गाजियाबाद के पंजाबी समाज को अपने नेताओं के लिए चाहिए समुचित टिकट
गाजियाबाद के पंजाबी समाज को अपने नेताओं के लिए चाहिए समुचित टिकट
# अन्यथा करेंगे अपनी उपेक्षा करने वालों के खिलाफ बगावत, किया ऐलान
कमलेश पांडेय/विशेष संवाददाता
गाजियाबाद। उत्तरप्रदेश में विधानसभा चुनाव 2022 की डुगडुगी चुनाव आयोग ने बजा दी है। इसलिए सत्ताधारी भाजपा एवं प्रमुख विपक्षी दल सपा के अलावा कांग्रेस, बसपा, आप आदि दलों व उनके नेतृत्व वाले गठबंधनों के द्वारा अपने-अपने उम्मीदवारों की सूची को अंतिम रूप दिया जा रहा है। जिसपर गाजियाबाद के पंजाबी समाज की नजरें भी गड़ी हुई हैं। क्योंकि आजादी के बाद हुए तीन विधानसभा चुनावों में गाजियाबाद विधानसभा सीट पर
पंजाबी समाज से आने वाले कद्दावर कांग्रेस नेता सरदार तेजा सिंह का कब्जा हुआ करता था। इस नाते वो गाजियाबाद के पहले विधायक माने जाते हैं। लेकिन चौथे विधानसभा चुनाव में उन्हें गाजियाबाद विधानसभा सीट की बजाय पड़ोसी मुरादनगर विधानसभा सीट से लड़ाने की पार्टी की रणनीति विफल रही और वे चुनाव हार गए। इसके बाद से गाजियाबाद व आसपास की विधानसभा सीटों पर पंजाबी समाज के किसी भी नेता को बतौर विधायक, प्रतिनिधित्व करने का मौका नहीं मिला। उस भाजपा के स्वर्ण काल में भी जिसे सिंधियों और पंजाबियों की पार्टी करार दिया जाता रहा है।
आप यह जानकर हैरत में पड़ जायेंगे कि जब सरदार तेजा सिंह गाजियाबाद के विधायक हुआ करते थे तो उनके समाज के मात्र 50 परिवार हुआ करते थे। लेकिन अपने राजनीतिक कौशल के बल पर वो सर्व समाज का सहयोग हासिल करते रहे और लगातार तीन बार यहां से विधायक बने। बताया जाता है कि उनकी लोकप्रियता से घबराकर उनकी ही पार्टी के रणनीतिकारों ने साल 1967 में हुए चौथे विधानसभा चुनाव में गाजियाबाद विधानसभा सीट से उनका टिकट काटकर उन्हें मुरादनगर विधानसभा सीट से टिकट दे दिया गया, जहां नया उम्मीदवार होने के कारण वो पर्याप्त जनसमर्थन नहीं जुटा पाए और चुनाव हार गए। उसके बाद पंजाबी समाज के नेताओं को कभी भी गाजियाबाद सीट पर अपना सियासी सिक्का जमाने का मौका नहीं मिला, जिसकी कसक आज भी इस समाज के नेताओं और कार्यकर्ताओं में महसूस की जाती है। यह बात राष्ट्रीय हिंदी दैनिक "हिन्द आत्मा" द्वारा किये गए एक सामाजिक सर्वे में प्रकट होकर सामने आई है।
पंजाबी समाज के कर्णधारों का कहना है कि पिछले कई चुनावों से वो लोकसभा सीट, विधानसभा सीट और त्रिस्तरीय पंचायती राज चुनावों वाली सीट पर अपने समाज को समुचित प्रतिनिधित्व देने की वकालत विभिन्न पार्टियों के रणनीतिकारों के समक्ष कर रहे हैं, लेकिन अभी तक हमारे अरमानों को पंख नहीं लगने दिये गए हैं। इससे गाजियाबाद का पंजाबी समाज चिंतित है और "हिन्द आत्मा" द्वारा यह पूछे जाने पर कि यदि किसी भी दल ने पंजाबी समाज को टिकट नहीं दिया तो आगे क्या होगा? पंजाबी समाज का रुख किधर होगा? क्योंकि इस समाज के गाजियाबाद विधानसभा क्षेत्र के लगभग 50 हजार