सनातन धर्म के अस्तित्व से आबद्ध हैं देवाधिदेव महादेव, भगवान राम और प्रभु श्री कृष्ण
सनातन धर्म के अस्तित्व से आबद्ध हैं देवाधिदेव महादेव, मर्यादा पुरुषोत्तम भगवान राम और षोडश कला निपुण प्रभु श्री कृष्ण
@ डॉ दिनेश चन्द्र सिंह, आईएएस, डीएम, जौनपुर, यूपी
यदि मैं कहूँ कि सत्य सनातन धर्म के अस्तित्व से आबद्ध हैं देवाधिदेव महादेव, मर्यादा पुरुषोत्तम भगवान राम और षोडश कला निपुण प्रभु श्री कृष्ण आदि देव, तो यह कतई गलत नहीं होगा। क्योंकि रामायण और महाभारत जैसे महाकाव्य इनकी मानवीय सद्प्रेरणाओं का बखान करते हैं, जिससे समस्त मानवीय सभ्यताएं किसी न किसी रूप में अनुप्राणित होती आई हैं। इस बात में कोई दो राय नहीं कि भारतीय संस्कृति की जड़ें उस अटल और अखिल सनातन सभ्यता से अभिसिंचित हैं जिसको तमाम प्रकार के आक्रमणकारियों ने मिटाने की कोशिश की, परन्तु मिट न सकी।
ऐसा इसलिए कि (क्योंकि) यह सभ्यता उदात्त मानवीय संस्कारों पर आधारित है, यह सभ्यता प्राणी मात्र के निमित्त हमारी मर्यादाओं पर आधारित है, यह सभ्यता हमारे पूर्वजों द्वारा किये गए त्याग और तपस्या पर आधारित है, यह सभ्यता उन बिंदुओं को केंद्र में रखकर रची हुई है, जिसके मूल में केवल वसुधैव कुटुंबकम और सर्वे भवन्तु सुखिनः की अवधारणा काम करती है। इसलिए इस सभ्यता को आक्रांताओं द्वारा मिटाने की अथक कोशिश की गई, लेकिन वे स्वयं मिट गए, किंतु सनातन सभ्यता न मिट सकी।
देखा जाए तो आतताइयों द्वारा सनातनी प्रतीक चिन्हों को मिटाया गया, परन्तु जब-जब धर्म का नाश हुआ, अधर्म की आसुरी शक्तियों ने प्रहार करके हमारे प्रतीक चिन्हों को मिटाने की कोशिश की, ऐसे विपरीत समय में ही विलक्षण प्रतिभाओं द्वारा जन्म लेकर उन प्रतीक चिन्हों को भारतीय सभ्यता और संस्कृति के आधार पर पुनर्जीवित करने का जो सार्थक प्रयास किया गया, उसी के परिणामस्वरूप स्वरूप आज पुनः हमारी सनातन धर्म की संस्कृति कायम है। उन महान विभूतियों के द्वारा, उन सभी वैभवशाली प्रतीक चिन्हों को, जो हमारी आस्था और पूजा के केंद्र हैं, का पुनरुद्धार किया गया। और यह पुनरुद्धार सदियों से चली आई हमारे संघर्ष की गौरवगाथा के कारण ही संभव हो सका।
इसलिए हम कहते हैं कि रामनवमी के अवसर पर मर्यादा पुरुषोत्तम श्री राम जी के आदर्शों को मानकर उनके त्याग, परित्याग, साहस, पराक्रम और सभी ऐसे महत्वपूर्ण बिंदुओं को जो हमारी संस्कृति के महत्वपूर्ण विषय हैं, उनको आत्मसात करते हुए रामनवमी के त्यौहार को जो हम कल रविवार को मनाने जा रहे हैं, उसके केंद्रबिंदु में शक्ति की आराधना के साथ-साथ हम संस्कृति रहित उन पहलुओं पर आत्मसात करते हुए चलने का प्रण लें, जिससे कि हम अनायास ही किसी के प्रति हम क्रूर न हों, आक्रामक न हों और यदि कोई हमारी संस्कृति पर आक्रमण करे तो उसका उसी प्रकार से जवाब दिया जा सके, जैसा कि मर्यादा पुरुषोत्तम राम जी ने रावण की आसुरी शक्तियों को ललकार कर संयम, विवेक, धैर्य, त्याग और साहस के साथ परास्त करके दिया था।
