अब देश-प्रदेश की दलित-पिछड़ी राजनीति को चाहिए एक और नया नायक

अब देश-प्रदेश की दलित-पिछड़ी राजनीति को चाहिए एक और नया नायक

@ रोशनलाल गुप्ता, संस्थापक राष्ट्रीय अध्यक्ष, भारतीय जन अधिकार पार्टी 

भारत समेत किसी भी समाज का सम्पूर्ण विकास तबतक नहीं हो सकता, जब तक कि वहां के पिछड़े वर्गों, अत्यंत पिछड़े वर्गों, दलितों, महादलितों, गरीब सवर्णों और पसमांदा मुसलमानों के समग्र उत्थान पर विभिन्न सरकारों द्वारा अपना ध्यान केंद्रित नहीं किया जाए। कहने को तो केंद्र सरकार, राज्य सरकार व जिला सरकार यानी स्थानीय निकायों द्वारा इन वर्गों के लिए अनेक लोकलुभावन योजनाएं बनाई हुई हैं। लेकिन इनका अनुपालन इतनी वैमनस्यता पूर्वक किया जाता है कि 'कहीं घृत घना, कहीं मुट्ठी भर चना, कहीं वह भी मना' वाली कहावत इनके ऊपर आजादी के 75 वर्ष बाद भी चरितार्थ हो रही है। ऐसा नहीं है कि इनकी बद से बदतर स्थिति के लिए कोई एक पार्टी या गठबंधन जिम्मेदार है, बल्कि सत्ता पक्ष और विपक्ष के तमाम दल इस मामले में सियासी हमाम में नंगे साबित हुए हैं। यही वजह है कि देश-प्रदेश की दलित-पिछड़ी राजनीति अब  एक और नए नायक की बाट जोह रही है।

इन वर्गों पर अतिरिक्त ध्यान देने का मतलब सिर्फ सरकारी नौकरियों, शिक्षण संस्थाओं और संसदीय व्यवस्थाओं में लोकलुभावन आरक्षण से नहीं, बल्कि देश के समस्त प्राकृतिक संसाधनों व आर्थिक प्रचलनों में उनकी समुचित भागीदारी सुनिश्चित किये जाने को लेकर है, जो कि आजादी के 75 साल बाद भी कहीं दृष्टिगोचर नहीं हो रहा है। यही नहीं, हमारे प्रशासनिक उपक्रमों व उससे जुड़े विभिन्न शैक्षणिक आयामों में इन वर्गों की सांकेतिक उपस्थिति से सामाजिक-आर्थिक-सांस्कृतिक पुनर्जागरण कदापि नहीं लाया जा सकता, जो कि शोषण रहित समतामूलक समाज की पवित्र भावनाओं का मूल कारक है। संभवतया सियासी पुनर्जागरण का मूल स्रोत भी यही है। इसलिए हमने यह तय किया है कि भारतीय जन अधिकार पार्टी अपना पूर्ण ध्यान इन वंचित-शोषित-पददलित वर्गों के समग्र विकास पर केंद्रित करेगी, ताकि उनके जीवन यापन स्तर में न केवल अपेक्षित सुधार लाया जा सके, बल्कि उनकी मानसिक क्षमता के पूर्ण उन्नयन की भी बारीक व्यवस्था सुनिश्चित किया जाए। ऐसा होने से  सभी देशवासियों को उनके जीवन में आगे बढ़ने के एक समान अवसर प्राप्त हो सकेंगे। 

