तो अब बीजेपी के सियासी भविष्य के लिए भी खतरा बन चुके हैं क्षेत्रीय दल!

तो अब बीजेपी के सियासी भविष्य के लिए भी खतरा बन चुके हैं क्षेत्रीय दल!

# पहले जनसंघ-बीजेपी और अब कांग्रेस-आप को साधकर बढ़ा चुके हैं अपना क्षेत्रीय दबदबा

@ कमलेश पांडेय/वरिष्ठ पत्रकार व स्तम्भकार

भारतीय राजनीति में क्षेत्रीय दलों के एक बार फिर से उभरने के चलते वह भारतीय जनता पार्टी पशोपेश में पड़ चुकी है, जो कि कभी राष्ट्रीय जनतांत्रिक गठबंधन यानी एनडीए की आड़ में इन्हें खाद-पानी प्रदान करती आई है। यह बात दीगर है कि पूर्व प्रधानमंत्री अटल बिहारी बाजपेयी के इन प्रयासों को मौजूदा प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने एक हद से ज्यादा कभी तवज्जो नहीं दी। 

दरअसल ये वही समाजवादी राजनीतिक ताकतें हैं, जिनके साथ पहले 1977 में, फिर 1989 में और फिर 1998 व 1999 में भाजपा नेता कंधे से कंधा मिलाकर कांग्रेस मुक्त भारत का सपना संजोए बैठे थे। वैसे तो 2014 और 2019 में भी इनकी पूछ रही, लेकिन मोदी-शाह की जोड़ी ने इन्हें वैसा भाव नहीं दिया, जैसा कि अटल-आडवाणी की जोड़ी दिया करती थी। यही वजह है कि समाजवादी सियासत से निकले तमाम क्षेत्रीय दल भाजपा को कांग्रेस से ज्यादा बड़ी राजनीतिक चुनौती देने को आतुर दिखाई दे रहे हैं।

यहां पर यह बताना जरूरी है कि जिन समाजवादियों ने राष्ट्रवादियों के साथ मिलकर धीरे-धीरे पहले राज्यों में और फिर केंद्र में कांग्रेस का सफाया किया, वही कांग्रेस वर्ष 2004 में संयुक्त प्रगतिशील गठबंधन यानी यूपीए बनाकर उन्हीं समाजवादी-राष्ट्रवादी विचारधारा से निकले क्षेत्रीय दलों के साथ केंद्र से लेकर राज्यों तक में गठबंधन किया और कथित धर्मनिरपेक्षता का राग अलापकर हिंदुत्व यानी बीजेपी मुक्त भारत का सपना संजोने लगी। 

मसलन, केंद्र में 2004 और 2009 में तथा राज्यों में कांग्रेस की यह रणनीति तो एक हद तक सफल रही और बीजेपी को सत्ता में जाने से रोकने की दिशा में भी वह कामयाब रही। लेकिन तीसरे व चौथे मोर्चे की कब्र पर उगी महागठबंधन की राजनीति ने राज्यों की सियासत में कांग्रेस को छोटे भाई यानी पिछलग्गू की भूमिका में ला खड़ा किया, जिससे उसका अखिल भारतीय जनाधार बुरी तरह से छिज गया, यानी कम हो गया। और अब ऐसे ही क्षेत्रीय दल कांग्रेस को भाव देने से मना कर रहे हैं और उसके पीएम इन वेटिंग यानी राहुल गांधी के सामने ही एक मजबूत चुनौती बनकर खड़े हो चुके हैं।

यहां पर यह सबकुछ बताने का तातपर्य यह है कि जिस कांग्रेस और भाजपा ने क्रमशः यूपीए और एनडीए की सियासत को हवा दी, आज वही क्षेत्रीय दल अपने अपने क्षेत्रीय मांद में मजबूत होते ही उन्हीं दोनों राष्ट्रीय दलों को फुंफकारने लगे हैं, जिनके पीछे नेहरू-गांधी परिवार और संघ परिवार का खुला हाथ रहा है। एक तरफ नेहरू-गांधी परिवार खुलकर राजनीतिक बैटिंग करता है तो संघ परिवार भाजपा नेताओं को आगे करके खुद रेफरी यानी एम्पायर की भूमिका में दिखाई देता है। 

