जब राजा का धर्म प्रजा की रक्षा करना है तो जनभक्षकों को नहीं मिटाने के लिए दोषी कौन? बताए सरकार


जब राजा का धर्म प्रजा की रक्षा करना है तो जनभक्षकों को नहीं मिटाने के लिए दोषी कौन? बताए सरकार
@ कमलेश पांडेय/वरिष्ठ पत्रकार व राजनीतिक विश्लेषक

कभी हिंदुत्व और राष्ट्रवाद का प्रतीक समझा जाने वाला राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ अब सौ वर्ष का हो चुका है, लेकिन अपने गठन के मौलिक उद्देश्यों से भटक चुका है। यह बात मैं नहीं कह रहा, बल्कि वक्त वक्त पर आए इसके विरोधाभाषी बयानों से स्पष्ट होता है। यूँ तो अपने गठन के उद्देश्यों में यह एक हद तक सफल रहा है, लेकिन इसके चेले-चपाटियों ने यानी जनसंघ और भारतीय जनता पार्टी (भाजपा) के नेताओं ने लोकतांत्रिक सत्ता हासिल करने के बाद भी कोई उल्लेखनीय भूमिका नहीं निभाई,  चाहे इसका कारण जो भी रहा हो। लिहाजा यह सामूहिक चिंता का विषय है, क्योंकि उनकी इस मौकापरस्त प्रवृति से राष्ट्रीय सुख-शांति व समृद्धि प्राप्ति का दिशा में बाधा पहुंची है! भले ही हम कभी सोने की चिड़ियां और विश्वगुरु रहे हों, लेकिन आज संघर्षभूमि मतलब दंगा-फसाद और बर्बर हत्याकांड भूमि के रूप में अभिशप्त कर दिए गए हैं। 
इसलिए अब यह समझ में नहीं आता कि इस्लाम और ईसाई मतावलंबियों द्वारा गुलामी कालीन परिस्थितियों में अग्रसारित व हर्ष-विषाद ग्रस्त भारतीय संविधान, उस पर आधारित 'बेलगाम' न्यायपालिका, 'अनियंत्रित' नौकरशाही, 'विवेकशून्य' मीडिया, 'मतिहीन' नेताओं और 'ईर्ष्यालु' समाजसेवियों की धर्मनिरपेक्ष और पूर्वाग्रही फौज के रहते हुए क्या विशुद्ध सनातनी और हिन्दू भारतीय मूल्य अक्षुण्ण रह पाएंगे, यह राष्ट्रीय चिंता और विमर्श का विषय है। 

सुलगता सवाल है कि क्या वसुधैव कुटुंबकम और सर्वे भवन्तु सुखिनः की पवित्र अवधारणा को लगातार मुंह चिढ़ाने वालों के खिलाफ हमारी संवैधानिक कड़ियों ने कभी कोई दमदार और यादगार पहल की है, जबकि इन्हीं की सनातन और हिंदू विरोधी कृत्यों की एक लंबी फेहरिस्त है। यही वजह है कि धर्मनिरपेक्षता बनाम मुस्लिम-ईसाई तुष्टीकरण जैसी राजनीतिक जंग से परेशान भारतीयों ने तो भाजपा को पूर्ण बहुमत तक दे दिया, एक नहीं बल्कि दो बार दिया, फिर भी उनकी मौलिक समस्याओं का समाधान नहीं हुआ। राम मंदिर बन गया, कश्मीर से धारा 370 समाप्त कर दिया गया, लेकिन गौ हत्या पर पूर्ण प्रतिबंध और समान नागरिक संहिता की मांग आज तक अधूरी है।आजाद भारत का कड़वा अनुभव तो इसी बात की चुगली करता है।

ऐसे में आरएसएस प्रमुख मोहन भागवत जब दिल्ली में एक कार्यक्रम के दौरान धर्म की व्याख्या करते हुए कहते हैं कि, "धर्म केवल पूजा-पाठ तक सीमित नहीं है, बल्कि जीवन जीने की एक संहिता है" तो एक नई उम्मीद जगती है। आगे उन्होंने हिंदू समाज से अपने धर्म की गहरी समझ विकसित करने और उसे विश्व के सामने सही तरीके से प्रस्तुत करने का आह्वान किया है, जो आज की सबसे बड़ी जरूरत है। हालांकि उन्होंने अहिंसा के महत्व पर भी जोर दिया और कहा कि विश्व को भारत के पारंपरिक ज्ञान से एक नया रास्ता मिल सकता है। लेकिन सवाल यह है कि यह बात तो हमलोग बहुत दिनों से सुनते आ रहे हैं, जबकि अब निर्णायक कार्रवाई करने की बेला आ चुकी है।

