क्या आप टैक्स हैवेन देशों के बारे में जानते हैं? टैक्स चोरी और मनी लॉन्ड्रिंग में इनकी क्या भूमिका होती है? समझिए

क्या आप टैक्स हैवेन देशों के बारे में जानते हैं? टैक्स चोरी और मनी लॉन्ड्रिंग में इनकी क्या भूमिका होती है? समझिए

@ कमलेश पांडेय/वरिष्ठ पत्रकार व स्तम्भकार

सरकारी अथवा निजी संस्थाओं में व्याप्त भ्रष्टाचार एक वैश्विक समस्या बन चुकी है। इससे राजनेताओं, नौकरशाहों, उच्च पेशेवर अधिकारियों और उद्यमियों को तो बेहिसाब आमदनी हो जाती है, लेकिन आम आदमी का आर्थिक हित और कतिपय सार्वजनिक हित बुरी तरह से प्रभावित हो जाता है। क्योंकि विभिन्न उपक्रमों में घाटा दिखाकर शासन जहां आमलोगों पर कर की दर बढ़ाता रहता है, वहीं सार्वजनिक सेवाओं और जनसुविधाओं की डिलीवरी में भी अव्यवहारिक कटौती करता रहता है। लोकतांत्रिक प्रशासन के लिए यह स्थिति किसी अभिशाप से कम नहीं है।

# भारत के बाद अब यूरोपीय यूनियन में भी सुनाई देने लगी टैक्स चोरी और मनी लॉन्ड्रिंग की बात

कुछ साल पहले तक कर अपवंचना यानी टैक्स चोरी और काला धन को वैध बनाने की कला यानी मनी लॉन्ड्रिंग के तौर-तरीकों की चर्चा भारत में आम हुआ करती थीं। इसी क्रम में टैक्स हेवन कंट्रीज की भी चर्चा होती थी। लेकिन अब यूरोपीय यूनियन में शामिल देशों के भीतर भी ऐसी ही चर्चाएं जोर पकड़ रही हैं। पता चला है कि यूरोपीय यूनियन में शामिल 36 बड़े यूरोपीय बैंकों ने हर साल 1.34 लाख करोड़ की चपत उन देशों या उनके समूहों को लगाई है, जहां उनका संचालन मुख्यालय है। यह बात मैं नहीं कह रहा बल्कि यूरोपीय यूनियन टैक्स ऑब्जर्वेटरी (ईटीओ) की रिपोर्ट बता रही है। 

यह रिपोर्ट बताती है कि ये बैंक हर साल अपना एक चौथाई मुनाफा उन देशों में भेजते हैं, जिन्हें टैक्स हेवन यानी कर चोरी का अड्डा कहा जाता है। यह रिपोर्ट इन बैंकों के व्यवहार के अध्ययन पर आधारित है, जिनमें बार्कलेज, एचएसबीसी, ड्यूश बैंक, डांस्के बैंक, आईएनजी, यूनि क्रेडिट और नैटवेस्ट समूह आदि शामिल हैं। आंकड़े बता रहे हैं कि यूरोप के 36 बड़े बैंक टैक्स चोरी के रूप में हर साल कम से कम 20 अरब यूरो यानी 1.34 लाख करोड़ रुपये का चूना लगा रहे हैं। यह रकम इन बैंकों के कुल मुनाफे का करीब 14 फीसदी है। 

# यूरोपीय यूनियन में शामिल देशों में पिछले 7 वर्षों से चल रहा है टैक्स चोरी का सिलसिला 

खास बात यह है कि वहां टैक्स चोरी का यह सिलसिला पिछले 7 वर्षों से चल रहा है। यहां यह स्पष्ट कर दें कि जब ये बैंक घाटे में रहते हैं तो उनकी सार्वजनिक पूंजी से मदद की जाती है। इसके बावजूद वो अपना पूरा मुनाफा प्रदर्शित नहीं करके सरकारी खजानों में योगदान करने से बच रहे हैं। इसलिए अंतरराष्ट्रीय न्यूनतम टैक्स दर तय करने का प्रयास सही दिशा में बढ़ाया गया एक कदम है, जिससे टैक्स हेवन देशों की अर्थव्यवस्था भविष्य में बुरी तरह से प्रभावित होगी। 

