भारत और यूरोपीय यूनियन यदि समझदारी दिखाएं तो बदल सकती है भू-राजनीति
भारत और यूरोपीय यूनियन यदि समझदारी दिखाएं तो बदल सकती है भू-राजनीति
@ कमलेश पांडेय/वरिष्ठ पत्रकार व राजनीतिक विश्लेषक
वैश्विक राजनीति में अमेरिका, रूस, चीन के अलावा यूरोपीय यूनियन का भी अपना महत्व है। वहीं, आसियान देशों, अरब देशों, अफ्रीकी देशों, ऑस्ट्रेलिया और दक्षिण अमेरिकी देशों में से किसी भी समूह की उपेक्षा कदापि नहीं की जा सकती है। ऐसे में भारतीय उपमहाद्वीप का अगुवा भारत अपने क्षेत्रीय और वैश्विक हितों की पूर्ति के लिए सधे पांव कदम बढ़ा रहा है।
देखा जाए तो चूहे-बिल्ली की खेल वाली वैश्विक कूटनीति के मायने निरंतर बदल रहे हैं। अब तक पूंजीवादी लोकतंत्र को चुनौती देने वाले समाजवादी या साम्यवादी नायकों के अलावा तानाशाहों और आतंकवादी समूहों द्वारा समर्थित सरकारों से न केवल लोकतंत्र खतरे में है, बल्कि पूरा अर्थतंत्र भी तबाह होने वाला है। बार बार दुनियावी नेता जिस न्यू वर्ल्ड आर्डर की बात करते रहते हैं, उसका पूंजीवादी स्वरूप अभी पूरी तरह से उभरकर सामने नहीं आया है, लेकिन विभिन्न देशों में सक्रिय हथियार बन्द समूह कहीं छात्रों, कहीं धार्मिक नेताओं और कहीं प्रशासनिक विफलताओं की आड़ में जो अपनी सक्रियता दिखा रहे हैं, उससे पूंजीवादी सफलता पर भी प्रश्नचिन्ह स्वाभाविक है।
सवाल है कि कबीलाई युग, सामंतवादी दौर, राजशाही, लोकशाही, तानाशाही और आतंकशाही के विभिन्न शोषक रंगों को देख चुकी हमारी शासन व्यवस्था अब क्या चाह रही है? वैसे तो समय-समय पर वर्गवाद, सम्प्रदायवाद, जातिवाद और ताक़तवाद ने समकालीन सिस्टम को प्रभावित करने की कुचेष्टा की, जिससे जनहित प्रभावित हुआ। लेकिन सुख-शांति-समृद्धि की वैश्विक गारंटी कभी नहीं मिली। यदि मिली भी तो संक्षिप्त कालखंड के लिए! ऐसे में स्वाभाविक सवाल है कि अब तक की सबसे सफल शासन व्यवस्था को अप्रासंगिक बनाने के लिए यह पूंजीवाद क्यों आमादा है?
दरअसल, दुनिया की भू-संपदा, प्राकृतिक संसाधनों, ज्ञान संपदा, मानवीय संसाधनों, उन्नत सभ्यता-संस्कृति का सदुपयोग वह प्राणी हित में, मानव हित में, प्रकृति हित में आखिर क्यों नहीं कर पा रहा है? ऐसा नहीं है कि सोने की चिड़ियाँ समझे गए भारत ने, विश्वगुरू करार दिए गए आर्यावर्त (जम्बूद्वीप) ने दुनिया को सही रास्ता नहीं दिखाया, लेकिन लूट-मार करने वाले लोगों की हिंसक प्रवृति, नरम गोश्त और गरम गोश्त को लालायित मनुष्यों की पाश्विक प्रवृति ने वसुधैव कुटुंबकम के उद्दात भाव और सर्वे भवंतु सुखिनः के जनकल्याणकारी दृष्टिकोण की सदैव उपेक्षा की।
यही वजह है कि कभी महाभारत हुआ तो कभी प्रथम विश्वयुद्ध और द्वितीय विश्वयुद्ध की विभीषिका मानव समुदाय को झेलनी पड़ी। यही नहीं, अनगिनत क्षेत्रीय युद्ध हुए, द्विपक्षीय या द्विगुटीय युद्ध जारी हैं और सुख-शांति के नाम पर हर तरफ 'नील बटे सन्नाटा' का भाव पसरा है। अमेरिका, चीन और रूस के हथियार उद्योग में मंदी न छा जाए, फ्रांस, इंग्लैंड, जर्मनी, इजराइल, दक्षिण कोरिया, जापान आदि की हथियार व सुरक्षा तकनीकी उपलब्ध करवाने वाली कम्पनियां कहीं ठप्प न पड़ जाए, इसलिए आतंकवाद, उग्रवाद को सुलगाना जरूरी है।
यह आम धारणा बन चुकी है कि किसी देश के प्राकृतिक संसाधनों पर कब्जा जमाना हो, या उसके मानवीय संसाधनों का स्वहित के मुताबिक उपयोग करना हो, तो वहां पहले अशांति फैलाने का बंदोबस्त करना और फिर शांति स्थापित करने हेतु सहयोग देना और फिर उसकी भरपाई के लिए मनमाफिक शर्तें थोपना कौन सा राजनय है, पीड़ितों की समझ से बाहर है। पहले दो ध्रुवीय दुनिया बनाई गई, फिर एक ध्रुवीय दुनिया को बनाने का असफल प्रयत्न किया गया और अब फिर बहुध्रुवीय दुनिया के मुहाने पर हमलोग खड़े हैं तो आखिर क्यों, समझ से परे है?
