वैश्विक कूटनीति की बलिवेदी पर आखिर कबतक चढ़ते रहेंगे भारत के दूरगामी हित!
वैश्विक कूटनीति की बलिवेदी पर आखिर कबतक चढ़ते रहेंगे भारत के दूरगामी हित!
@ तीखी बात/कमलेश पांडेय, वरिष्ठ पत्रकार व स्तम्भकार
वैश्विक कूटनीति यानी वर्ल्ड वाइड डिप्लोमेसी की आंखमिचौली से भारत का हित कितना सधेगा, यह तो आने वाला वक्त ही बताएगा। लेकिन दुनिया के थानेदार अमेरिका से नजदीकी बढ़ाने और वैश्विक मंच के सर्वाधिक भरोसेमंद दोस्त समझे जाने वाले रूस से दूरी बनाने से बेहतर होगा कि चीन को हर वक्त अपनी रणनीति केंद्र में रखते हुए भारत हर वह सधा कदम उठाए, जिसको कमतर आंकने की भूल न तो चीन करे, न रूस करे और न ही अमेरिका कर सके।
देखा जाए तो चीन, रूस और अमेरिका जैसे राष्ट्र यदि हमारे मित्र नहीं हो सकते तो इन्हें अपना धुर शत्रु बनाने वाला कोई भी कदम हमारी बुद्धिमानी कदापि नहीं समझी जाएगी। वाकई, चीन से शत्रुता भाव विकसित करना जहां भारत के प्रथम प्रधानमंत्री जवाहर लाल नेहरू की भारी भूल रही है, वहीं अमेरिका को शत्रु गुट पाकिस्तान का मददगार बनाने में भारत की प्रथम महिला प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी की लापरवाही भी कम नहीं रही है।
रही बात रूस की तो वैश्विक मंच पर उसके जैसे भरोसेमंद दोस्त को कमतर आंकने की जो गलती प्रधानमंत्री अटल बिहारी बाजपेयी ने की, उसे सुधारने में यदि वर्तमान प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी कामयाब नहीं हुए, जिसकी उम्मीद काफी कम है, तो इक्कीसवीं सदी का यह एशियाई विस्मार्क भारत समेत एशियाई देशों को उसी तरह से तीसरे विश्व युद्ध में झोंक सकता है, जैसा कि 20 वीं सदी के इतिहास में जर्मनी की दुर्गति विस्मार्क की अवसरवादी नीतियों के परिणाम स्वरूप हो चुकी है, जिसे हमसब पढ़ चुके हैं।
बहरहाल अंतर सिर्फ यह होगा कि तब यूरोप की बर्बादी से अमेरिका विश्व का शहंशाह बना और अब एशिया की बर्बादी से रूस दुनिया का नया हीरो बनेगा। क्योंकि जो स्थिति बन रही है, उसमें भारत और चीन की बर्बादी पारस्परिक मारकाट में तय है। शायद अमेरिका और रूस का प्लान बी भी यही है, और हमलोग जाने-अनजाने उसी दिशा में आगे भी बढ़ते जा रहे हैं। इस बार रूस इसलिए आगे निकल सकता है, क्योंकि अमेरिका विरोधी इस्लामिक देशों से उसके ताल्लुकात व्यवहारिक रूप से ज्यादा मजबूत हैं।
यहां गौर करने वाली बात यह है कि कद-काठी से घाघ प्रतीत होने वाले अमेरिकी राष्ट्रपति जो बाइडेन भी इसे समझ चुके हैं, इसलिए रूस की काट के तौर पर अफगानिस्तान से निकलकर अमेरिकियों के खिलाफ इस्लामिक देशों के गुस्से को कम करने वाला वो हर कदम उठाएंगे, जिससे अरब मुल्क अमेरिका के धुर विरोधी नहीं बन पाएं और रूस-चीन आदि के गुप्त गठबंधन की ओर उनका झुकाव कम हो। यह स्थिति भारत के लिए भी अच्छी रहेगी। अमेरिका भी रूस और चीन से प्रतिस्पर्धा में बने रहने के लिए भारत से मित्रता का आकांक्षी हैं, लेकिन एक मजबूत भारत उनके एजेंडे में न तो अभी है और न ही कभी होगा, जैसा कि अमेरिकी राष्ट्रपति जो बाइडेन खुद ही कह भी चुके हैं कि किसी भी देश का, राष्ट्र निर्माण करना अमेरिका की जिम्मेदारी नहीं है।
भले ही अमेरिकी राष्ट्रपति जो बाइडेन ने अफगानिस्तान के सम्बन्ध में यह बात कही है, लेकिन अमेरिका की सरपरस्ती के बावजूद दुनिया के मंचों पर पाकिस्तान की जो दुर्गति हुई, भविष्य में कमोबेश भारत की भी वैसी ही हो, यह भारतीय नेतृत्व कभी नहीं चाहेगा। इसलिए स्वाभाविक सवाल है कि तब भारत को क्या करना चाहिए। जवाब होगा कि सबसे पहले भारत को अपने आंतरिक विरोधाभासों को खत्म करना चाहिए, जो क्षुद्र लोकतंत्र और बहुमत की राजनीति की देन है। भारतीय नेतृत्व को भारतीयता को विखंडित करने वाली जातीय और भाषाई सोच को हतोत्साहित या दमन करना चाहिए।
