'चीनियों और अमेरिकियों की तुलना में भारतीयों को बौद्धिक रूप से मजबूत बनाते हैं सनातनी धार्मिक संस्कार’

‘चीनियों और अमेरिकियों की तुलना में भारतीयों को बौद्धिक रूप से मजबूत बनाते हैं यहाँ प्रचलित धार्मिक संस्कार’
@ डॉ दिनेश चन्द्र सिंह, आईएएस, डीएम, जौनपुर, यूपी   
 
“जिन खोजा तिन पाइयां, गहरे पानी पैठ| मैं बपुरा बुड़न डरा, रहा किनारे बैठ|” कहने का तात्पर्य यह कि “जो व्यक्ति मेहनत करता है, उसे सफलता अवश्य ही मिलती है| लेकिन जो व्यक्ति पानी में डूबने  के डर से, पानी में डुबकी न लगाकर सिर्फ किनारे पर बैठा रहता है, उसे कुछ भी प्राप्त नहीं होता है|” यह मानवीय जीवन की कड़वी सच्चाई है| चूँकि मुझे धर्म, अर्थ, काम, और मोक्ष के सफल और सकारात्मक जीवन यात्रा को जीने की यात्रा का बोध है| इसलिए अबोध होकर भी बोध करने की वजह ढूंढ लेता हूँ, ढूंढ रहा हूँ|

दरअसल मुझे धर्म और अधर्म का कुछ ज्ञान है| धर्म का अल्प और अधर्म का अनंत ज्ञान है| आमतौर पर किसी भी व्यक्ति को केवल अधर्म का ही ज्ञान होता है, क्योंकि मनुष्य का जन्म ही प्राकृतिक तौर पर नर-नारी के मिलन का प्रतिफल है| इसलिए जन्म के समय से ही हम प्राकृतिक जीवन जीते हैं| परन्तु धर्म की व्याख्या शास्त्रों में, ‘वेद’, ‘पुराण’, ‘भगवत गीता’, ‘रामायण’, ‘रामचरितमानस’ एवं अन्य धर्मग्रंथों में है| 

यदि सनातन धर्म के अतिरिक्त अन्य धर्मों के ग्रंथों की भी बात की जाए तो सभी धर्मों की प्रमाणिक मान्यता प्राप्त धार्मिक पुस्तकों में, जिस रूप में भी उनके अनुयायी मानते आए हैं, वह भली भांति वर्णित है| चाहे इस्लाम धर्म की पवित्र पुस्तक ‘कुरान शरीफ’ हो या गुरुग्रंथ खालसा पंथ की ‘गुरुग्रंथ साहिब’ हो, ईसाई धर्म की धार्मिक ग्रन्थ ‘बाइबिल’ हो, या फिर पारसियों की पवित्र धार्मिक पुस्तक ‘आवेस्ता’, चाहे यहूदियों की मुख्य पवित्र धार्मिक पुस्तक ‘तौरात’ हो, जिसे पेंटाटेक या मूसा की पांच पुस्तकों- उत्पत्ति, निर्गमन, लेवीय, संख्या और व्यवस्था (जेनेसिस, एक्सोडस, लेवीटॉस, नंबर और देउतेरोनोमी) का संकलन समझा जाता है, या फिर चीन के धर्मग्रन्थ ‘ताओ धर्म’ से जुड़े हैं, जिनमें ताओ-ते-चिंग (Tao-Te- Ching) और जुआंग-जी (Zhuang-zi) शामिल हैं| सभी का मर्म जनकल्याण ही है
 
दरअसल, चीन में धर्म विविधतापूर्ण है और अधिकांश चीनी लोग या तो गैर धार्मिक है या फिर महान चीनी दार्शनिक कन्फ्यूशियश की विश्व दृष्टि के साथ बौद्ध धर्म और ताओवाद के संयोजन का अभ्यास करते हैं, जिसे सामूहिक रूप से ‘लोकधर्म’ कहा जाता है| यद्यपि मैंने चीन देश की यात्रा नहीं की, परन्तु अपने अनुभव से उह कह सकता हूँ या फिर अभिव्यक्त कर सकता हूँ कि वहां के नागरिक भारत के सनातन धर्म और बौद्ध धर्म, जिसका उद्भव और प्रचार भारतीय भूमि से हुआ, के सम्मिश्रण से प्रभावित तो हैं|

