काश! डीएम साहब 'समाजसेवियों' के इतिहास-भूगोल पर भी नजर दौड़ाते

काश! डीएम साहब 'समाजसेवियों' के इतिहास-भूगोल पर भी नजर दौड़ाते

@ राजपथ/अशोक कौशिक, संपादक, हिन्द आत्मा दैनिक

भारत के उत्तरप्रदेश राज्य अंतर्गत गाजियाबाद के टीएचए अंतर्गत वसुंधरा सेक्टर 15 और 17 में मुख्य रोड के किनारे स्थित ग्रीन बेल्ट को क्षति पहुंचाकर वहां लगाई जाने वाली फुटपाथी दुकानों को  हटाने को लेकर स्थानीय आरडब्ल्यूए द्वारा चलाए गए अभियानों की प्रारंभिक सफलता और मौजूदा हश्र सबके सामने है। यानी कि जिन दुकानों को हटाने के लिए तमाम तरह के पापड़ बेले गए, अब 'माहवारी' बंध जाने के बाद किसी को भी ग्रीन बेल्ट की और वहां पर नगर निगम द्वारा  कराई गई कंटीले तारों की फैंसिंग व पौधों को नष्ट किये जाने की सुधि किसी को नहीं है, जबकि उक्त आंदोलन के समय आरडब्ल्यूए द्वारा की गई तरह तरह की आदर्शवादी बातों को तब के अखबारों ने प्रमुखता से प्रकाशित किया था।

यह बात आज मैं इसलिए उठा रहा हूँ कि स्थानीय  समाजसेवियों और वसुंधरा के विभिन्न आरडब्ल्यूए के सदस्यों का एक प्रतिनिधिमंडल जिलाधिकारी गाजियाबाद राकेश कुमार सिंह से उनके कार्यालय कक्ष में मिला और उन्हें नगर निगम द्वारा ग्रीन बेल्ट उजाड़ कर, पेड़ उखाड़ कर जमीन पर सीमेंटेड टाइल लगाकर लोहे की दुकानें रखने और उन्हें अवैध तरीके से बेचने से रोकने की मांग की। साथ ही निवेदन किया कि ग्रीन बेल्ट को अपनी पहली वाली अवस्था में पुनर्स्थापित किया जाए। हो सकता है कि भविष्य में इनकी 'माहवारी' भी बंध जाने के बाद इस मुद्दे को भी ये भूल जाएं, लेकिन पत्रकारों की नजर में ऐसी घटनाओं के समर्थन या विरोध के हर लम्हे नांचते रहते हैं!

बता दें कि स्थानीय समाजसेवियों और वसुंधरा के विभिन्न आरडब्ल्यूए के सदस्यों के प्रतिनिधिमंडल ने आवास विकास परिषद के अधीक्षण अभियंता द्वारा जिलाधिकारी को लिखी गई चिट्ठी का भी संदर्भ दिया एवं नगर निगम, आवास विकास व जिलाधिकारी की जो वर्ष 2018 में एक मीटिंग हुई थी, उसमें जिस जगह को वेंडिंग जोन के लिए नियत किया गया था, उसका भी संदर्भ दिया गया। जिसके मद्देनजर जिलाधिकारी ने तुरंत ही इस चिट्ठी पर नगर आयुक्त को नोट लिखा कि इस अतिक्रमण को हटा दिया जाए और यदि इसके लिए बल प्रयोग की आवश्यकता है तो वह बल प्रशासन द्वारा उपलब्ध कराया जाएगा। 

वैसे तो इस प्रतिनिधिमंडल ने गरीब दुकानदारों से हो रही जबरन उगाही, अलॉटमेंट और दुकानों के नाम पर प्राइवेट कंपनी में पैसा जमा कराने से संबंधित हो रहे घोटाले की भी जांच कराने की मांग की है। उसने बताया कि इस घोटाले के चलते नगर निगम में जो स्वच्छता अभियान के तहत वहां पर शौचालय का निर्माण किया गया था, जिसमें लाखों रुपए का खर्च आया था, उस शौचालयों को भी तोड़कर वहां पर इस दुकानों के खोखे को रखा जा रहा है और अधिकारियों एवं उनके कुछ दलालों द्वारा दुकानदारों से पैसे लेकर उन्हें आश्वासन दिया जा रहा है कि यह दुकानें उनके पास हमेशा के लिए रहेंगी। लिहाजा जिलाधिकारी ने इस पर भी संज्ञान लिया है और आवश्यक कार्यवाही करने हेतु नगर निगम को निर्देशित किया है। इस प्रतिनिधिमंडल में समाजसेवी अमित किशोर, गिरीश शर्मा, संदीप गुप्ता, इमरान खान, प्रशांत सिरोही, ऋषि देव, सुनील वैद और श्रीमती नरगिस आदि शामिल रहे।

