सुपर पू स्टूल ट्रांसप्लांट क्या है? पू-स्टूल डोनेशन (मल दान) मिशन से इसे कैसे संपादित किया जाता है? किन किन बीमारियों में इसके क्या-क्या लाभ हैं? सविस्तार जानिए

सुपर पू स्टूल ट्रांसप्लांट क्या है? पू-स्टूल डोनेशन (मल दान) मिशन से इसे कैसे संपादित किया जाता है? किन किन बीमारियों में इसके क्या-क्या लाभ हैं? सविस्तार जानिए

@ कमलेश पांडेय/वरिष्ठ पत्रकार व स्तम्भकार

समकालीन दुनिया में नेत्रदान, रक्तदान, वीर्य दान, अंगदान, शरीरदान के बाद अब जो एक नया दान इन दिनों ट्रेंड में आया है, उसे "मल दान" यानी "पू या स्टूल डोनेशन" कहते हैं। ऐसे दान में हासिल उच्च गुणवत्ता वाले मल से मल प्रत्यारोपण यानी सुपर पू स्टूल ट्रांसप्लांट चिकित्सा पद्धति को बढ़ावा दिया जा रहा है। वहीं, कुछ लोग मल डोनर बनकर पैसे भी कमा रहे हैं।

मल चिकित्सा से जुड़े विशेषज्ञ बताते हैं कि यदि किसी स्वस्थ इंसान के उच्च गुणवत्ता वाले मल का प्रत्यारोपण दूसरे अस्वस्थ इंसान की आंतों और पेट में किया जाता है तो इससे कई प्रकार की बीमारियां ठीक हो सकती हैं। जैसे- क्लॉसट्रिड्रियम डिफिसिल कोलाइटिस या सी डिफ। क्योंकि इसकी वजह से ही डायरिया, सेप्सिस और मौत तक हो सकती है। लेकिन यदि सही तरीके से परीक्षित किया हुआ मल रोगी की आंतों में डाल दिया जाए तो वह कई तरह की बीमारियों से मुक्त हो सकता हैं। 

# देश दुनिया में तेजी से बढ़ रहा है मल दान' का ट्रेंड 

दरअसल, इसी मल डालने की विधि को फीकल ट्रांसप्लांट या स्टूल ट्रांसप्लांट कहते हैं। इसी वास्ते 'मल दान' का ट्रेंड देश दुनिया में तेजी से बढ़ रहा है। बता दें कि दान वाले मल (पू या स्टूल) को सुपर पू कहा जा रहा है। जबकि इसके दानदाताओं को 'गुड पू डोनर्स' कहा जा रहा है। कहने का तातपर्य यह कि दूसरे के उच्च गुणवत्ता वाले मल से निम्न मल गुणवत्ता से ग्रस्त रोगियों की आंतों की बीमारियों का इलाज होगा।

मल चिकित्सा की दुनिया में 'गुड पू डोनर्स' को यूनिकॉर्न्स कहा जा रहा है, क्योंकि इन्हें खोजना बेहद मुश्किल होता है। वहीं, अच्छे मल के दान से बहुत से लोग फीकल ट्रांसप्लांट यानी मल प्रत्यारोपण करवा रहे हैं। बहरहाल, इस नए ट्रेंड की वजह से ही इंसानी माइक्रोबायोम यानी आंतों के माइक्रोब्स पर नए अध्ययन संभव हो पा रहे हैं। जिसके दृष्टिगत आंतों के माइक्रोब्स यानी आंतों के बैक्टीरिया में बदलाव करके इंसानों की सेहत को सुधारा जा रहा है।

विशेषज्ञ बताते हैं कि आंतों के माइक्रोब्स यानी बैक्टीरिया सिर्फ खाना पचाने और पाचन क्रिया से संबंधित काम ही नहीं करते हैं, बल्कि यह आपके मूड को सही रखने, प्रतिरोधक क्षमता को मजबूत करने, शारीरिक और मानसिक स्वास्थ्य को सही रखने में भी मदद करते हैं। लेकिन सबसे बड़ी दिक्कत ये है कि पश्चिमी भोजन की परंपरा यानी फास्ट फूड और एंटीबायोटिक्स के बढ़ते प्रचलन हमारे माइक्रोबायोटा को बिगाड़ रहे हैं। माइक्रोबायोटा यानी आंतों में मौजूद सूक्ष्म बैक्टीरिया की दुनिया, जिससे हमारे शारीरिक और मानसिक स्वास्थ्य का गहरा नाता है।

