ट्रस्टीशिप का सिद्धांत क्या है? क्या यह उपयोगी है? यहां किस रूप में उपस्थित है?
ट्रस्टीशिप का सिद्धांत क्या है? क्या यह अब भी उपयोगी है? हमारी अर्थव्यवस्था में यह किस रूप में उपस्थित है?
@ कमलेश पांडेय/वरिष्ठ पत्रकार व स्तम्भकार
राष्ट्रपिता महात्मा गांधी द्वारा प्रतिपादित ट्रस्टीशिप (न्यासिता) का सिद्धांत एक स्वस्थ सामाजिक-आर्थिक परिवेश का द्योतक है, जिसका अनुपालन करके कोई भी लोकतांत्रिक देश जनसामान्य की सेवा में सफल होते हुए अपना समग्र औद्योगिक विकास जारी रख सकता है। यह एक ऐसा सामाजिक-आर्थिक दर्शन है, जो अमीर लोगों को कुछ ऐसा माध्यम प्रदान करता है जिसके द्वारा वे गरीब और असहाय लोगों की मदद कर सकें। वास्तव में, यह सिद्धांत गांधी जी के आध्यात्मिक विकास को दर्शाता है, जो कि थियोसोफिकल लिटरेचर और भगवद्गीता के अध्ययन से उनमें विकसित हुआ था।
ट्रस्टीशिप के सिद्धांत के जन्मदाता राष्ट्रपिता महात्मा गांधी के अपने आर्थिक दर्शन के अंतर्गत ट्रस्टीशिप के सिद्धांत के अनुसार, जो भी संपति हमारे पास हैं उस संपति के हम संरक्षक हैं। कहने का तात्पर्य यह कि भले ही संपति की देखभाल का दायित्व हमारे पास है, लेकिन हम उस संपति के मालिक नहीं हैं। बता दें कि जहां साम्यवादी व्यवस्था के अंतर्गत किसी भी संपति का मालिक राज्य होता है और उत्पादन के समस्त साधनों पर उसका सीधा नियंत्रण होता है। ऐसे में राज्य का यह दायित्व है कि उत्पादन के साधनों का उपयोग समाज के हित में किया जाए।
वहीं, पूंजीवादी व्यवस्था के अंतर्गत उत्पादन के विभिन्न साधनों पर पूंजीपतियों का एकाधिकार होता है, जो अपने हित में उत्पादन के समस्त साधनों का उपभोग करते हैं। इससे स्पष्ट है कि पूंजीवादी व्यवस्था में उत्पादित वस्तुओं का उपभोग व्यक्तिगत हित में किया जाता है। लेकिन, राष्ट्रपिता महात्मा गांधी ने साम्यवादी और पूंजीवादी यानी दोनों व्यवस्थाओं से इतर उनके बीच का मार्ग अपनाया है, जिसे उन्होंने ट्रस्टीशिप का सिद्धांत करार दिया है। इस सिद्धांत में उत्पादन के साधनों पर समाज का नियंत्रण होता है और आवश्यकता पड़ने पर पूंजी या संपत्ति का उपयोग जनकल्याण के लिए किया जाता है। इस प्रकार ट्रस्टीशिप का सिद्धांत समाज कल्याण की भावना से ओत-प्रोत होता है।
वास्तव में, गांधी जी राज्य एवं व्यक्तिगत एकाधिकार के विरोधी थे और उनका लक्ष्य समाज के सभी वर्गों का उत्थान करना था। इसलिए वर्तमान संदर्भ में गांधी जी की विचारधारा काफी उपयोगी है। हाल ही में अपने अमेरिकी दौरे के क्रम में अमेरिका के राष्ट्रपति जो बाइडेन से बातचीत करने के क्रम में भारतीय प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने महात्मा गांधी केे ट्रस्टीशिप की चर्चा की, जिससे यह आज भी मौजूं है।
दरअसल, ट्रस्टीशिप को व्याख्यायित करते हुए गांधी जी
राजपाल प्रकाशन दिल्ली द्वारा प्रकाशित अपनी पुस्तक "मेरे सपनों का भारत" के पृष्ठ-60 पर कहते हैं कि "फर्ज कीजिये कि विरासत के या उद्योग-व्यवसाय के द्वारा मुझे प्रचुर सम्पत्ति मिल गई। तब मुझे यह जानना चाहिए कि वह सब सम्पत्ति मेरी नहीं है, बल्कि मेरा तो उस पर
महज इतना ही अधिकार है कि जिस तरह दूसरे लाखों आदमी गुजर बसर करते हैं, उसी तरह मैं भी इज्जत के साथ अपना गुजर बसर भर करूं। मेरी शेष सम्पत्ति पर राष्ट्र का हक है और उसी के हितार्थ उसका उपयोग होना आवश्यक है।"