इसलिए भारत पुनः ऐतिहासिक भूमिका निभाने को ततपर है। अमेरिका, रूस, चीन के मुकाबले यूरोपीय यूनियन को साधने, आशियान देशों से पुराने भावनात्मक सम्बन्धों को प्रगाढ़ करने और तीसरी दुनिया के देशों यानी ग्लोबल साउथ की पैरोकारी करने का सीधा मकसद वैश्विक राजनीति में अपनी जगह बनाना है। इस नजरिए से देखा जाए तो यूरोपीय यूनियन के साथ भारत की बढ़ती निकटता से जहां अमेरिकी और चीनी हित प्रभावित होंगे, वहीं रूसी मित्रता को रणनीतिक मजबूती मिलेगी। इसके लिए हमें न केवल साम्राज्यवादी सोच से आगे निकलना होगा, बल्कि भू-सामरिक उद्देश्य से सधी चालें चलनी होंगी।
यही वजह है कि यूरोपीय यूनियन के अध्यक्ष उर्सूला वाल डेर लेयेन का हालिया भारत दौरा बेहद चर्चित रहा। यह गौरव की बात है कि भारत के साथ-साथ यूरोप और अमेरिकी मीडिया में भी इसकी चर्चा हुई। वैसे तो भारतीय मीडिया ने इसे थोड़ा कम तवज्जो दिया, लेकिन यूरोपीय यूनियन मीडिया और अमेरिकी मीडिया में इसको लेकर अपने-अपने तरीके से विश्लेषण करने और अवधारणा बनाने की पूरी दिलचस्पी दिखाई।
आश्चर्य की बात तो यह है कि यूरोपीय यूनियन मीडिया और अमेरिकी मीडिया के बीच उर्सूला के भारत दौरे को लेकर एक अघोषित जंग छिड़ गई थी, और दोनों तरफ से एक-दूसरे के हितों के खिलाफ कुठराघात वाली टिप्पणियां भी लगातार हो रही थीं। इससे समझा जा सकता है कि वहां की मीडिया अपने राष्ट्रीय हितों और वैश्विक सरोकारों को लेकर कितनी सजग है। भारतीय मीडिया से भी दुनिया को यही उम्मीदें हैं। उल्लेखनीय है कि यूरोपीय यूनियन की अध्यक्ष उर्सूला की भारत के प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी आदि के साथ कई दौर की बैठकें भी हुई और विभिन्न स्तरों पर वाताएं भी हुई। इस दौरान उर्सूला का बयान भी काफी महत्वपूर्ण था।
वह यह कि, "भारत हमारे लिए अति महत्वपूर्ण देश है और हम भारत के विकास और उन्नति को लेकर आश्चर्यचकित हैं। भारत के पास नरेन्द्र मोदी जैसा कुशल और भविष्य दृष्टि वाला नेता है जो अपने नेतृत्व से दुनिया को चकित भी करते हैं। भारत के पास बाजार की प्रचुरता है, समृद्धि भी है, जो पूरी दुनिया के लिए अवसर के सामान है। भारत के बाजार में पूरी दुनिया को मंदी और अस्थिरता के भंवर से निकालने की शक्ति है।"
उर्सूला के उपर्युक्त कथन से स्पष्ट प्रतीत कि यूरोपीय यूनियन अब भारत के साथ व्यापार और साझीदारी को एक नया आयाम देने के लिए तैयार है। इसके साथ ही वह अमेरिका की तरह ही भारतीयों के हुनर को यूरोपीय यूनियन में नया अवसर भी देने के लिए भी प्रतिबद्ध है। इसके अलावा, वैश्विक कूटनीति के क्षेत्र में भी यूरोपीय यूनियन, भारत के साथ मिलकर काम करने के लिए तैयार हो चुका है। हालांकि वैश्विक कूटनीति में कई ऐसी बाधाएं, हैं, अवरोधक हैं और विसंगतियां हैं, जो हिंसक हैं, तानाशाही हैं और सामान अवसर के खिलाफ हैं। लिहाजा, भारत की सहायता से यूरोपीय यूनियन ऐसी विसंगतियों और अवरोधकों पर विजयी प्राप्त करने का हिमायती बन चुका है। कहने का तातपर्य यह कि यूरोपीय यूनियन को न केवल आर्थिक क्षेत्र में बल्कि कूटनीतिक क्षेत्र में और सामरिक क्षेत्र में भी भारत जैसे निर्विवादित देश की सहायता और समर्थन चाहिए, ताकि अमेरिकी, रूसी और चीनी दांवपेचों का वह सफलता पूर्वक मुकाबला कर सके।