पंजाबी वोटर, साहिबाबाद विधानसभा क्षेत्र के लगभग 60 हजार पंजाबी वोटर, मुरादनगर विधानसभा क्षेत्र के लगभग 40 हजार वोटर, मोदीनगर विधानसभा क्षेत्र के लगभग 25 हजार वोटर और लोनी विधानसभा क्षेत्र के लगभग 15 हजार वोटर यदि चाह लें, और पंजाबी समाज की उपेक्षा की गांठ मन में बांध लें तो किसी भी दल के सियासी अरमानों पर तो पानी फेर ही सकते हैं। न केवल विधानसभा चुनाव में, बल्कि लोकसभा चुनाव में भी। क्योंकि गाजियाबाद के तीन विधानसभा क्षेत्रों यथा गाजियाबाद, साहिबाबाद और मुरादनगर में पंजाबी समाज के वोटर बहुतायत में हैं, जबकि गाजियाबाद लोकसभा सीट पर भी लगभग 2 लाख वोट के दम पर किसी भी राजनेता व उनके दल की किस्मत बनाने या बिगाड़ने की हैसियत रखते हैं।
पंजाबी समाज पर किये गए सर्वे में यह बात खुलकर सामने आई कि इतना मजबूत वोट बैंक लिए बैठे पंजाबी समाज पर यदि राजनीतिक पार्टियां गौर नहीं करेंगी तो इस समाज के नेताओं की उपेक्षा निकट भविष्य में उनपर भारी पड़ सकती है। इस कारोबारी और उद्यमी समाज के लिए पहली उम्मीद की किरण तो बीजेपी ही है और इस पार्टी के स्वनामधन्य नेताओं यथा दर्जा प्राप्त मंत्री बलदेव राज शर्मा, क्षेत्रीय उपाध्यक्ष अशोक मोंगा, जगदीश साधना, निगम पार्षद डॉक्टर एस पी सिंह आदि नेताओं जिन्होंने भाजपा को अपनी जिंदगी के लगभग 40-50 साल दिए, उन्हें गाजियाबाद शहर विधानसभा सीट या मुरादनगर विधानसभा सीट या फिर साहिबाबाद विधानसभा सीट, यानी उक्त तीनों विधानसभा सीटों में से कहीं से भी उन्हें टिकट दिया जा सकता है, ताकि अरसे से उपेक्षित पंजाबी समाज के नेतृत्व को यहां भी आगे बढ़ने का मौका मिले। क्योंकि गाजियाबाद विधानसभा सीट तो उनकी परम्परागत सीट समझी जाती है भूतपूर्व विधायक सरदार तेजा सिंह के गाजियाबाद के प्रथम विधायक होने के नाते। लेकिन इस बार भी यदि पंजाबी समाज की भावनाओं की यदि उपेक्षा हुई तो सियासी अंजाम कुछ और भी हो सकता है। क्योंकि किसान आंदोलन की सफलता में पंजाबी समुदाय की जो अहम भूमिका रही है और कांग्रेस, समाजवादी पार्टी और राष्ट्रीय लोकदल के प्रति इस समाज में जो सहानुभूति पैदा हुई है, वह यदि वोट में तब्दील हो गई तो न केवल गाजियाबाद में बल्कि पश्चिमी उत्तरप्रदेश में भी भाजपा को भारी कीमत चुकानी पड़ सकती है।
सर्वे में यह बात भी सामने आई कि गाजियाबाद में पंजाबी समाज के जो विभिन्न संगठन है, वो समाज हित के लिए पिछले पांच दशक से समाज को जोड़ने का काम कर रहे हैं। चाहे परिचय सम्मेलन हो या बैसाखी का त्यौहार मनाने की बात हो, चाहे लोहड़ी मनाने की बात हो या फिर धर्म गुरुओं के गुरु पर्व को मनाने की बात हो, पंजाबी समाज के ये सारे संगठन सभी राजनीतिक दलों के नुमाइंदों को बुलाकर अपने मंच पर पिछले पांच दशक से सम्मान देते आए हैं। लेकिन जब पंजाबी समाज के नेताओं को चुनावी मौकों पर जब टिकट प्रदान करते हुए सम्मान देने की बारी आती है तो राजनीतिक दल काफी कंजूसी क्यों दिखाते हैं, यह सोचनीय सवाल है।