बता दें कि यूरोप में हाल के वर्षों में टैक्स चोरी पर बहस तेज हुई है। ईटीओ के मुताबिक, ये बैंक टैक्स चोरी के लिए 17 टैक्स हेवन देशों का इस्तेमाल करते हैं। जहां टैक्स हेवन देश उन्हें कहा जाता है जहाँ अन्य देशों की अपेक्षा बहुत कम कर लगता है या बिलकुल कर नहीं लगता। ऐसे देशों में पैसे जमा करने पर वे पैसे जमा करने वाले व्यक्ति या संस्था के बारे में कुछ भी नहीं पूछते। इन देशों में बहामास, बरमुडा, द ब्रिटिश वर्जिन आइलैंड, द कैमन आइलैंड, गुएनर्सी, जिब्राल्टर, हांगकांग, आयरलैंड, आइल ऑफ मैन, जर्सी, कुवैत, लक्जमबर्ग, मकाऊ, माल्टा, मॉरीशस, पनामा और कतर शामिल हैं। 

#  सार्वजनिक रूप से उपलब्ध सूचनाओं के आधार पर निकाला गया है यूरोपीय बैंकों द्वारा की गई टैक्स चोरी का अनुमान

ईटीओ का कहना है कि टैक्स चोरी का अनुमान सार्वजनिक रूप से उपलब्ध सूचनाओं के आधार पर निकाला गया है। इन बैंकों की कुल आमदनी, टैक्स पूर्व मुनाफा, चुकाए गए टैक्स की रकम और उनके कर्मचारियों से जुड़ी सूचनाएं शामिल हैं। वर्ष 2014 से 2020 तक के उपलब्ध आंकड़ों के अध्ययन में उन बैंकिंग कंपनियों को शामिल किया गया, जिनका सालाना राजस्व 75 करोड़ यूरो या 6,535.6 करोड़ रुपए से अधिक है।

बता दें कि यूरोपीय संघ ने इस अध्ययन के लिए ईटीओ को शुल्क के रूप में 12 लाख यूरो या करीब 10.45 करोड़ रुपये भुगतान किया था। ईटीओ का अनुमान है कि सभी 36 बैंकों ने अपने एक चौथाई मुनाफे को उन देशों में ट्रांसफर कर दिया, जहां टैक्स दर 15 प्रतिशत से कम है। विशेष बात यह है कि इन बैंकों ने टैक्स हैवन देशों में जिन कर्मियों की नियुक्ति की उन्हें सालाना औसत 2.38 लाख यूरो यानी 2.07 करोड़ रुपये वेतन के रूप में दिया गया। वहीं, यूरोपीय देशों में मौजूद कर्मियों का औसत वेतन सालाना 65000 यूरो यानी 56.6 लाख रुपये ही है।

रिपोर्ट में कहा गया है कि इन बैंकों ने न सिर्फ कैरेबियाई द्वीपों में स्थित टैक्स हैवन देशों का ही इस्तेमाल किया, बल्कि यूरोप के अंदर भी आयरलैंड, लक्जमबर्ग और माल्टा जैसे देशों में अपने मुनाफे को ट्रांसफर किया बैंकों का यह व्यवहार यूरोप के करदाताओं के साथ धोखाधड़ी है। उनके लिए निराशाजनक भी है। ईटीओ का अनुमान है कि अगर टैक्स हैवन देशों में बैंकों ने न्यूनतम 15 प्रतिशत के हिसाब से टैक्स चुकाया होता तो उन्हें सालाना 3 अरब से 5 अरब यूरो यानी 26.1 से 43.5 हजार करोड़ रुपए तक अतिरिक्त टैक्स देना पड़ता।

