क्या वाकई अमेरिका बदल रहा है या फिर कोई नया स्वांग रच रहा है?
क्या वाकई अमेरिका बदल रहा है या फिर अपनी कमजोरी छिपाने के लिए नया स्वांग रच रहा है?
@ कमलेश पांडेय/वरिष्ठ पत्रकार व राजनीतिक विश्लेषक
दुनिया का थानेदार अमेरिका बदल रहा है! उसकी विदेश नीति बदल रही है! इससे दुनियाभर के देश प्रभावित हो रहे हैं! चूंकि अब वह 'चंद्रायण व्रत' कर चुका है! इसलिए युद्ध नहीं शांति की बात कर रहा है! वह तीसरा विश्व युद्ध टालना चाहता है, इसलिए अपने यूरोपीय सहयोगियों को सद्बुद्धि बांट रहा है! इससे नाटो के सदस्य देशों में खलबली मची हुई है! यूरोपीय संघ भी परेशान है! सवाल है कि क्या वाकई अमेरिका बदल रहा है या फिर अपनी कमजोरी छिपाने के लिए नया स्वांग रच रहा है?
भारत में एक कहावत है कि नौ सौ चूहे खाकर बिल्ली हज को चली। मतलब स्वभाव से हिंसक प्राणी, अहिंसक होने का नाटक रच रहा है। इसकी को चंद्रायण व्रत करार दिया जाता है। अमेरिका के संदर्भ में यही बात लागू होती है। हालांकि, आपको यह जानकर हैरत होगी कि यह सब कुछ अनायास नहीं हो रहा है बल्कि इसके पीछे चतुर अमेरिकी लोगों, उनके अमेरिकी प्रशासन और वहां के रिपब्लिकन नेताओं की एक सोची-समझी रणनीति काम कर रही है।
दरअसल, वह रणनीति है अमेरिकी फर्स्ट की। मेक अमेरिका ग्रेट अगेन की। यह तभी सम्भव है जब अमेरिका रूस-भारत दोनों को साधकर चले और चीन के साथ चतुराई भरा रिश्ता रखे। इसके पीछे सबसे बड़ी वजह है यूरोपीय देशों के एकजूट होना और उससे अमेरिका के हितों का प्रभावित होना। इससे उस पर रणनीतिक दबाव बढ़ रहा है। शायद इसलिए अमेरिका भी अब बदल रहा है।
सवाल है कि जिस इंग्लैंड यानी ग्रेट ब्रिटेन के दम पर, उसके सहयोगियों फ्रांस-जर्मनी आदि को साथ लेकर उसने पूरी दुनिया में उधम मचाई, उनकी बदलती नीतियों के साइड इफेक्ट्स से बचने के लिए अब वह अपनी नई विदेश नीति बना रहा है, जिसके मूल में युद्ध कम, शांति अधिक हो। इसके अलावा, जिस तरह से वह संयुक्त राष्ट्र संघ की कई अंतरराष्ट्रीय योजनाओं से अपना पिंड छुड़ा रहा है, वह भी चिंता की बात है। कई मामलों में उसके द्वारा अंतरराष्ट्रीय न्यायालय की अवहेलना से मनबढ़ देशों को शह मिल रही है।
इन बातों से स्पष्ट है कि अब अमेरिका सिर्फ और सिर्फ अपना हित साधेगा। वह दुनिया की चिंता छोड़ेगा। इससे अमेरिकी पुनः समृद्ध होंगे। वहीं, दुनिया भी सुकून में रहेगी और वैश्विक थानेदारी की होड़ में जुटे चीन को समझेगी। इस बात में कोई दो राय नहीं कि प्रथम विश्व युद्ध और द्वितीय विश्व युद्ध यूरोपीय देशों की आपसी प्रतिस्पर्धा का नतीजा था। आज पुनः यूक्रेन के साथ खड़े होकर यूरोपीय देश रूस को भड़का रहे हैं।
वहीं, जिस तरह से कुछ अरब देश और कुछ एशियाई देश चीन की अगुवाई में रूस के साथ खड़े हैं, उससे तीसरे विश्व युद्ध की आहट सुनाई दे रही है। मानो तीसरा विश्व युद्ध दस्तक दे रहा हो। गनीमत है कि भारत खुलेआम रूस के साथ नहीं, बल्कि तटस्थ है, अन्यथा रूस नाटो पर और अधिक भारी पड़ता।
