चिराग तले अंधेरा, आखिर वैश्य समाज कैसे पड़ गया इतना अकेला!

चिराग तले अंधेरा, आखिर वैश्य समाज कैसे पड़ गया इतना अकेला!

@ राजपथ/अशोक कौशिक, संपादक

औद्योगिक नगरी गाजियाबाद में वैश्य सियासत की एक अलग और अलहदा पहचान रहती आई है। दल कोई भी हो, पर इस उर्वर समाज के सपूत वहां मुख्य भूमिका में अवश्य मौजूद रहते हैं। सिर्फ आजादी के बाद ही नहीं, बल्कि उससे पहले से भी! महात्मा गांधी, राममनोहर लोहिया, नरेंद्र मोदी, नरेश अग्रवाल, प्रेमचंद गुप्ता, अरविंद केजड़ीवाल जैसे अनेक धुरंधर राजनीतिज्ञों के सियासी दाना-पानी का जुगाड़ करने-करवाने में भी इस समाज के स्थानीय कर्णधारों ने समय समय पर महती भूमिका निभाई है। फलस्वरूप यहां के वैश्य समाजसेवियों को भी राजनीतिक, प्रशासनिक व कारोबारी महकमे में अच्छे अच्छे ओहदे मिले हैं। 

आखिर ऐसे प्रभावशाली समाज के समकालीन कर्णधारों द्वारा लोहिया नगर स्थित हिंदी भवन में गत दिनों आयोजित अंतरराष्ट्रीय वैश्य महासम्मेलन के दर्शक दीर्घा में लोगों की नाम मात्र की मौजूदगी या यों कहें कि आमलोगों व कार्यकर्ताओं से ज्यादा नेताओं की मौजूदगी न केवल हैरान करती है, बल्कि भारतीय जनता पार्टी का एक मजबूत जनाधार समझे जाने वाले इस समाज के नामचीन सत्ताधारी नेताओं की अहम उपस्थिति के बावजूद श्रोताओं का नदारत रहना वैश्य समाज की एकजुटता पर ही गम्भीर सवालिया निशान खड़े करता है। 

सुलगता सवाल तो यह है कि कहीं यह महानगर की सियासत पर वैश्य समाज की कमजोर हो रही पकड़ का नतीजा तो नहीं है! क्या इससे भाजपा की भावी रणनीति को भी झटके लगने के संकेत नहीं मिल रहे, क्योंकि गाजियाबाद पार्टी के मजबूत गढ़ों/किलों में से एक माना जाता है? हाल से एक धीमी आवाज आई कि वैश्य समाज के वक्ता अनेक, पर श्रोता नदारद, क्या यही है वैश्य समाज की एकता का उत्तर नहीं मिलना भी अंतर्राष्ट्रीय वैश्य महासम्मेलन तथा आईवीएफ की गाजियाबाद इकाई द्वारा आयोजित वैश्य एकता समारोह की सफलता पर प्रश्नवाचक चिन्ह लगाता है। वैसे तो इसमें सभी दल के नेता मौजूद रहे, लेकिन मंच भाजपा समर्थित अधिक महसूस हुआ। यही वजह है कि कांग्रेस, बसपा, सपा, रालोद, आप आदि पार्टी के समर्थक वैश्य नेताओं के चेहरे खिल गए, क्योंकि खाली खाली हिंदी भवन सभागार महानगर में भाजपा की कमजोरी की चुगली कर रहा था।

कहने को तो अनेक नेता और गणमान्य लोग इस सम्मेलन में आए जिसमें अंतर्राष्ट्रीय वैश्य महासम्मेलन के राष्ट्रीय अध्यक्ष अशोक अग्रवाल, कार्यकारिणी अध्यक्ष सुरेंद्र गुप्ता, राष्ट्रीय महामंत्री राजीव मित्तल, राज्यसभा सांसद अनिल अग्रवाल, उत्तर प्रदेश के स्वास्थ्य राज्य मंत्री अतुल गर्ग, रविकांत गर्ग जैसे अनेक वक्ता कार्यक्रम में शरीक हुए, पर श्रोताओं के नाम पर पूरा हॉल खाली पड़ा रहा, जिससे सहज ही यह अंदाजा लगाया गया कि वैश्य समाज कितना एकजुट है! उसकी तथाकथित एकता यहां कैसे तार-तार हो चुकी है। हद तो यह कि इसके बावजूद भी वैश्य समाज ने हुंकार भरी और अपनी राजनीतिक भागीदारी बढ़ाने पर जोर दिया, जो नक्कारखाने में तूती की आवाज मानिंद दबकर रह गई।

कहने को तो वैश्य एकता सम्मेलन के जरिए वैश्य समाज एक मंच पर एकत्र हुआ। वैश्य समाज के नेता, उद्योगपति, व्यापारी व समाज के हर वर्ग के लोग उपस्थित हुए। लेकिन हकीकत उसमें शामिल लोग समझ पाए यहां वहां से बाहर आई तस्वीरों ने पत्रकारों को कड़वी सच्चाई से वाकिफ करा दिया।

