कहीं दीप जले, कहीं दिल, जीवन-यापन कितनी मुश्किल

कहीं दीप जले, कहीं दिल, जीवन यापन कितनी मुश्किल!

@ राजपथ/अशोक कौशिक, सम्पादक, हिन्द आत्मा

लोकपर्व दीपावली चार नवंबर को मनाई जाएगी। लोग अपने घर व प्रतिष्ठान को सजायेंगे, लक्ष्मी-गणेश की पूजा करेंगे, मिठाई आदि उपहार अपने परिचित जनों को बांटेंगे। आतिशबाजी करेंगे। यह उत्सव हमलोग देश-विदेश में मनाएंगे, कहीं कम-कहीं ज्यादा। वैसे भी साधन-संपन्न लोगों की तो हर रोज दीवाली होती है। दिवाला तो उनका निकलता है जो दाने दाने को मोहताज होते हैं। हमारी व्यवस्था में हाशिए पर धकेल दिए गए होते हैं। 

बहुत सारे लोग श्रमवीर होते हैं, लेकिन उनके श्रम का उचित मूल्य उन्हें नहीं मिल पाता है। बमुश्किल अपने जीवन का गुजारा तो कर लेते, पर पर्व-त्यौहार मनाने व तड़क भड़क वाली जिंदगी जीने लायक वो नहीं बचते! चाहकर भी कुछ नहीं कर पाते। खुद को तो मना लेते हैं, लेकिन बीबी-बच्चों कैसे मनाएं। जब इंसान पंच बराबर यानी सगे-सम्बन्धियों, मित्रों-पड़ोसियों के स्तर का नहीं होता तो अफसोस के अलावा वो कर भी क्या सकता। 

इसलिए कहा जाता है कि दीपावली एक ऐसा उत्सव है जहां कहीं दीप जलते हैं तो कहीं दिल। जब से हमारे समाज ने त्याग की नीति का परित्याग करके लाभ की नीति को अपना लिया है, तब से स्थिति और विकृत होती जा रही है। बहुत ऐसे लोग होते हैं जो जीवन यापन करने में सक्षम होते हैं, लेकिन हमारी प्रशासनिक व सामाजिक व्यवस्था के छल प्रपंच के शिकार होते ही वो कहीं के नहीं बचते, यानी अपनी जमा पूंजी गंवा बैठते हैं। 

वैसे तो निजीकरण व भूमंडलीकरण में जनसुविधाओं का अंबार बढ़ा तो ठगी के अवसर भी बढ़े। सरकारी कम्पनियों व संस्थानों से तो लोगों को मनमाफिक सुविधाएं मिल जाती थीं, लेकिन निजी कंपनियों के दांव पेंचों से बचने की समझ औसतन भोले भारतीयों में कहां! कोविड नामक वैश्विक महामारी ने स्थिति को और बद से बदतर बना दिया। डिजिटल सुविधाओं का अंबार लगा तो डिजिटल धोखाधड़ी भी रोज अपने ही रिकॉर्ड तोड़ रही है। 

स्वाभाविक है कि स्वतंत्रता, समानता व बन्धुत्व की मूल भावनाओं वाले लोकतंत्र व उसकी शासन प्रणाली के दांव-पेंचों से मानवीय जीवन सरल कम, दुरूह ज्यादा होता जा रहा है। इसके उटपटांग फैसलों से त्याग की भावना तो भारतीय समाज से तिरोहित होती जा रही है, लेकिन जिस लाभ की अवधारणा को इसने प्रचलित किया, वह सबको समान रूप से नसीब नहीं हो पारी रही। सुप्रसिद्ध कवि जानकी बल्लभ शास्त्री के शब्दों में कहें तो कहीं घृत घना, कहीं मुट्ठी भर चना, कहीं वह भी मना वाला आलम हर ओर दिखाई दे रहा है।

 सच कहूं तो हमारे नेताओं ने लोगों की तकदीर बदलने की अथक कोशिश की, लेकिन नौकरशाही, न्यायशाही और उद्योगशाही के चक्कर में ऐसे पिसे की, सत्ता ही गंवा बैठे। हालांकि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ ने अनेक जनहितैषी कदम उठाए हैं, लेकिन विपक्ष के मकड़जाल में ऐसे फंसे कि कथित वादों से निबटने के सारे प्रयास निष्फल प्रतीत हो रहे हैं। ऐसा इसलिए कि हमारी जनता सही कामों को भूलती बहुत जल्दी है और भावनाओं में ज्यादा बहती है।

मेरी राय है कि जैसे सबके वोट का महत्व एक समान है, उसी प्रकार हमारी नीतियां भी समान नागरिक संहिता जैसी बननी चाहिए। क्योंकि जातीय, साम्प्रदायिक व क्षेत्रीय वैमनस्यता का परित्याग हमलोग नहीं करेंगे, तबतक सबके घर में दीवाली सुनिश्चित नहीं की जा सकती। और जबतक सबके घरों में साधन संपन्नता की लक्ष्मी और प्रबल सुरक्षा भाव लिए विघ्नहर्ता भगवान गणेश का प्रवेश सुनिश्चित नहीं किया जाएगा, तबतक हमारी तमाम पढ़ाई-लिखाई, नियम -कानून को लानत है! 

आखिर हिन्द की आत्मा उन गांवों में बसती है जहां महानगरीय दीवाली जैसा उत्सव मनाना किसी दुःस्वप्न जैसा होता है। कहीं कहीं तो सघन अंधकार और गहरा ही रहता है। इसलिए आइए हमसब समवेत रूप से सोंचें-विचारें कि राष्ट्रपिता महात्मा गांधी का अंतिम व्यक्ति और राष्ट्रपुरुष दीनदयाल उपाध्याय का अंत्योदय वाली अवधारणा कबतक शतप्रतिशत साकार होगी। 

सवाल अब रोटी कपड़ा और मकान, शिक्षा, स्वास्थ्य और सम्मान भर का नहीं है, बल्कि सबलोग डिजिटल रूप से साक्षर बनें, सबके पास स्मार्ट फोन, कम्प्यूटर, लैपटॉप हो और सबके लिए समान अवसर की गुंजाइश कैसे बने, यही आज का यक्ष प्रश्न है। हमारे कृत कर्म जितनी जल्दी इसका जवाब दे दें, उतनी जल्दी विशाल भारतीय समाज का भला हो जाएगा। हमें सबको तोड़ने के बजाए परस्पर जोड़ने वाली राजनीति करनी चाहिए, ताकि भारतीय सीमाएं भविष्य में सिंकूड़े नहीं, बल्कि अपनी खोई हुई जमीन व बन्धु बांधव वापस पा लें। 

चाहे सैनिकों की शहादत हो या कर्मयोगियों का आत्मोत्सर्ग, इससे प्रभावित घर में कभी अंधेरा नहीं पसरे, यह भी हमें ही सोचना है। राम की अयोध्या में तो दीवाली मन रही, लेकिन मथुरा-काशी की 'कलंकित अमावस्या' कब छंटेगी, मैं पूछूं, उससे पहले बता दी जाए तो बेहतर!

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