वर्तमान और भविष्य की चुनौतियों से निपटने के लिए बहुमुखी वैश्विक संस्थाओं में सुधारों पर बल दें दुनिया के सभी सदस्य देश
वर्तमान और भविष्य की चुनौतियों से निपटने के लिए बहुमुखी वैश्विक संस्थाओं में सुधारों पर बल दें दुनिया के सभी सदस्य देश
@ कमलेश पांडेय/वरिष्ठ पत्रकार व स्तम्भकार
वर्तमान और भविष्य की चुनौतियों से निपटने के लिए दुनिया के सभी देशों को बहुमुखी वैश्विक संस्थाओं में सुधारों पर बल देना चाहिए। ताकि विभिन्न तरह की चुनौतियों से निपटने में दुनियावी देशों को सक्षम बनाया जा सके। यह बात प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने विश्व आर्थिक मंच के डावोस एजेंडा शिखर सम्मेलन में स्टेट ऑफ दी वर्ल्ड यानी विश्व की स्थिति विषय पर विशेष रूप से अपने विचार व्यक्त करते हुए कही है, जिसका सर्वकालिक महत्व है।
पीएम ने गत दिनों वीडियो कॉन्फ्रेंसिंग के माध्यम से जो गूढ़ बातें कही हैं, वो उनकी दूरदर्शिता का परिचायक है। उनके विचार सभी देशों के लिए उत्साहबर्द्धक हैं और विश्व में भारत के बढ़ते महत्व का भी द्योतक है। इसका आधुनिक विश्व व्यवस्था पर गहरा प्रभाव पड़ेगा। प्रधानमंत्री ने जो कुछ महत्वपूर्ण बातें कही हैं, उसके विभिन्न पहलुओं की चर्चा करना यहां जरूरी है, क्योंकि वे देश-दुनिया सभी के लिए प्रासंगिक और उपादेय हैं और रहेंगी भी।
पहला, भारत महामारी की एक और लहर का सावधानी और विश्वास के साथ मुकाबला कर रहा है तथा तमाम उम्मीद भरे नतीजों के साथ आर्थिक क्षेत्र में आगे बढ़ रहा है। भारत एक मजबूत लोकतंत्र है, जिसने मानवजाति को उम्मीदों का गुलदस्ता दिया है, जिसमें भारतीयों का लोकतंत्र, प्रौद्योगिकी में अटूट विश्वास निहित है तथा जो 21वीं शताब्दी और भारतीयों की प्रतिभा व मनोदशा को शक्ति सम्पन्न बना रहा है। कोरोना-काल के दौरान, भारत ने अपनी परिकल्पना ‘एक विश्व, एक स्वास्थ्य’ का पालन करते हुये जरूरी दवायें और वैक्सीनों की आपूर्ति करके कई जिंदगियां बचाईं। क्योंकि भारत आज दुनिया का तीसरा सबसे बड़ा फार्मा उत्पादक देश है, जिसे ‘विश्व की फार्मेसी’ के तौर पर जाना जाता है।
दूसरा, आज भारत दुनिया में रिकॉर्ड सॉफ्टवेयर इंजीनियर भेज रहा है। पचास लाख से ज्यादा सॉफ्टवेयर डेवलेपर्स भारत में काम कर रहे हैं। भारत के पास दुनिया में तीसरे नंबर के सबसे ज्यादा यूनीकॉर्न्स हैं। दस हजार से ज्यादा स्टार्ट-अप्स पिछले छह माह में पंजीकृत हुये हैं। आज भारत के पास विश्व का सबसे बड़ा, सुरक्षित और सफल डिजिटल भुगतान प्लेटफॉर्म है तथा सिर्फ पिछले महीने में ही यूनीफाइड पेमेन्ट इंटरफेस के जरिये 4.4 अरब लेन-देन हुये हैं।
तीसरा, भारत व्यापार सुगमता को बढ़ावा दे रहा है तथा सरकार के दखल को कम से कम कर रहा है। इसने कॉर्पोरेट टैक्स के दरों को सरल बनाकर, कम करके, उसे दुनिया में अत्यंत प्रतिस्पर्धी बना दिया है।
चतुर्थ, भारत में ड्रोन, स्पेस, भू-स्थानिक मानचित्रण जैसे नियंत्रण-मुक्त क्षेत्र हैं और भारत ने सूचना प्रौद्योगिकी तथा बीपीओ सेक्टर संबंधी पुराने दूरसंचार नियमों में सुधार किये हैं। बीते साल ही हमने 25 हजार से ज्यादा अनुपालनों को कम किया है।
पंचम, भागीदार के रूप में भारत के बढ़ते आकर्षण की वजह यह है कि भारत विश्व आपूर्ति श्रृंखला में दुनिया का भरोसेमंद साझीदार बनने के लिये प्रतिबद्ध है तथा कई देशों के साथ मुक्त व्यापार समझौतों की राह बना रहा है। उसकी नवोन्मेष, प्रौद्योगिकी को अपनाने की क्षमता और उद्यमशीलता की भावना उसे आदर्श विश्व साझीदार के योग्य बनाती है।
षष्टम, भारत में निवेश का यह सबसे अच्छा समय है। भारतीय युवाओं में आज उद्यमशीलता एक नई ऊंचाई पर है। 2014 में जहां भारत में कुछ सौ पंजीकृत स्टार्ट-अप थे, वहीं, आज इनकी संख्या 60 हजार के पार हो चुकी है। इनमें से 80 से ज्यादा यूनीकॉर्न्स हैं, जिनमें से 40 से ज्यादा तो 2021 में ही बने हैं।
