सवाल संविधान के बुनियादी ढांचे का नहीं, बल्कि खुदगर्जी का!

सवाल संविधान के बुनियादी ढांचे का नहीं, बल्कि खुदगर्जी का!

@ कमलेश पांडेय/वरिष्ठ पत्रकार व स्तम्भकार

सर्वोच्च न्यायालय अक्सर कहता है कि संविधान के बुनियादी ढांचे को संशोधित नहीं किया जा सकता है यानी कि भारतीय संसद द्वारा चाह कर भी उसमें परिवर्तन नहीं किया जा सकता है! सिद्धांत के तौर पर यह बात सही प्रतीत हो सकती है, लेकिन व्यवहारिक नजरिए से नहीं! क्योंकि न्यायिक सत्ता को बरकरार रखने के सवाल पर सर्वोच्च न्यायालय और उसके विद्वान न्यायाधीशों को बुनियादी ढांचे का सिद्धांत अनायास ही स्मरण हो आता है, लेकिन जब बात व्यापक जनहित की रक्षा की आती हो तो हमारी कई मामलों में किंकर्तव्यविमूढ़ दिखाई देने वाली  संसदीय सत्ता को भारतीय संविधान के बुनियादी ढांचे के सिद्धांत का स्मरण दिलाना वह भूल जाता है, या फिर अपनी व्याख्या को वैश्विक और व्यवहारिक अमलीजामा पहना देता है, जिससे अभागी जनता टुकुर-टुकुर ताकने रहने को अभिशप्त रह जाती है!

दरअसल एक आम बुद्धिजीवी के रूप में और एक वरिष्ठ पत्रकार होने के नाते संविधान के सभी स्तम्भों को बड़े ही करीब से ही देखने का अवसर मिलने के चलते यहां पर जो सवाल उठाने का साहस मैं प्रदर्शित कर पा रहा हूँ, उसका मकसद संसदीय अवमानना या न्यायिक अवमानना करने का नहीं है, बल्कि उन मूलभूत सवालों के बारे में उन्हें और उन जैसे माननीयों-विद्वानों समेत आमलोगों को आगाह करने भर से है, ताकि जिम्मेदार लोग लीक से हटकर कुछ उम्दा सोचने-समझने को विवश हों, अन्यथा इन मुद्दों पर भविष्य में एक स्वस्थ जनमत कायम किया जा सके। 

मेरा दृढ़विश्वास है कि ऐसा आज नहीं तो कल निश्चय ही होगा, क्योंकि पंथनिरपेक्षता, आरक्षण और सामाजिक न्याय, नई आर्थिक नीतियों आदि के समर्थन में स्थापित परम्पराओं, मानवीयता व सामाजिकता से जुड़े कानूनी व संवैधानिक पहलुओं की 'मनमानी व्याख्या' करने के आदी जिस तरह से हमारे न्यायिक संस्थान और विधायी संस्थान हो चुके हैं, उससे पूरे देश की आदमीयता प्रभावित हुई है, बहुमत के प्रति लोगों की अवधारणा बदली है और संविधान के सभी स्तम्भों में टकराहट बढ़ी है, जिससे आम आदमी की दुश्वारियां कम होने का नाम ही नहीं ले रही हैं। 

सवाल है कि जब लोकतंत्र जनता का, जनता के लिए और जनता के द्वारा किया जाने वाला शासन प्रणाली है, और जिसमें स्वतंत्रता, समानता और बन्धुत्व के भाव समाविष्ट होने चाहिए, तो फिर उसी जनता के व्यापक हित में उनके जनप्रतिनिधियों और उनकी पूरी संवैधानिक व्यवस्था से जुड़े अभिजात्य वर्ग के लोगों द्वारा समय-समय पर जो स्वार्थ के वशीभूत होकर आचरण, विधि-विधान प्रस्तुत किये जा रहे हैं, उसकी निष्पक्ष समीक्षा करते हुए उनको आईना दिखाते रहना मीडिया का फर्ज है, जिसे निभाने भर की एक अदद कोशिश भर मैं भी कर रहा हूँ। 

ऐसा इसलिए कि तमाम नियम-कानूनों के होते हुए भी यह सिस्टम कुछ खास लोगों के लिए ही क्यों काम कर रहा है और ऐसा कबतक करता रहेगा। मेरा अभिप्राय जनशोषक व स्वहित पोषक पूंजीवादी शक्तियों से है, जिनके पक्ष में हमारी अभिजात्य संसद बने बनाये स्थापित कानूनों को तोड़-मरोड़ रही है, पर हमारी न्यायपालिका को संविधान के बुनियादी ढांचे के रक्षा करने की याद कतई नहीं आती! कई बात तो वह खुद भूल जाती है कि उसका काम बौद्धिकता व प्रमाण की कसौटी न्याय देना है, बहुमत से भयभीत होकर प्रभावित होना या अल्पमत से बिना डरे उसकी उपेक्षा करना नहीं! 