अंतरराष्ट्रीय विश्लेषकों का मानना है कि यूरोपीय यूनियन की अध्यक्ष उर्सूला की यह सोच उम्दा है, लेकिन उनके सामने अमेरिकी डर और दंड दोनों की चुनौतियां समुपस्थित हैं। मसलन यह सही है कि जिन बातों को लेकर उर्सूला चिंतित है और संकट में खड़ी हैं, उन बातों के प्रति खुलकर वह बोल नहीं सकीं, लेकिन अप्रत्यक्ष तौर पर ही सही परन्तु उन्होंने उल्लेख तो जरूर कर दिया है। सवाल है कि उन्हें अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रम्प के जिस बात का डर और दंड है, उसका समाधान भी यूरोपीय यूनियन के परिवर्तित पैंतरे में ही निहित है।
इस बात से आपलोग अवगत हैं कि डोनाल्ड ट्रम्प अक्सर डर और दंड जैसे शब्दों का प्रयोग करते हैं। डोनाल्ड ट्रम्प हमेशा कहते हैं कि हम अपने विरोधियों को दंड भी देंगे और डर भी दिखायेंगे। अपने पुराने सहयोगी यूरोपीय यूनियन से जुड़े मामले में भी डोनाल्ड ट्रम्प ने डर और दंड दोनों भाव दिखाया है। सच कहा जाए तो यूरोपीय यूनियन ही नहीं बल्कि पूरी दुनिया डोनाल्ड ट्रम्प की इस थ्योरी और चाबूक से हलकान है, परेशान है और भयभीत है। खासकर उनके टैरिफ वार से और आए दिन बदलती वैश्विक कूटनीति से, यूरोपीय यूनियन भी हलकान है। यूँ तो डोनाल्ड ट्रम्प ने चीन, कनाडा, मैक्सिको पर भारी टैरिफ वार किया है और भारत को भी कुछ ऐसी ही नसीहत दी। लेकिन उनको हर तरफ से मुंहतोड़ जवाब भी मिल रहा है।
बता दें कि अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंफ ने यूरोपीय यूनियन को भी धमकी दी है कि वे अमेरिकी हितों को सुरक्षित रखें और समृद्ध करें, अन्यथा टैरिफ दंड भोगने के लिए तैयार रहें। यह अजीबोगरीब है कि अब यूरोपीय यूनियन को भी अमेरिका अपने हितों के आधार पर मदद देने या फिर समृद्ध करने के लिए तैयार नहीं है। इससे नाटो का भविष्य भी खतरे में है। समझा जाता है कि अमेरिकी मुद्रा डॉलर के सामने यूरोपीय यूनियन की मुद्रा यूरो को रूग्न रखने की अमेरिकी चाल भी बहुत तेज है, जिससे यूरो का संकट भी बढने की आशंका है। यही वजह है कि यूरोपीय यूनियन की अध्यक्ष उर्सूला चिंतित हैं और भारत के साथ सहयोग बढ़ाने को लेकर ततपर भी हैं।