दूसरा, हर प्रकार की सांप्रदायिकता को हतोत्साहित करे और इस्लामिक सांप्रदायिकता को बढ़ावा देने वाले कानूनों को समाप्त कर इस सम्प्रदाय में मौजूद अराजक तत्वों से सख्ती से निपटे और किसी भी प्रकार की तुष्टिकरण की नीति से बाज आना चाहिए। तीसरा, इस्लामिक देशों के साथ जैसे को तैसा वाली कूटनीति अपनाना चाहिए, जो व्यवहारिक धरातल पर सटीक हो। चौथा, फ्रांस, इजरायल, जापान, दक्षिण कोरिया, दक्षिण अफ्रीका, ब्राजील जैसे स्वाभाविक मित्र देशों से प्रगाढ़ और भरोसेमंद सम्बन्ध बनाना चाहिए।
वहीं, ऑस्ट्रेलिया, जर्मनी, इंग्लैंड, कनाडा, स्विट्जरलैंड जैसे देशों से हमारे सम्बन्ध भी व्यवहारिक होने चाहिए। वहीं, इंडोनेशिया, ईरान, यूएई, अफगानिस्तान जैसे इस्लामिक देशों से सम्बंध उत्तम बने, लेकिन यदि इनका झुकाव पाकिस्तान की तरफ हो तो फिर उधर ही रहे, इधर रहने की इजाजत कतई नहीं देनी चाहिए। नेपाल, भूटान, म्यांमार, बंगलादेश, श्रीलंका, मालदीव, थाईलैंड जैसे देशों को पेंडुलम पॉलिटिक्स की बजाय उन पर सख्त नियंत्रण ही भारतीय वैश्विक कूटनीति की सफलता की कुंजी होगी।
अमूमन, विषय वस्तु की गहराई में जाने से पहले हम यह स्पष्ट कर दें कि हिंदुओं के हिस्से वाले भारत का चिर शत्रु मुस्लिमों के हिस्से वाला पाकिस्तान है, जो एशियाई मुस्लिम देशों को भारत के खिलाफ खड़े करने के लिए किसी भी हद तक जाने को तैयार बैठा है, ताकि पहले भारत, फिर हिंदुओं का अस्तित्व मिटाया जा सके। यदि हमारा संविधान और उसके सियासी पहरुए इस तल्ख सच्चाई से अनभिज्ञ रहने का स्वांग रच रहे हैं, तो वह खुद को कथित धर्मनिरपेक्षता के भुलावे-बहकावे में आकर मिटाने की तैयारी कर रहे हैं, जो पाकिस्तान चाहता है। इसलिए इस्लाम के नाम पर एकजुट होकर भी इस्लामिक देश हमारा बाल-बांका नहीं कर पाएं, हमारी वैश्विक कूटनीति उस स्तर की होनी चाहिए, जिसका यहां सर्वथा अभाव दिख रहा है।
कहना न होगा कि देश के जनमानस को मोदी सरकार से जो उम्मीदें थीं, उस पर खुद मोदी के अदूरदर्शिता भरे निर्णयों ने ही तुषारापात किया है। इसलिए वैश्विक राजनय में अप्रासंगिक गुटनिरपेक्षता, शीत युद्धकालीन रूस की सरपरस्ती, 1962 के बाद चीन विरोध और 1990 के दशक से अमेरिका की सरपरस्ती जैसी बचकानी व नीतिगत हरकतों से बचते हुए एक परिपक्व और आदर्श विदेश नीति विकसित की जानी चाहिए, जिससे प्राचीन भारत की आत्मा और उदात्त सनातन संस्कृति की रक्षा व इसका प्रचार प्रसार किया जा सके।
इस बात में कोई दो राय नहीं कि एक समर्थ भारत के प्रति चीन का असहयोगी व जलनशील रवैया, भारत द्वारा अमेरिका की ओर दोस्ती का हाथ बढ़ाने से पाकिस्तान की ओर बढ़ते रूस के हाथ और भारत का मित्र होने के बावजूद अमेरिका द्वारा अफगानिस्तान से हाथ खींचना या फिर क्वाड (अमेरिका, भारत, ऑस्ट्रेलिया और जापान का सैन्य गठबंधन) के होने के बावजूद एयूकेयूएस (अमेरिका, ब्रिटेन और ऑस्ट्रेलिया का सैन्य गठबंधन) का बनना, यह जाहिर करता है कि भारत से दोस्ती सभी चाहते हैं, लेकिन उस पर भरोसा किसी का नहीं है। आशय यह कि गुटनिरपेक्ष रहकर हम इस्लामिक अतिवाद और उसे शह दे रहे पाक-चीन का मुकाबला हमलोग कदापि नहीं कर सकते।
मतलब साफ है कि अमेरिका, रूस व चीन के जैसे हथियार आपूर्तिकर्ता देश चाहते हैं कि भारत को यूज एंड थ्रो की तरह अपने अपने हित के अनुरूप इस्तेमाल करो और फिर फेंक दो। इसलिए भारतीय नेतृत्व के लिए यह अग्नि परीक्षा का काल है और थोड़ी-सी भी लापरवाही से देश गृह युद्ध में और विश्व युद्ध में या फिर दोनों में उलझ सकता है। यदि इसका अनुमान लगाने में हम सब असमर्थ हैं तो भारत पर शासन करने का हम सबको कोई नैतिक हक नहीं है, बल्कि हम सभी भारतीयों के समुज्ज्वल भविष्य से सौदेबाजी करके उसे बाहुबल व अव्यवस्था के नरक में जाने को अभिशप्त कर रहे हैं।
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