जैसा कि राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के सरसंघचालक मोहन भागवत ने कहा है कि धर्म केवल पूजा-पाठ और कर्मकांड नहीं है, बल्कि यह एक जीवन जीने की संहिता है। आज समय आ गया है कि जब हिंदू समाज को अपने धर्म की सही समझ बनानी होगी और उसे दुनिया के सामने सही रूप में प्रस्तुत करना होगा। इसी क्रम में उन्होंने यह भी कहा कि राजा का धर्म प्रजा की रक्षा करना होता है। लेकिन सवाल उठता है कि व्यवहार में ऐसा आजाद भारत में तो नहीं दिखा। 1947 के नोआखाली दंगे से 2025 के मुर्शिदाबाद दंगे तक के सैकड़ों घटनाओं की प्रशासनिक विफलताओं से हिन्दू जनमानस त्रस्त और क्षुब्ध है। इनसे जुड़ी न्यायिक खानापूर्ति भी सवालों के घेरे में है। आखिर विलंबित न्याय से बड़ा अन्याय कुछ नहीं हो सकता है, यह बात विगत आठ दशकों में भी हमारी सरकार की समझ से परे है।

सवाल है कि न्यायपालिका, कार्यपालिका और विधायिका की भूलभुलैया से हिंदुओं को राहत कौन दिलाएगा। यदि भाजपा के प्रधानमंत्री ऐसा नहीं करेंगे तो क्या कांग्रेस के प्रधानमंत्री से उम्मीद की जाएगी, जिन्होंने यहां तक कह दिया था कि देश के राष्ट्रीय संसाधनों पर पहला अधिकार मुसलमानों का है। इन्होंने दंगा नियंत्रण सम्बन्धी जो कानून बनाना चाहा, उसमें हिंदुओं को ही फंसाने की पूरी व्यवस्था थी। हालांकि हिंदुओं के प्रबल विरोध के चलते अल्पसंख्यक सिख प्रधानमंत्री के अरमान चूर चूर हो गए और गद्दी खिसक गई। 

लेकिन उसके बाद भाजपा के प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की ढुलमुल नहीं से जातिमुक्त समाज की स्थापना नहीं हो पाई। पाकिस्तान और बंगलादेश के इस्लामी राष्ट्र बनने के उलट भारत को हिन्दू राष्ट्र बनाने के हिंदुओं के अरमान अधूरे रह गए। आतंकवादी और नक्सली हिंसा में कमी इसलिए नहीं आ पाई कि मोदी सरकार अर्बन आतंकियों और नक्सलियों के खिलाफ निर्णायक कार्रवाई नहीं कर पाई। हमारी विधायिका, कार्यपालिका, न्यायपालिका और मीडिया में इनकी गहरी पैठ की शिनाख्त और निर्णायक कार्रवाई प्रधानमंत्री के स्तर से नहीं होगी, तो क्या किसी मुख्यमंत्री से अपेक्षा की जाएगी। 

ये ऐसे सुलगते हुए सवाल हैं जो भारतवासियों पर हर रोज भारी पड़ रहे हैं। पुलवामा से पहलगाम तक के आतंकी हमलों के संदेशों को हमारी सरकार नहीं समझ पाई और तत्काल मुंहतोड़ जवाब नहीं दिए, तो अब आगे उससे क्या अपेक्षा की जाए। ऐसे में जब संघ प्रमुख ने कहा है कि अपने जीवन के लिए अपना धर्म मत छोड़ों। धर्म केवल कर्मकांड नहीं है। ये सिर्फ पूजा पाठ तक सीमित नहीं है। धर्म एक कोड है। रिलिजन अलग-अलग हो सकते हैं, हमें सब रास्तों का सम्मान करना है। हम किसी को बदलने का प्रयास नहीं करते हैं। जो जिस रास्ते पर चलना चाहे, चले।लिहाजा आज हिंदू समाज को हिंदू धर्म समझने की आवश्यकता है। विश्व के सामने ठीक नजरिए से पेश करने का उत्तम साधन पुस्तक है। लेकिन जब विषैले दलित-पिछड़े-अल्पसंख्यक साहित्य सृजन पर रोक नहीं लगेगी, ऐसा करने वालों के खिलाफ कार्रवाई नहीं होगी तो फिर स्वस्थ और राष्ट्रवादी पुस्तक की रचना कैसे होगी? मौलिक सवाल है।