अमेरिकी और यूरोपीय यूनियन के बदलते सम्बन्धों के बीच सर्वाधिक गौर करने वाली बात यह है कि 'नाटो' को लेकर अमेरिका अब पैंतरेबाजी पर पैंतरेबाजी दिखाते जा रहा है, क्योंकि नाटो का प्रभुत्व यूरोपीय देशों पर है। एक तरह से यूरोपीय देशों का रक्षाकवच नाटो है, जिसके साथ अमेरिका का सहयोग और समर्थन भी महत्वपूर्ण रहा है। आपको पता है कि नाटो के देश यूक्रेन को अपनी सदस्यता देने के पक्षधर रहे हैं और इसी आधार पर यूक्रेन पर रूस ने हमला कर दिया और यूक्रेन को अपना एक और प्रदेश बनाने की कुचेष्टा की। इसके लिए रूस ने यूक्रेन के साथ एक भयानक युद्ध और हिंसा की विभत्स कहानी लिख डाली, जो आजतक जारी है।
वहीं, नाटो भी रूस के खिलाफ यूक्रेन का मददगार है। हैरत की बात यह है कि जो बाइडेन के समय में अमेरिका भी यूक्रेन की एकता और अखंडता को अक्षुण रखने के लिए अडिग था, लेकिन अब डोनाल्ड ट्रम्प ने रूसी राष्ट्रपति ब्लादिमीर पुतिन के साथ अपनी दोस्ती बढा डाली है। इसके अलावा, उन्होंने यूक्रेन से अपनी कीमत वसूलने हेतु चौधराहट भी दिखानी शुरू कर दी है। यही वजह है कि डोनाल्ड ट्रम्प और जेलेन्सकी के बीच हुई द्विपक्षीय वार्ता एक द्विपक्षीय वाकयुद्ध में तब्दील हो गया, जिसके बाद जेलेन्सकी सीधे तौर पर ट्रम्प के साथ उलझ गये और पहले तो झुकने से भी इनकार कर दिया, लेकिन बाद में माफी मांगकर झुके भी। इस प्रकार यूक्रेन में रूस को किसी तरह का लाभ यदि मिला तो यह नाटो और यूरोपीय यूनियन के लिए अच्छा या पक्षधर नहीं हो सकता है, क्योंकि यूरोपीय यूनियन अपने अस्तित्व के लिए ब्लादमीर पुतिन और रूस की अराजक और हिंसक शक्ति को खतरनाक और अमानवीय मानता आया है।
यही वजह है कि यूरोपीय यूनियन और भारत की नजदीकियां बढ़ाने के लिए यह समझने की कोशिशें की जा रही हैं कि आखिर इस नई संभावित द्विपक्षीय साझेदारी के मुद्दे क्या-क्या हैं, जिन पर दोनों देश आगे बढ़ना चाहते हैं। यूँ तो द्विपक्षीय फ्री ट्रेड एंग्रीमेंट पर अभी कोई समझौता नहीं हुआ है और कई दौर की बातचीत के बावजूद यह मुद्दा अभी भी लंबित है। लेकिन इस बात पर सहमति बढ रही है कि दोनों पक्ष एक-दूसरे के पारस्परिक और वैश्विक हितों के प्रति गंभीर मंथन कर चुके हैं और जो थोड़ी-बहुत कसर रह गई है, उस पर द्विपक्षीय सहमति बनाने की कोशिशें जारी हैं।
इस बाबत उर्सूला का स्पष्ट कहना है कि कुछ रूकावटें हैं जिस पर हम काम कर रहे हैं और जल्द ही उन रूकावटों को दूर कर लिया जायेगा। ऐसा होते ही इस वर्ष के अंत तक यह उम्मीद की जा रही है कि फ्री ट्रेड एग्रीमेंट हो जायेगा। ऐसे में यदि भारत और यूरोपीय यूनियन के बीच फ्री ट्रेड एग्रीमेंट हुआ तो फिर यह बहुत बडी सफलता होगी और यूरोपीय यूनियन-भारत के बीच व्यापार का नया इतिहास बनेगा। हालांकि, इसी बात को लेकर अमेरिका, चीन और रूस की नजरें भी यहां गड़ी हुई हैं, क्योंकि ये तीनों महाशक्तियां यह नहीं चाहती हैं कि यूरोपीय यूनियन और भारत के बीच फ्री ट्रेड एग्रीेमेंट संभव बने। क्योंकि इस फ्री ट्रेड एगीमेंट से भारत को कुछ ज्यादा ही लाभ हो जाएगा। जिससे अमेरिका और रूस के हित तो कम प्रभावित होंगे, लेकिन चीन की परेशानी बढेगी और चीन की अर्थव्यवस्था भी बुरी तरह से प्रभावित होगी।