इस बात में कोई दो राय नहीं कि देश-प्रदेश में पिछड़ी जातियों, अति पिछड़ी जातियों, दलितों-महादलितों, गरीब सवर्णों और पसमांदा मुसलमानों की स्थिति दिन-प्रतिदिन दयनीय होती जा रही है। क्योंकि खेती-बाड़ी और पशुपालन आदि की स्थिति तो पहले से ही दयनीय है। वहीं, 1990 के दशक में देश की अर्थव्यवस्था पर थोपी गई नई आर्थिक नीतियों के परिणामस्वरूप छोटे-मोटे काम-धंधे भी अलाभकारी होते चले गए। इस दौर में सरकारी कार्यों में निजी कम्पनियों और एनजीओज के बढ़ते दखल से न केवल सरकारी नौकरियों में इनके लिए आरक्षित अवसरों में भारी कमी दर्ज की गई है, बल्कि सरकारी ठेके भी अब बड़ी बड़ी कम्पनियों को ही नसीब हो रहे हैं, जिसके चलते अधिकांश कार्य अब श्रम बल पर नहीं बल्कि मशीनीकरण के बल पर किये जा रहे हैं, जिससे कुशल-अकुशल दिहाड़ी मजदूरों के काम में भी मंदी व्याप्त हो चुकी है। ऐसे में स्वाभाविक है कि इन वर्गों के लिए रोटी, कपड़ा और मकान, शिक्षा, स्वास्थ्य और सम्मान आदि का जुगाड़ करना दिन ब दिन मुश्किल साबित होता जा रहा है।

कहने को तो आजादी से लेकर अबतक समाज के इन बड़े वर्गों के हकहुक़ूक़ की लंबी चौड़ी बातें तो नेताओं व समाजसेवियों द्वारा बहुत की गई, लेकिन जमीनी स्तर में इनके जीवन स्तर को ऊंचा उठाने के लिए व्यवहारिक उपक्रम बहुत कम किये गए। जो किये गए वो ऊंट के मुंह में जीरा के समान हैं, इससे ज्यादा कुछ नहीं। यह कौन नहीं जानता कि पिछले 3 दशकों से देश में लागू नई आर्थिक नीतियों ने उन्हें संविधान प्रदत्त आरक्षण के तहत लाभ उठाने की युगान्तकारी कोशिशों की भी एक तरह से गला घोंट दिया गया है, क्योंकि सरकारी क्षेत्र में नौकरियों के अवसर लगातार कम होते जा रहे हैं। वहीं, तेजी से पनपते निजी क्षेत्र में आरक्षण लागू करवाने के प्रति भी कोई भी दल संजीदा नहीं है। लिहाजा इन वर्गों के जीवन यापन यानी रहन-सहन, शिक्षा, स्वास्थ्य, रोजगार, आदि के नजरिये से एक बड़ी लड़ाई लड़ने की जरूरत है। क्योंकि जबतक संसद, विधानमंडल और जिला सरकार में इन वर्गों के प्रतिनिधित्व नहीं बढ़ेंगे, तबतक इनके दूरगामी हितों से जुड़े कोई भी कानून नहीं बनवाए जा सकेंगे।