लेकिन न्यायिक इतिहास साक्षी है कि ऐसा एक बार नहीं, बल्कि कई बार हुआ है! इससे भारतीय प्रबुद्ध वर्ग भी विचलित हुआ है। मीडिया ट्रायल का सिद्धांत यहीं से मजबूत हुआ है, जिसकी बढ़ती लोकप्रियता से अब खुद न्यायपालिका भी भयभीत है। हमारा स्पष्ट मानना है कि न्यायिक निर्णय भी समीक्षा से परे नहीं होने चाहिए, वो भी मीडिया, संसद-विधानमंडलों या फिर जनसमूह से!

बता दें कि संविधान के बुनियादी ढांचे समेत सर्वोच्च न्यायालय और उच्च न्यायालय में न्यायविदों की नियुक्ति करने वाले कोलेजियम के सवाल पर जब केंद्र सरकार और सर्वोच्च न्यायालय हाल ही में एकदम आमने-सामने हो चुके हों, तब सर्वोच्च न्यायालय के मुख्य न्यायाधीश डी वाई चंद्रचूड़ ने यहां तक कह दिया है कि आधारभूत ढांचा सिद्धांत न्यायपालिका के लिए ध्रुवतारा है, जिससे संविधान की व्याख्या करने का मार्गदर्शन मिलता है। 

बता दें कि सुप्रसिद्ध विधिवेत्ता ननी पालखी वाला की दलीलों पर ही सुप्रीम कोर्ट ने 1972 में बुनियादी ढांचे का सिद्धांत दिया था, जिससे स्पष्ट है कि वर्तमान न्यायपालिका सरकार को कोई भी ढील देने को तैयार नहीं है। उल्लेखनीय है कि 50 साल पहले केशवानंद भारती बनाम स्टेट ऑफ केरल केस में शीर्ष कोर्ट की 13 विद्वान न्यायाधीशों की बेंच ने 7:6 के बहुमत से बुनियादी ढांचे का सिद्धांत प्रतिपादित किया था, जिसके अनुसार संविधान के बुनियादी ढांचे को संशोधित नहीं किया जा सकता है। 

वहीं, वर्ष 2015 में न्यायपालिका की स्वायत्तता को भी बुनियादी ढांचा बताकर तत्कालीन संविधान पीठ ने एनजेएसी कानून, 2015 (न्यायाधीशों की नियुक्ति का कानून) को निरस्त कर दिया था। इसलिए यहां पर एक सवाल उठता है कि सर्वोच्च न्यायालय यह स्पष्ट कर दे कि संविधान के बुनियादी ढांचे में क्या-क्या शामिल है और क्या-क्या नहीं! इससे जनता किसी गलतफहमी में नहीं रहेगी। वहीं, हमारी संसद जिस तरह से बहुमत से प्रभावित होकर आए दिन संविधान संशोधन करती रहती है, उससे भी अल्पमत वालों को राहत मिलेगी, क्योंकि संसद का काम सबके समान हित के लिए कानून बनाना है, न कि बहुमत वाले धड़े को प्रभावित करने के लिए, जो कि सामाजिक न्याय और साम्प्रदायिक सद्भाव की आड़ में किया गया है। वहीं, पूंजीपतियों को प्रभावित करने के लिए तो संसद ने अपनी सारी सीमाएं लांघ दी और न्यायपालिका खामोश रही या उन्हीं के पक्ष में कोई नया तर्क गढ़ दी!

ऐसे में स्वाभाविक सवाल है कि जब देश के उपराष्ट्रपति जगदीप धनखड़ जैसे मंजे-मंजाए राजनेता संविधान के बुनियादी ढांचे पर सवाल उठाते हुए यह कहते हैं कि "यह सिद्धांत संविधान में अजनबी है", तो फिर बात बहुत दूर तक जाती है। क्योंकि हाल के दिनों में सरकार के लगभग सभी उच्च पदाधिकारी, कानून मंत्री और उपराष्ट्रपति न्यायपालिका पर लगातार दबाव बना रहे हैं कि कोलेजियम को 2015 के संविधान पीठ के निर्णय के अनुसार एमओपी में सुधार करना चाहिए। 