ऐसा इसलिए कि चीन अभी भी यूरोपीय यूनियन के बाजार का सर्वाधिक लाभ उठा रहा है और यूरोपीय यूनियन के निवेशक भी चीन के सस्ते श्रम शक्ति और संरक्षण मुक्त चीनी तानाशाही के कारण ज्यादातर लाभार्थी होते जा रहे हैं। लेकिन अब भारत भी विदेशी निवेशकों को आकर्षित कर रहा है। क्योंकि भारत भी अपने संसाधनों और दक्ष श्रम शक्ति के बल पर विदेशी निवेशकों के लिए एक पंसदीदा जगह बन चुका है। यही वजह है कि चीन में निवेशक कपंनियां अब हाल के दिनों में अपना बोरिया-विस्तर समेट कर बाहर निकल रही हैं, क्योंकि निवेशकों के लिए चीन भी अब नीरस और कम उपयोगी, अलाभकरी देश बन गया है।
चर्चा है कि यूरोपीय यूनियन और भारत दोनों रक्षा के क्षेत्र में भी आपसी साझेदारी करने के इच्छुक है। इस दृष्टिकोण से भारतीय नेवी और ईयू मैरीटाइम सेक्योंरिटी एंटीटीज के बीच साझा अभ्यास भी हो चुके हैं। मसलन भारत ईयू के साथ स्थायी तौर पर स्ट्रक्चर्ड कोऑपरेशन प्रोजेक्ट से जुडना चाहता है। वहीं, हिंसा और आतंकवाद पर भी दोनों पक्ष गंभीर हैं। उधर, मुस्लिम आतंकवाद को लेकर अब यूरोपीय यूनियन के देशों में भी चुनौतियां बढी हैं और उनकी शांति पर एक नया आसन्न संकट आ खडा हुआ है। जानकार बताते हैं कि यूरोपीय देशों में मुस्लिम कट्टरपंथियों की हिंसा भी बढ़ी है। यूरोपीय यूनियन के कई देश मुस्लिम शरणार्थियों की समस्याओं से जूझ रहे हैं और इन्हें शरणार्थी नहीं बल्कि मुस्लिम हिंसक गिरोह के तौर पर देखते हैं। यही कारण है कि यूरोपीय यूनियन अब मुस्लिम आतंकवाद को संरक्षण देने वालों के खिलाफ कठोर नीति रखती है। चूंकि भारत भी मुस्लिम आतंकवाद से पीड़ित है। इसलिए इस प्रश्न पर दोनों पक्ष एक-दूसरे के लिए लाभकारी बन सकते हैं।
समझा जाता है कि यूरोपीय यूनियन को अपने व्यापारिक घाटे से बाहर निकलने के लिए अब भारत जैसे उभरते हुए वैश्विक आर्थिक और रणनीतिक ताकत का साथ चाहिए। वहीं, अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रम्प की तरह-तरह की धमकियों और टैरिफ वार से बाहर निकलने के लिए भी यूरोपीय यूनियन को भारत का ही साथ चाहिए। वहीं, चीन और रूस की अराजक और हिंसक आर्थिक नीतियों से भी लडने के लिए यूरोपीय यूनियन को भारत का भरोसेमंद साथ चाहिए। इससे स्पष्ट है कि नये भारत में दुनिया का नेतृत्व करने की शक्ति निहित है। इसी कारण यूरोपीय यूनियन भारत के साथ नई रणनीतिक सम्बन्ध बनाने को लेकर आतुर दिखाई दे रहे हैं। लिहाजा, भारत को भी बदलती परिस्थितियों का फायदा उठाने के लिए जोड़-घटाव तेज कर देना चाहिए।
इससे साफ है कि यदि भारत और यूरोपीय यूनियन पारस्परिक समझदारी दिखाएं तो दुनियावी भू-राजनीति बदल सकती है। मोदी सरकार की भी चाहत यही है और कोशिश अनवरत जारी है।
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