यूपी को गुर्जर मुख्यमंत्री देने में आखिर हर्ज क्या है, किसे है, कबतक है?





यूपी को गुर्जर मुख्यमंत्री देने में आखिर हर्ज क्या है, किसे है, कबतक है?

@ कमलेश पांडेय, वरिष्ठ पत्रकार व स्तम्भकार

भारतीय लोकतंत्र में सत्ता बहुमत वालों को ही नसीब होती है। इस बहुमत की प्राप्ति के लिए सियासी दल पहले समीकरण बनाते हैं, और जब उसकी सफलता में कोई कोर कसर रह जाती है तो वह चुनाव पूर्व या चुनाव बाद गठबंधन बनाते हैं, और हर हाल में 'सत्ता कुमारी' का वरण करने को व्याकुल रहते हैं! येन केन प्रकारेण सत्ता जब नहीं मिलती तो उनकी दशा बिना पानी के मछली वाली होकर रह जाती है। यानी कि खुद को सुरक्षित रखने के लिए वो भी सियासी कीचड़ में छिप जाते हैं और सत्ता रूपी पंचवर्षीय चुनावी बारिश का बेसब्री पूर्वक इंतजार करते रहते हैं। कभी कभी इसमें एक दशक या उससे अधिक वक्त भी लग जाते हैं।

उत्तरप्रदेश (यूपी) में भी गठबंधन सरकारों या सियासी  समीकरणों का बोलबाला रहता आया है। मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ के नेतृत्व में भाजपा नीत राष्ट्रीय जनतांत्रिक गठबंधन (एनडीए) यहां सत्ता में है। वहीं, कांग्रेस नीत संयुक्त प्रगतिशील गठबंधन (यूपीए) उनसे सत्ता छिनने को आतुर है। 
वहीं, समाजवादी पार्टी के नेता व पूर्व मुख्यमंत्री अखिलेश यादव बिहार के तर्ज पर ही माई समीकरण नीत महागठबंधन बना कर सत्ता हासिल करने की सोच रहे हैं, भले ही वहां की तरह वह अस्थायी ही क्यों न हो! जबकि दम समीकरण यानी दलित मुस्लिम समीकरण की प्रबल पैरोकार बसपा सुप्रीमो सुश्री मायावती पशोपेश में पड़कर भीतर ही भीतर अपनी सियासत को शान चढ़ा रही है। हालांकि, इस दम समीकरण के जनक भी बिहार के दलित नेता व पूर्व केंद्रीय मंत्री रामविलास पासवान थे।

यह बात ठीक है कि यूपी में अभी साम्प्रदायिक समीकरण का बोलबाला है। लेकिन जातीय समीकरण को झुठलाने का माद्दा बीजेपी व कांग्रेस के अलावा किसी अन्य पार्टी में यहां नहीं है। आगे भी इसकी उम्मीद कम है। एक वक्त वह भी रहा जब समाजवादी नेताओं ने सूबे को 'अजगर समीकरण' दिया और फिर 'माई समीकरण' में सिमट कर रह गए। अजगर यानी अहीर (यादव), जाट, गुजर, राजपूत जातियों का समीकरण। और माई यानी मुस्लिम व यादव जाति का समीकरण। दम यानी दलित मुस्लिम समीकरण भी एक अहम समीकरण है, लेकिन अभी इसके बल पर कोई नेता सत्ता में नहीं पहुंचा है।

यूपी में अजगर और माई दोनों समीकरण वक्त की कसौटी पर सफल रहा है। लेकिन आज इनकी आपसी प्रतिस्पर्धा से कोई दूसरा समीकरण यानी दम समीकरण भी यहां हावी हो सकता है। कहना न होगा कि अजगर समीकरण के बूते ही चौधरी चरण सिंह यूपी में मुख्यमंत्री से लेकर भारत के प्रधानमंत्री तक बने। वहीं, मुस्लिम यादव समीकरण के ही बल पर मुलायम सिंह यादव यूपी के मुख्यमंत्री बने और देश के प्रधानमंत्री बनते बनते रह गए। वहीं, राष्ट्रवादी व सम्प्रदायवादी सियासी छौंक लगाते हुए योगी आदित्यनाथ यूपी के मुख्यमंत्री बन गए और निकट भविष्य में प्रधानमंत्री भी बनने के आसार प्रबल हैं, यानी 2024 या 2029 तक।

