादकों और कारीगरों के उत्थान के लिए समर्पित है। 

बतौर उदाहरण उन्होंने बताया कि इसने आदिवासी कला और कौशल के लिए एक नई पहचान का समर्थन किया है जिसे उसका हक नहीं दिया गया था और अक्सर पिछली सरकारों द्वारा उनकी उपेक्षा की गई थी। वोकल फॉर लोकल को रोजगार के अवसरों, नए राजस्व चैनलों, पुनर्जीवित कृषि उप-क्षेत्रों और स्थानीय मैन्युफैक्चरिंग में एडवांस टेक्नोलॉजी को व्यापक रूप से अपनाने के माध्यम से देश की अर्थव्यवस्था को मजबूत करने के लिए पेश किया गया है।

उन्होंने जोर देते हुए कहा कि जिस तरह बूंद-बूंद से सागर बनता है, उसी तरह अगर भारत का हर नागरिक 'वोकल फॉर लोकल' के मंत्र को जीने लगे तो देश को आत्मनिर्भर बनते देर नहीं लगेगी। जब सभी देशवासी स्थानीय उत्पादकों के लिए मुखर होंगे तो उनकी गूंज भारत ही नहीं बल्कि पूरी दुनिया में सुनाई देगी।

कहना न होगा कि हमारे प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी का यह आह्वान वर्तमान दौर में सर्वाधिक प्रासंगिक है, क्योंकि तथ्य इस बात की पुष्टि करते हैं कि स्थानीय हस्तशिल्प और जनजातीय कलाओं के माध्यम से कमाई करना पहले से अब अधिक लाभप्रद हो गया है, स्थानीय और भौगोलिक रूप से व्यापक बाजारों तक पहुंच सरकार के प्रोत्साहन से अधिक सुविधाजनक हो गई है। इन उत्पादों की मांग और बिक्री में भी काफी सुधार हुआ है।

वहीं, डिजिटलीकरण को अपनाते हुए, खादी और ग्रामोद्योग आयोग ने पूरे भारत में अपनी पहुंच का विस्तार करने के लिए ऑनलाइन मार्केटिंग में कदम रखा, जिससे कारीगरों को KVIC ई-पोर्टल के माध्यम से सबसे दूरस्थ क्षेत्रों में भी अपने उत्पाद बेचने की अनुमति मिली। इसप्रकार पिछले एक दशक में खादी उद्योग के उत्पादों की मांग लगातार बढ़ी है। इससे कारीगरों का उत्पादन और आय दोनों आसमान छू रहे हैं। वहीं, कुशल कारीगरों द्वारा तैयार किए गए स्वदेशी खादी उत्पादों की बिक्री में 2013-14 से 2022-23 तक 332% की अभूतपूर्व वृद्धि देखी गई है। 

जहां वर्ष 2013-14 में खादी उद्योग के उत्पादों का सालाना कारोबार 31,154 करोड़ रुपये था, वहीं 2022-23 में यह 1,34,630 करोड़ रुपये तक पहुंच गया। कुल रोजगार 2013-14 में 130,38,444 से बढ़कर 2022-23 में 177,16,288 हो गया, जो 36% की वृद्धि को दर्शाता है। इसके अलावा, नए रोजगार के अवसर 2013-14 में 5 लाख+ से बढ़कर 2022-23 में 9 लाख+ हो गए, जो 70% की वृद्धि को दर्शाता है।

वहीं, 'वोकल फॉर लोकल' के आह्वान ने आदिवासी समुदायों को प्रतिबंधित करने वाले दशकों पुराने कानूनों के दुष्प्रभावों को महत्वहीन बना दिया है, जहां वे पहले बांस जैसे वन उत्पादों की कटाई तक सीमित थे। अब उन्हें इन संसाधनों पर स्वामित्व का अधिकार प्राप्त हो गया है। साथ ही, वन उत्पादों को बढ़ावा देने की कई पहल की गई हैं, जिनमें न्यूनतम समर्थन मूल्य (एमएसपी) के लिए पात्र वस्तुओं की सूची 12 से बढ़ाकर लगभग 90 कर दी गई है। 

