आखिर सुसंस्कृत भारत की पुनर्स्थापना कब बनेगी हमारी प्रशासनिक प्राथमिकता?
आखिर सुसंस्कृत भारत की पुनर्स्थापना कब बनेगी हमारी प्रशासनिक प्राथमिकता?
@ कमलेश पांडेय/वरिष्ठ पत्रकार व राजनीतिक विश्लेषक
कभी भारत को विश्वगुरु कहा जाता था, लेकिन आज धर्मनिरपेक्ष खलनायक जो अपने मूल लोगों की हिफाजत में लाचार है। इस वास्ते वह उन नापाक देशों के समक्ष गिड़गिड़ा रहा है जो उसके मुकाबले कहीं नहीं ठहरते हैं। कभी भारत को सोने की चिड़ियां समझा जाता था, लेकिन आज हमारे बाजार विदेशी सामानों से भरे पड़े हैं! कभी भारत सुख-शांति और साधना स्थली के रूप में जाना जाता था, लेकिन आज यह दंगाई, आतंकी, नक्सली और आपराधिक भूमि मतलब संघर्ष भूमि बनने को अभिशप्त है।
जानते हैं क्यों, क्योंकि भारतीय संविधान के मूल स्रोत हमारे आक्रमणकारियों के नापाक फूट डालो और राज करो जैसे प्रतिगामी विचारों से अभिप्रेरित हैं। जब हम आक्रमणकारियों की बात करते हैं तो इन इस्लाम और ईसाई समाज से जुड़े क्रूर राजाओं और नौकरशाहों की याद तरोताजा हो जाती है जो सनातनियों के मौलिक शत्रु समझे जाते हैं। यथा- मूर्तिभंजक, मंदिर ध्वंसकर्ता, जनउत्पीडक आदि।
यह कड़वा सच है कि कथित धर्मनिरपेक्षता, अल्पसंख्यकवाद, अतार्किक आरक्षण आदि जैसे नापाक गुलामी कालीन विचार जो अब अप्रासंगिक हो चुके हैं, को 'आसेतु हिमालय' में इसलिए बरकरार रखा गया है, क्योंकि हमारे प्रशासन में शीर्ष पदों पर इनके हिमायती बैठे हैं!
दरअसल, उपर्युक्त बातें ऐसे राजनेता, अधिकारी, न्यायविद, उद्योगपति, समाजसेवी लोगों द्वारा प्रोत्साहित हैं जो देशवासियों को भ्रमित करने को काफी है।
दरअसल, ये लोग सिर्फ नाम से हिन्दू हैं, जबकि कॉन्वेंट एजुकेटेड होने के कारण और 'कांग्रेसियों-समाजवादियों-वामपंथियों की फर्जी धर्मनिरपेक्षता में लगभग 6 दशक तक प्रशिक्षित होने के कारण इनके आचार-विचार में भी लगभग वही 'कुसंस्कार' जैसे मांसाहार, दुर्व्यसन आदि समाविष्ट हो चुके हैं। यह भी कड़वा सच है कि ये लोग सनातनी संस्कारों से विमुख हो चुके हैं और आधुनिक पाश्चात्य मूल्यों के हिमायती बन चुके हैं।
देखा जाए तो आज हर जगह इनका बोलबाला है। चाहे विश्वविद्यालय हो या अधिवक्ता परिषद या फिर अन्य सार्वजनिक मंच, ऐसे लोग भरे पड़े हैं और आरएसएस के ध्येय पूर्ति के सबसे बड़े रोड़े बन चुके हैं। ऐसे तत्वों की लगभग 80 साल की उपलब्धि यही है कि आजाद भारत तबाह हो चुका है। हिंदुओं के हिस्से वाले हिंदुस्तान को ये लोग एक चौथाई धर्मनिरपेक्ष पाकिस्तान बना चुके हैं, जो देश में रहकर पाकिस्तान, पूर्वी पाकिस्तान यानी बंगलादेश की भाषा बोलते हैं।