अंतरराष्ट्रीय राजनयिकों के मुताबिक, भारत को मित्रता के हिसाब से अभी खुलकर रूस का साथ देना चाहिए था, लेकिन वह चीनी चुनौतियों की वजह से ऐसा नहीं कर पा रहा है। वहीं, अमेरिका के साथ भी भारत खुलकर नहीं जा सकता, क्योंकि अपनी दगाबाजी के लिए वह मशहूर है। शायद इसलिए भी तीसरा विश्वयुद्ध टलता जा रहा है।
उधर, स्थिति को भांपकर अमेरिका भी खुद को बदल रहा है, जो ट्रंफ-मोदी, ट्रंफ-पुतिन और मोदी-पुतिन की व्यक्तिगत समझदारी के लिए जरूरी है। इनकी पारस्परिक समझदारी से ही बेलगाम चीन को काबू में किया जा सकता है। क्योंकि ज्यादा मजबूत चीन न केवल अमेरिका बल्कि रूस और भारत के भविष्य के लिए भी खतरनाक साबित हो सकता है।
इसलिए सभी देश फूंक-फूंक कर कदम रख रहे हैं, सधी चालें चल रहे हैं। ताकि इजरायल-फिलिस्तीन विवाद की तरह यूक्रेन-रूस विवाद को खत्म किया जा सके। हालांकि, चीन-ताइवान विवाद, भारत-पाकिस्तान विवाद, अमेरिका-कनाडा मतभेद, अमेरिका-मेक्सिको मनभेद आदि यक्ष प्रश्न हैं, लेकिन नई अमेरिकी विदेश नीति से सबकुछ शांत पड़ जाएगा, क्योंकि आग में घी डालने वाली अमेरिकी विदेश नीति जो बदल रही है।
देखा जाए तो भारतीय मोदी प्रशासन ने जिस तरह से अमेरिकी ट्रंफ प्रशासन, रूसी पुतिन प्रशासन और चीनी चिनपिंग प्रशासन को साधा है, इससे सभी देश परस्पर करीब आए हैं। ग्लोबल साउथ की भी पूछ बढ़ी है। जापान, ऑस्ट्रेलिया, दक्षिण कोरिया, इंडोनेशिया, इजरायल, फ्रांस, जर्मनी, दक्षिण अफ्रीका, ब्राजील, तुर्किये, यूएई, ईरान सबका महत्व बढ़ा है। अंर्तराष्ट्रीय पूछ परख बढ़ी है।
इसे कहते हैं संगत से गुण होत हैं, संगत से गुण जात। भारत-अमेरिकी सम्बन्ध और अधिक सुधरेंगे, यदि अमेरिकी-रूसी रिश्ते प्रगाढ़ हुए तो। भारत को सोने की चिड़िया और विश्व गुरु बनाने के लिए फैसले का असर है कि अमेरिका भी मेक अमेरिका, ग्रेट अगेन की राह बढ़ चला है। अमेरिकी फर्स्ट की नीतियों को मजबूत कर रहा है। अपनी डॉलर डिप्लोमैसी को नई धार दे रहा है।
आप सोच रहे होंगे कि यह सब बात मैं क्यों कर रहा हूँ, तो यह जान लीजिए कि ट्रंफ प्रशासन अब दुनिया के देशों से दो टूक भाषा में बात कर रहा है। उनकी नीति है कि अब अमेरिका की कीमत पर किसी को भी आगे नहीं बढ़ने दिया जाएगा। दरअसल, रूस को नियंत्रित करने के लिए ही अमेरिका ने चीन को खूब आगे बढ़ाया, जो अब उसके लिए ही भस्मासुर बन बैठा है।
यही वजह है कि चीन को नियंत्रित करने के लिए अमेरिका ने भारत की पीठ थपथपाई। और जब भारत इससे लाभान्वित होने के बाद भी रूसी मित्रता को निभाते रहा, तो अमेरिका के पास रूस से मधुर सम्बन्ध बनाने के अलावा कोई चारा नहीं बचा। अब यही बात यूरोपीय देशों को नागवार गुजरी है।
इधर, ट्रंप-ज़ेलेंस्की के बीच अमेरिकी ओवल ऑफ़िस में हुई बहस पर दुनियाभर के नेता चाहे जो कहें, लेकिन अमेरिका अपने भावी हितों से टस से मस होने के लिए तैयार नहीं है।