मीडिया रिपोर्ट्स के मुताबिक, यह जनजातीय समुदायों के लिए बड़ी राहत है, जो पहले मुख्यधारा से अलग-थलग पड़ने के कारण उत्पन्न बाधाओं को दूर करने और उत्पादों के लिए उचित पारिश्रमिक प्राप्त करने में सहायक है। विशिष्ट आकर्षण और पर्यावरण मित्रता से प्रेरित होकर, आदिवासी शिल्प कौशल अब विदेशी बाजारों में 12 करोड़ अमेरिकी डॉलर से भी अधिक कमा रहा है। इसके अलावा, 24,104 करोड़ रुपये के आश्वासित पीएम-जनमन बजट के साथ सतत आजीविका को बढ़ावा देना उन्हें चौतरफा सुरक्षा और स्थिरता प्रदान करता है।

इसी प्रकार वन धन योजना ने अपने दायरे को बढ़ाया है और देश भर में 3,000 से अधिक वन-धन विकास केंद्रों और 50,000 वन-धन स्वयं सहायता समूहों के साथ वन संसाधनों को समकालीन अवसरों से जोड़ा है। जनजातीय उत्पादों की मार्केटिंग के लिए TRIFED द्वारा संचालित ट्राइब्स इंडिया के आउटलेट 29 से बढ़कर 119 हो गए हैं, जिनमें अब एक लाख उत्पाद हैं।

वहीं, भारत ने नई विदेश व्यापार नीति में संदर्भित ODOP-DEH (One District One Product-Districts as Export Hubs) पहल शुरू की, ताकि प्रत्येक जिले में विशिष्ट उत्पादों पर ध्यान केंद्रित करके निर्यात बढ़ाने के लिए अपने 734 पहचाने गए जिलों में संतुलित क्षेत्रीय विकास को बढ़ावा दिया जा सके। इसके साथ ही, आंध्र प्रदेश के विशाखापत्तनम में ट्राइबल रिसर्च इंस्टिट्यूट की स्थापना, रिसर्च और डॉक्यूमेंटेशन कार्यों में जनजातीय समुदायों का समर्थन करने और उनकी समृद्धि को बढ़ाने के लिए ट्रेनिंग एवं कैपेसिटी बिल्डिंग कार्यक्रमों पर बल देती है।

इसके अलावा, 17 सितंबर, 2023 को शुरू की गई पीएम-विश्वकर्मा योजना, पारंपरिक शिल्पों के लिए बाजार को मजबूत करने के लिए एक नई पहचान लेकर आई। यह योजना उन लाखों परिवारों के लिए आशा की एक नई किरण है जो हस्त कौशल और औजारों पर निर्भर हैं। यह पहल आर्थिक रूप से कमजोर इन परिवारों की सहायता करने और जनजातीय समुदायों के विविध शिल्पों और कलात्मक परंपराओं को संरक्षित करने का दोहरा उद्देश्य लेकर आई, जो उन्हें सम्मान की भावना प्रदान करती है।

देखा जाए तो 13,000 करोड़ रुपये के बजट वाली यह योजना पूरी तरह से केंद्र सरकार द्वारा वित्त पोषित है। इस तरह के समय पर समर्थन के साथ, भारत वैश्विक हस्तशिल्प बाजारों को आगे बढ़ाने और अपना प्रभुत्व कायम करने में कोई कसर नहीं छोड़ेगा क्योंकि 18 अतिरिक्त पारंपरिक ट्रेड्स को इसमें आसानी से वित्त समर्थन मिलता है। वहीं,
दीर्घकालिक रोजगार सृजन और क्षेत्र के सतत विकास की मांग करने वाली कारीगर अर्थव्यवस्था ने इस योजना का स्वागत किया, विशेष रूप से इन लक्षित लाभार्थियों में कारीगर शामिल थे, खासकर दलित, आदिवासी, पिछड़े समुदायों या ग्रामीण महिलाओं से जिनकी समुदायों के बाहर गतिशीलता लंबे समय से सामाजिक या सांस्कृतिक मानदंडों के कारण प्रतिबंधित थी। अब तक, 1,25,700 से अधिक शिल्पकारों ने योजना का लाभ लेने के लिए सफलतापूर्वक पंजीकरण किया है।