# कई बार कुछ लोगों का माइक्रोबायोम इतना बिगड़ जाता है कि उसे ठीक करने के लिए लोगों को जरूरत होती है दूसरे के मल की 

चिकित्सकों का अनुभव बताता है कि कई बार कुछ लोगों का माइक्रोबायोम इतना बिगड़ जाता है कि उसे ठीक करने के लिए लोगों को दूसरे के मल की जरूरत होती है। ऐसे में यह सवाल उठना लाजिमी है कि दूसरे के शरीर से निकला मल हमारी मदद कैसे कर सकता है? इसलिए यह जान लीजिए कि यदि कोई स्वस्थ इंसान अपने उच्च गुणवत्ता का मल दान करता है, जिसका प्रत्यारोपण यानी ट्रांसप्लांट आपके शरीर में किया जाता है तो उसके ताकतवर बैक्टीरिया ही हमारे शरीर को सुधारने में मदद करते हैं। कहने का तातपर्य यह कि ये हमारी बीमारियों को ठीक करने या बीमारियों से हमें बचाने में काफी कारगर होते हैं।

यही वजह है कि एडिलेड स्थित बायोमबैंक के मुख्य चिकित्सा अधिकारी सैम कोस्टेलो और मुख्य कार्यपालक थॉमस मिशेल अपनी पारखी नजरों और हासिल तकनीकों से ऐसे ही स्वस्थ लोगों को खोज रही है, जिनसे उच्च गुणवत्ता का मल हासिल किया जा सके। इसलिए लोग को प्रोत्साहित किया जा रहा है कि वो अपना मल दान करें। वहीं, कभी कभार उच्च कोटि के मल को खरीदने की भी व्यवस्था की गई है, ताकि जरूरतमंद रोगियों को निराश नहीं होना पड़े। बताया जाता है कि इस तरह से हासिल मल को बायोमबैंक अपनी प्रयोगशाला में संवर्धित करके उसे प्रत्यारोपण के लायक बना देती है, ताकि जब किसी अस्वस्थ इंसान की आंतों में यह मल डाला जाए तो उसकी बीमारियां ठीक की जा सकें।

# बायोमबैंक में बनाया गया है एक शानदार टॉयलेट, जहां से लोगों का मल सीधे जाता है लैब की मशीन में 

गौरतलब है कि इसी काम के लिए बायोमबैंक में एक शानदार टॉयलेट बनाया गया है, जहां से लोगों का मल सीधे लैब की मशीन में जाता है। वहां पर उसके बेहतरीन और अच्छे बैक्टीरिया को निकाला जाता है। उसके बाद कंपनी अपनी सीक्रेट थैरेपी से उन्हें और ज्यादा बेहतर बनाती है। इसके बाद अलग-अलग बीमारियों को ठीक करने के लिए अपेक्षित मल और उसके बैक्टीरिया में विभिन्न तरह के रसायनों को मिलाया जाता है, जिससे बैक्टीरिया की ताकत और बढ़ जाती है। ततपश्चात उसे अलग-अलग सीरिंज में भरकर रख दिया जाता है, ताकि जरूरत पर काम आ सके।

# मल दाताओं के मेडिकल हिस्ट्री, ट्रैवल हिस्ट्री और एंटीबायोटिक हिस्ट्री की भी होती है जांच : डॉ. एमिली टकर 

यहां पर यह भी स्पष्ट कर दें कि मल दान से मिले सैंपल की जांच इसी संस्था की एक्सपर्ट डॉ. एमिली टकर करती हैं। उनके मुताबिक, वो किसी व्यक्ति से उसका मल लेने से पहले कई तरह की जांच करती हैं और जब प्रामाणिक विधियों से यह समझ लेती हैं कि उसे किसी तरह का कोई संक्रमण या बीमारी नहीं है, तब वो उसका मल सेलेक्ट कर लेती हैं। इस पूरी प्रक्रिया में वो उसकी मेडिकल हिस्ट्री, ट्रैवल हिस्ट्री और एंटीबायोटिक हिस्ट्री की भी जांच करती हैं। वो बताती हैं कि जो लोग मलदान करना चाहते हैं, उनके लिए उनके पास 8 हफ्ते का कार्यक्रम है।