जरा समाजसेवी गिरीश शर्मा की बातों पर गौर कीजिए, वो बताते हैं कि "न सिर्फ यह दुकान अवैध और अनैतिक तरीके से लगाई जा रही हैं बल्कि क्षेत्र के कई दलालों व कर्मचारियों द्वारा भोले भाले गरीब खोखे वालों से लाखों रुपए की उगाही भी की जा रही है, जिसमें उन्हें झूठा आश्वासन दिया जा रहा है कि यह जमीन और दुकान हमेशा के लिए उनकी हो जाएगा। जबकि डूडा के कार्यालय से हमने पता किया तो डूडा की तरफ से स्पष्ट किया गया कि उनकी इस प्रकार की कोई स्कीम नहीं है, जिसमें जमीन और दुकान हमेशा के लिए पैसे लेकर दुकानदारों को दी जाएगी। इसके उल्ट डूटा ने कहा है कि यदि कोई दलाल या कर्मचारी दुकानदारों से पैसा लेता हुआ पाया गया तो उसके खिलाफ पुलिस में रिपोर्ट की जाएगी।

अब जरा समाजसेवी अमित किशोर की बातों पर ध्यान दीजिए। वो कहते हैं कि "यदि अभी भी इस ग्रीन बेल्ट को पुनर्स्थापित नहीं किया जाता और यहां से अतिक्रमण नहीं हटाया जाता तो हम लखनऊ में आवास आयुक्त से जाकर मिलेंगे और उन्हें बताएंगे कि किस प्रकार नियमों के विरुद्ध नगर निगम गाजियाबाद, जिसे कॉलोनी सिर्फ रखरखाव के लिए हस्तांतरित की गई थी, इस कॉलोनी के मूलभूत ढांचे के अंदर बदलाव कर रहा है और अनैतिक तरीके से जमीन को हमेशा या किराए के लिए लोगों को दे रहा है। उन्होंने कहा कि ग्रीन बेल्ट को पुनर्स्थापित करने के लिए हम एनजीटी कोर्ट का भी सहारा लेंगे और वसुंधरा की तमाम ग्रीन बेल्ट्स को अतिक्रमण से मुक्त कराने और उन्हें हरा-भरा और खूबसूरत करवाने के लिए आंदोलन करेंगे।

इस बात में कोई दो राय नहीं कि समाजसेवियों और आरडब्ल्यूए के सदस्यों ने सही मुद्दा उठाया है। लेकिन वह ये क्यों नहीं बताते कि इसी खोखे से चंद कदमों की दूरी पर से जिन फुटपाथी दुकानों को प्रशासन ने कई बार उजाड़ा, वो आज वहां कैसे गुलजार हैं! और उस ग्रीन बेल्ट का जो मौजूदा हश्र हुआ है, उस पर उनकी चुप्पी का राज क्या है? मैं ये मानता हूं कि वसुंधरा, वैशाली, इंदिरापुरम, कौशाम्बी जैसे पॉश इलाके में किराए की दुकान लेनी सबके बस की बात नहीं है। 

इसलिए यहां पर साप्ताहिक हाट बाजारों और सड़क किनारे ग्रीन बेल्ट पर, फुटपाथों पर फुटपाथी दुकानें आपको कुकुरमुत्ते की तरह मिल जाएंगी, जिससे हजारों लोगों को रोजगार भी मिला हुआ है और लाखों लोगों को सस्ता भोजन सामग्री या अन्य सस्ती सेवाएं मिल जा रही हैं। इन दुकानों से नगर निगम, प्राधिकरण या आवास विकास, पुलिस चौकी और स्थानीय रँगबाजों द्वारा नेताओं के संरक्षण में मोटी वसूली हो रही है, जिसमें अपना हिस्सा ऐसे समाजसेवी व रेजिडेंट्स भी तलाश रहे हैं, जिन्हें आगे अपनी राजनीति चमकानी है!

प्रशासन को चाहिए कि वह ऐसे आंदोलनों के रिकॉर्ड संजोकर रखे और उसके मकसद से भटकने के बाद इसमें शामिल लोगों को भीतर करे। क्योंकि हर बात में आंदोलन, केस-मुकदमे से जहां काम करने वाले लोग परेशान होकर ठगा सा महसूस करते हैं, वहीं ऐसे लोगों की चांदी रहती है जो सिर्फ बातों की जुगाली करते हैं और मुद्दा दर मुद्दा अपना चेहरा बदलते हैं! अक्सर यह खूबसूरत नहीं, बल्कि बदसूरत प्रतीत होता है हिन्द आत्मा की नजर में! गाजियाबाद के हर रंग से वाकिफ है यह! गिरगिट की तरह रंग बदलने वालों से भी!

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