दरअसल, इन दोनों राजनीतिक व सामाजिक परिवारों को मजबूत क्षेत्रीय चुनौती इसलिए मिल रही है कि बिहार में नीतीश कुमार के लव-कुश परिवार (गुट) का जनता दल यूनाइटेड (जदयू), लालू यादव परिवार का राष्ट्रीय जनता दल (राजद) व स्व. रामविलास पासवान परिवार की लोक जनशक्ति पार्टी (लोजपा) हावी है तो झारखंड में स्व. शिबू सोरेन परिवार का झारखंड मुक्ति मोर्चा (जेएमएम) सभी राष्ट्रीय दलों पर भारी पड़ता है। वहीं, उड़ीसा में स्व. बीजू पटनायक परिवार का बीजू जनता दल (बीजेडी) और पश्चिम बंगाल में ममता बनर्जी परिवार की तृणमूल कांग्रेस (टीएमसी) ने सभी राष्ट्रीय दलों को अपने यहां बौना साबित कर दिया है।

वहीं, उत्तरप्रदेश में स्व.मुलायम सिंह यादव परिवार की समाजवादी पार्टी (सपा) और सुश्री मायावती परिवार की बहुजन समाज पार्टी (बसपा), हरियाणा में स्व. चौधरी देवीलाल परिवार का भारतीय लोक दल (इनैलो), दिल्ली-पंजाब में अरविंद केजरीवाल परिवार की आम आदमी पार्टी (आप), पंजाब में बादल परिवार का अकाली दल बादल (एडीबी) अपने आगे किसी की भी नहीं चलने देते। या फिर किसी की अकस्मात आई सियासी चलती को कभी स्थायी नहीं रहने देते।

इसी प्रकार महाराष्ट्र में बाल ठाकरे परिवार की शिव सेना (एसएस) और शरद पवार परिवार की राष्ट्रवादी कांग्रेस पार्टी (एनसीपी), आंध्र प्रदेश में वाईएसआर परिवार की वाईएसआरसीपी और स्व. एन्टीरामा राव परिवार की तेलगुदेशम पार्टी (टीडीपी), तेलंगाना के चंद्रशेखर राव परिवार की तेलंगाना राष्ट्र समिति (टीआरएस) और भारतीय राष्ट्र समिति (बीआरएस), कर्नाटक में स्व. रामकृष्ण हेगड़े परिवार का जनता दल सेक्यूलर (जेडीएस) और तमिलनाडु में स्व. करुणानिधि परिवार की द्रविड़ मुनेत्र कषगम (द्रमुक) और स्व. जयललिता परिवार की अन्ना मलाई द्रविड़ मुनेत्र कषगम (अन्नाद्रमुक) आदि प्रायः सभी राष्ट्रीय दलों को बौना साबित करते आए हैं।

उसी तरह से जम्मू-कश्मीर में फारुख अब्दुल्ला परिवार का नेशनल कांफ्रेस (एनसी) और मुफ़्ती मोहम्मद सईद परिवार की पीपुल्स डेमोक्रेटिक पार्टी (पीडीपी), केरल में मुस्लिम लीग के अलावा वामपंथी परिवार की भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी (भाकपा) और कम्युनिस्ट पार्टी मार्क्सवादी (माकपा), ओवैसी की एआईएमआईएम के अलावा विभिन्न छोटे-छोटे राज्यों की असम गण परिषद, पीस पार्टी आदि जैसी और भी क्षेत्रीय पार्टियां हैं, जो अपने अपने इलाके में राष्ट्रीय पार्टियों को बेदम रखती आई हैं। ये इतनी चतुर पार्टियां हैं कि केंद्र में जब कांग्रेस थी तो ये जनता पार्टी व जनता दल से तालमेल रखने लगीं और जब केंद्र में बीजेपी आई तो ये कांग्रेस व समाजवादी दलों से बेहतर तालमेल रखने लगीं।

कुल मिलाकर हिमाचल प्रदेश, उत्तराखंड, मध्यप्रदेश, छत्तीसगढ़, राजस्थान, गुजरात, गोवा आदि गिने-चुने राज्य हैं, जहां कांग्रेस और बीजेपी एक दूसरे के मुकाबले में आमने-सामने खड़े होते हैं, अन्यथा अन्य राज्यों में भी सियासी शिखंडीयों की तलाश में जुटे रहते हैं, ताकि एक-दूसरे को रणनीतिक मात देकर केंद्रीय अथवा सूबाई सत्ता साध सकें। हाल के दशकों में बीजेपी का राष्ट्रीय ग्राफ तेजी से बढ़ने और कांग्रेस का राष्ट्रीय स्वरूप तेजी से घटने से जगह जगह पर इन क्षेत्रीय दलों की चांदी हो गई है, जिससे समग्र राष्ट्रीय हितों की जगह क्षेत्रीय हितों को टुकड़े-टुकड़े में तवज्जो दी जाने लगी है।