बता दें कि अजगर समीकरण कांग्रेस की ब्राह्मण प्रभुत्व वाले सवर्ण, दलित और अल्पसंख्यक गठजोड़ को तोड़ने के लिए बनाया गया, जो समय की कसौटी पर शत प्रतिशत खरा उतरा। इस समीकरण ने बसपा की पूर्व मुख्यमंत्री सुश्री मायावती के दम समीकरण यानि दलित-मुस्लिम गठजोड़ को भी बेदम कर रखा है। हालांकि, वक्त वक्त पर कांग्रेस की तुष्टीकरण की नीति और बीजेपी के कथित राष्ट्रवाद की चक्की में ये समीकरण पिसते यानी बनते बिगड़ते रहे हैं। 

बताया जा रहा है कि बीजेपी यदि हरियाणा में एक कद्दावर जाट नेता पैदा कर लेती और उन्हें वहां का मुख्यमंत्री बना देती, तो वही नेता यूपी में राकेश टिकैत जैसे राष्ट्रीय कद वाले दूसरे जाट किसान नेता को कतई पैदा नहीं होने देता! सारा साम, दाम, दंड व भेद की नीति अपनाकर उनका उभार रोक सकता था। लेकिन बीजेपी यहां चूक गई।आपको याद होगा कि यूपी के चौधरी चरण सिंह के बाद ही हरियाणा में चौधरी देवीलाल को खिलने और पहले मुख्यमंत्री, फिर उपप्रधानमंत्री तक बनने का मौका मिला। 

इसलिए राजनीति का तकाजा कहता है कि यूपी में अब गुर्जर मुख्यमंत्री जो दल देगा, वही सियासत की अगली बाजी पलट देगा। क्योंकि अजगर समीकरण में शामिल सभी जातियों को मुख्यमंत्री बनकर यूपी को हांकने का मौका मिल चुका है, जबकि गुर्जर जाति अभी तक इस मौके से वंचित रखी गई है।

इस बात में कोई दो राय नहीं कि यूपी में पूरब से पश्चिम तक अजगर समीकरण का सिक्का चलता है। यूपी की सत्ता से ब्राह्मणों को बेदखल करने वाला यह सफल समीकरण साबित हुआ है। जाट नेता और पूर्व प्रधानमंत्री चौ. चरण सिंह इस समीकरण के जनक थे। देखा जाए तो यूपी में अहीर (यादव) और जाट बतौर मुख्यमंत्री सत्ता सुख भोग चुके हैं। मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ जैसे राजपूत मुख्यमंत्री अभी सत्ता पर काबिज हैं। इसलिए गूजरों को एक बार मुख्यमंत्री का ताज मिलना चाहिए, ताकि अजगर समीकरण में शामिल सभी जातियों को यूपी में मुख्यमंत्री बनने का मौका मिल जाये। अजगर समीकरण का जनाधार इतना व्यापक है कि माई और दम समीकरण यदि मिल भी जाएं तो अजगर समीकरण का बाल बांका भी नहीं कर सकते। लेकिन आपसी फूट के चलते अजगर समीकरण भी कभी कभी निष्प्रभावी प्रतीत होने लगता है।

हालांकि, अजगर समीकरण की एक बिडम्बना यह भी रही है कि इसमें शामिल जातियों के महत्वाकांक्षी नेता अपनी जाति को सत्ता में लाने के लिए सहयोगी जातियों के नेताओं के पैर खींचने की भरपूर कोशिश करते हैं। पहले जाट नेता चौधरी चरण सिंह, यादव नेता मुलायम सिंह यादव और क्षत्रिय नेता योगी आदित्यनाथ की सियासी शैली व समीकरण से इस बात की पोल खुलती है। इसलिए वक्त का तकाजा है कि इस समीकरण को प्रासंगिक बनाये रखने के लिए अहीर, जाट और क्षत्रिय नेता अपना बड़ा दिल दिखाएं और अबकी बार किसी मजबूत गूजर नेता को मुख्यमंत्री बनाएं, ताकि गुर्जर सम्राट मिहिर भोज के वंशजों को भी सफल सियासी पारी खेलने का मौका मिलेगा। पढ़ो और अब तो जागो गुर्जर समाज...!





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