# कर के स्वर्ग यानी टैक्स हैवेन देशों के बारे में कुछ खास बातें जानिए

आपको बता दें कि कर के स्वर्ग या 'टैक्स हैवेन' उन देशों को कहते हैं जहाँ अन्य देशों की अपेक्षा बहुत कम कर लगता है, या बिलकुल भी कर नहीं लगता है। वजह यह कि ऐसे देशों में कर के अलावा भी बहुत सी गतिविधियाँ चलतीं रहतीं हैं। दरअसल, ऐसे देश टैक्स में किसी प्रकार की पारदर्शिता नहीं रखते और न ही किसी प्रकार की वित्तीय जानकारी को किसी अन्य से साझा करते हैं। इसलिए ये देश उन लोगों के लिए स्वर्ग (हैवेन) हैं, जो टैक्स चोरी करके पैसे इन देशों में जमा कर देते हैं। ऐसे देशों में पैसे जमा करने पर वे पैसे जमा करने वाले व्यक्ति या संस्था के बारे में कुछ भी नहीं पूछते। यही कारण है कि टैक्स चोरों के लिए ऐसे देश स्वर्ग जैसे होते हैं, जो अपने देश से पैसे इन देशों में कालेधन के रूप में जमा कर देते हैं। बता दें कि स्विट्ज़रलैंड ही नहीं, एशिया में सिंगापुर, मलेशिया, हांगकांग, मॉरिशस, मालदीव, दुबई और बहरीन एवं यूरोप में ऑस्ट्रिया, बेल्जियम, मोनाको आदि कर के स्वर्ग देशों में शुमार किये जाते हैं।

# अर्थ शोधन निवारण अधिनियम, 2002 बना चुका है भारत

बता दें कि अर्थ शोधन निवारण अधिनियम, 2002 भारत के संसद द्वारा पारित एक अधिनियम है जिसका उद्देश्य काले धन को सफेद करने से रोकना है। इसमें अर्थशोधन से प्राप्त धन को राजसात करने का प्राविधान है। यह अधिनियम 1 जुलाई, 2005 से प्रभावी हुआ। इस अधिनियम को वर्ष 2005, 2009 और 2012 में संशोधित किया गया। इस कानून के लागू होने के बाद भारत में ऐसे मामलों में भारी गिरावट देखने को मिली है।

# जानिए, टैक्स क्या है?

किसी भी देश द्वारा व्यक्तियों या विविध संस्था से जो अधिभार या धन लिया जाता है उसे कर या टैक्स कहते हैं। अमूमन, राष्ट्र के अधीन आने वाली विविध संस्थाएँ भी तरह-तरह के कर लगातीं हैं। कर प्राय: धन (मनी) के रूप में लगाया जाता है, किन्तु यह धन के तुल्य श्रम के रूप में भी लगाया जा सकता है। कर दो तरह के हो सकते हैं- प्रत्यक्ष कर या अप्रत्यक्ष कर। एक तरफ इसे जनता पर बोझ के रूप में देखा जा सकता है, वहीं इसे सरकार को चलाने के लिये आधारभूत आवश्यकता के रूप में भी समझा जा सकता है। 

# आदर्श होनी चाहिए कर-संग्रहण-प्रणाली

भारत के प्राचीन ऋषि यानी समाजशास्त्री कर के बारे में यह मानते थे कि वही कर-संग्रहण-प्रणाली आदर्श कही जाती है, जिससे करदाता व कर संग्रहणकर्ता दोनों को कठिनाई न हो। उन्होंने कहा कि कर-संग्रहण इस प्रकार से होना चाहिये जिस प्रकार मधुमक्खी द्वारा पराग संग्रहण किया जाता है। इस पराग संग्रहण में पुष्प भी पल्लवित रहते हैं और मधुमक्खी अपने लिये शहद भी जुटा लेती है। 

# आम बात हो चुकी है टैक्स चोरी यानी कर अपवंचना 

वहीं, टैक्स चोरी यानी कर अपवंचना भी आम बात हो चुकी है। अवसर मिलने पर अधिकांश व्यक्ति इस पर अमल करते हैं। दरअसल, व्यक्तियों, व्यापारिक संस्थानों, ट्रस्टों एवं अन्य समूहों द्वारा अवैध तरीके अपनाकर या गलत सूचना देकर या सही सूचना छिपाकर, कर बचाना या कम कर अदा करना ही कर अपवंचन कहलाता है। 