इसलिए अब यह जरूरी हो चुका है कि देश के इतने बड़े समाज को सत्ता से प्राप्त दो टुकड़ों के प्रति मेहरबान नहीं रहना चाहिए, बल्कि अपने स्वर्णिम भविष्य के लिए एक लंबी राजनीतिक लड़ाई का सूत्रपात करना चाहिए। देश में राजनेताओं, नौकरशाहों, उद्योगपतियों के जो कॉकस हैं, उनमें इन वर्गों के असली नुमाइंदे बहुत कम हैं और जो गिने-चुने हुए हैं भी, उनकी मानसिकता भी आभिजात्य वर्गीय हो चली है। इसी स्थिति को बदलने के लिए हमने राष्ट्रीय क्रांतिकारी समाजवादी पार्टी के राष्ट्रीय कार्यकारी अध्यक्ष जैसे महत्वपूर्ण व सम्मानजनक पद से इस्तीफा दिया है और नवगठित भारतीय जन अधिकार पार्टी की एक भावी योजना के साथ जनता जनार्दन के बीच उपस्थित  हुआ हूँ। क्योंकि हमारा एकमात्र मकसद यूपी-बिहार समेत हिंदी भाषी राज्यों व गैर हिंदी भाषी राज्यों की इन उपेक्षित जातियों की सोच-समझ में उबाल लाना है। ऐसा इसलिए कि समाजवादी राजनीति से पैदा होकर सत्ता के शिखर तक पहुंचे समाजवादी पार्टी के नेता व यूपी के पूर्व मुख्यमंत्री मुलायम सिंह यादव-अखिलेश यादव, बहुजन समाज पार्टी की नेता व यूपी की पूर्व मुख्यमंत्री सुश्री मायावती, राजद सुप्रीमो व बिहार के पूर्व मुख्यमंत्री लालू प्रसाद यादव, उपमुख्यमंत्री तेजस्वी यादव, लोक जनशक्ति पार्टी के नेता व पूर्व केंद्रीय मंत्री रामविलास पासवान व चिराग पासवान जैसे "पिछड़े-दलित सवर्णों" तुल्य नेताओं द्वारा स्थापित दलों से जुड़े लोगों ने पूरे जनसमूह को न केवल मूर्ख बनाया, बल्कि उनकी भावनाओं को भड़काकर ही अपना पारिवारिक सियासी साम्राज्य खड़ा लिया। कहीं न कहीं एनडीए-यूपीए की आड़ लेकर ये बीजेपी-कांग्रेस के एजेंट साबित हुए, इसलिए इनसे हमारे लोगों को अब न्याय की उम्मीद भी नहीं है। 

सच कहूं तो देश की दलित-पिछड़ी राजनीति कमोबेश जातीयता, साम्प्रदायिकता व क्षेत्रीयता की चक्की में पिसकर दिशाहीन हो चुकी है। इसने राष्ट्रवाद, हिंदुत्व और वैश्विक पूंजीवाद से गुप्त समझौता कर लिया है, जो कि चिंता की बात है। यह देश जातिवाद, क्षेत्रवाद और सम्प्रदायवाद के पैमाने पर नहीं बंटे और बंटकर बिखरे, इसके लिए जिस राजनीतिक क्रांति की जरूरत है, भारतीय जन अधिकार पार्टी उसी का सूत्रपात करेगी, ताकि सामाजिक-आर्थिक-सांस्कृतिक क्रांति के सहारे सियासी क्रांति का बीजारोपण भारतीय समाज में किया जा सके। 

यहां पर मुझे यह बताते हुए शर्म महसूस हो रही है कि भारतीय राजा-महाराजाओं, मुस्लिम-ब्रिटिश शासकों और आधुनिक भारत के लोकतांत्रिक कर्णधारों ने जिन प्रशासनिक व आर्थिक व्यवस्थाओं को समय समय पर प्रश्रय दिया, उससे देश के पिछड़े वर्गों, अत्यंत पिछड़े वर्गों, दलितों, महादलितों, गरीब सवर्णों और पसमांदा मुसलमानों को सबसे ज्यादा क्षति हुई। आंकड़े गवाह हैं कि भूमि संसाधनों पर आधारित खेती-बाड़ी व पशुपालन आदि, आर्थिक संसाधनों पर आधारित बाजार व उससे फलने-फूलने वाले उद्योग-धंधों यानी काम-धंधों, प्रशासनिक संसाधनों यानी नौकरी-ठेकेदारी में समाज के इन दबे कुचले वर्गों का प्रतिनिधित्व उनकी आबादी के अनुरूप नगण्य है, जिससे इनका समुचित शैक्षणिक व सांस्कृतिक विकास संभव नहीं हो पाया। 