भागवत ने आगे कहा है कि अहिंसा हमारा मूल स्वभाव है। हमारा अहिंसा लोगों को बदलने के लिए है, लेकिन कुछ ऐसे बिगड़े हैं कि वो उपद्रव करेंगे, मानेंगे ही नहीं। ऐसे में हमें यह समझना होगा कि रावण का बद्ध भी उसके कल्याण के लिए हुआ। वो बदल नहीं सका तो भगवान ने उसका संहार किया, ताकि वो नया जीवन ले सके, सुधार कर सके।अहिंसा हमारा धर्म है तो गुंडागर्दी से मार न खाना भी हमारा धर्म है। जिनका सुधार नहीं हो सकता है, उनको वहां भेज देते हैं जहां उनका कल्याण हो। हम पड़ोसी को छोटा नहीं दिखाते हैं। प्रजा का कल्याण राजा का काम है। वो अपना कर्म करेगा, वही उसका धर्म है, वो करेगा। लेकिन सवाल फिर वही कि जातीय राजनीति से हमारे विश्वविद्यालय का वातावरण दूषित हो चुका है, हमारे प्रशासन-न्यायपालिका में पूर्वाग्रही तत्व घुस गए हैं, अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता का दुरूपयोग हो रहा है। फ़िल्म और मीडिया जनित षडयंत्र से समाज टूट रहा है। फिर भी प्रधानमंत्री सबकी नकेल कसने में अक्षम क्यों हैं? जब हमारा मुकाबला चीन जैसे शक्तिशाली शत्रु से है तो फिर हमारा प्रशासन और उद्योग घराना उसके प्रति उदार क्यों है? बहस का विषय है।

उन्होंने आगे कहा कि आज विश्व को एक नया रास्ता चाहिए। जो अनेक प्रयोग पिछले 2000 वर्षों में हुए, अनेक विचारधारा के रूप में हुए, वो फलीभूत नहीं हुए। सुख तो बढ़ा लेकिन किसी का बढ़ा और किसी का कम हुआ। संतोष नहीं हुआ। दुख भी बढ़ा। नई सुविधा आई तो नए रोग आ गए। विकास हुआ तो पर्यावरण खराब हुआ। विश्व की मनुष्यता के लिए नया रास्ता भारत की तरफ देखा जा रहा है। लेकिन सवाल फिर वही कि भारत भी जब उन्हीं अंधी गलियों में भटकेगा, कागज के संविधान को सबकुछ मान लेगा, लेकिन समतामूलक दृष्टि नहीं रखेगा, आर्थिक न्याय सब तक नहीं पहुंचाएगा तो फिर निर्णायक बदलाव कैसे आएगा, यक्ष प्रश्न है।

संघ प्रमुख ने कहा कि ऐसी परंपरा की दृष्टि भारत के पास है। हमारा जो पारंपरिक विचार है, जो हमारा मूल विचार है, उस पर पिछले 1200 से 1500 साल काम नहीं हुआ। हम वैभव और शास्त्र जब संसार को कभी दे रहे थे तब हम सुरक्षित और समृद्ध रहे। जाति, पंथ, भेदभाव हमारे शास्त्रों में था या नहीं, इसपर अभी उडुपी में सभी संतों ने प्रमाण के साथ एक राय में कह दिया कि ऐसा हमारे यहां नहीं था। तो फिर सवाल यही कि आखिर ऐसा आरोप मढ़ने वालों के खिलाफ कार्रवाई तो प्रधानमंत्री को ही करना है, करवानी है। इसलिए आवश्यक है कि 'भागवत भजन' के मूल मर्म को समझा जाए और उसके अनुरूप मौलिक कार्रवाई की जाए, अन्यथा आगे की राह कंटकाकीर्ण होती जाएगी, जिस पर चलने में परेशानी आएगी। इसे समझें प्रधानमंत्री और उनका कार्यालय,क्योंकि देश को सही दिशा देने की जिम्मेदारी उनकी है, वह इन सुलगते हुए सवालों को पीठ न दिखाएं, बल्कि दृढ़ता पूर्वक उसका मुकाबला करें। तभी नया इतिहास उनका होगा, नया संसद भवन बनवाने से कुछ नहीं होने वाला!

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