इसलिए आइए रामनवमी के अवसर पर हम उस भारतीय संस्कृति के महान प्रतीक मर्यादा पुरुषोत्तम भगवान राम जी के आदर्शों से सीख लेकर अपने जीवन में कुछ न कुछ उनके जीवन दर्शन से ग्रहण करते हुए आगे बढ़ने का संकल्प लें। और रही बात महाकुंभ की तो महाकुंभ ने भी हमें सिखाया है कि हम आएं, समागम करें, संवाद करें, विभिन्न संस्कृतियों की विचारधाराओं पर विमर्श करें, एक मंथन करें, और उस मंथन के आधार पर जो मानव कल्याण के लिए हमारे मूल्य हैं, उनकी अभिवृद्धि करते हुए आगे बढ़ें। महाकुंभ इन सभी मायनों में इसलिए सार्थक और सिद्ध हुआ।
........और रामनवमी के अवसर पर पुनः उस कलश रूपी पूजा का जो विधि विधान है, नवरात्रि के अवसर पर सभी लोगों ने पूरी निष्ठा के साथ किया, मां भगवती उनको उनकी निष्ठा का और त्यागपूर्ण किये गए तपस्या का निश्चित रूप से अवश्य मनवांछित फल प्रदान करेंगी। और रामनवमी के अवसर पर जिस प्रकार से महाकुंभ में विभिन्न संस्कृतियों के लोग आए, और सबने अमृत रस प्राप्त किया, उसी प्रकार मर्यादा पुरुषोत्तम भगवान राम के जो जीवन आदर्श हैं, वह किसी एक धर्म के लिए नहीं, बल्कि पूरी मानवता के कल्याण के लिए हैं।
देखा जाए तो विदेशी मुस्लिम आक्रमणकारियों ने, विधर्मियों ने काशी विश्वनाथ, सोमनाथ, अयोध्या रामजन्मभूमि, मथुरा कृष्ण जन्मभूमि आदि पर कई बार आक्रमण किए, लेकिन भगवान शिव, राम, कृष्ण की कृपा दृष्टि से हमलोग उन सभी का पुनरुद्धार कर पाए। हमारी इसी अन्तरशक्ति को इंगित करते हुए किसी मशहूर शायर ने सच ही लिखा है कि-
"सारे जहाँ से अच्छा, हिन्दोस्ताँ हमारा।
हिन्दी हैं हम वतन हैं, हिन्दोस्ताँ हमारा।।
यूनान-ओ-मिस्र-ओ-रूमा, सब मिट गए जहाँ से।
अब तक मगर है बाक़ी, नाम-ओ-निशाँ हमारा।।
कुछ बात है कि हस्ती, मिटती नहीं हमारी।
सदियों रहा है दुश्मन, दौर-ए-ज़माँ हमारा।।"
उल्लेखनीय है कि रविवार को पूरे देश में रामनवमी मनाई जा रही है। इस दिन मर्यादा पुरुषोत्तम भगवान राम और उनके अनन्य भक्त पवनपुत्र हनुमानजी की विशेष आराधना की जाती है। इस वर्ष सनातन धर्म, शुभ कलश, मर्यादा पुरुषोत्तम भगवान राम और महाकुंभ 2025 के परम पावन संस्मरण के साथ रामनवमी मनाई जा रही है। इसी संदर्भ में सनातन धर्म, भारतीय संस्कृति, उसकी राष्ट्रीय जीवंतता और उसके ऐतिहासिक, सांस्कृतिक, राजनैतिक और पौराणिक महत्व के विशिष्ट व जीवंत कालखंड को समेटे हुए एक ऐसी संघर्षपूर्ण यात्राओं का जीवंत और अजर-अमर चित्रण कर रहे हैं, जिसका मूल स्रोत धर्म ही है, और जो जनमानस में विजयी भाव को प्रतिष्ठित व प्रदर्शित करता है। आज भी भगवान राम इस भाव के सबसे बड़े प्रतीक माने जाते हैं।
यही वजह है कि प्रयागराज आने वाले श्रद्धालुओं का जत्था अयोध्या और काशी भी गया। क्योंकि भगवान राम और भगवान शिव परस्पर पूरक समझे जाते हैं। एक के बिना दूसरे की कल्पना व्यर्थ है। राम भक्त हनुमान भी तो शिव के एकादश रुद्र ही गिने जाते हैं। इसलिए रामनवमी पर इन सबकी पुण्यबर्द्धक चर्चा स्वाभाविक है।