यदि राज्यवार गौर किया जाए तो पूर्वोत्तर में कांग्रेस साफ हो चुकी है और उसके गैप को बीजेपी भरने में कामयाब हो चुकी है। इसके लिए उसे जहां-तहां स्थानीय दलों का भी सहयोग लेना पड़ा है। वहीं, केरल, तेलंगाना, कर्नाटक, महाराष्ट्र, मध्यप्रदेश, छत्तीसगढ़, राजस्थान, हिमाचल प्रदेश, हरियाणा, पंजाब, उत्तराखंड और गुजरात जैसे राज्यों में कांग्रेस मजबूती से बीजेपी के मुकाबले खड़ी तो है, लेकिन कहीं-कहीं पर आम आदमी पार्टी के उभार से उसे दोहरी चुनौती मिली है। दिल्ली, पंजाब के बाद गोवा व गुजरात के चुनाव परिणाम इस बात की चुगली कर रहे हैं कि कांग्रेस को अब अपना राष्ट्रीय स्वरूप बचाये रखने के लिए बीजेपी से ज्यादा खतरा आप, राजद, सपा, एनसीपी, टीएमसी जैसे क्षेत्रीय दलों से है, जिनके चलते वह संसद में मुख्य विपक्षी दल होने का रूतबा भी गंवा चुकी है। यदि यही हाल रहा तो देर सबेर राष्ट्रीय दल होने का दर्जा भी खो सकती है।

जहां तक भाजपा की बात है तो 2024 में होने वाले लोकसभा चुनाव में बीजेपी को प्रमुख विपक्षी दल कांग्रेस से ज्यादा चुनौती विभिन्न राज्यों में फिर से उभरते जा रहे क्षेत्रीय दलों से मिल सकती है। क्योंकि अरविंद केजरीवाल, नीतीश कुमार, ममत बनर्जी और चंद्रशेखर राव जैसे आदमकद मुख्यमंत्री केंद्र में सत्तारूढ़ नरेंद्र मोदी सरकार को निशाने पर लेने के लिए अंदरखाने में आपसी अन्तर सहमती विकसित कर रहे हैं। इनके अथवा क्षेत्रीय दलों के प्रभाव वाले लगभग एक दर्जन राज्यों में लगभग 350 लोकसभा सीटें ऐसी हैं, जहां पर भाजपा को इन दलों से मुकाबला करना पड़ सकता है। ये ऐसी सीटें हैं जहां पर यदि भाजपा विरोधी महागठबंधन बन गया तो मोदी-शाह की जोड़ी को भी यहां पर सीटें निकालने के लिए नाकों चने चबाने पड़ सकते हैं। 

खास बात यह कि इन राज्यों में कुछ ऐसे दल भी हैं, जिन्हें राष्ट्रीय दल की मान्यता प्राप्त है, भले ही उनका प्रभाव राज्य विशेष में हो। सपा, बसपा, राजद, जदयू, लोजपा, जेएमएम, बीजद, टीएमसी, सीपीआई, सीपीएम, शिवसेना, एनसीपी, बीआरएस, टीआरएस, आप, टीडीपी, पीडीपी, द्रमुक, अन्नाद्रमुक, एआईएमआईएम, पीस पार्टी, मुस्लिम लीग आदि ऐसे भारतीय राजनीतिक दल हैं, जिन्हें बीजेपी फूटी आंखों से भी नहीं सोहाती है। बीजेपी रणनीतिकारों ने भले ही फूट डालो और शासन करो की नीति के तहत इनके पारस्परिक अंतर्विरोधों को हवा दिलवाकर 2014 और 2019 में केंद्रीय सत्ता पाने में सफल हो गई, लेकिन बीजेपी के बढ़ते सियासी प्रभाव से ये दल इतने चिंतित हो चुके हैं कि अपने कांग्रेस विरोधी रवैये को 
भूलकर अब बीजेपी विरोधी रवैया अपना रहे हैं, जिससे मोदी-शाह की राजनीतिक पेशानी पर बल पड़ना स्वाभाविक है।