इस प्रकार से वोकल फॉर लोकल अभियान की सफलता पर निरंतर जोर और विश्वास के साथ, वर्तमान राष्ट्रीय नेतृत्व ने सफलतापूर्वक जो हासिल किया है, वह उन उत्पादों के लिए समान रूप से कारोबारी इनोवेशन, प्रचार और सशक्तिकरण को बढ़ावा दे रहा है जो कभी भी बड़े वैश्विक बाजारों तक पहुंचने और गुणवत्ता के मामले में आधार बनाने की दिशा में नहीं सोच सकते थे। चाहे वह हमारा G20 इवेंट हो, या भारत-अमेरिका यात्रा की श्रृंखला, या हाल ही में श्रीराम मंदिर का लोकार्पण, पीएम मोदी ने यह सुनिश्चित किया है कि स्थानीय उत्पाद और शिल्प कौशल, अंतरराष्ट्रीय स्तर पर और भारत में बेहद लोकप्रिय हों, जो उनकी योग्यता के लिए विधिवत मान्यता प्राप्त हो।

इसलिए हमारे प्रधानमंत्री द्वारा उपहारों की विशिष्टता का व्यक्तिगत समर्थन और वैश्विक समकक्षों पर शानदार प्रभाव डालने के लिए उनकी खूबियों को सटीक रूप से बढ़ाना, अतीत में देखे गए सबसे विचारशील हस्तक्षेपों में से एक है। यह पीएम मोदी की 'भारतीयता' और राष्ट्र का सर्वश्रेष्ठ लाने के लिए सभी अवसरों का सदुपयोग करने के उनके उत्साह को भी दर्शाता है। इस तरह की विजनरी मार्केटिंग पहलों के कारण, पूरे भारत में कारीगरों का मनोबल बढ़ा है। उच्च गुणवत्ता वाले उत्पादों का निर्माण, कारीगरों के बीच एक अकल्पनीय उत्साह बन गया है, जो विभिन्न विकल्पों के साथ ग्राहकों को आकर्षित करते हैं और अपने प्रतिस्पर्धी लाभ को बढ़ाने के लिए अपने उत्पादों पर GI टैगिंग के बारे में विशेष रूप से ध्यान देते हैं।

वहीं, पिछले एक दशक में भारत की विकास यात्रा हर दिन मजबूत होती जा रही है, भारत ने "आत्मनिर्भरता" में नई ऊंचाई हासिल की है, और वोकल फॉर लोकल का मंत्र, काफी हद तक, इस स्पिरिट को बढ़ावा देने वाली नींव बना है। भारतीयों के लिए, भारतीयों द्वारा, भारतीयों का; 'वोकल फॉर लोकल' का सार बना हुआ है! नतीजतन, लोकल इंडस्ट्री अब सरकार की सबसे भरोसेमंद भागीदार है, जो पीएम मोदी के नेतृत्व में आत्मनिर्भर भारत के विजन के साथ अग्रसर है। 

कहने का तातपर्य यह है कि हमलोग विदेशी ऑनलाइन कम्पनियों द्वारा प्रोत्साहित की जा रही बाहरी उत्पादों की खरीददारी के बजाए यदि लोकल मार्केट से खरीददारी करेंगे तो ज्यादा सुखी रहेंगे। अपने पड़ोसियों को भी वित्तीय रूप से मजबूत करेंगे। देशी लोग तो शुरू से ही मितव्ययिता के सिद्धांत से लैस रहते हैं, लेकिन पढ़े-लिखे अभिजात्य लोगों के संसर्ग में आकर उनके जो खरीद संस्कार बदल रहे हैं, उससे भारत का सुरक्षा हित प्रभावित हो सकता है, हो रहा है। इसलिए प्रधानमंत्री मोदी ने राष्ट्रीय मंत्र थमा दिया है, ताकि घटिया चीनी मालों से देश को मुक्ति व सामरिक सुरक्षा दोनों मिले। इसलिए हमें देशी उत्पादों का ही प्रयोग करना चाहिए। कहना का आशय यह कि राष्ट्रीय सुरक्षा को मजबूती प्रदान करने के लिए देशवासियों को वोकल फ़ॉर लोकल बनना पड़ेगा, अन्यथा आएगी मुश्किल!

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