बिखरते भारतीय समाज को एक सूत्र में पिरोने के लिए आज भी प्रासंगिक हैं पूर्व राज्यसभा सांसद मामा बालेश्वर दयाल के प्रगतिशील विचार
बिखरते भारतीय समाज को एक सूत्र में पिरोने के लिए आज भी प्रासंगिक हैं पूर्व राज्यसभा सांसद मामा बालेश्वर दयाल के प्रगतिशील विचार
@ कमलेश पांडेय/वरिष्ठ पत्रकार व स्तम्भकार
बामनिया आश्रम के संस्थापक, महान समाजवादी नेता और आदिवासियों के 'गाँधी मामा' पूर्व राज्यसभा सदस्य बालेश्वर दयाल उन गिने चुने महान समाजवादियों में शुमार किये जाते हैं, जिनका गहरा नाता स्वतंत्र भारत के दिग्गज समाजवादी नेताओं से रहा है। अपने उर्वर विचार और दूरदर्शी सोच के लिए वो आज भी भारतीय समाज के लिए प्रासंगिक हैं।
क्योंकि सामाजिक परिस्थितियां कमोबेश वही हैं, बस उनके नेतृत्व के सोचने और विचारने का तौर तरीका बदल गया है। इसलिए उनका विराट व्यक्तित्व आज भी बिखरते जा रहे भारतीय समाज को एक सूत्र में पिरोने के काम आ सकता है और उनके समाजवादी दर्शन से समकालीन अंधकारमय सामाजिक परिवेश को पुनः आलोकित किया जा सकता है।
आपको पता होना चाहिए कि धर्मांतरण को रोकने के लिए तत्कालीन परिस्थितियों में उन्होंने जिस तरह से हिंदुत्व के प्रतीक जनेऊ का सहारा लिया और शंकराचार्य से सहमति लेकर आदिवासियों को धारण करवाया, वैसा रोल मॉडल अपनाने से पहले आज के समाजवादियों को सौ बार अपने गिरेबान में झांककर देखना होगा और इस डर से उबरना होगा कि उनका अल्पसंख्यक मत छींटक जाएगा।
यह बात तो महज बानगी भर है उनको अभिव्यक्त करने की, लेकिन उनकी सामाजिक और समाजवादी सोच इतनी विराट रही है कि उसे शब्दों में गूंथा नहीं जा सकता, बल्कि व्यवहार में ही प्रदर्शित किया जा सकता है। क्योंकि मन, वचन और कर्म से उन्होंने मानवतावाद को प्रोत्साहित किया, जिसे राजनैतिक भाषा में समाजवाद करार दिया जाता है।
एक खास बात और, बिहार की सत्तारूढ़ पार्टी जनता दल यूनाइटेड (जदयू) का चुनाव चिन्ह तीर का निशान भी इन्हीं की उर्वर सियासी सोच का नतीजा है। इस नजरिए से वह न केवल समाजवादी सियासत बल्कि खुद जदयू के लिए भी बड़े अहम हैं। अपने इस कर्तृत्व से वो कालजयी हो गए।
युवा जदयू के राष्ट्रीय अध्यक्ष संजय कुमार बताते हैं कि "मामा बालेश्वर दयाल न सिर्फ समाजवादी आंदोलन के अगुआ थे, बल्कि वर्तमान चुनाव चिह्न तीर का सुझाव भी उन्होंने ही दिया था। आदिवासी बहुल बांसवाड़ा में भीलों के उत्थान में लगे मामा बालेश्वर दयाल ने भीलों के तीर को ही जदयू का चिह्न बनाने का सुझाव दिया। उनके सुझाव को मानते हुए जदयू ने तीर को अपना पार्टी चिह्न के रूप में अपना लिया।"
बताते चलें कि मामा बालेश्वर दयाल का जन्म उत्तर प्रदेश के इटावा जिले में 1905 में स्वतंत्रता सेनानी व गांधीवादी कार्यकर्ता शिवशंकर लाल के घर में हुआ था। हालांकि सामाजिक सेवा में गहरी अभिरुचि होने के कारण वह उत्तरप्रदेश से मध्यप्रदेश आ गये और वर्ष 1937 में उन्होंने झाबुआ जिले में ‘बामनिया आश्रम’ की नींव रखी। इसी साल यहां भीषण अकाल पड़ने पर ईसाई मिशनरी भी राहत कार्य में योगदान देने के लिए आई। तब उन्होंने देखा कि ईसाई मिशनरियों की रुचि सेवा में कम और धर्मांतरण में ज्यादा है।
इसके बाद मामा बालेश्वर दयाल ने पुरी के शंकराचार्य की सहमति से भीलों को क्रॉस के बदले जनेऊ दिलाना शुरू किया। ततपश्चात उन्होंने भील जाति की कुरीतियों के खिलाफ अभियान खड़ा किया। मामा बालेश्वर दयाल ने आश्रम से प्रकाशित होनेवाली पत्रिका ‘गोबर’ का भी संपादन किया है। बाद में वह राजस्थान में बांसवाड़ा और डुंगुरपुर जिलों में भीलों के उत्थान के लिए अपनी कर्मभूमि बना डाली।
मामा बालेश्वर दयाल आर्य समाज और सोशलिस्ट पार्टी से भी जुड़े रहे। उनके आश्रम में सभी लोगों का आना-जाना होता था। यहां आनेवाले लोगों में सुभाषचंद्र बोस और आचार्य नरेंद्र देव जैसे लोग भी शामिल थे। इनके अलावा भी कई राजनीतिज्ञ इनके आश्रम में आते जाते रहते थे। ऐसे राजनेताओं में जयप्रकाश नारायण, डॉ राममनोहर लोहिया, चौधरी चरणसिंह, जार्ज फर्नांडीस जैसे नेता प्रमुख समाजवादी नेता अग्रगण्य थे।
समझा जाता है कि समाजवादी विचारधारा के बालेश्वर दयाल द्वारा भीलों के लिए किये गये उनके कार्यों के कारण ही वह समाजवादियों के वोटबैंक के रूप में स्थापित हो गये। वर्ष 1973 में वह अखिल भारतीय संयुक्त समाजवादी पार्टी के अध्यक्ष बने। बाद में वह मध्य प्रदेश से 1977 और 1984 के बीच राज्यसभा में सदस्य चुने गये। वर्ष 26 दिसंबर, 1998 को आश्रम में उनका देहावसान हो जाने के बाद वहीं उनकी समाधि बना कर प्रतिमा स्थापित की गयी।
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