इधर, जेलेन्सकी के अड़ियल रुख से भले ही अमेरिका-यूक्रेन के बीच खनिजों को लेकर कथित समझौता नहीं हो पाया है। लेकिन आगे क्या होगा, इस पर पूरी दुनिया की नजर गड़ी हुई है।
बता दें कि यूक्रेन के राष्ट्रपति वोलोदिमीर ज़ेलेंस्की और अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप के बीच 28 फरवरी 2025 दिन शुक्रवार को हो रही बातचीत ने उस समय अप्रत्याशित मोड़ ले लिया जब रूस-यूक्रेन के जंग के सवाल पर दोनों के बीच तीखी बहस हो गई। जबकि ज़ेंलेस्की और ट्रंप की इस मुलाक़ात को बड़ी उम्मीद की नज़रों से देखा जा रहा था। हालांकि, जब दोनों नेताओं के बीच ज़ुबानी जंग छिड़ गई तो अमेरिकी राष्ट्रपति ने दो टूक कहा कि डील कीजिए या फिर छोड़ दीजिए।
चूंकि अंतरराष्ट्रीय पत्रकारों की मौजूदगी में दोनों राष्ट्रपतियों के बीच कहा-सुनी हो गई, इसलिए दोनों देशों के बीच कथित समझौता नहीं हो पाया। अब तक यही माना जा रहा था कि ये समझौता रूस-यूक्रेन के बीच संघर्ष विराम का रास्ता खोल सकता था। लेकिन विवाद के साथ ख़त्म हुई इस बातचीत ने रही सही उम्मीद फ़िलहाल ख़त्म कर दी है।
इससे पहले ट्रंप ने कहा था कि यूक्रेन के राष्ट्रपति वोलोदिमीर ज़ेलेंस्की एक बहुत 'बड़ा समझौता' करने अमेरिका आ रहे हैं। ऐसा इसलिए कि ट्रंप के इस ऐलान से पहले ज़ेलेंस्की ने अमेरिका के साथ खनिज समझौते की हामी भरी थी। दरअसल दोनों नेताओं के बीच यूक्रेन में मौजूद दुर्लभ खनिज संसाधन पर समझौते के लिए दस्तखत होने वाले थे जिसकी मनमाफिक कीमत जेलेन्सकी अपने पक्ष में हामी भरवाकर वसूलना चाहते थे।
इसलिए दस्तखत से पहले ओवल ऑफिस में दोनों नेताओं के बीच मुलाकात हो रही थी और मीडिया का जमावड़ा लगा था। क्योंकि समझौते पर दस्तखत होने के बाद दोनों नेताओं को फिर एक ज्वाइंट प्रेस कॉन्फ्रेंस के लिए आना था, लेकिन उससे पहले ही दोनों नेताओं के बीच बहस हो गई।
वहीं, कई इंटरनेशनल एक्सपर्ट्स का मानना है कि डोनाल्ड ट्रंप जबरदस्ती यूक्रेनी खनिज संपदा पर अमेरिका का नियंत्रण चाहते थे और जेलेंस्की को उन्होंने दस्तखत लिए मजबूर कर दिया था। चूंकि ये समझौता अमेरिका को यूक्रेन में मौजूद दुर्लभ और अन्य महत्वपूर्ण खनिजों को निकालने की इजाजत देता। इसलिए बहस के बाद अपना उद्देश्य नहीं सधता देखकर जेलेंस्की बिना दस्तखत किए वाइट हाउस से निकल आए। इस प्रकार वाइट हाउस में डोनाल्ड ट्रंप और यूक्रेनी राष्ट्रपति जेलेंस्की के बीच हुई बहस ने जियो-पॉलिटिक्स में तहलका मचा दिया है।
बता दें कि अमेरिकी विदेश मंत्री मार्को रूबियो ने ज़ेलेंस्की से माफ़ी मांगने को कहा था। तब उन्होंने साफ-साफ कहा है कि आप करोड़ों लोगों की जान से खेल रहे हैं। दरअसल, खनिज समझौते पर बातचीत के दौरान ज़ेलेंस्की ने ट्रंप से कहा कि आप हमारी ज़मीन पर चले आए हत्यारे से समझौता मत कीजिए। उनका इशारा रूस के राष्ट्रपति व्लादीमिर पुतिन की ओर था।