यूँ तो सदियों से सनातन धर्म को किसी भी चुनौतियों को सहन कर ऊपर उठने और अपनी जड़ों को कभी भी न मिटने देने की अलौकिक प्रतिभा प्राप्त है। इसलिए इसके अमरत्व जीवन दर्शन से मानव समुदाय सदैव पल्लवित, पुष्पित एवं पुंजित होता आया है| सनातन धर्म को सदैव जीवंत बनाये रखने के लिए हमारे पर्व त्यौहार का विशेष स्थान है। रामनवमी भी उनमें अग्रगण्य है, जो प्रतिवर्ष पूरे देश में मनाई जाती है। इसी प्रकार प्रकृति की गोद में, नदियों के तट पर लगने वाले धार्मिक मेले और आयोजन भी सनातन धर्म की महिमा में जान डालते आए हैं।
वाकई ये सभी आयोजन हमारे सनातन धर्म की गहराई पूर्ण जड़ों को कभी न मिटने देने वाली अमृत रूपी धारा से अभिसिंचित करते आये हैं। ये अतीत काल से ऐसा करते आ रहे हैं और आगे भी करते रहेंगे| ऐसा मेरा भी दृढ़ विश्वास है। आखिर कैसी भी अनुकूल और प्रतिकूल यानी विषम परिस्थिति रही हो, महाकुंभ जैसे आयोजन सदैव इसी प्रकार से आयोजित होते आ रहे हैं और आयोजित होते रहेंगे, क्योंकि सनातन संस्कृति एक जीवंत सभ्यता-संस्कृति का परिचायक है। रामनवमी पर भी यही बात लागू होती है। कुम्भ और महाकुंभ जहां क्रमशः 12 और 144 वर्ष के बाद आयोजित होता है, वहीं रामनवमी प्रत्येक वर्ष।इससे छह माह पहले आयोजित होने वाले शारदीय नवरात्र के दशहरा मेला, विजयादशमी का विजय भाव और यत्र-तत्र-सर्वत्र आयोजित होने वाले रामलीला के आयोजन से सनातन धर्म का कीर्ति ध्वज जिस प्रकार फहराता है, उसमें भगवान राम के विराट व्यक्तित्व का भी बड़ा योगदान है।
.......और यदि परिस्थितियां इसके अनुकूल हो जाएँ तो फिर क्या कहने! यूपी में परम पूज्य योगी आदित्यनाथ जी, मुख्यमंत्री, उत्तरप्रदेश की उदारता से जैसा सफल और चर्चित आयोजन उत्तरप्रदेश में हुआ या हो रहे हैं, उसमें महाकुंभ 2025 जैसे यादगार आयोजन में चार चांद लग गए। इसे कहते हैं सुविचारित रणनीति से हुआ अतिसुन्दर आयोजन| निःसन्देह, दिव्य एवं भव्य महाकुम्भ 2025 के आयोजन की अनुपम अभिराम छवि जो सदैव-सदैव के लिए अपनी पूर्णता के साथ स्वर्ण अक्षरों में लिखी गई, अविस्मरणीय गाथा बनकर विश्व पटल पर भारत के सांस्कृतिक गौरवज्ञान की गाथा में विशाल कहानी बन गई| जिसको हर व्यक्ति ने अपनी-अपनी दृष्टि और अपनी विचारधारा से देखा, परखा और अभिव्यक्त किया|
भले ही दुनिया की मिश्र, यूनान, मेसोपोटामिया आदि जैसी प्राचीन सभ्यताएं और संस्कृतियां बर्बर व असभ्य आक्रमणों से तबाह हो गईं, ऐसी बर्बाद हुईं कि भविष्य में कभी पुनः नहीं उठ खड़ी हो सकीं। लेकिन सिंधु घाटी सभ्यता से जुड़ी सनातन सभ्यता-संस्कृति एक अपवाद निकली। इस अलौकिक सभ्यता-संस्कृति पर अनेक आक्रमण हुए, लेकिन यह हर बार और मजबूत होकर उभरी। भूत और वर्तमान परिवेश इसी बात का साक्षी है।