# इंसान इकलौता ऐसा जीव है, जिसके शरीर में बैक्टीरिया का अथाह भंडार है: सैम कोस्टेलो

मल दान के आह्वान पर प्रकाश डालते हुए सैम कोस्टेलो कहते हैं कि इंसान इकलौता ऐसा जीव है, जिसके शरीर में बैक्टीरिया का अथाह भंडार है। जिनमें इतनी विभिन्नताएं हैं, उसकी कल्पना नहीं की जा सकती है। वो आगे बताते हैं कि कई बैक्टीरिया के बारे में तो अभी अध्ययन भी नहीं किया जा सका है। उनका स्पष्ट मानना है कि इंसान कई तरह की खाद्य सामग्रियों को खाता है, जो अलग-अलग होते हैं। इसलिए उसके शरीर की आंतों और मल में लाखों तरह के बैक्टीरिया मौजूद होते हैं।

सैम कोस्टेलो आगे बताते हुए चिंता जाहिर कर रहे हैं कि हमलोग जिस तरह से खा-पी रहे हैं, उससे हमारे समय में माइक्रोबियल एक्सटिक्शंन हो रहा है, यानी कि माइक्रोब्स खत्म होते जा रहे हैं। और यदि ये खत्म हो गए तो हमारा शरीर भी देर सबेर खत्म हो जाएगा। क्योंकि प्रो बैक्टीरिया के अभाव में शरीर में कई तरह की बीमारियां पैदा होंगी। इसलिए शरीर को सुचारू रूप से चलाने के लिए यह नितांत आवश्यक है कि शरीर में सही बैक्टीरिया मौजूद रहे। इसलिए यदि किसी की बीमारियों को दूसरे के मल से ठीक किया जा सकता है तो उससे कोई दिक्कत नहीं है और किसी को होनी भी नहीं चाहिए।

# सुपर पू डोनर्स के सिद्धांत पर काम कर रहे हैं मॉलिक्यूलर बायोलॉजिस्ट डॉक्टर जस्टिन ओ'सुलीवन 

आपकी ज्यादा जानकारी के लिए यह बता दें कि डॉक्टर जस्टिन ओ'सुलीवन ऑकलैंड यूनिवर्सिटी में एक मॉलिक्यूलर बायोलॉजिस्ट यानि आणविक जीवविज्ञानी हैं, जो 'सुपर पू डोनर्स' के सिद्धांत पर काम कर रहे हैं। उनका मानना है कि किसी भी इंसान की आंतों में लाखों की संख्या में अच्छे और बुरे, दोनों तरह के कई प्रकार के बैक्टीरिया रहते हैं। ये सूक्ष्म जीव आपस में एक दूसरे से अलग होते हैं। हालांकि, चिकित्सा के क्षेत्र में पॉटी को दूसरे की आंत में डालना एकदम नया है, लेकिन रिसर्च में मिले सबूत इस बात का प्रमाण हैं कि अपनी पॉटी में प्रो बैक्टीरिया रखने वाले कुछ दानकर्ता अपने इस आयाम में बेहद सफल हो रहे हैं, जो अपनी पॉटी से पैसे भी कमा सकते हैं।

डॉक्टर जस्टिन ओ'सुलीवन आगे कहते हैं कि यदि हम पता लगा सकें कि यह कैसे होता है, तो मल प्रत्यारोपण की सफलता में सुधार कर सकते हैं और अल्जाइमर, मल्टीपल स्केलेरोसिस और अस्थमा जैसी सूक्ष्म जीवों से जुड़ी बीमारियों में भी इसका परीक्षण किया जा सकता है। उनके शोध के अनुसार, किसी भी व्यक्ति के मल में उसके अपने तरह के जीवाणु होते हैं जो लाभदायक साबित हो सकता है। उनका ये शोध फ्रंटियर्स इन सेलुलर एंड इन्फेक्शन माइक्रोबायोलॉजी में प्रकाशित हुआ है। जिसमें वे कहते हैं कि मल प्रत्यारोपण के नतीजों को देखें तो पॉटी दाता के मल में मौजूद अधिक तरह के जीवाणु बेहद अहम साबित होते हैं, और जिन मरीजों में मल प्रत्यारोपण सफल होता है; उनके शरीर में बेहतर और विविध माइक्रोबायोम भी विकसित होता है। 