लेकिन ट्रंप का साफ़ कहना था कि किसी भी संभावित संघर्ष विराम के लिए यूक्रेन को थोड़ा झुकना होगा। क्योंकि किसी भी समझौते के लिए थोड़ा सुलह वाला रवैया अपनाना पड़ता है। हालांकि, आपको इतना ज़्यादा झुकने की जरूरत नहीं होगी जितना लोग सोच रहे हैं। मैं बीच में हूं। मैं यूक्रेन के लिए भी हूं और रूस के लिए भी। मैं इसे (रूस-यूक्रेन जंग) सुलझते हुए देखना चाहता हूं।
उधर, इस जंग पर अपने कथित अस्पष्ट रुख़ के लिए आलोचना झेल रहे ट्रंप ने कहा है कि शांति समझौते के लिए अमेरिका का निष्पक्ष रहना ज़रूरी है। जो बिल्कुल सही बात है। वैसे भी जेलेन्सकी में बचपना है, जबकि ट्रंफ समझदारी भरी नसीहत दे रहे हैं। इसके पीछे उनका लंबा अनुभव है। शायद इसलिए पुतिन की सीधी आलोचना करने से परहेज़ करने वाले अपने रुख़ का बचाव करते हुए ट्रंप ने कहा है कि मैं किसी की तरह/तरफ झुका हुआ नहीं हूं। मैं अमेरिका और दुनिया के लिए जो अच्छा है उसके साथ हूं।
लेकिन बातचीत में तनाव तब भड़क उठा जब अमेरिकी राष्ट्रपति ने कहा कि ज़ेलेंस्की को अमेरिकी मदद का शुक्रगुज़ार होना चाहिए। जबकि ज़ेलेंस्की तीसरे विश्वयुद्ध का जोखिम ले रहे हैं। आप करोड़ों लोगों की जान से खेल रहे हैं और आप जो कर रहे हैं वो इस देश का बहुत बड़ा अपमान है।
वहीं, दोनों ओर से हुई इस तीखी झड़प को देखकर वहां मौजूद पत्रकार हैरत में थे। क्योंकि ट्रंप और उप राष्ट्रपति जेडी वेंस दोनों ज़ेलेंस्की से ज़ोरदार बहस करने लगे। इस पर ज़ेलेंस्की ने कहा 'ज़ोर से बोलना बंद' कीजिए। लेकिन वेंस अड़े रहे और कहा कि जंग ख़त्म करने के लिए डिप्लोमेसी ज़रूरी है। आप ओवल ऑफिस का अपमान कर रहे हैं। इससे तनाव और बढ़ गया।
वहीं, ट्रंप ने वेंस का बचाव करते हुए कहा कि हमने आपको 350 अरब डॉलर के हथियार और सैनिक साजो-सामान दिए। अगर आपके पास हमारे हथियार नहीं होते तो ये जंग दो हफ्ते में ख़त्म हो जाती। इस पर ज़ेलेंस्की ने तुरंत पलटवार किया और तंज़ करते हुए कहा कि 'हां, हां ये जंग तो दो या तीन दिन भी नहीं चलती। मैंने पुतिन से भी यही सुना है। मजेदार बात यह है कि दोनों ओर से इस तीखी झड़प को देखकर वहां मौजूद पत्रकार हैरत में थे। जबकि अमेरिका में यूक्रेनी राजदूत तो अपना माथा पकड़े हुए थे कि उनके सामने ये क्या हो रहा है।
इस गर्मागर्मी के बाद ट्रंप ने कहा कि इस तरह से तो काम करना मुश्किल हो जाएगा। इस पर वेंस एक बार फिर बीच बचाव करते दिखे। उन्होंने कहा कि हमारे बीच असहमतियां है। आप गलत हैं और ऐसे में अमेरिकी मीडिया के सामने लड़ने के बजाय उन असहमतियों पर बात करनी चाहिए।
याद दिला दें कि ट्रंप ने कुछ दिनों पहले ही ज़ेलेंस्की को "तानाशाह" कहा था और उन पर "युद्ध शुरू करने" का आरोप लगाया था। वहीं, इस बेहद तीखी बहस के तुरंत बाद ट्रंप ने कहा कि मुझे पक्का लग गया है कि अगर अमेरिका इसमें शामिल है तो राष्ट्रपति ज़ेंलेस्की शांति के लिए तैयार नहीं हैं। उन्होंने (ज़ेलेंस्की) अमेरिका और इसके सम्मानित ओवल ऑफिस का अपमान किया है।