एक कहावत है- “लुच बड़ा परमेश्वर से|” अर्थात जिस प्राणी को परमेश्वर ने जन्म दिया, वह अपनी वाणी और सोच में परमेश्वर की लीला और उसकी शक्ति को अपनी वाणी के द्वारा कभी कभी ऐसा कहता है जिसकी सर्वत्र निंदा होती है| परन्तु एक प्रकार की विचारधारा ने भी करोड़ों व्यक्ति पृथ्वी पर हैं और उनकी अपनी वैचारिक पृष्ठभूमि और आलोचना करने की कटु वाणी है। परन्तु जहाँ तक मैं समझता हूँ कि सनातन धर्म में पूजा-अर्चना और अपने ईष्ट की आराधना के लिए एक बहुत ही साधारण विधि-विधान है जिसको गरीब-अमीर कोई भी बिना किसी आडम्बर और बिना किसी खर्च के प्रतीक रूप स्थापित कर अपनी पूजा को विधि-विधान से संपन्न कर सकता है| वह भी प्रकृति विभिन्न रूपों के संयुक्त सम्पृक्त रूपेण भाव की अवधारणा पर आधारित है|
मसलन, भारतीय संस्कृति की परम्पराओं में, हमारे प्रत्येक पूजा के सन्दर्भ में, अनुष्ठान के संदर्भ कलश पूजा का विशेष महत्व है| कलश पूजा के विधान को यदि समझें तो यह सभी वर्णों/वर्गों के पहुँच के करीब है| यह प्रकृति प्रेमी गरीब के लिए तो अत्यंत सुविधाजनक है| पवित्रता की दृष्टि से, पर्यावरण को किसी प्रकार की हानि न पहुंचे, उस दृष्टि से भी कलश पूजा का विधान ईको फ्रेंडली (Eco Friendly) है| कलश पूजा भी मिट्टी के कलश में ही वन्दनीय और पूजनीय है|
भले ही बढ़ते भौतिकवाद और आधुनिकता की दौड़ में वाणिज्यिक उद्देश्य की पूर्ति के लिए मिट्टी के कलश को कुछ पूंजीपति अन्य धातु के कलश में परिवर्तित करने की कोशिश कर रहे हैं ताकि उनकी वाणिज्यिक उपादेयता बढ़ जाए, लेकिन उनकी इस कुचेष्टा से लोग सजग हो रहे हैं| मेरी समझ में प्रकृति और पर्यावरण की द्रष्टि से मिट्टी के कलश का ही महत्त्व सदैव था और सदैव रहेगा| अनुष्ठान के संदर्भ में कलश पूजन का विशेष महत्व इसलिए है|
सनातन धर्म की मान्यताओं के आधार पर कलश के मुख को भगवान विष्णु, ग्रीवा को भगवान रूद्र और आधार को भगवान ब्रह्मा, मध्य के आधार को समस्त देवियों तथा अंदर जल को सम्पूर्ण सागर के प्रतीक रूप में अभिहित किया गया है|
हमारी प्राचीन संस्कृति और मान्यताओं के अंतर्गत कुंभ मेला सनातन की प्रवृति, मेधा तथा चिरंतन परम्परा से चली आ रही संस्कृति का अद्भुत संगम है| प्रयागराज में गंगा, यमुना और सरस्वती का संगम तट, उज्जैन में क्षिप्रा नदी का तट, नासिक में गोदावरी नदी का किनारा और हरिद्वार में हरि के दर्शन हेतु प्रकृति के द्वार स्थित गंगा तट का अभूतपूर्व आयोजन के साक्षी बनते हैं| हमारे प्राचीन विद्वानों एवं संतों ने प्रयागराज कुंभ की संकल्पना को खगोलीय अनुशासन में भी आबद्ध किया गया है| माघ माह में भुवन भास्कर सूर्य संचरण करते हुए जब मकर राशि में स्थित होते हैं तथा देवगुरु वृहस्पति जब वृष राशि में प्रवेश करते हैं तभी कुंभ का आयोजन यहाँ होता है|
