प्रेस क्लब ऑफ इंडिया में उर्दू पत्रकारिता के दो सौ साल पूरे होने पर विचार गोष्ठी आयोजित
प्रेस क्लब ऑफ इंडिया में उर्दू पत्रकारिता के दो सौ साल पूरे होने पर विचार गोष्ठी आयोजित
# वक्ताओं ने भारत के निर्माण में उर्दू मीडिया की भूमिका पर अपने अपने विचार प्रकट किए
कमलेश पांडेय/विशेष संवाददाता
नई दिल्ली। उर्दू पत्रकारिता के 200 साल पूरे होने पर रविवार को प्रेस क्लब ऑफ इंडिया में "भारत के निर्माण में उर्दू मीडिया की भूमिका" विषयक एक विचार गोष्ठी का आयोजन किया गया। जिसमें पत्रकारों ने देश की द्वितीय राजभाषा उर्दू की पत्रकारिता के अतीत, वर्तमान और भविष्य पर प्रकाश डालते हुए अपने अपने महत्वपूर्ण विचार रखे। बता दें कि प्रेस क्लब ऑफ इंडिया 4,200 से अधिक पत्रकारों का एक निकाय है जो अपने बौद्धिक विमर्श के लिए राष्ट्रीय-अंतरराष्ट्रीय स्तर पर लब्धप्रतिष्ठित है।
इस अवसर पर पत्रकार सह राजनेता शाहिद सिद्दीकी, कुर्बान अली और शम्स तबरेज़ कासमी सहित उर्दू पत्रकारिता से जुड़े प्रमुख व्यक्तियों ने कार्यक्रम में भाग लिया। जबकि राष्ट्रीय सहारा उर्दू के कई संस्करण चलाने वाले सहारा न्यूज नेटवर्क के सीईओ उपेंद्र राय इस समारोह के मुख्य अतिथि थे। वक्ताओं ने "भारत के निर्माण में उर्दू मीडिया की भूमिका" पर विस्तृत रूप से चर्चा की।
बैठक की अध्यक्षता प्रेस क्लब ऑफ इंडिया के अध्यक्ष उमाकांत लखेरा ने की। जबकि पीसीआई के महासचिव विनय कुमार ने भी इस कार्यक्रम में भाग लिया। इस अवसर पर मौलवी मोहम्मद बकर का चित्र, संभवत: पहले भारतीय उर्दू पत्रकार जिन्होंने कर्तव्य के आह्वान के दौरान अपने प्राण न्यौछावर कर दिए, का अनावरण किया गया। जो भारत में उर्दू पत्रकारिता के लंबे और गौरवशाली इतिहास की याद दिलाता है, जो सन 1822 की है।
इससे पता चलता है कि अंग्रेजी और अन्य भाषाओं के समाचार पत्रों के आने से बहुत पहले मौलवी बकर अपने उर्दू अखबार "दिल्ली उर्दू अखबार" के माध्यम से लोगों को जागृत कर रहे थे। 1857 के भारत के पहले स्वतंत्रता संग्राम पर भी उनकी विभिन्न रिपोर्ट प्रकाशित है। वो उन बहुत कम लोगों में से थे, जिनके समाचार पत्र ने राजनीतिक जागृति पैदा करने और ब्रिटिश राज की कार्रवाई की निंदा करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई है।
उन्होंने अपनी कलम की ताकत से स्वतंत्रता संग्राम में तब तक भाग लिया, जब तक कि उन्हें मेजर विलियम एस.आर. हडसन ने 16 सितंबर, 1857 ई. को गोलियों से भून नहीं डाला। इस तरह से कर्तव्य की बलिवेदी पर वो शहीद हो गए।
उन दिनों को याद करते हुए, जब उर्दू पत्रकारिता ने सबसे प्रमुख स्थान दिल्ली पर कब्जा कर लिया था, वक्ताओं ने कहा कि यह अवसर भारत में उर्दू पत्रकारिता के गौरवशाली दिनों की भी याद दिलाता है, जब इस उपमहाद्वीप में भगत सिंह, लाला लाजपत राय और मौलाना आजाद सहित कई राजनेता अपने विचार उर्दू में भी लिखते रहते थे।
वहीं, सबसे पुराने उर्दू अखबारों में से एक "नई दुनिया" के प्रधान संपादक शाहिद सिद्दीकी ने कहा कि "उर्दू भारत के स्वतंत्रता संग्राम का माध्यम था। यह भारतीय जनता की भाषा थी और यहां तक कि इसका इस्तेमाल भी किया जाता था। राजा महेंद्र प्रताप द्वारा जब उन्होंने काबुल में पहली प्रांतीय भारत सरकार की स्थापना की, तो करता सिंह सराभा ने सैन फ्रांसिस्को से एक उर्दू अखबार निकाला।
वहीं, सहारा मीडिया नेटवर्क्स के ग्रुप एडिटर उपेंद्र राय ने दर्शकों को उर्दू भाषा की भारतीयता के बारे में याद दिलाया। उन्होंने कहा कि "यह भारत की भाषा है न कि किसी विशेष क्षेत्र या समुदाय की। उर्दू का एक विशिष्ट और प्रसिद्ध अतीत है, फिर भी इसकी भविष्य की राह आसान नहीं है।"
वहीं, क़ुर्बान अली ने कहा कि "आज़ादी के तुरंत बाद, जिस भाषा को एक कीमती रत्न की तरह माना जाता था, उसे छुरा घोंपा गया और पीटा गया। किसी भी सरकार ने इस भाषा को पुनर्जीवित करने के लिए ईमानदारी से प्रयास नहीं किया। अब पत्रकार समुदाय के पास अपने खोए हुए अतीत को पुनर्जीवित करने का दायित्व है और इसे प्रासंगिक बनाएं।"
वहीं, वरिष्ठ पत्रकार और स्तंभकार रोहिणी सिंह ने आम आदमी की आवाज को मजबूत करने के लिए भारत में उर्दू लेखन और पत्रकारिता को बढ़ावा देने की आवश्यकता को रेखांकित किया। कार्यक्रम का संचालन प्रबंध समिति के सदस्य ए यू आसिफ ने किया और धन्यवाद प्रस्ताव पीसीआई सदस्य और पत्रकार शम्स तबरेज ने दिया।
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