# अवैध रूप से प्राप्त धन यानी काला धन के स्रोतों को छिपाने की कला है मनी लॉन्डरिंग

वहीं, काले धन को वैध बनाना (मनी लॉन्डरिंग) अवैध रूप से प्राप्त धन के स्रोतों को छिपाने की कला है। अंततः यह एक ऐसी प्रक्रिया है जिसके द्वारा आपराधिक आय को वैध बनाकर दिखाया जाता है। इसमें शामिल धन को नशीली दवाओं की सौदेबाजी, भ्रष्टाचार, लेखांकन और अन्य प्रकार की धोखाधड़ी और कर चोरी सहित अनेक प्रकार की आपराधिक गतिविधियों के जरिये प्राप्त किया जा सकता है। काले धन को वैध बनाने के अलग-अलग तरीके हो सकते हैं और इसका विस्तार सरल से लेकर जटिल आधुनिकतम तकनीकों के रूप में हो सकता है।

# वैश्विक अर्थव्यवस्था के दो से पाँच प्रतिशत हिस्से में कालेधन को वैध बनाने का मामला था शामिल 

बता दें कि विभिन्न देशों के कई विनियामक और सरकारी प्राधिकरण दुनिया भर में या अपनी राष्ट्रीय अर्थव्यवस्था के भीतर वैध बनाए गए काले धन की मात्रा के लिए हर साल एक अनुमान जारी करते हैं। 1996 में अंतरराष्ट्रीय मुद्रा कोष ने अनुमान लगाया था कि दुनिया भर में वैश्विक अर्थव्यवस्था के दो से पाँच प्रतिशत हिस्से में काले धन को वैध बनाने का मामला शामिल था। 
# एक अंतःसरकारी निकाय है एफएटीएफ, लेकिन अपने उद्देश्यों में हुआ विफल

हालांकि, काले धन को वैध बनाने की प्रक्रिया का मुकाबला करने के लिए एक अंतःसरकारी निकाय, एफएटीएफ का गठन किया गया था, जिसने यह स्वीकार किया कि "कुल मिलाकर वैध बनाए गए काले धन की मात्रा का एक विश्वसनीय अनुमान प्रस्तुत करना पूरी तरह से असंभव है और इसलिए एफएटीएफ द्वारा इस संदर्भ में कोई आंकड़ा प्रकाशित नहीं किया जाता है। 

# हर साल वैध बनाए जाने वाले काले धन की राशि है अरबों में

देखा जाए तो शैक्षिक टिप्पणीकार भी स्वीकृति के किसी भी स्तर तक इस धन की मात्रा का अनुमान लगाने में असमर्थ रहे हैं। मापन में कठिनाई के बावजूद हर साल वैध बनाए जाने वाले काले धन की राशि अरबों में है और यह सरकारों के लिए एक महत्वपूर्ण नीति संबंधी चिंता का विषय बन गया है। इसके परिणाम स्वरूप सरकारों और अंतर्राष्ट्रीय निकायों द्वारा काले धन को वैध बनाने वालों को डराने, रोकने और पकड़ने के प्रयास किए गए हैं। 

यूं तो वित्तीय संस्थानों द्वारा सरकार की आवश्यकताओं के परिणाम स्वरूप और इसमें शामिल प्रतिष्ठा संबंधी जोखिम से बचने दोनों के लिए काले धन से संबंधित लेनदेन का पता लगाने और इन्हें रोकने के लिए प्रयास किए गए हैं, लेकिन वो कितना सफल हुए, निश्चित रूप से कुछ कहा नहीं जा सकता है। बहरहाल, दुनिया के विभिन्न देशों के द्वारा अंतरराष्ट्रीय न्यूनतम टैक्स दर तय करने का प्रयास किया जा रहा है, जो सही दिशा में बढ़ाया गया एक महत्वपूर्ण कदम समझा जा सकता है।

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