परन्तु वहां की भौगोलिक पृष्ठभूमि के कारण मानवोचित गुण, यथा- करुणा, वात्सल्य, त्याग, तप, जप, शरणागत वत्सल भाव से युक्त या सम्पृक्त नहीं हैं| इसलिए वहां केवल भौतिकवाद है और वाणिज्यवाद के कारण मन में निराशा, हताशा और दूसरे से लड़कर खुद को जीतने की अदम्य जिजीविषा है जो धर्मसम्मत नहीं है| इसलिए सभी सुख सुविधाओं से सम्पृक्त और संपन्न होने के कारण भी धर्म के मर्यादापूर्ण आचरण में बंधे न होने के कारण, वे सभी लोग केवल और केवल हताशा और निराशा के कारण मेंटल एंग्जायटी के शिकार हैं| इसलिए उन्हें रोजमर्रा की स्थितियों के बारे में तीव्र, अत्यधिक और झिझक वाली चिंता और डर सताता रहता है, जिससे उनकी हृदय गति तेज, साँसें तेज रहतीं हैं| इससे पसीना आना और सिर में दर्द महसूस होना उनके लिए आम बात है। (They experience intense, excessive and fearful anxiety and dread about everyday situations, which can cause them to have a rapid heart rate, rapid breathing and frequent sweating and headaches.)

इसी प्रकार विश्व का सबसे समृद्ध, ऐश्वर्यवान, स्वयम्भू, सर्वशक्तिमान, आर्थिक, राजनैतिक विकास की दृष्टि से विश्व के सभी राष्ट्रों का मार्गदर्शक राष्ट्र ‘संयुक्त राज्य अमेरिका’ जिसे धर्म के विषय पर चिंता नहीं, केवल अर्थ, काम पर चिंता है| इसलिए अर्थ और काम तो अमेरिका में है| सभी आधुनिक सुख-सुविधा और धर्मपोषित राष्ट्रों को एक क्षण में विध्वंस करने की सभी ज्ञान आधारित शक्ति परक सुविधाओं से सुदृढ़ राष्ट्र अमेरिका का हर व्यक्ति पीड़ित है| वे लोग अपनी वेदना और अपने को असहाय समझ कर चिंतित और परेशान रहते हैं, क्योंकि अमेरिका की प्रगति, वैभव, गौरव, समृद्धि धर्मसम्मत नहीं है| मैं कभी अमेरिका नहीं गया परन्तु मैंने अपने अनुभव और अध्ययन से पाया या फिर सुना कि वहां मातृशक्ति बालिका महिला सुरक्षा, सम्मान, स्वावलंबन की गारंटी तो है परन्तु उनके शुचितापूर्ण जीने की गारंटी के अभाव अमेरिका की प्रत्येक बालिका विभिन्न अनचाहे कारण से अपनी शुचिता को मात्र 14-17 वर्ष की अल्पायु में ही धर्म सम्बद्ध शिक्षा और चेतना के अभाव में नष्ट कर चुकी होती हैं| उसी का परिणाम है कि- वहां न वात्सल्य है, न करुणा है और न ही मार्मिक संवेदनाओं से युक्त सदाचार भरा आचरण, जिसकी भारतीय धर्मसम्मत संस्कृति में अनुपालना है|

इसलिए भारत अधिक समृद्धि से उत्कृष्ट न होकर भी धर्मपरायण होने के कारण कई प्रकार के व्यसनों, व्यभिचार परक कृत्यों से उन्मुक्त है| इसके बावजूद भी धर्म की मर्यादा और विभिन्न धर्मग्रंथों में वर्णित व्यवस्था, जिसमें उल्लेख है कि यदि कोई व्यक्ति धर्मसम्मत व्यवहार नहीं करेगा तो नष्ट हो जायेगा| क्योंकि रावण भी अपने सम्पूर्ण वैभव, गौरव, आर्थिक समृद्धि, ज्ञान-विज्ञान और साहस के बावजूद भी अनैतिक कर्मों के चलते मर्यादा पुरुषोत्तम प्रभु श्री राम जी से परास्त हुआ| क्योंकि भगवान श्रीराम मर्यादित आचरण के साथ जीवन की यात्रा के विविध सोपान पर “धर्म, अर्थ, काम, मोक्ष” की परिधि में अपने गुरुवर की मर्यादापूर्ण अनुशासित शिक्षा पद्धति से पल्लवित, पुष्पित, पुंजित हुए| उन्होंने स्वयं भगवान के अवतरित स्वरूप में विभिन्न लीलाओं के माध्यम से “धर्म, अर्थ, काम, मोक्ष” की मर्यादा का, भारतीय संस्कृति और धर्मसम्मत चिंतन से युक्त सामान्य नागरिक की लीलाओं से धर्म की विजय पताका का, सुंदर चित्रण करने के लिए अवतार लिया या अवतरित हुए थे|