इस समाज के लोगों ने हमें बताया कि किसी भी दल ने गाजियाबाद में किसी भी पंजाबी समाज के व्यक्ति को न तो विधान परिषद में भेजने के बारे में सोचा और न ही राज्यसभा में भेजने के बारे में सोचा, आखिर हमारे साथ ऐसा दोयम दर्जे का व्यवहार क्यों, जबकि गाजियाबाद में हमारे पास मजबूत जनाधार है।
लोग बताते हैं कि पंजाबी समाज के लोग अपने यहां होने वाले विभिन्न तरह के सामाजिक कार्यक्रमों में हर किसी जाति, धर्म, क्षेत्र, भाषा के लोगों को बुलाते हैं और किसी भी जाति या धर्म पर फोकस नहीं करते हैं। उसी तरह सभी जाति, धर्म, क्षेत्र व भाषा के लोग अपने यहां यदि कार्यक्रम करते हैं और पंजाबी समाज के लोगों को बुलाते हैं तो इस समाज के लोग सभी लोगों के कार्यक्रम में जाते हैं। यही नहीं, पिछले 5-6 दशकों से चाहे जो भी व्यक्ति या दल चुनाव लड़ता है तो उसको पंजाबी समाज तन-मन-धन से सहयोग करता है। लेकिन जब पंजाबी समाज के लोगों को सियासत में आगे बढ़ाने की बात होती है तो सभी दलों को सांप सूंघ जाता है। पंजाबी समाज के लोगों ने बताया कि सांसद और विधायक बनाने की बात तो छोड़िए, गाजियाबाद नगर निगम में सत्तारूढ़ पार्टी जो नॉमिनेटेड पार्षद बनाती है, उनमें भी एकाध दफा की बात को छोड़ दिया जाए तो इन नॉमिनेटेड पार्षदों में भी गिनती की भागीदारी पंजाबी समाज नहीं ले पाता है, जो चिंता की बात है।
इन्हीं ढेर सारे सवालों से जुड़े किंतु परन्तु को स्पष्ट करने के लिए जब हमने इस बारे में इंद्रजीत सिंह टीटू से बातचीत करने की कोशिश की तो उन्होंने भी अपनी व्यथा कथा साझा की। इंद्रजीत सिंह टीटू गाजियाबाद के पंजाबी समाज में किसी परिचय के मोहताज नहीं हैं। वो गुरुद्वारा श्री गुरु सिंह सभा गाजियाबाद के प्रधान हैं और कई धार्मिक व सामाजिक संगठनों से जुड़े हैं। प्रादेशिक व्यापार मंडल में भी वो प्रदेश उपाध्यक्ष हैं। शहर के जितने भी बड़े आयोजन होते हैं, चाहे वो सरकारी हों या व्यापारी समाज के और किसी भी जाति, धर्म, क्षेत्र व भाषा के, उसमें इंद्रजीत सिंह टीटू की उपस्थिति अवश्य देखने को मिलती है। यही वजह है कि उनसे ही हमने पंजाबी समाज के बारे में उनके ही लोगों के दिल में उमड़ घुमड़ रहे सवालों की वस्तुस्थिति जानने के लिए खुलकर बात की तो वह सवाल को सुनकर ही भावुक हो उठे। उन्होंने कहा कि मेरे को खुद को 28 साल राजनीति में सामाजिक सेवा करते हो गए। विभिन्न दलों में मुझे सेवा करने का मौका मिला है। मेरे जैसे और भी पंजाबी समाज के साथी हैं, जो अन्य दलों में अपनी सेवाएं दे रहे हैं, लेकिन किसी को राजनीतिक मुकाम मिलता दिख नहीं रहा है। इस बारे में उनका दर्द भरे अंदाज में कहना है कि पंजाबी समाज जब तक औरों से सहयोग करता रहता है तब तक यह समाज बहुत प्यारा और अच्छा लगता है। लेकिन यही पंजाबी समाज जब अपने नेताओं के लिए टिकट की बात करता है तो उसे दुश्मन की निगाह से देखा जाता है। मुझे भी कभी कभी समझ नहीं आता कि इसको हम अपनी शराफत