लेकिन शोध से यह भी पता चलता है कि ऐसे किसी भी प्रत्यारोपण की सफलता इस बात पर  निर्भर करती है कि दाता और मरीज़ का मैच कितना बेहतर होता है। ये केवल पॉटी में मौजूद बैक्टिरीया पर निर्भर नहीं करता। वही आगे बताते हैं कि फ़िल्टर्ड पॉटी के प्रत्यारोपण के ज़रिए बार-बार दस्त होने के कुछ मामलों में अच्छे नतीजे भी मिले हैं। क्योंकि इन मरीज़ के मल में जीवित बैक्टीरिया निकल जाता था जबकि उसमें डीएनए और वायरस बरकरार रहते थे। ये वायरस प्रत्यारोपित किए गए बैक्टीरिया और अन्य जीवाणु के जीवित रहने और उनके मेटाबोलिक काम पर असर डाल सकते हैं।

# मल प्रत्यारोपण ईकाई में मदद करती हैं कन्सल्टेंट गैस्ट्रोएंट्रोलॉजिस्ट डॉक्टर जॉन लैंडी 

वहीं, डॉक्टर जॉन लैंडी, जो वेस्ट हर्टफोर्डशायर अस्पताल एनएसएच ट्रस्ट में एक कन्सल्टेंट गैस्ट्रोएंट्रोलॉजिस्ट हैं और मल प्रत्यारोपण ईकाई में मदद करती हैं, वो बताती हैं कि हम अब तक ये नहीं समझ पाये हैं कि आखिर कोई 'सुपर पू डोनर' बनता कैसे है, इसके पीछे की वजह क्या है। क्योंकि हम हमेशा यह सुनिश्चित करते हैं कि हमारे डोनर स्वस्थ रहें और उन्हें कोई बीमारी न हो, लेकिन हम उनके सभी सूक्ष्म जीवों (माइक्रोबायोम) का परीक्षण नहीं करते हैं कि वो कैसा है। इसलिए मुझे लगता है इस तरह की जांच भी की जानी चाहिए।

# छोटी और बड़ी आंत में सूजन हो जाता है क्लोस्ट्रीडियम डिफ्फिसिल से, मल प्रत्यारोपण इसका बेहतर उपाय: डॉ जूली मैक्डोनल्ड

वहीं, लंदन के इंपीरियल कॉलेज में माइक्रोबायोम की विशेषज्ञ डॉ जूली मैक्डोनल्ड, जो मल प्रत्यारोपण की सफलता दर को बढ़ाने के विषय पर अध्ययन कर रही हैं, का मानना है कि मौजूदा वक्त में, मल दान का अधिकतर इस्तेमाल क्लोस्ट्रीडियम डिफ्फिसिल नाम के पेट के संक्रमण की वजह से होने वाली ख़तरनाक स्थिति के इलाज के लिए किया जाता है। क्योंकि ये संक्रमण किसी मरीज़ के पेट पर तब कब्ज़ा कर लेता है जब एंटीबायोटिक खाने के कारण मरीज़ के पेट में मौजूद उसके अच्छे जीवाणु खत्म हो गए हों। कहने का तातपर्य यह कि कमज़ोर आंत वाले मरीज़ के लिए ये घातक हो सकता है।