आलम यह है कि आज जगह-जगह जातीय और साम्प्रदायिक दंगे होते हैं, आतंकी हमले होते हैं, नक्सली हिंसा होती है, आपराधिक उत्पात होते हैं। कहीं हक की लड़ाई चल रही है तो कहीं दबंगई का बोलबाला है। देश भगवान भरोसे चल रहा है, क्योंकि इनकी धर्मनिरपेक्षता जिसे मैं अव्वल दर्जे का कुसंस्कार समझता हूं, इन पर उलजुलूल तर्क देने को प्रोत्साहित करती है। नेहरू का हिंदुत्व इंदिरा का सेक्यूलर इसलिए बन गया, क्योंकि उन्होंने फिरोज गांधी से शादी रचा ली थी।
आपकी समझदारी विकसित करने के लिए एक उदाहरण देता हूँ। स्विट्जरलैंड में समुदाय विशेष मात्र 2 प्रतिशत है और पढ़ा लिखा भी है। फिर भी तार्किक सोच रखने वाले सलवान मोमिका की घर में घुसकर गोली मारकर हत्या कर दी। आज पूरा यूरोप इसी मानसिकता से ग्रस्त है और नया अरब बनने को आतुर हैं। जबकि भारत में तो कन्वर्टेड हिंदू 20 प्रतिशत हैं और ज्यादातर मदरसे में पढ़े हैं। इसलिए 20 साल बाद गृहयुद्ध, नरसंहार, हत्या, बलात्कार और अगला विभाजन निश्चित है। प्रख्यात साहित्यकार कमलेश्वर की कृति 'और कितने पाकिस्तान' दशकों पहले इस ओर इशारे कर चुकी है।
कहना न होगा कि सुनियोजित लव जिहाद, लैंड जिहाद, ड्रग जिहाद, घुसपैठ जिहाद, धर्मांतरण जिहाद, जनसंख्या जिहाद आदि के कारण भारत की डेमोग्राफी बहुत तेजी से बदल रही है। इसके लिए अरब देशों, यूरोप आदि से इन्हें बहुत मदद मिलती है। ऐसे में यदि कठोर कानून तत्काल नहीं बना तो 20 वर्ष बाद या तो कन्वर्ट होना पड़ेगा अन्यथा यश चोपड़ा, प्रेम चोपड़ा, सुनील दत्त, देवानंद, राज कपूर, राजेन्द्र कुमार, गुलजार, मनमोहन सिंह, खुशवंत सिंह, मिल्खा सिंह, इंद्र कुमार गुजराल, राम जेठमलानी और आडवाणी जी आदि की तरह आप जहां हैं, वहीं से मकान, दुकान, खेत, खलिहान, उद्योग, व्यापार आदि सबकुछ छोड़कर भागना होगा। ये लोग तो पाकिस्तान से हिंदुस्तान आए थे, लेकिन यहां के लोग कहाँ जाएंगे, जम्मूकश्मीर, पश्चिम बंगाल और केरल आदि के हालात चीख चीख कर पूछ रहे हैं।
सुलगता सवाल है कि यदि विकास करने से देश सुरक्षित होता तो विकास के मामले में फ्रांस और स्विट्जरलैंड हमसे बहुत आगे हैं, लेकिन आज असुरक्षित मुल्क बनते जा रहे हैं। अब कुछ आंकड़ों पर गौर कीजिए। 1805 में अफ़गानिस्तान के प्रधानमंत्री पंडित नंदराम टिक्कू ने बहुत विकास किया था और 10 साल बाद उन्हें खदेड़ दिया गया और आज वहां एक भी हिंदू, जैन, बौद्ध, सिख आदि नहीं बचा है। इसी प्रकार 100 वर्ष पहले विश्व की सबसे बड़ी भगवान बुद्ध की मूर्ति अफ़गानिस्तान में थी, लेकिन अब वहाँ न मूर्ति बची है और न बौद्ध!
इसी प्रकार 100 वर्ष पहले विश्व का सबसे बड़ा जैन मंदिर मुल्तान में था, लेकिन अब वहाँ मदरसा चलता है और न तो भगवान पार्श्वनाथ की मूर्ति है और न तो कोई जैन! वहीं, 100 वर्ष पहले विश्व का सबसे बड़ा शिव मंदिर गांधार (अफ़गानिस्तान) में था, लेकिन अब उसका नामोनिशान नहीं है। न शिवलिंग बचा है और न शिवभक्त! वहीं, 100 वर्ष पहले विश्व का सबसे बड़ा विष्णु मंदिर कैकेय (पाकिस्तान) में था, लेकिन अब उसका नामोनिशान नहीं है। न भगवान विष्णु की मूर्ति बची और न विष्णु भक्त!