बहरहाल, जब वो शांति के लिए तैयार हों तो वापस आ सकते हैं। इस तीखी झड़प के बाद ज़ेलेंस्की खनिज समझौते पर दस्तख़्त किए बगैर निकल गए। इससे साफ है कि खनिज समझौता भी जेलेन्सकी अपनी शर्तों पर ही करने का मूड बनाकर गए थे और आने उद्देश्य में नाकाम होते देख उन्होंने डील ही रद्द कर दी।
वहीं, इस घटना के बाद ज़ेलेंस्की ने कहा है कि यूक्रेन शांति चाहता है। शुक्रिया अमेरिका, शुक्रिया आपके समर्थन के लिए, शुक्रिया इस दौरे के लिए, शुक्रिया अमेरिकी राष्ट्रपति, कांग्रेस और अमेरिकी जनता। यूक्रेन सिर्फ़ और सिर्फ़ शांति चाहता है और हम उसी के लिए काम कर रहे हैं। उन्होंने यह भी कहा कि ओवल ऑफ़िस में दुनिया के मीडिया के सामने जो हुआ वो अच्छा नहीं था।
हालांकि इस दौरान उन्होंने ये भी उम्मीद जताई कि उन्हें पूरा भरोसा है कि ट्रंप के साथ उनके रिश्ते को बचाया जा सकता है। दोनों देशों के आपसी रिश्ते दो राष्ट्रपतियों से बढ़कर हैं। इसलिए मैंने अपने लोगों और आपके लोगों (अमेरिकियों) का शुक्रिया कहना शुरू किया है। आपके लोगों ने हमारे लोगों की जान बचाने में मदद की। हम आपके शुक्रगुज़ार हैं और जो हुआ इसका मुझे दुख है।
गौरतलब है कि यूक्रेन के राष्ट्रपति जेलेंस्की को जो बाइडेन प्रशासन से काफी मदद मिल रही थी। अमेरिका की मदद की वजह से ही पिछले तीन सालों से यूक्रेन, रूस के खिलाफ जंग में टिका हुआ है। लेकिन ट्रंप पहले ही साफ कर चुके थे कि अमेरिकी टैक्सपेयर्स के पैसों को ऐसे बर्बाद नहीं किया जा सकता है।
वाइट हाउस में डोनाल्ड ट्रंप और यूक्रेनी राष्ट्रपति जेलेंस्की के बीच हुई बहस ने जियो-पॉलिटिक्स में तहलका मचा दिया है। क्योंकि जब ट्रंप और जेलेंस्की के बीच यह बहस हो रही थी तब यूक्रेन की एंबेसडर ओक्साना मार्कारोवा इस बहस को देखकर काफी निराश दिख रही थीं, और वो अपना सिर पकड़े हुए थीं। क्योंकि डोनाल्ड ट्रंप खुलेआम उनके देश के राष्ट्रपति का अपमान कर रहे थे, चेतावनी दे रहे थे कि 'जेलेंस्की तीसरे विश्वयुद्ध का जुआ खेल रहे हैं।'
दरअसल, ओवल ऑफिस में डोनाल्ड ट्रंप ने जेलेंस्की से कहा कि रूस के साथ युद्धविराम समझौता काफी करीब है और ये भी कहा कि यूक्रेन के प्राकृतिक संसाधनों तक अमेरिका को पहुंच मुहैया करना एक उचित सौदा होगा। इस दौरान हो रही बातचीत के दौरान जेलेंस्की ने कहा कि आखिरकार अमेरिका को भी युद्ध के परिणाम भविष्य में भुगतने होंगे।
इसपर ट्रंप ने फटकार लगाते हुए कहा कि हमें यह मत बताइए कि हम क्या महसूस करने जा रहे हैं। आप यह तय करने की स्थिति में नहीं हैं कि हम क्या महसूस करने जा रहे हैं। ट्रंप ने तेज आवाज में बोलते हुए जेलेंस्की से कहा कि हम बहुत अच्छा और बहुत मजबूत महसूस करने जा रहे हैं।
वहीं, ट्रंप और ज़ेलेंस्की की बहस पर दुनियाभर के नेताओं ने अपनी प्रतिक्रिया दी है। ट्रंप और ज़ेंलेस्की के बीच बातचीत के इस हश्र पर कई यूरोपीय देशों के नेताओं ने यूक्रेन का समर्थन किया है। वहीं कुछ अमेरिकी सांसदों ने भी राष्ट्रपति ट्रंप और उप राष्ट्रपति जेडी वेंस को इस अप्रत्याशित हालात के लिए दोषी ठहराया है।