अंतरराष्ट्रीय वैश्य महासम्मेलन की गाजियाबाद इकाई द्वारा हिंदी भवन में वैश्य एकता एवं सम्मान समारोह का जो आयोजन किया गया, उसमें बतौर मुख्य अतिथि के रूप में संस्था के राष्ट्रीय अध्यक्ष अशोक अग्रवाल, राज्य सभा सांसद अनिल अग्रवाल, राज्य मंत्री अतुल गर्ग, एमएलसी दिनेश गोयल, व्यापारी कल्याण बोर्ड के अध्यक्ष रवि कांत गर्ग, महिला आयोग की अध्यक्ष विमला बाथम, व्यापारी कल्याण बोर्ड के उपाध्यक्ष अशोक गोयल, पूर्व विधायक सुरेश बंसल, राज्य मंत्री दर्जा प्राप्त कैप्टन विकास गुप्ता, बृजेश गुप्ता चंचल, सुरेंद्र गुप्ता, राजीव मित्तल, अजय गुप्ता, राजकिशोर गुप्ता, व्यापारी संजीव गुप्ता भी उपस्थित रहे।

इस अवसर पर मुख्य अतिथियों ने भले ही अपने सम्बोधन में बताया कि महाराजा अग्रसेन व्यापारियों के शहर अग्रोहा के एक महान भारतीय राजा थे। महाराजा अग्रसेन सूर्यवंशी राजा थे, जिनका जन्म क्षत्रिय कुल में हुआ था। महाराजा अग्रसेन एक पौराणिक समाजवाद के प्रर्वतक, युग पुरुष, राम राज्य के समर्थक, महादानी एवं समाजवाद के प्रथम प्रणेता थे। वे अग्रोदय नामक गणराज्य के महाराजा थे। जिसकी राजधानी अग्रोहा थी। इसलिए हम सभी को महाराज अग्रसेन के विचारों को पालन करते हुए जीना है। लेकिन हकीकत यह है कि इस समाज में जितने भी नेता हैं, उतने संगठन, फर्म, ट्रस्ट, एनजीओ व कम्पनी की बहुतायत है और मौका मिलते ही सभी एक दूसरे की टांग खिंचाई शुरू कर देते हैं। यही वजह है कि आर्थिक रूप से नहीं सही, पर सामूहिकता बोध के नजरिये से यह समाज भी टूट रहा है। इसके लोग मन ही मन घुट रहे हैं।

नेताओं ने सगर्व कहा कि वैश्य समाज हमेशा समाज और देश की चिंता करता है। हम सभी को समाज की चिंता करते हुए समाज में जो परिवार किसी कारण वश परेशानियों का सामना कर रहे हैं, उनका सहयोग करना है। वैश्य युवाओं को शिक्षा के साथ व्यापार और नौकरियों के अवसर भी उपलब्ध कराने होंगे, जिससे वैश्य वर्ग का प्रत्येक परिवार संपन्न होगा। हम सभी को एकता के साथ देश और समाज हित मे निर्णय लेने होंगे। 

कहा तो यहां तक जा रहा है कि जिस कार्यक्रम को सफल बनाने में अनिल अग्रवाल सावरिया, रजनीश बंसल, विकास बंसल, गौरव गर्ग, देवेन्द्र हितकारी, अतुल जैन, अनिल गर्ग, दिनेश अग्रवाल, अजय गुप्ता, आदि नारायण गुप्ता, सुभाष गर्ग, आशुतोष बिंदल, राकेश मोहन, के पी गुप्ता, डॉक्टर सपना बंसल, विभु बंसल, अनुज मित्तल, संदीप सिंघल, संजीव मित्तल, सौरभ गुप्ता, विजय महेश्वरी, विपिन सिंघल, विकास गर्ग, सीमा गोयल, सुनील वार्ष्णेय, विपुल अग्रवाल, संदीप गोयल, मनोज गोयल, भारत गोयल, अंजलि सिंघल, महेश चंद हापुड़ वाले, मनमोहन गोयल, अधिवक्ता धनेश प्रकाश गर्ग, उमाशंकर गोयल, राज किशोर गुप्ता, कैलाश, डॉक्टर सौरभ गुप्ता, गौरव सिंघल, जम्मू प्रसाद जैन, सौरभ जायसवाल आदि लोग शुरू से अंत तक लगे हुए हों, वहां पर लोगों के नहीं जुटाने की वजह कोरोना प्रोटोकॉल है या नोटबन्दी-जीएसटी व महामारी का दंश झेल रहे वैश्य समाज की अपने समाजसेवी नेताओं से बेरुखी, समाज के मंजे मजाये नेता ही बता सकते हैं, जो कुरेदने पर भी अभी अपना मुंह नहीं खोल रहे। हालांकि, कांग्रेस नेता सुशांत गोयल व पी के गर्ग, बसपा नेता सुरेश बंसल और सपा नेता प्रेमचंद गुप्ता, अभिषेक गर्ग, रामकिशोर अग्रवाल व मधुकर सिंघल तो इस स्थिति से मन ही मन गदगद बताए जाते हैं और वैश्य समाज को सावधान कर रहे हैं कि भाजपा सरकार और कुछ वर्ष रह गई तो वैश्य समाज भी सड़क पर आ जाएगा!

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