इसलिए अब इन विषम हालातों को बदलने की जरूरत है, जो कि ऊपर से नीचे तक की घृणित सियासी सोच को बदले बिना संभव नहीं हो सकता। हैरत की बात है कि देश में चाहे कांग्रेस की सरकार हो या भाजपा की, यूपीए गठबंधन की सरकार हो या एनडीए गठबंधन की, समाजवादियों की सरकार हो या दलितवादियों की, सबने इस लोकतांत्रिक व्यवस्था का दुरुपयोग स्वहित में किया, जिससे समाज के पिछड़े वर्गों, अत्यंत पिछड़े वर्गों, दलितों, महादलितों, गरीब सवर्णों और पसमांदा मुसलमानों के दीर्घकालिक हितों की लड़ाई सदैव अधूरी रह गई, जिसे अब पूरे करने का जिम्मा हमारे-आपके नाजुक कंधों पर आ चुका है। 

इसलिए इसे किसी निर्णायक मुकाम पर पहुंचाए बिना हम चैन से न तो सोएंगे और न ही किसी को सोने देंगे। हमारी जनहितकारी लड़ाई यूपी-बिहार से शुरू होकर देर-सबेर पूरे देश में पहुंचेगी। क्योंकि हमने नियति से वादा किया है कि समाज के पिछड़े वर्गों, अत्यंत पिछड़े वर्गों, दलितों, महादलितों, गरीब सवर्णों और पसमांदा मुसलमानों के बीच सैद्धांतिक व लौकिक शिक्षा की अलख जगायेंगे, उन्हें नौकरी व स्वरोजगार के लिए प्रेरित करेंगे, उनमें सांस्कृतिक पुनर्जागरण का सूत्रपात करेंगे और उनके राजकीय हकहुक़ूक़ उन्हें दिलाने की भरपूर उद्यम करेंगे, ताकि सदियों से सोई मूर्तिवत प्रशासनिक व्यवस्था को जगाया जा सके।

इसलिए मैं आपलोगों से इस आलेख के माध्यम से नम्र निवेदन कर रहा हूँ कि इन्हें सामूहिक चुनौती देने और बीजेपी-कांग्रेस के आधार मतों में सेंध लगाने के लिए हमारे दल के मजबूत स्तंभ बनें, क्योंकि हमलोग इस दिशा में काफी आगे बढ़ चुके हैं। इसके लिए देश का शोषित वंचित समाज आपका आभारी रहेगा। चलते चलते एक बात और स्मरण करा दूं कि जातीय जनगणना की मांग हमारे लिए साधन है, साध्य नहीं। क्योंकि 1931 की जनगणना से जुड़े रहे तत्कालीन अंग्रेज कमिश्नर जेएच हट्टन ने लिखा था, "सही-सही जाति आधारित जनगणना असंभव है। भारत में लगभग छह हजार जातियां हैं, उनकी भी उप जातियां हैं, जिनकी संख्या हजारों में होगी। अत: इनकी वैज्ञानिक जनगणना संभव नहीं है।" 

हालांकि आजाद भारत की सामाजिक न्याय समिति 2001 की रिपोर्ट बताती है कि प्रदेश में पिछड़ी जातियों की आबादी कुल जनसंख्या की लगभग 54.05 प्रतिशत है। अनुमानत: इसमें 10-12 प्रतिशत मुस्लिम पिछड़ी आबादी भी शामिल है। कहने का तातपर्य यह कि सिर्फ यूपी में पिछड़े-अत्यंत पिछड़े वर्गों की आबादी 45 प्रतिशत है, जबकि दलितों-महादलितों की आबादी 20 प्रतिशत और गरीब सवर्णों की आबादी 10 प्रतिशत। वहीं पसमांदा मुसलमानों की तादात भी लगभग 10 प्रतिशत है। 

इसलिए जिस दिन देश के ये 85 प्रतिशत लोग अपने वाजिब हकहुक़ूक़ के लिए गोलबंद हो जाएगी, उस दिन पहले भारतीय संसद, विधानमंडलों और त्रिस्तरीय पंचायती राज संस्थाओं का चेहरा बदलेगा है और ततपश्चात इनसे जुड़े हुए सभी लोगों का। इसलिए नए भारत में इन नए राजनीतिक सोच को स्वीकार करें और अपने भविष्य का निर्माण खुद करें। जय हिंद।

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