वह आगे लिखते हैं कि "इस सिद्धांत का प्रतिपादन मैंने तब किया था, जबकि जमींदारों और राजाओं की सम्पत्ति के सम्बन्ध में समाजवादी सिद्धांत देश के सामने आया था। क्योंकि समाजवादी इस सुविधा प्राप्त वर्गों को खत्म कर देना चाहते हैं जबकि मैं यह चाहता हूं कि वे (जमींदार और राजा-महराजा) अपने लोभ और सम्पत्ति के बावजूद उन लोगों के समकक्ष बन जायें, जो मेहनत करके रोटी कमाते हैं।"
यदि भारतीय कम्पनियों में मौजूद कॉर्पोरेट सोशल रिस्पांसिबिलिटी यानि सीएसआर के सिद्धांत पर गहराई से सोचें तो आपको यह समझ में आ जायेगा कि सीएसआर की स्थापना बापू के ट्रस्टीशिप सिद्धांत सेे ही अभिप्रेरित होकर की गई है, जो उन्होंने ही करवाया था।
उल्लेखनीय है कि प्रतिवर्ष 2 अक्तूबर को राष्ट्रपिता महात्मा गांधी की जयंती के मौके पर पूरा देश बापू को नमन करता है। यही नहीं, हरेक राष्ट्रीय मौके पर राष्ट्रगान या राष्ट्रीय गीत के गायन के बाद उन्हें सबसे पहले याद किया जाता है। इस बात में कोई दो राय नहीं कि आधुनिक विश्व को सत्य और अहिंसा का मार्ग दिखाने वाले, महान समाज सुधारक, अंत्योदय से समाजोदय और स्वदेशी से स्वावलंबन जैसे दर्शन के प्रणेता राष्ट्रपिता महात्मा गांधी से अब संपूर्ण विश्व अब प्रेरणा प्राप्त कर रहा है।
कहना न होगा कि महात्मा गांधी के विचारों, उनके सिद्धांतों को लोग अपने जीवन में उतारने के लिए हर संभव कोशिश करते हैं। उनके बताए हुए अहिंसा के मार्गों पर हर कोई चलने का प्रयास कर रहा है, लेकिन क्या आपको पता है कि आज के अत्याधुनिक भारत के कॉर्पोरेट सोशल रिस्पांसिबिलिटी यानि सीएसआर कानून की नींव महात्मा गांधी ने भी रखी थी।
अमूमन, महात्मा गांधी कहते थे कि “मान लीजिए कि मैं बहुत अधिक धनवान हूं, यह धन-दौलत या तो विरासत या व्यापार और उद्योग के माध्यम से मिला हो। लेकिन मुझे पता है कि ये धन दौलत सिर्फ मेरा नहीं है, बल्कि जो मेरा है वह सम्मानजनक आजीविका है एवं इससे बेहतर कोई और नहीं हो सकता। मेरी संपत्ति का बाकी हिस्सा समुदाय का है और इसका इस्तेमाल समुदाय के कल्याण के लिए किया जाना चाहिए।” और शायद बापू की इसी सोच की बदौलत आज सीएसआर कानून भारतीय समाज के सांस्कृतिक, सामाजिक और चौमुखी विकास के लिए बहुत महत्वपूर्ण है।
आपको बता दें कि गांधीजी के ट्रस्टीशिप के सिद्धांतों पर ही सीएसआर कानून बना है। वहीं, भारत में साल 2014 में केंद्र में पीएम नरेंद्र मोदी की सरकार बनते ही सीएसआर कानून को अनिवार्य कर दिया गया था। हालांकि, कानून को संसद में पेश किए जाने से बहुत पहले से ही सीएसआर भारत में प्रचलित और आंतरिक रहा है। वास्तव में सीएसआर की जड़ें हमारे राष्ट्रपिता महात्मा गांधी द्वारा ही प्रतिपादित ‘ट्रस्टीशिप’ के आदर्श में ही निहित रहा हैं।
महात्मा गांधी द्वारा प्रदान की गई ट्रस्टीशिप की अवधारणा ने उस समय के भारतीय व्यापार जगत के नेताओं के डीएनए में सीएसआर अंकित कर दिया था। दरअसल, इस अवधारणा के अनुसार, पूंजीपतियों को अपनी संपत्ति के ट्रस्टी (मालिक नहीं) के रूप में कार्य करना चाहिए और सामाजिक रूप से जिम्मेदार तरीके से खुद को संचालित करना चाहिए। क्योंकि ‘सेवा ही धर्म है’, जो भारतीय जीवन पद्धति का हिस्सा है। व्यापारियों की समाज के प्रति जिम्मेदारियों का भी महात्मा गांधी ने ज़ोरदार समर्थन किया और आज मोदी सरकार भी यही चाहती है।