जहां कनाडा के प्रधानमंत्री जस्टिन ट्रूडो ने कहा है कि उनका देश यूक्रेन का समर्थन जारी रखेगा। क्योंकि रूस ने अवैध और अनुचित तरीके से यूक्रेन पर हमला किया है। विगत तीन साल से यूक्रेन साहस और जवाबी कार्रवाई के साथ मुकाबला कर रहा है। उनकी लड़ाई लोकतंत्र, आज़ादी और संप्रभुता के लिए है, यह एक ऐसी लड़ाई है जो सबके लिए मायने रखती है। इसलिए कनाडा यूक्रेन को अपना समर्थन जारी रखेगा।
वहीं, फ्रांस के राष्ट्रपति इमैनुएल मैक्रों ने कहा कि रूस ने हमला किया और यूक्रेन के लोगों पर हमला हुआ है। इसलिए हमें उन लोगों का सम्मान करना चाहिए जो शुरू से ही लड़ रहे हैं। मुझे लगता है कि हमने तीन साल पहले शुरू रूस के आक्रमण के दौरान यूक्रेन की मदद करके सही किया था और ऐसा करते रहेंगे। हम यानी अमेरिका, यूरोपीय देश, कनाडाई लोग और जापानी, सब यूक्रेन के मददगार हैं।
उधर, पोलैंड के प्रधानमंत्री डोनाल्ड टस्क ने कहा है कि, यूक्रेनी दोस्तों, आप अकेले नहीं हैं। जबकि स्पेन के प्रधानमंत्री पेड्रो सांचेज ने कहा है कि यूक्रेन, स्पेन आपके साथ खड़ा है। इधर, नॉर्वे के प्रधानमंत्री जोनास गर स्टोर ने कहा है कि हम इस संघर्ष में यूक्रेन और स्थायी शांति के पक्ष में हैं। उधर, स्वीडन के प्रधान मंत्री उल्फ क्रिस्टरसन ने भी यूक्रेन का समर्थन किया और कहा कि स्वीडन यूक्रेन के साथ खड़ा है। आप न केवल सिर्फ अपने लिए बल्कि पूरे यूरोप की आज़ादी के लिए लड़ रहे हैं। वहीं, आयरलैंड के उप प्रधान सिमोन हैरिस ने कहा है कि यूक्रेन को रूस के अवैध हमले के लिए दोषी नहीं ठहराया जा सकता है। हम यूक्रेन के साथ हैं।
वहीं, ब्रिटेन के प्रधानमंत्री किएर स्टार्मर ने ट्रंप और जेलेंस्की, दोनों से बातचीत की है। 10 डाउनिंग स्ट्रीट की प्रवक्ता ने कहा है कि उनका यूक्रेन को समर्थन जारी है। वो यूक्रेन की संप्रभुता और सुरक्षा को ध्यान में रखते हुए शांति का रास्ता तलाशने की हरचंद कोशिश कर रहे हैं। प्रधानमंत्री राष्ट्रपति ज़ेलेंस्की समेत अंतरराष्ट्रीय नेताओं की मेज़बानी के लिए उत्सुक हैं।
उधर, अमेरिकी नेताओं की भी प्रतिक्रिया आने लगी है। अमेरिकी विदेश मंत्री मार्को रूबियो ने इस बातचीत को बुरी तरह नाकाम बताते हुए कहा कि ज़ेंलेस्की को माफी मांगनी चाहिए। उन्हें वहां जाकर इस तरह का विरोधी रुख़ अपनाने की कोई ज़रूरत नहीं थी। जबकि डेमोक्रेटिक सांसद चक शुमर ने कहा है कि ट्रंप और वेंस गंदा काम कर रहे हैं। सीनेट डेमोक्रेट्स आज़ादी और लोकतंत्र के लिए लड़ना कभी नहीं रोकेंगे।
वहीं, रिपब्लिकन सांसद डॉन बेकन ने कहा है कि अमेरिकी विदेश नीति के लिए यह एक बुरा दिन रहा। यूक्रेन आज़ादी, फ्री मार्केट और कानून का राज चाहता है। वो पश्चिम का हिस्सा बनना चाहता है। रूस हमसे और हमारे पश्चिमी मूल्यों से नफरत करता है। हमें ये साफ कर देना चाहिए हम आज़ादी के पक्ष में खड़े हैं।
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