महापौर और निगम पार्षदों की सीटों पर लटक रही है आरक्षण की तलवार!
महापौर और निगम पार्षदों की सीटों पर लटक रही है आरक्षण की तलवार!
# बीजेपी के रणनीतिकारों ने ओबीसी-दलित-महिला सीटों के आरक्षण को लेकर समझदारी नहीं दिखाई तो 'ध्वस्त' हो सकता है बीजेपी का किला
कमलेश पांडेय/विशेष संवाददाता
गाजियाबाद। बीजेपी का गढ़ समझे जाने वाले गाजियाबाद में गाजियाबाद नगर निगम चुनाव 2022 में पार्टी की जीत को दुहराने-तिहराने को लेकर पार्टी के नेता और रणनीतिकार बाहर से भले ही आश्वस्त दिखाई दे रहे हैं, लेकिन अंदरखाने में उनकी हलचल देखने-सुनने-गौर करने लायक है। वह इसलिए कि सवर्ण जनाधार वाली भाजपा जैसे-जैसे ओबीसी, दलितों और अल्पसंख्यकों को पटाने के लिए नए-नए तिकड़म बिठा रही है, वैसे वैसे जमीनी स्तर पर प्रभावित होने वाले सवर्ण राजनेता अपनी दलगत निष्ठा बदलकर अपना क्षेत्र बचाने की कोशिश में हाथ-पांव मारना शुरू कर देते हैं, जिससे बीजेपी का सवर्ण जनाधार दरक रहा है और चुनाव दर चुनाव करवट ले रहे मतदाताओं के रुख से इस बात की तस्दीक हो रही है।
देखा जा रहा है कि सवर्ण-अवर्ण की क्षुद्र सियासत से जो शहरी मतदाता कांग्रेस का दामन छोड़कर बीजेपी या अन्य क्षेत्रीय दलों की ओर चले गए थे, वो अब उन दलों की ऐसी ही हरकतों से आजिज आकर धीरे-धीरे कांग्रेस की ओर लौटने लगे हैं या फिर इसकी संभावनाएं जगह-जगह टटोल रहे हैं। इसके पीछे निर्वाचन क्षेत्र यानी वार्ड दर वार्ड को सामान्य, महिला, ओबीसी या एससी-एसटी के रूप में आरक्षित किये-करवाये जाने को लेकर जो खेल घाघ नेताओं-अधिकारियों की मिलीभगत से चलाया जा रहा है, उसकी भी बड़ी भूमिका है।
जानकार बताते हैं कि 100 वार्डों वाले गाजियाबाद नगर निगम का महापौर पद पहले सामान्य के लिए खाली था। फिर इसे ओबीसी के लिए आरक्षित किया गया। उसके बाद इसे महिला के लिए आरक्षित किया गया। लेकिन अब चर्चा है कि आरक्षण को लेकर यहां पर कोई और खेल भी हो सकता है। क्योंकि स्थानीय सांसद, जो केंद्रीय राज्यमंत्री भी हैं, नगर निगम क्षेत्र से जुड़े तीन-तीन स्थानीय विधायक (गाजियाबाद सदर, साहिबाबाद और मुरादनगर), राज्यसभा सांसद, यूपी सरकार में स्थानीय मंत्री, विधान परिषद सदस्य के अलावा पार्टी संगठन से जुड़े महारथी महापौर पद और 100 वार्डों को ओबीसी, दलित और महिला के लिए आरक्षित किये जाने को लेकर परदे के पीछे से जो खेल खेल रहे हैं, उसमें यदि निष्पक्षता या संतुलन दृष्टिगोचर नहीं हुआ तो बीजेपी का सवर्ण जनाधार छिटक भी सकता है।
पार्टी के जानकार बताते हैं कि महापौर आशा शर्मा और उनके समर्थक वार्ड पार्षद अपनी-अपनी सीटों पर लटकने वाली आरक्षण की तलवार और फिर आसपास में एडजस्ट किये जाने को लेकर पार्टी की रणनीति में असमंजस को लेकर बेचैन दिखाई दे रहे हैं। वैसे तो योगी सरकार के मातहत इन्होंने पिछली टीमों के मुकाबले काफी अच्छा कार्य अपने अपने क्षेत्रों में करवाया है। लेकिन मुख्यमंत्री-उपमुख्यमंत्री के बीच चली सवर्ण व ओबीसी की खेमेबाजी के चलते जिन पार्षदों ने अपनी काम में लापरवाही बरती, वो ही अब आरक्षण की आड़ लेकर अगल-बगल की सीटों पर ताका-झांकी कर रहे हैं, जिससे सवर्ण पार्षदों में बेचैनी
साफ दिखाई दे रही है।
यही वजह है कि कांग्रेस, सपा-रालोद गठबंधन, बसपा और आम आदमी पार्टी के रणनीतिकारों की नजर ऐसी तमाम सीटों पर गड़ी हुई है, जो सीट आरक्षण की नीति से प्रभावित होने वाले हैं या फिर जहां पर सिटिंग पार्षदों के पत्ते उनकी पार्टियां साफ करने वाली हैं। चूंकि शहरी क्षेत्रों में बीजेपी के अलावा सभी पार्टियों का थोड़ा बहुत जनाधार है, इसलिए वह ऐसे विक्षुब्ध होने वाले नेताओं के सतत सम्पर्क में बने हुए हैं। इसलिए सीटों को आरक्षित किये जाने वाले सवाल पर बीजेपी के केंद्रीय नेतृत्व व प्रदेश नेतृत्व द्वारा यदि व्यापक सूझबूझ नहीं दिखाई गई तो ओबीसी और दलित नेताओं को शहरों में संतुलित करने के चक्कर में उसका मूल सवर्ण जनाधार भी भटक सकता है। यदि बिहार बीजेपी की तरह यूपी बीजेपी ने भी रणनीतिक समझदारी नहीं दिखाई तो अक्सर जुड़वां भाई कहे जाने वाले यूपी-बिहार में 'अटपटे आरक्षण' का सवाल बीजेपी की गले की हड्डी भी बन सकता है।
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