खास बात यह है कि अगले साल यानी 2023 में नौ राज्यों के विधानसभा चुनाव होने वाले हैं, लेकिन इन राज्यों की रणनीति में सभी दलों की लोकसभा चुनाव की रणनीति भी शामिल रहेगी। जिस तरह से 2022 में हुए विधानसभा चुनाव में पंजाब में आम आदमी पार्टी और हिमाचल प्रदेश में कांग्रेस, बीजेपी को हराने में कामयाब रही और बीजेपी को सिर्फ गोवा, उत्तराखंड और गुजरात में ही सरकार बनाकर संतोष करना पड़ा; उसी तरह से नौ राज्यों में होने वाले विधानसभा चुनावों में कांग्रेस और क्षेत्रीय दल बीजेपी को तगड़ी चुनावी शिकस्त देने की तैयारियों में जुटे हुए हैं। वहीं, एमसीडी चुनाव में आप को मिली राजनीतिक सफलता और गुजरात में बढ़े जनाधार से आप के हौसले बुलंद हैं और वह भी कुछ अन्य राज्यों में अपनी चुनावी किस्मत आजमा सकती है।

बता दें कि वर्ष 2023 में नौ राज्यों, यथा- मध्यप्रदेश, राजस्थान, छत्तीसगढ़, कर्नाटक, तेलंगाना, त्रिपुरा, मेघालय, नागालैंड और मिजोरम में विधानसभा चुनाव होने वाले हैं। इन्हें अक्सर 'मिनी लोकसभा चुनाव' करार दिया जाता है, क्योंकि इन चुनावों के बाद ही वर्ष 2024 का लोकसभा चुनाव अप्रैल-मई महीने में होगा, जिसे आम चुनाव कहा जाता है। इन चुनावों में केंद्र में सत्तारूढ़ भारतीय जनता पार्टी, प्रमुख विपक्षी दल कांग्रेस और हाल के दशक में तेजी से उभरती हुई आम आदमी पार्टी के अलावा समाजवादी, जातिवादी-धर्मवादी और क्षेत्रवादी सियासी आधार वाले क्षेत्रीय दलों द्वारा इस चुनाव में पूरी दमखम के साथ हिस्सा लिया जाना है।

 वहीं, जिस तरह से असुद्दीन ओवैसी की पार्टी एआईएमआईएम अपने मूल प्रदेश तेलंगाना से निकलकर महाराष्ट्र और बिहार में भी कुछ सीटें जीतने में कामयाब हुई है, उससे साफ है कि इस पार्टी की मौजूदगी से विभिन्न राज्यों में मुस्लिम मतों का विभाजन होने लगा है। इससे उन दलों के समक्ष एक चुनौती पैदा हुई है, जिन्हें मुस्लिम वोट मिलते थे। यानी कांग्रेस और आप के अलावा विभिन्न क्षेत्रीय दलों के जनाधार भी एआईएमआईएम की उपस्थिति से प्रभावित होंगे।

उल्लेखनीय है कि वर्ष 2019 में हुए लोकसभा चुनाव में भी भाजपा को कांग्रेस से ज्यादा कड़ी चुनौती विभिन्न क्षेत्रीय दलों से ही मिली थी। तब कांग्रेस लोकसभा की महज 52 सीट ही जीत पाई थी, जबकि क्षेत्रीय दलों ने उससे ज्यादा सीटें जीती थीं। बताया जाता है कि वर्ष 2024 के अप्रैल-मई में होने वाले लोकसभा चुनावों के लिए अब ज्यादा समय नहीं बचा है, इसलिए भाजपा उन सभी राज्यों में भी लोकसभा चुनाव की तैयारी शुरू कर चुकी है, जहां पर अभी कोई चुनाव नहीं होने वाले हैं। 

कुछ यही वजह है कि बीजेपी भी अब 2024 की अपनी रणनीति में कांग्रेस से ज्यादा क्षेत्रीय दलों से मुकाबले पर केंद्रित कर रही है। उसकी कोशिश यही रहेगी कि हरेक सीट पर त्रिकोणीय मुकाबले की स्थिति बने, ताकि वह आराम से अपनी सीट निकाल पाए। उम्मीद है कि कांग्रेस की तरह आप भी इस बार सभी सीटों पर अपने प्रत्याशी उतारे, जिससे बीजेपी की राह आसान हो जाएगी।

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