इसी प्रकार 1971 में बांग्लादेश को बनवाने के लिए हमारे 20 हज़ार सैनिकों ने बलिदान दिया था, लेकिन अब वहां हिंदू, जैन, बौद्ध, सिख को अपना मकान, दुकान, खेत, खलिहान, उद्योग, व्यापार छोड़कर भागना पड़ रहा है। वहीं,
1990 में कश्मीर से हिंदुओं को अपना मकान, दुकान, खेत, खलिहान, उद्योग, व्यापार आदि छोड़कर भागना पड़ा और आजतक वापस नहीं मिला। पहलगाम आतंकी हिंसा में हिंदुओं के मारे जाने से सवाल फिर सुलग उठा है।
यह कड़वा सच है कि वोटजीवी, नोटजीवी और सत्ताजीवी नेता प्रतिदिन आरोप-प्रत्यारोप, तू-तू-मैं-मैं, नूरा-कुश्ती, बतोलेबाजी, भाषणबाजी और तू चोर मैं सिपाही करते हैं, लेकिन आवश्यक मुद्दों पर संसद में चर्चा नहीं करते हैं। इन पर न्यायपालिका भी स्वतः संज्ञान नहीं लेती। जबकि राष्ट्रहित इन्हीं पर विकसित नवदृष्टिकोण पर निर्भर है। बता दूं कि गांधीवाद, लोहियावाद, अंबेडकरवाद, साम्यवाद, समाजवाद आदि आपको भ्रमित करने वाले जुमले हैं। जबकि नेताओं का असली लक्ष्य है, सत्ता और सत्ता से पैसा! तथा अपने मित्रों को कारोबारी डील दिलवाना, ताकि बैकडोर से आय बनी रहे।
ऐसे में यदि आप अपना मकान, दुकान, खेत, खलिहान, उद्योग, व्यापार और त्योहार बचाना चाहते हैं तो दल गत गुलामी छोड़िये और अपने सांसद से मिलकर लव जिहाद, लैंड जिहाद, ड्रग जिहाद, घुसपैठ जिहाद, धर्मांतरण जिहाद और जनसंख्या जिहाद आदि को रोकने के लिए कठोर कानून बनाने की मांग करिए। यदि आप अपने बच्चों को सुरक्षित देखना चाहते हैं तो नेताओं की जय जयकार करने की बजाय अपने सांसद से मिलकर समान शिक्षा, समान नागरिक संहिता, समान कर संहिता, समान व्यापार संहिता, समान जनसंख्या संहिता, समान पुलिस संहिता, समान न्याय संहिता, समान प्रशासनिक संहिता आदि को लागू करने की मांग करिये।
याद रखिए, आज के नेता 20 वर्ष बाद आपका मकान, दुकान, खेत, खलिहान, उद्योग, व्यापार और त्योहार बचाने नहीं आएंगे, लेकिन आज का कठोर कानून आपका धन, धर्म और परिवार को बचाएगा। इसलिए अब रास्ता दो ही बचा है- या तो चीन जैसा कठोर कानून बने या फिर इजरायल जैसा शक्ति का उपयोग हो! इससे संवैधानिक पुरुषों को मिर्ची लगेगी, क्योंकि उनका भ्रष्टाचार नहीं दब पाएगा। लेकिन जब जनसमूह एकजूट होगा तो ये भी विवश होंगे 'बांग्लादेश' की तरह! इसलिए इन सबसे पूछिए कि आखिर सुसंस्कृत भारत की पुनर्स्थापना कब बनेगी आपकी प्रशासनिक प्राथमिकता? आखिर हमारे भविष्य को धर्मनिरपेक्ष घोड़ों से रौंदवाने को आपलोग क्यों आतुर हैं? भविष्य की पदचाप कब महसूस करेंगे।
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