परमानन्द बासा, जंगली शिव और स्व. श्रीभगवान पांडेय जी का प्रकृति बोध

परमानन्द बासा, जंगली शिव और स्व. श्रीभगवान पांडेय जी का प्रकृति बोध

@ कमलेश पांडेय/वरिष्ठ पत्रकार व स्तम्भकार

बिहार के भागलपुर जनपद अंतर्गत कहलगांव अनुमंडल के पीरपैंती अंचल स्थित पंचरुखी पंचायत अंतर्गत परमानंद बासा है जहां पर साक्षात जंगली शिव, जंगली काली और पवनपुत्र हनुमान जी विराजमान हैं। समीपस्थ हरदेवचक पंचायत अंतगर्त गोकुल मथुरा ग्राम निवासी स्व. बाबू नंदकिशोर पांडेय की एक चक जमींदारी को ही परमानंद बासा के नाम से जाना जाता है। यह टिकर क्षेत्र अपनी उत्पादकता के लिए बहुत प्रसिद्ध है। पास में बहती बरमसिया नदी इसे गोकुल मथुरा गांव से अलग करती है।

लोकमान्यता है कि जंगली शिव कुलदेव हैं और जंगली काली कुलदेवी। इनके मंगलकारी आशीर्वाद से ही यहां हमेशा रौनक रहती है। जंगली शिव मतलब विशालकाय पीपल वृक्ष के नीचे विराजमान शिवलिंग। स्थानीय लोग बटेश्वर स्थान, कहलगांव से गंगाजल लाकर इनपर चढ़ाते हैं। दिव्य पुरुष स्व. श्रीभगवान पांडेय जी इन देवी-देवताओं के प्रति अगाध आस्था रखते थे। उनके पूजापाठ का मतलब था एक लोटा जल और पहली फसल का कुछ अंश ईश्वर को अर्पण। इस जंगल में अमावस की रात को भी आपको भय नहीं लगेगा। वर्ष 1990 के दशक के शुरुआती वर्षों में कई-कई रात मैंने भी वहां गुजारी है, इसलिए हर एक चीज से करीब से वाकिफ हूँ।

स्व. बाबू नंदकिशोर पांडेय के सबसे छोटे पुत्र स्व. श्रीभगवान पांडेय सूर्योदय होते ही यहां पहुंच जाते और गोधूलि बेला में यहां से वापस लौटते। वे घोड़े के बहुत शौकीन थे और उसकी टाप बता देती थी कि "काका" (उनके भतीजे प्यार से यही बोलते) आ रहे हैं या जा रहे हैं। गाय, बैल और कुत्तों के अलावा पक्षियों से भी उन्हें प्रेम था। नौकर-चाकर से भी गहरा लगाव रखते थे।सबको कुछ न कुछ खिलाने के बाद ही वे खुद खाते थे।

मैंने देखा है कि लगभग एक दशक से अधिक समय तक परमानन्द बासा ही उनका ठिकाना बन चुका था। खेती, बागवानी और पशुपालन के अलावा अपने काम की सब्जियों को भी उगाने का उन्हें शौक रहा और जब भी कोई उनसे मिलने आता तो कुछ न कुछ देते जरूर थे। भोज-भात में आना जाना और इसी बहाने लोगों से मिलना जुलना उन्हें काफी पसंद था। जब भी मिलते तो पूरी रिश्तेदारी और जान-पहचान वाले लोगों की कुशल क्षेम पूछ लेते। फिर कहते, जंगली शिव कल्याण करेंगे। उनकी ही कृपा से जंगल में मंगल है।

खास बात यह कि आदमी के अंदर बसे आदमी को पहचानने की गजब की क्षमता ईश्वर ने उन्हें दी थी। व्यक्तिविशेष से जुड़ी उनकी संक्षिप्त टिप्पणी भी बहुत मायने रखती थी। पहली बार नेचर, टेम्परेचर और सिग्नेचर का महत्व उन्होंने ही बतलाया था, जो व्यक्तित्व की परख का अब भी बड़ा पैमाना समझा जाता है। प्रकृति की परख भी उनमें अद्भुत थी। आसमान देखकर मौसम का हाल बता देते थे।

चाहे गन्ने की पेराई हो या धान-गेहूं-मटर-बूंट की खेती, एक एक चीज की बारीक समझ थी उनमें। आलू-प्याज भी काम भर उगा लिया करते। अमरूद, लीची, पपीता, निम्बू, लौकी और नेनुआ की उम्दा वेरायटी वह खोजकर मंगवाते और लगवाते। बातों ही बातों में कहते कि यह मधुबन है, जो कमाएगा, वो खाएगा। हम तो सिर्फ सबको समझायेगा कि कुछ अच्छा करते रहो और जंगली शिव पर भरोसा रखो।

मूलधन से ज्यादा उन्हें सूद प्यारी थी। मतलब पुत्र-पुत्री के अलावा नाती-पोतों से भी अटूट प्यार था उन्हें। अपने भाइयों, बहनों के अलावा रामपुर दीघार, बलिया जनपद, उत्तरप्रदेश के अपने मूल ग्रामवासियों से भी उनका सम्पर्क ताउम्र बना रहा। कहने का तातपर्य यह कि आदमी हूँ, आदमी से प्यार करता हूँ, उनके जीवन का ध्येय था। अकारण वो गुस्सा नहीं होते, लेकिन इंसान की नादानी बस या किसी अन्य कारणवश जब वो तमतमाते तो चेहरा लाल हो उठता। लेकिन कुछ समय बाद फिर वही प्यार मिलता, जिसके आप हकदार हैं। वो बताते थे कि गलती आदमी से ही होती है, लेकिन जब उस ओर उसका ध्यान दिलाया जाए तो उसे स्वीकार करके क्षमा याचना कर लेना चाहिए, न कि कुतर्क पेश करना चाहिए। क्योंकि जब कोई मुझसे कुतर्क करता है तो हमारा ब्लडप्रेशर हाई हो जाता है। होना भी चाहिए, मितभाषी जो थे।

यह सबकुछ लिखने-बताने का तातपर्य यह कि व्यक्तित्व-विशेष की पसंद और प्रवृत्ति क्या होती है, जो उन्हें आम आदमी की भीड़ से अलग हटाकर खास बनाती है। मनोवैज्ञानिक कहते हैं कि यदि हम महान पुरुषों के पदचिन्हों का अनुकरण करेंगे तो जीवन के कुरुक्षेत्र में अवश्य ही सफल होंगे। महाभारत तो नियति है, लेकिन मन में भारत यानी ग्रामीण सुसंस्कारों को अवश्य जिंदा रखना चाहिए, ताकि पीढ़ी दर पीढ़ी उसका हस्तांतरण चलता रहे।

टिप्पणियाँ

इस ब्लॉग से लोकप्रिय पोस्ट

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की इजरायल यात्रा के कूटनीतिक निहितार्थ

जनहितैषी सुझाव को शिकायत समझने की भूल न करें, अपेक्षित बदलाव के वाहक बनें

शिक्षक दिवस: जिलाधिकारी डॉ दिनेश चंद्र सिंह ने स्कूलों का औचक निरीक्षण किया और बाल बाटिका का महत्व समझाया