खगोलीय गणना के मुताबिक, देवगुरु वृहस्पति प्रत्येक 12 वर्ष में वृष राशि में प्रवेश के सूत्र को स्वीकार करते हुए प्रयागराज में प्रत्येक द्वादश (12) वर्ष पर त्रिवेणी के तट पर मानवीय सभ्यता के सबसे बड़े जनसंकुल का प्रतिनिधित्व करने वाला कुम्भ मेला आयोजित किया जाता है| इस वर्ष दिव्य व भव्य महाकुम्भ 2025 में 68 करोड़ श्रद्धालुओं ने पुण्य स्नान किया| जिसमें मानवीय सभ्यता के जनसंकुल का विभिन्न भूखंडों (देश-विदेश) की विभिन्न विचारधाराओं के अनुयायियों और समरसता के पुजारी विभिन्न धर्मानुयायियों की उपस्थिति के साथ महाकुम्भ मेला 2025 अपनी पूर्णता, गौरवगाथा और सनातन धर्म की विजय पताका के उद्घोष के साथ संपन्न हुआ|
"मेष राशि गते जीवे मकरे चन्द्र भास्करौ| अमावस्या तदा योगः कुम्भाख्य स्तीर्थ नायके||"- (स्कन्द पुराण)
महाकुम्भ 2025 में जिसने जो चाहा, उसने उसे प्राप्त किया| चाहे हम मोक्ष प्राप्ति की बात करें या फिर धर्म-पूर्ण आस्था के साथ पाप-पुण्य की वैतरणी को पार करने की यात्रा के अमृत मोती को प्राप्त करने की यात्रा हो| व्यापर और उद्योग की बात हो या रोजगार के सृजन की कहानी या विभिन्न विषयों के साथ विकास की कहानी की यात्रा को प्राप्त करने के उद्देश्य से किए गए निर्माण कार्य, सभी संस्थागत निर्माण कार्य, सभी संरचनात्मक निर्माण विकास यात्रा की कहानी लिख चुके हैं|
जहां विभिन्न साधु-संतों के पुण्य प्रताप से विभिन्न धार्मिक आयोजनों से हुए संवाद की प्रतिध्वनि से उत्पन्न धार्मिक ऊर्जा के आत्मीयतापूर्ण वैश्विक दर्शन की धुरी में विकास और प्रकृति की गोद में रहकर उत्कृष्ट मानवीय मूल्यों को आत्मसात करती सनातन धर्म की सुचितापूर्ण नैतिक मूल्यों पर आधारित संस्कृति की अकथनीय कहानी सभी दिशाओं में अमृत वर्षा करती हुई मानव स्वाभाव को तृप्त करती गई| वहीं और सबने देखा, राजनीति के विविध आयाम भी पूर्ण प्रखरता के साथ प्रकट हुए और सबका अपनी विचारधारा के अनुसार संगम तट पर अपनी जमीन तलाशने का अवसर मिला| परन्तु ऐसे लोगों की धार्मिक आस्था का पुण्य लाभ शायद नहीं मिला होगा, क्योंकि जैसी हमारी दृष्टि होगी वैसी ही हमारी पाने की वृष्टि होगी|
"तेजसां हि न वयः समीक्ष्यते|"- शास्त्रों के किंचित मात्र अध्ययन करने से मुझे व मेरी अल्प बुद्धि को यह आभाषित हुआ, अर्थात् ज्ञात हुआ कि अतिविशिष्ट महत्वपूर्ण रक्षा कवच को भेदने वाले अस्त्र को ग्रहण करने या देने की शक्ति मात्र उसी को प्राप्त होती है जिसमें किसी भी वस्तु को धारण कर उसे त्यागने की क्षमता हो। चाहे लोभ हो, जनकल्याण और मानव कल्याण के लिए वह सुयोग्य पात्र को परीक्षण कर देने में विश्वास रखता हो| इसी क्रम में ताड़का बद्ध के पश्चात् महर्षि विश्वामित्र जी भगवान राम को ब्रह्मास्त्र प्रदान करते हैं, पात्रता एवं परीक्षण के आधार योग्यता के परिभाषित हो जाने पर|