भारत की आजादी के बाद राष्ट्र निर्माण में गांधी के विचारों का बड़ा योगदान है। खासकर गांधी जी की ‘ट्रस्टशिप’ के दर्शन का, जो उस समय के अमीर लोगों को समाज और कमजोर वर्ग के उत्थान के लिए अपने संसाधन दान में देने का प्रेरक माध्यम बना। देश के कॉर्पोरेट भी आज गांधी जी की इस सोच को आगे ले जाने में काफी सफल हुए है।
आपको पता होना चाहिए कि ट्रस्टीशिप ने सीएसआर की नींव रखी। हालांकि, भारत की संसद में कानून पेश होने से बहुत पहले, टाटा और विप्रो जैसे व्यापारिक घराने सीएसआर गतिविधियों में सक्रिय रूप से शामिल थे। इन व्यावसायिक घरानों के नेताओं ने महात्मा गांधी के ट्रस्टीशिप को उनके परोपकारी कार्यों का श्रेय दिया है। आज भी सीएसआर ही कॉर्पोरेट सेक्टर को विशाल भारतीय समाज से जोड़ता है। यह न केवल व्यवसाय को नैतिक रूप से संचालित करने का आग्रह करता है, बल्कि समाज के विकास में सक्रिय भागीदारी भी चाहता है। वहीं, सीएसआर भी यही करता है।
कहना न होगा कि समाज के हर व्यक्ति को समान अवसर देने और दीये से दीये जलाने का प्रोत्साहन अब देश के कॉर्पोरेट्स में भी आ गया है। वे कार्पोरेट सोशल रिसपांसिबिलिटी के जरिए देश में सेवा का एक नया अलख जगा रहे हैं। कंपनियों की समाज के प्रति इस ज़िम्मेदारी पर पिछले महज कुछ वर्ष में ही सम्मिलित रूप से लगभग 50 हजार करोड़ रुपये खर्च किए जा चुके हैं, जिसे हर साल आगे बढ़ता ही जाना है। इसलिए महात्मा गांधी की जयंती के मौके पर कॉर्पोरेट्स सीएसआर पहल से लाभान्वित हुए लाखों लोगों की तरफ से भी बापू के प्रति यह सच्ची श्रद्धांजलि है।
प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने एक बार निवेशकों के एक सम्मेलन को संबोधित करते हुए कहा कि वे खुलेआम उद्योगपतियों से मिलते हैं। वे कुछ लोगों की तरह उद्योगपतियों के साथ खड़े होने से नहीं डरते, क्योंकि उनके इरादे 'नेक' हैं। इस मौके पर नरेन्द्र मोदी ने देश के लिए सबसे महत्वपूर्ण बात महात्मा गांधी के बिड़ला परिवार से संबंधों का उल्लेख करते हुए कहीं। वह यह कि 'जब नीयत साफ हो और इरादे नेक हों, तो किसी के साथ खड़ा होने से दाग नहीं लगते। महात्मा गांधी का जीवन इतना पवित्र था कि उन्हें बिड़लाजी के परिवार के साथ जाकर रहने, बिड़लाजी के साथ खड़ा होने में कभी संकोच नहीं हुआ।' इस मौके पर नामचीन उद्योगपति भी उपस्थित थे।
गांधीजी के आर्थिक सिद्धांतों में उनका ट्रस्टीशिप का सिद्धांत सर्वोपरि है, जिसका प्रतिपादन उन्होंने दक्षिण अफ्रीका में 1903 में किया था। गांधीजी ने इसका आधार ईशोपनिषद के प्रथम श्लोक को माना था, जिसका अर्थ है कि, 'इस जगत में जो कुछ भी जीवन है, वह सब ईश्वर का बसाया हुआ है। इसलिए ईश्वर के नाम से त्याग करके तू यथाप्राप्त भोग किया कर। किसी के धन की वासना न कर।' उनके अनुसार, जो व्यक्ति अपनी आवश्यकताओं से अधिक संपत्ति एकत्रित करता है, उसे केवल अपनी आवश्यकताओं की पूर्ति करके पर्याप्त संपत्ति का उपयोग करने का अधिकार है, शेष संपत्ति का प्रबंध उसे एक ट्रस्टी की हैसियत से, उसे धरोहर समझकर, समाज कल्याण के लिए करना चाहिए।