हालांकि, डॉ जूली मैक्डोनल्ड के काम से यह भी इशारा मिलता है कि मल प्रत्यारोपण को किसी विशेष काम में लाया जा सकता है जैसे कि बीमारी के कारण खो गई चीज़ की पूर्ति करने के लिए। वो कहती हैं कि उनकी प्रयोगशाला में वे ये पता लगाने की कोशिश कर रही हैं कि प्रत्यारोपण कैसे काम करता है और कब हमें इस कदम को उठाना बंद करना चाहिए। उनके मुताबिक, मरीज़ को मल के इंजेक्शन देने के बजाय उनके लिए मल पर आधारित एक उपचार-व्यवस्था भी अपनाई जा सकती है, जिसे अपनाने में उन्हें बुरा नहीं लगेगा। वहीं, ऐसा करने से पॉटी दान के इर्दगिर्द बने वहम से छुटकारा मिलने में मदद होगी।

# दूसरों को अपनी पॉटी दान करने पर विचार करने के लिए प्रोत्साहित करना चाहती है क्लाउडिया

बता दें कि 31 वर्षीय क्लाउडिया कैंपेनेला ब्रिटेन की एक यूनिवर्सिटी में स्टूडेंट सपोर्ट एडमिनिस्ट्रेटर हैं और अपने खाली समय में एक पॉटी दानकर्ता भी हैं। वो बताती हैं कि उनके कुछ दोस्त सोचते हैं कि यह थोड़ा अज़ीब या घृणित है, लेकिन उन्हें इसकी चिंता नहीं है। इसे दान करना बेहद आसान है और वो केवल चल रहे मेडिकल रिसर्च में मदद करना चाहती हैं। उन्हें इसमें कुछ योगदान करने की खुशी है। उनके मुताबिक, उनकी पॉटी 'अच्छे बग' वाली है। इसलिए उनकी पॉटी (मल) किसी रोगी आंत में डाल कर उसका इलाज किया जाएगा। इस वजह से क्लाउडिया को पता है कि उनका दान कितना उपयोगी है और यही कारण है कि वे इसे दान करती हैं, लेकिन उनकी पॉटी इतनी ख़ास क्यों है? इस बारे में वैज्ञानिकों का मानना है कि कुछ लोगों की पॉटी में ऐसे बैक्टीरिया मौजूद होते हैं जिसकी मदद से किसी दूसरे व्यक्ति के रुग्ण आंत को ठीक किया जा सकता है।

क्लाउडिया आगे कहती हैं कि वो पॉटी डोनर बनना चाहती थीं क्योंकि उन्होंने पढ़ा था कि वेगन लोगों की पॉटी में  अच्छे बग हो सकते हैं। हालांकि ऐसा कोई सबूत नहीं है कि वेगन लोगों की पॉटी की क्वालिटी अन्य आहार लेने वालों की तुलना में बेहतर होती है, लेकिन विशेषज्ञ यह रिसर्च कर रहे हैं कि आखिर वो क्या चीज़ है जिससे पॉटी 'बढ़िया' के दर्जे में आती है। आगे वो चाहती हैं कि लोग इस बारे में अपनी निकृष्ट सोच बदलें और पॉटी डोनर या पू डोनर बनने के बारे में सोचें। क्योंकि इसे दान करना वाकई में बहुत आसान है और सरल भी। यदि आप इसके बारे में सोच रहे हैं तो आप अपने नज़दीकी अस्पताल से संपर्क कर सकते हैं। ऐसा करने पर अस्पताल आपको एक ख़ास डिब्बा देता है जिसमें आप अपना मल इकट्ठा कर सकते हैं। और जब आप काम पर निकलते हैं तो उस डिब्बा को अस्पताल में देते हुए निकल सकते हैं। इसके लिए बस आपको कुछ क़दम और चलने की मेहनत करनी होती है। इसलिए जनहित में इतना तो आप कर ही सकते हैं।

आपको पता होना चाहिए कि दूसरे के मल से आपका इलाज भी हो सकता है। इसलिए इसकी डिमांड भी बढ़ी है क्योंकि इससे आंत संबंधी बीमारियों का नया इलाज किया जा रहा है। यह डिजाइनर गट बैक्टीरिया बनाने के काम आता है, ताकि लोगों को पेट संबंधी बीमारियों से ठीक किया जा सके। इसलिए इस पूरी वैज्ञानिक और चिकित्सकीय मुहिम में समाज के प्रति संवेदनशील हर व्यक्ति को अपने हिस्से का योगदान देने को ततपर होना ही नहीं चाहिए, बल्कि वह दिखनी भी चाहिए।

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