समझें या कमजोरी। क्योंकि कोई भी प्रतिनिधि चुनावी टिकट मिलने के बाद माथा टेकने अपने नजदीकी गुरुद्वारा या सुप्रसिद्ध गुरुद्वारे पर जरूर जाता है, वो गुरु घर में आस्था भी रखते हैं, लेकिन पंजाबी समाज को टिकट देने में सहयोग करने में पीछे रहते हैं। आखिर पंजाबी समाज की ऐसी दुर्दशा क्यों? क्योंकि आने वाली नई पीढ़ी हमको माफ नहीं करेगी और ना ही अपनी पीढ़ी को हम जवाब देने लायक रहे कि हम उनको विरासत में क्या देने जा रहे हैं। उन्होंने सगर्व कहा कि गुरु साहब ने भी दो कृपाण धारण किये थे। एक जुल्म के विरुद्ध लड़ने के लिए और दूसरा राजयोग के लिए। उन्हें ही आदर्श मानकर राजनीति में अपना हक मांगना कोई बुरी बात नहीं है।
एक अन्य सवाल कि यदि गाजियाबाद की तीन विधानसभा सीटों, जहां पंजाबी समाज बहुतायत में है, में से किसी भी विधानसभा सीट पर किसी भी दल से आपके समाज के लोगों को टिकट नहीं मिलता है तो पंजाबी समाज का क्या रुख रहेगा? इस सवाल का जवाब देते हुए इंद्रजीत सिंह टीटू ने बताया कि इस बारे में तो पंजाबी समाज को जो बुजुर्ग लोग हैं, निर्णय तो वह लेंगे कि अब हमको क्या करना है। जहां तक मेरी निजी राय है, वह यह है कि अगर हमें समाज में जिंदा रहना है तो अपने वोट बैंक की अहमियत का अहसास कराना होगा। क्योंकि पिछले पांच दशक से हमने जो सहयोग किया है, उसके बाद भी सहयोग न मिलने पर मिलजुककर कठोर निर्णय लेना पड़ेगा। अन्यथा आने वाली पीढ़ी हमें माफ नहीं करेगी। यह कड़वा सच है कि हर एक राजनीतिक दल अपने मंच पर गुलदस्ते का कोरम पूरा करने के लिए एक सिख को जरूर बैठाता है पर संवैधानिक पद पर नवाजने से परहेज करता है। इससे पंजाबी समाज का अहित हो रहा है। इसे हमलोग मिलजुलकर ही बदलेंगे। गाजियाबाद में अपने गौरवशाली इतिहास को दुहराए बगैर हमलोग अब चैन से नहीं बैठेंगे, बस मीडिया हमारा साथ देता रहे और हमारी बात हमारे लोगों तक पहुंचाता रहे। क्योंकि अखबार में छपी बातों पर लोग ज्यादा विश्वास करते हैं।
उन्होंने आगे बताया कि जब भी कभी देश पर आपदा आई है तो पंजाबी समाज सबसे पहले अगली पंक्ति में खड़ा दिखाई दिया है। अभी हाल ही में पिछले वर्ष आई कोरोना की बीमारी की दूसरी लहर में पूरे देश में एक मिसाल बन पंजाबी समाज ने इंदिरापुरम गुरुद्वारे में फ़्री आक्सीजन उपलब्ध कराई, जिससे हजारों लाखों लोगों की जान बचाई जा सकी। उसी प्रकार गुरुद्वारा श्री सिंह सभा एवं सी ब्लॉक गुरुद्वारे ने छोटे आक्सीजन सिलेंडर उपलब्ध कराए। वहीं, सबसे बड़ी रसोई चलाकार लगातार 100 दिनों तक लंगर चलाकार लाखों की संख्या में खाने के पैकेट वितरित किये और मानवता की मिसाल पेश की। कोविड वैक्सिनेशन के मामले में भी पंजाबी समाज अग्रणी पंक्ति में खड़ा दिखाई दिया और विभिन्न गुरुद्वारों में लाखों की संख्या में लोगों को वैक्सीन लगवाई। भविष्य में भी पंजाबी समाज जिस लायक है अग्रणी पंक्ति में खड़ा मिलेगा।
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