लेकिन न्यायाधीशों की नियुक्ति की प्रक्रिया में सरकार के प्रतिनिधि यानी नुमाईन्दे को शामिल करने की मांग पर कोई प्रतिक्रिया नहीं देकर कोलेजियम ने स्पष्ट संदेश दिया है कि एमओपी में संशोधन करने का उसका कोई इरादा नहीं है। इस बात की पुष्टि उसने 20 न्यायाधीशों की सिफारिश करके कर दी है। यही नहीं, उसने पांच साल पुराने एक नाम को दिल्ली उच्च न्यायालय के लिए मंजूर करने के लिए फिर से केंद्र सरकार को भेजा है जिससे सरकार भी असमंजस में पड़ गई है।

गौरतलब है कि यह नाम समलैंगिक वरिष्ठ वकील सौरभ किरपाल का है, जिनका सहचर स्विट्जरलैंड निवासी है। बता दें कि इनके नाम को वर्ष 2021 में केंद्र सरकार ने आपत्तियों के साथ कोलेजियम को वापस भेज दिया था, क्योंकि उम्मीदवार का समलैंगिक होना और उनके सहचर का विदेशी मूल का होना सरकार को पसंद नहीं है। वहीं, अपने पक्ष को मजबूत करने के लिए सरकार ने विदेशी व देशी गुप्तचर एजेंसी क्रमशः रॉ और आईबी की रिपोर्ट का हवाला भी दिया था। 

इतना ही नहीं, यह सबकुछ करने के बाद भी किरपाल पर अनौपचारिक रूप से अपनी उम्मीदवारी वापस लेने का दबाव बनाया गया, लेकिन उन्होंने दो टूक कहा कि वह नाम वापस नहीं लेंगे। क्योंकि उनका नाम दिल्ली उच्च न्यायालय की कोलेजियम ने भेजा है, जिसके लिए उन्होंने कभी कोई प्रयास नहीं किया था। इसलिए उनका मानना है कि यदि कोलेजियम को नाम रद्द करना है तो वह खुद करे।

वहीं, कोलेजियम ने इस बार फिर से नाम भेजने के साथ बहुत दृढ़तापूर्वक पूर्वक सरकार को बता दिया है कि सौरभ को न्यायाधीश बनाने से किसी तरह का कोई नुकसान नहीं होगा, बल्कि विभिन्न नागरिकों के अधिकारों का संरक्षण होगा। इससे एक कदम आगे बढ़कर सौरभ के विदेशी सहचर के बारे में कोर्ट ने बिना नाम लिए ही यह तर्क दिया है कि सरकार तथा उच्च नौकरशाही में कई बार ऐसे लोग आए हैं जिनके जीवनसाथी विदेशी रहे हैं, लेकिन उनसे कभी कोई दिक्कत नहीं हुई। उदाहरण के तौर पर, देश के पूर्व प्रधानमंत्री राजीव गांधी की पत्नी इटली मूल की हैं। वहीं, मौजूदा सरकार में देश के पूर्व विदेश सचिव व विदेश मंत्री एस जयशंकर की पत्नी जापानी मूल की हैं। वहीं, देश के पूर्व मुख्य न्यायाधीश की एच एल दत्तू की पुत्रवधू रूसी मूल की थीं।

यही नहीं, कोलेजियम ने यहां तक स्पष्ट किया है कि स्विट्जरलैंड भारत का मित्र देश है और उसके नागरिकों से देश को कोई खतरा नहीं है। यह बेहद तटस्थ देश है और इसने 1515 से अपनी इस स्थिति को बनाया हुआ है। यहां तक कि यह कुछ गिने चुने देश में शामिल है जिन्होंने प्रथम और द्वितीय विश्व युद्ध में भाग नहीं लिया। इस दौरान किसी यूरोपीय देश ने इस पर न तो हमला किया और न ही इसने किसी पर हमला किया।

इन बातों से साफ जाहिर होता है कि व्यक्तिगत स्वार्थ की पूर्ति के लिए तो संसद से लेकर सुप्रीम कोर्ट तक तरह-तरह के तर्क-कुतर्क प्रस्तुत किये जाते हैं, लेकिन सवाल जब आम आदमी से जुड़ी मूलभूत सुविधाओं का होता है तो मानो सबको सांप सूंघ जाता है या फिर पूंजीवाद के आईने में ही इन्हें भी इनका खूबसूरत चेहरा पसंद आता है, चाहे जनता कितनी भी बदसूरत क्यों न दिखाई दे। इसलिए यह कहना मुनासिब होगा कि कानून अंधा नहीं होता, बल्कि जानबूझकर उसे अंधा बनाया जाता है ताकि समकालीन अभिजात्य वर्गों के हितों की पूर्ति में कोई बाधा नहीं पहुंचे! गलत तो नहीं कह रहा जनाब! समय आने दीजिए, क्रूर वक्त भी 'अंग्रेजों' की तरह ही आपसे भी कर लेगा सवाल-जवाब, तय मानिए।

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