यही वजह है कि आज भी आवश्यकता है धर्म की मर्यादा में रहकर जीवन के अर्थ को समझने और काम को केवल यौनिक क्रिया से पृथक कर उसमें निहित वंशवृद्धि की पवित्र भावना को अंगीकार करने की| वास्तव में आज प्रत्येक व्यक्ति के लिए धर्मसम्मत विधान तय करने की जरूरत है| वहीं शासकीय कार्मिकों को शासन द्वारा प्रदत्त कार्यों को करने की संकल्प प्रतिबद्धता के साथ कर्म करने की कौशल विकास क्षमता में अभिवृद्धि करने की संकल्प बद्धता की जरूरत है| 

दरअसल धर्मयुक्त जीवन को समझना है तो आयें अभिव्यक्त करते हैं बिजनौर जनपद की ऐतिहासिक यात्रा की, जिससे उत्पन्न भारत बोध पर हर किसी को गर्व होता है- भारतवर्ष नाम भरत नामक एक प्रसिद्द राजा के नाम पर पड़ा है| माना जाता है कि भरत राजा राजा दुष्यंत और शकुंतला के पुत्र थे| उनके शासनकाल में इस भूभाग को भारत वर्ष कहा जाने लगा|

देखा जाए तो महाराजा भरत का बिजनौर जनपद से सीधा सम्बन्ध है| महाराजा भरत का जन्म बिजनौर जिले में गंगा और मलिनी नदी के संगम स्थल पर स्थित महर्षि कण्व के आश्रम में हुआ था| इसलिए बिजनौर को भारतवर्ष की भूमि माना जाता है| क्योंकि महाराजा भरत के नाम पर ही इस देश का नाम भारत पड़ा है| इसी प्रकार से महाभारत काल में महर्षि बिदुर जो सदाचार, ज्ञान, सत्य, निष्ठुर, निडर, निर्भीक संत के साथ बिदुर नीति के प्रतिपादक थे और  भगवान श्री कृष्ण के अनंत कृपापात्र थे, उनकी जन्म एवं कर्मस्थली रहा बिजनौर जनपद ही, जिसका भूभाग आज भी कई हजार वर्षों की जीवन यात्रा के साथ अपनी मर्यादा करुणा के साथ जीवंत है|

दरअसल जीवन की इस धारा में और उत्कृष्ट जीवन की उपलब्धियों भरी यात्रा में धर्म, अर्थ, काम, मोक्ष के विविध पड़ावों को पाकर ही भगवान प्रदत्त जीवन यात्रा की उपलब्धि की प्राप्ति होती है| मेरा ज्ञान अल्प है, परन्तु जीवन में जिस व्यक्ति ने धर्म, अर्थ, काम, मोक्ष के विविध सोपानों को नहीं समझा और जिया, उसका जीवन व्यर्थ और अल्प होता है| सच कहूँ तो गुरुकुल की शिक्षा की प्राप्ति के अभाव में भी भारत राष्ट्र की मिट्टी के कण-कण में यह शिक्षा भारत वर्ष में जन्म लेने वाले प्रत्येक नर-नारी को बिना किसी दीक्षा यानी समुचित शिक्षा के ही लोकाचार द्वारा प्राप्त होती रहती है, तो वह गलत नहीं होगा|

सच कहूँ तो अनेक महान कार्य करने वाले कार्यसाधक और लब्धप्रतिष्ठित मानव बिजनौर की परम पावन भूमि पर जन्में हैं| इसलिए इन महान विभूतियों पर पृथक से विस्तारपूर्वक लिखूंगा| आज अभी केवल इतना ही| सच ही कहा गया है कि “कर्मण्ये वाधिकारस्ते मां फलेषु कदाचन|” यानी कि व्यक्ति का अधिकार केवल कर्म करने का है, फल प्राप्ति का नहीं, क्योंकि वह तो प्रारब्ध के अनुरूप ही मिलेगा जिसे दैवयोग समझा जाता है| परन्तु कर्म यदि धर्म और ज्ञान पर आधारित हो तो विजय यानी  सफलता उसके तमाम व्यसनों के बावजूद भी मिलेगी| यदि उसे नहीं तो उसके पुत्र/पुत्रों को अवश्य मिलेगी| यह अकाट्य सत्य है|

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