ट्रस्टीशिप सिद्धांत के पक्ष में गांधीजी मानते थे कि प्रकृति की रचना ही ऐसी है कि सभी की क्षमता एक-सी नहीं हो सकती। इसलिए प्राकृतिक रूप से कुछ लोगों की कमाने की क्षमता अधिक होगी और दूसरों की कम। इसलिए वे कहते हैं कि मैं बुद्धिवादी व्यक्तियों को अधिक कमाने दूंगा, उनकी बुद्धि को कुंठित नहीं करूंगा, परंतु उनकी अधिकांश कमाई राज्य की भलाई के लिए वैसे ही काम आनी चाहिए, जैसे कि बाप के सभी कमाऊ बेटों की आमदनी परिवार के कोष में जमा होती है। वे अपने कमाई का संरक्षक बनकर ही रहेंगे। इस तरह यह स्पष्ट है कि यह महत्वपूर्ण नहीं रह गया है कि उस समय गांधीजी किसके साथ खड़े थे परंतु महत्वपूर्ण यह है कि गांधीजी किन लोगों के पक्ष में खड़े थे।
सच कहूं तो आज पूरे विश्व में परंपरागत तौर पर न साम्यवाद बचा है और न ही पूंजीवाद। सोवियत संघ के पतन के बाद गैट समझौता, खुले बाजार की व्यापार नीति और विश्व व्यापार संगठन के द्वारा जिस पूंजीवाद की आंधी आई थी, उसी खुले बाजार की नीति का अगुआ देश अमेरिका आज हांफ रहा है। अमेरिका से पूंजीवाद की शुरुआत हुई थी और आज वही देश व्यापार संरक्षणवाद की बैसाखी थामने को अभिशक्त हो गया है। विश्व के इस क्रूर और निर्दयी पूंजीवाद की ठोकरें विश्व के कई देशों को धूल में मिला चुकी हैं। इस निर्दयी पूंजीवादी व्यवस्था का सबसे ताजा शिकार ईरान बनने जा रहा है। ऐसे कठोर समय में अपने देश का भविष्य विकास के नाम पर कुछ पूंजीपतियों के हाथ में सौंप देना इस देश के लिए दुर्भाग्यपूर्ण है। इसलिये सरकार को सचेत रहना चाहिए। उसे गांधी जी के ट्रस्टीशिप के सिद्धांत को सफल बनाने वाली पृष्ठभूमि तैयार करवानी चाहिए।
देखा जाए तो समकालीन विश्व की अर्थव्यवस्थाओं का संक्रातिकाल है। हमारा विश्व दो-दो विश्वयुद्ध देख चुका है, और शायद भारत-चीन के दांवपेंच से छिड़े तीसरे विश्वयुद्ध, जिसे अमेरिकी व रूसी शह प्राप्त हो, के बाद उसे देखने वाला कोई भी न बचे। कारण कि पूंजीवादियों का स्वर्ग कहलाने वाले देश अपने-अपने भविष्य को लेकर चिंतित हैं, जिससे यूरोप और अमेरिका के दो धुर बन रहे हैं। वहीं, रूस और चीन क्या करने वाले हैं, यह किसी को आभास नहीं हो पा रहा है। ऐसे समय पर भारतीय राज्य का कुछ पूंजीपतियों पर निर्भर हो जाना अच्छा संकेत नहीं है। इसलिए गांधी जी का ट्रस्टीशिप का सिद्धांत यहां विचारणीय पहलू है।
आप मानिए या नहीं मानिए, लेकिन यह अवश्य जानिए कि आजकल यूरोप और अमेरिका से होता हुआ 'क्रोनी कैपिटेलिज्म' अथवा 'याराना पूंजीवाद' भारत में अपनी जड़ें जमा रहा है। इस याराना पूंजीवाद में राजनेता, उनके मातहत या समर्थक पूंजीपति और सरकारी अधिकारी मिलकर अपने-अपने निजी स्वार्थों की पूर्ति करते हैं। इसमें देश के हित गौण हो जाते हैं। इस याराना पूंजीवाद की विशेषता यह है कि इसमें राजनेता और उनके आर्थिक सलाहकार शब्दों का खेल खेलते हैं। इसमें देश की गिरती हुई व्यवस्था को भी आंकड़ों की जादूगरी से बहुत ऊपर उठा दिया जाता है। इसमें सारी बातें सामूहिकता में ही कही जाती हैं, जैसे कुल उत्पादन, कुल राष्ट्रीय आय और स्टॉक एक्सचेंज में शेयरों के कीमतों में चढ़ाव अर्थव्यवस्था के गुणों के रूप में प्रसारित किए जाते हैं। लेकिन वास्तविकता कुछ और होती है। इससे निपटे बिना गांधी जी के ट्रस्टीशिप के सपने को साकार नहीं किया जा सकता है।