महर्षि विश्वामित्र जी ने युग काल के सर्वश्रेष्ठ योद्धा मर्यादा पुरुषोत्तम श्री राम जी को उनके जप, तप, दान, शील, विवेक, साहस, पराक्रम, न्याय और शरणागत भक्त वत्सल को धार्मिक शक्ति पोषित करके ब्रह्मास्त्र धारण करने के लिए शस्त्र देकर मर्यादा पूर्ण आचरण के साथ विवेक, धैर्य, पराक्रम और न्याय की स्थापना के लिए, राक्षसों का नाश करने के लिए ब्रह्मास्त्र प्रदान किया| इसी प्रकार आधुनिक लोकतंत्र में भी तपस्वी, योगी, साहसी, ऊर्जावान, यशस्वी, लाभ, मोह, पद और अहंकार से रहित महंत श्री योगी आदित्यनाथ जी को उत्तरप्रदेश का मुख्यमंत्री पद धारण करने का आदेश देकर प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी जी ने दूरदर्शिता पूर्ण कार्य किया।
वर्तमान में लोकतांत्रिक प्रणाली के अंतर्गत जनकल्याण, मानव कल्याण एवं सर्वजन हिताय के महत्वाकांक्षी विजन को दृष्टिगत रखने के लिए, शांति एवं कानून व्यवस्था को सुदृढ़ बनाने एवं अराजक तत्वों को नाश करने के उद्देश्य से आधुनिक युग के महर्षि स्वरुप संत श्री नरेंद्र मोदी जी ने उत्तरप्रदेश की कमान योगी आदित्यनाथ जी को सौंप दी, जिसके अंतर्गत विभिन्न जनहितैषी कार्य सम्पादित हुए और हो रहे हैं| इससे ज्ञान (GYAN) समझे जाने वाले- गरीब, युवा, अन्नदाता एवं नारी, के विभिन्न विषयों पर जनकल्याणकारी योजनाओं की विधि यात्रा में कानून बनाकर अपने आत्मबल, सत्यनिष्ठा और साहस से, कार्यपालिका के माध्यम से संचालित कर सेवा, सुरक्षा और सुशासन के 8 वर्षों के अप्रतिम एवं उत्कृष्ट वर्षों के कार्यों के आधार पर उत्कृष्ट उत्तरप्रदेश बनाने की दिशा में कार्य कर एक मील का पत्थर स्थापित किया|
महाकुंभ 2025 की सफलता, भव्यता, दिव्यता, धार्मिक सांस्कृतिक महत्व के अतिरिक्त अन्य सभी विषयों पर विस्तार से अभिव्यक्त किया गया है। परंतु यह महाकुंभ 2025 किस प्रकार प्रबंधकीय व्यवस्थाओं के कारण दिव्य रहा, उस पर संक्षेप प्रकाश डालना भी समीचीन होगा। क्योंकि स्वच्छ, सुरक्षित एवं सुव्यवस्थित महाकुंभ 2025, मा. मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ जी के नेतृत्व में उत्तरप्रदेश में संपन्न हुआ। उसकी सफलता के लिए कुछ ऐसे कारक हैं जिनका उल्लेख आवश्यक है।
महापर्व में आनेवाले श्रद्धालु, तीर्थयात्री, कल्पवासी, दिव्य अलौकिक पुण्य प्रताप से अभिसिंचित भारतीय संस्कृति, सनातन धर्म के मर्मज्ञ विद्वान, साधु-संतों की विराटता के दिव्य दर्शन के साथ करोड़ों पर्यटक जो विभिन्न धर्मों, वैचारिक दृष्टि से विविधता को समेटे हुए देशकाल की सीमा बंधन से मुक्त "वसुधैव कुटुंबकम" की वैश्विक सोच और दर्शन को समेटे पवित्र पावन प्रयागराज नगरी, सैकड़ों राष्ट्रों के नागरिक का पर्यटन एवं पुण्य की प्राप्ति की दृष्टि से आने के कारण यह महाकुंभ 2025 नयनाभिराम महाकुंभ सफल रूप से आयोजित हुआ।