सप्तम, भारत के आत्मविश्वास से भरे नजरिये को रेखांकित करते हुये उन्होंने ठीक ही कहा कि जब कोरोना-काल में दुनिया थोड़े-बहुत सुगम उपाय कर रही थी, उस समय भारत अपने सुधारों को मजबूत बना रहा था। भारत ने भौतिक और डिजिटल अवसंरचना में बड़े कदम उठाये हैं, जिनमें छह लाख गांवों में ऑप्टिकल फाइबर, संपर्कता सम्बंधी बुनियादी ढांचे में 1.3 ट्रिलियन डॉलर का निवेश, परिसम्पत्ति मौद्रीकरण तथा गतिशक्ति राष्ट्रीय मास्टर-प्लान के जरिये 80 अरब डॉलर जुटाने का लक्ष्य शामिल है, ताकि सामान, लोगों और सेवाओं की निर्बाध संपर्कता में नई ऊर्जा पैदा करने के लिये सभी हितधारकों को एकल प्लेटफार्म मिल सके।
अष्टम, आत्मनिर्भरता के रास्ते पर चलते हुये भारत का ध्यान सिर्फ प्रक्रियाओं को आसान बनाने पर ही नहीं है, बल्कि निवेश और उत्पादन को प्रोत्साहित करने पर भी है। उदाहरण यह कि आज 14 सेक्टरों में 26 अरब डॉलर की उत्पादन युक्त प्रोत्साहन योजना लागू की गई है। आज भारत वर्तमान के साथ ही अगले 25 वर्षों के लक्ष्य को लेकर नीतियां बना रहा है, निर्णय ले रहा है। इस कालखंड में भारत ने उच्च वृद्धि, कल्याण और आरोग्य को उच्चतम स्तर तक पहुंचाने का लक्ष्य रखा है। विकास का यह कालखंड हरित, स्वच्छ, सतत होने के साथ-साथ भरोसेमंद भी होगा।
नवम, आज की जीवनशैली और नीतियों का पारिस्थितिकी पर कितना असर पड़ता है। हमारी जीवनशैली भी जलवायु के लिये बड़ी चुनौती है। ‘प्रयोग करो और फेंक दो’ की संस्कृति और उपभोक्तावाद ने जलवायु चुनौतियों को और गंभीर बना दिया है। आज की ‘लो-बनाओ-इस्तेमाल करो-फेंक दो’ वाली अर्थव्यवस्था को तेजी से सतत अर्थव्यवस्था की तरफ बढ़ाना बहुत जरूरी है।
दशम, कॉप-26 सम्मेलन में प्रधानमंत्री ने मिशन लाइफ (एल.आई.एफ.ई.) पेश किया था, जिसका उल्लेख करते हुये उन्होंने ठीक ही कहा कि लाइफ जैसी जनभागीदारी के अभियान को पी-3, यानी ‘प्रो प्लैनेट पीपुल’ का एक बड़ा आधार भी बना सकते हैं। लाइफ, यानी ‘लाइफ फॉर एनवॉयरेनमेंट’ हर स्थिति में ग्राह्य और सतत जीवनशैली की परिकल्पना है, जो जलवायु सम्बंधी भावी संकटों और अप्रत्याशित चुनौतियों से निपटने के लिये उपयोगी हो सकती है। उन्होंने लक्ष्य की निर्धारित अवधि के काफी पहले ही भारत द्वारा जलवायु लक्ष्य को प्राप्त करने के प्रभावशाली रिकॉर्ड के बारे में भी मंच को अवगत कराया।
ग्यारह, प्रधानमंत्री ने विश्व व्यवस्था की बदलती वास्तविकताओं के अनुसार खुद को ढालने की जरूरत पर भी बल दिया और कहा कि बदलती विश्व व्यवस्था में विश्व परिवार नई चुनौतियों का सामना कर रहा है। जिसका मुकाबला करने के लिये हर देश और हर वैश्विक एजेंसी द्वारा सामूहिक और समकालिक कार्रवाई करने का आह्वान किया।
बारह, पीएम ने ठीक ही कहा कि आपूर्ति श्रृंखला में रुकावट, मुद्रास्फीति और जलवायु परिवर्तन आदि इन्हीं के उदाहरण हैं। उन्होंने क्रिप्टो-करेंसी का भी उदाहरण दिया और कहा कि जिस तरह की प्रौद्योगिकी इससे जुड़ी है, उसमें किसी एक देश द्वारा लिये गये फैसले, इसकी चुनौतियों से निपटने में अपर्याप्त होंगे।
निष्कर्षतः यह कहा जा सकता है कि प्रधानमंत्री ने समय से पहले ही हमें समझाने की एक सफल कोशिश की है कि हमें एक समान सोच रखनी होगी। इसलिए उन्होंने समसामयिक सवाल उठाया है कि क्या आज वैश्विक परिदृश्य को देखते हुये बहुमुखी संगठन, नई विश्व व्यवस्था और नई चुनौतियों से निपटने के लिये तैयार है? क्योंकि जब ये संस्थायें बनी थीं, तो स्थितियां कुछ और थीं और आज की परिस्थितियां कुछ और हैं। इसलिए हर लोकतांत्रिक देश का यह दायित्व है कि वह बहुमुखी संस्थाओं में सुधारों पर बल दे, ताकि उन्हें वर्तमान और भविष्य की चुनौतियों से निपटने में सक्षम बनाया जा सके।
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