क्या आपको पता है कि न्यू वर्ल्ड वेल्थ और एलआईओ की संयुक्त रिपोर्ट के अनुसार, 1991 में भारत द्वारा खुले व्यापार की नीति स्वीकार करने के बाद से हजारों खरबपति भारत छोड़कर विदेशों में बस गए थे। वहीं, यही रिपोर्ट बताती है कि वर्ष 2014 के बाद से यह रफ्तार और भी तेज हुई है। इस रिपोर्ट के अनुसार भारत छोड़ने वाले लोगों का पसंदीदा देश वही ब्रिटेन है, जिससे हम आजाद हुए। बता दें कि अरबपतियों के पलायन के लिहाज से विश्व में चीन के बाद भारत दूसरे स्थान पर है। स्वाभाविक है कि इनके पलायन से गांधी के ट्रस्टीशिप की अवधारणा की धार अवश्य कुंद हुई होगी।
भारतीय संसद में भगोड़ा आर्थिक अपराधी विधेयक पारित कराया गया है, जिस में ऐसे आर्थिक अपराधियों के विरुद्ध कठोर आर्थिक प्रावधान किए गए हैं, जो मुकदमों से बचने के लिए देश छोड़कर भाग जाते हैं। वहीं, इसमें यह भी सुंदर व्यवस्था की गई है कि यदि आरोपित मुकदमें की सुनवाई के लिए देश वापस लौट आता है तो उसके विरुद्ध शुरू की गई कानूनी कार्यवाही वापस ले ली जाएगी। वहीं, खास बात यह कि इस विधेयक में अपनी मर्जी से देश छोड़कर चले जाने वाले खरबपतियों के लिए कोई कानूनी नियम नहीं बनाए गए हैं, जबकि उन्हें बनाकर इनके हाथ-पांव बांधने चाहिए थे, ताकि गांधी के ट्रस्टीशिप के सिद्धांत को चपत न लगे।
देखा जाए तो देश में योजना आयोग की स्थापना वर्ष 1950 में की गई थी, जो देश का सबसे बड़ा कार्यालय था। यह देश के सुदूर भागों का अध्ययन कर उनके लिए पंचवर्षीय योजना बनाता था। लेकिन प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने वर्ष 2014 में स्वतंत्रता दिवस समारोह के लाल किले से अपने पहले ही संबोधन में योजना आयोग को भंग कर देने की घोषणा की और नीति आयोग का गठन कर दिया। हालांकि, पूरा देश यह नहीं जान पाया कि किस अनुसंधान और रिपोर्ट के आधार पर प्रधानमंत्री ने योजना आयोग को भंग करने का निर्णय लिया था। लेकिन, उनके निर्णय का सकारात्मक असर अब दिखाई दे रहा है।
आपको पता होना चाहिए कि साल 2002 के गुजरात दंगों के बाद उस सूबे का उद्योग जगत वहां जो कुछ हुआ, उससे बहुत नाराज था। ऐसे में उद्योगपति गौतम अडानी ने उस समय वहां पर उद्योगपतियों के समानांतर एक संगठन तत्कालीन सीएम नरेंद्र मोदी के समर्थन में खड़ा कर दिया था। और इसी संगठन के नेतृत्व में गौतम अड़ानी के नेतृत्व में वाइब्रेंट गुजरात अभियान चला था, जिससे दंगाग्रस्त गुजरात की जगह उभरते हुए, चमकते गुजरात की छवि बनी। उसके बाद प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी के कार्यकाल में अडानी समूह की जो जादुई प्रगति हुई है, इसके गवाह आंकड़े हैं। यही याराना पूंजीवाद है, लेकिन उन्होंने भी सीएसआर के माध्यम से जनहित के कई कार्य किये हैं, जिससे देश और देशवासी दोनों लाभान्वित हो रहे हैं।
कहने का तातपर्य यह कि अब पूरे विश्व में यात्रा करता हुआ 'क्रोनी-कैपिटलिज्म' अथवा 'याराना पूंजीवाद' अब अपने नए रूप में 'नेक इरादों का पूंजीवाद' बनकर हमारे देश में 'मुखा मुखम' हो रहा है और हम पलक पावड़े बिछाए इसके स्वागत में आतुर हैं। शायद यह गांधी जी के ट्रस्टीशिप के सिद्धांत का ही असर हो, जिस पर हमारे प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी भी अधिक जोर दे रहे हैं।
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