यह महाकुंभ डिजिटल महाकुंभ भी रहा है। सभी व्यवस्थाएं, लेनदेन तथा गोपनीय सुरक्षा तंत्र भी डिजिटल रहा है। सुरक्षित महाकुंभ के आधुनिक प्रबंधकीय व्यवस्थाओं से सभी को मोहित एवं आकर्षित किया, जैसे Integrated Central and Command Centre से 24x7 घण्टा तकनीकी निगरानी, स्मार्ट पार्किंग, सांस्कृतिक पुनरुत्थान का अमृतकाल, भौतिक संरचनाओं की सुदृढ़ता के साथ सांस्कृतिक भावनाओं के केंद्र में श्रद्धालुओं की आस्था के केंद्र में रहने वाले 21 प्राचीन मंदिरों और 6 कॉरिडोर के विकास एवं पुनरुत्थान के कारण भारत की गौरवशाली संस्कृति और परंपराओं को अक्षुण्ण करते हुए सांस्कृतिक विरासत की धरोहर को दुनिया के मानस पटल पर चिरकाल तक स्थायी रूप से भावना, संवेदना और पुण्य शक्ति की उपासना (संगम स्नान) की विराट छवि को सदैव-सदैव तक विश्व पटल पर स्थापित करने के कारण अमृतकाल के दर्शन कराने के मनोरथ को पूर्णता प्रदान करने में सफल रहा।
स्वच्छ महाकुंभ में सभी आधुनिक तकनीकों का प्रयोग करते हुए संगम जल को सम्पूर्ण कुंभ काल में स्वच्छ रखा गया। यह वैज्ञानिक दृष्टि से परीक्षण कराकर, आंकड़ों को सार्वजनिक किया गया है। यही महाकुंभ 2025 की सफलता, दिव्यता और सांस्कृतिक महत्व की कसौटी पर खरा उतरने का कारक बना, ना गंदगी, ना बीमारी, ना चर्मरोग और कोई महामारी, केवल दिव्यता, पवित्रता ही जल में पायी और सभी ने डुबकी लगाकर पाया अमृतफल। भौगोलिक दृष्टि से ऑक्सीजन के प्राकृतिक उत्सर्जन हेतु हरित बनाने के लिए वृक्षारोपण का कार्यक्रम कई वर्षों से चला आ रहा था जिससे वायु का ऑक्सीजन लेवल भी संदेश उत्कृष्ट बना रहा है।
वहीं, निर्बाध विद्युत व्यवस्था, स्वस्थ महाकुंभ और दृष्टि बाधित जरूरत मन्दों के लिए यह महाकुंभ नेत्र महाकुंभ भी कहलाया। व्यवस्था के अनगिनत पहलू हैं। कहाँ तक कहूं, लिखूं और प्रशंसा करूँ। मुझे डर है कि पाठक मुझे भाट न समझें, परंतु मैंने जो देखा, सुना, अनुभव किया और व्यवस्था में सहयोगी बना, उसी की अनुभूति के आधार पर बहुत कुछ अभिव्यक्त कर पा रहा हूँ। कहना, लिखना, बहुत चाहता हूं, परन्तु ज्यादा पढ़ना कोई नहीं चाहता है। इसलिए केवल अभी इतना ही, ज्यादा कुछ नहीं। जिंदगी के हसीन लम्हों को यदि याद करूँ तो महाकुंभ 2025 की डुबकी भरे पल सदैव यादों में रहेंगे। शायद ऐसे पल पुनः आएं, ऐसी प्रतीक्षा रहेगी।
संस्कृत में ठीक ही कहा गया है कि "वाक्यम प्रतिकूलं तु मृदुपूर्व शुभं हितम्| उपचारेण वक्तव्यो युक्तं च वसुधाधिपः||" यानी कि राजा के सामने ऐसी बात कहनी चाहिए जो सर्वथा अनुकूल, मधुर, उत्तम, हितकर, आदर से युक्त और उचित हो| क्योंकि राजा सम्मान का भूखा होता है| उसकी बात का खंडन करके आक्षेपपूर्ण भाषा में यदि हितकर वचन भी कहा जाए तो उस अपमान पूर्ण वचन का वह कभी अभिनन्दन नहीं कर सकता| वास्तव में, महामनस्वी राजा अग्नि, इंद्र, सोम, यम और वरुण- इन पांच देवताओं के स्वरूप धारण किए रहते हैं| इसलिए वे अपने में इन पांच गुणों- प्रताप, पराक्रम, सौम्यभाव, दंड और प्रसन्नता धारण करते हैं|
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