आइए भारत की स्वास्थ्य व्यवस्था की तकलीफ समझें और उसे मिलजुलकर दूर करवाएं?

आखिरकार भारत की स्वास्थ्य व्यवस्था की तकलीफ क्या है? आइए जानते हैं, समझते हैं, ताकि उसे दूर करने की एक सार्थक पहल कर सकें!

@ डॉ मनीष कुमार/वरिष्ठ न्यूरो सर्जन, दिल्ली-एनसीआर

किसी भी देश में स्वास्थ्य व्यवस्था सिर्फ आवश्यक नहीं, बल्कि सबसे महत्वपूर्ण सेवा है। लेकिन दुर्भाग्यवश आम आदमी या नागरिक सबसे ज्यादा समझौता इसी में/से करते हैं। वाकई, यदि व्यवस्था की ओर से इसका इंतज़ाम नहीं किया जाता है तो एक खाली जगह बन जाता है। जिसे कोई न कोई स्वतः ही भर देता है और इस तरह भारतीय चिकित्सा व्यवस्था के समानांतर "झोला छाप" चिकित्सक या कंपाउंडर नाम का शब्द जन्म लेता है!

# आखिर जीने में बाधा क्या है?

वैसे तो जीना सभी चाहते हैं, और वो भी जितना ज्यादा से ज्यादा हो सके। पर जीने में बाधा क्या है? यमराज किसके सीने में घुसा है? कैसे यमराज को नियंत्रित कर सकते हैं? यह सम्बन्धित देश की स्वास्थ्य सेवा का काम है। आइए बात भारत की करते हैं। यहां पर स्वास्थ्य की स्थिति के सभी मानक, चाहे वह जीने का औसत (एवरेज) साल हो या बच्चों की मृत्य दर हो या गर्भवती माताओं की मृत्य दर हो या कैंसर, टीबी या एचआईवी से संबंधित इलाज की बात हो, पश्चिमी देशों से हम बहुत पीछे हैं और इसका अहसास हर व्यक्ति को है। भारत के सामर्थ्यवान लोग भले ही अमेरिका और इंग्लैंड में इलाज करवा लेते हैं और डिग्रीधारी स्वास्थ्य कर्मी अच्छी कमाई के लिए अमेरिका, इंग्लैंड और अरब देशों का रुख कर लेते हैं! लेकिन भारत की धरती पर रहने वाले बाकी एक सौ पैंतीस करोड़ हिन्दुस्तानियों के स्वास्थ्य का भविष्य क्या है? यह सोच समझकर हर समझदार व्यक्ति का दिल कचोटने लगता है!

# स्वास्थ्य सेवा की उपलब्धता है एक समस्या 

सवाल है कि क्या लोग स्वास्थ्य सेवा की जरुरत नहीं महसूस करते? यह अनर्थक और विस्मयकारी सवाल है, क्योंकि यह मानव व्यवहार के विरुद्ध है। सच तो यह है कि स्वास्थ्य सेवा की उपलब्धता एक समस्या है। भले ही पिछले कुछ सालों से स्वास्थ्य सेवा पर केंद्र सरकार का खर्च बढ़ा है, वरना पहले तो यह 1 प्रतिशत से भी कम हुआ करता था। सरकारी स्वास्थ्य सेवायें ज्यादातर प्राथमिक चिकित्सा केंद्र पर केंद्रित ही हैं। देश के विभिन्न हिस्सों में राज्य सरकारों की स्थिति के हिसाब से स्वास्थ्य सेवायें जारी है, पर कुल मिलाकर एक तिहाई से भी कम लोग सरकारी अस्पतालों की सेवा प्राप्त कर पाते हैं। जबकि दुनिया में ऐसे भी देश हैं, जहाँ स्वास्थ्य सेवा पूरी तरह से सरकार के नियनत्रण में है और चिकित्सा सेवा हर व्यक्ति को आवश्यक रूप से उपलब्ध कराया जाता है। 

# जानिए कि किस देश में कैसी है व्यवस्था?

बहरहाल, आप अमेरिका, इंग्लैंड की बात छोड़ दीजिये, जहाँ चीन जैसे बड़े देश में 97 प्रतिशत लोग किसी न किसी हेल्थ इन्शुरन्स द्वारा सुरक्षित किये गए हैं, वहीं भूटान जैसा छोटा और गरीब देश भी शत-प्रतिशत मुफ्त चिकित्सा सेवा की गारंटी करता है। खास बात यह कि जो सेवा भूटान में  उपलब्ध नहीं है, उसके लिए रोगियों को भारत भेजा जाता है जिसका पूरा खर्चा भी वहां की सरकार उठाती है। इसलिए यहाँ पर यह जानना और समझना जरूरी है कि शत-प्रतिशत मुफ्त स्वास्थ्य सेवा क्यों और कैसे उपलब्ध है? बेशक, वहां की सरकारें पैसा समुद्र से नहीं लाती, बल्कि जो पैसे होते हैं उन्हें ही प्राथमिकता (प्रायोरिटी) से स्वास्थ्य सेवा पर खर्च करती हैं। एक बात और, इंग्लैंड में स्वास्थ्य सुविधाओं पर खर्च जीडीपी के 10 प्रतिशत से ज्यादा है, तो भारत में यह लगभग 1.28 प्रतिशत ही है, जबकि यह 1.28 प्रतिशत पहले से बहुत ज्यादा है! 

# एक साधारण इंसान की स्थिति से परखें स्वास्थ्य व्यवस्था को 

अब आर्थिक पहलू से, कुछेक उदाहरण से इसे समझते हैं। पहले हम एक साधारण इंसान की स्थिति देखें। मान लीजिये, किसी को पेट में दर्द होता है और उसे स्वास्थ्य सेवा की जरुरत महसूस हुई तो हमारे देश में क्या होगा? पहले अपने घर में उपलब्ध दवाएं, अपनी पसंद के हिसाब से लेगा। फिर पड़ोसी का मुफ्त सलाह लेगा। उसके बाद कोई राह चलते रिक्शा वाला, एम्बुलेंस ड्राइवर, या हो सकता है कि वह खुद अपनी जानकारी के हिसाब से, किसी डॉक्टर के पास पहुंचेगा। वो डॉक्टर साहब पहले अपने धंधे का हिसाब बनाएंगे। यदि (किस्मत से) उन्हीं डॉक्टर के डिपार्टमेंट का रोगी हुआ तो फिर भी ठीक, वरना जब उनकी मर्जी होगी, जब रोगी का ज्ञान चक्षु खुलेगा, तब डॉक्टर साहब अपनी पसंद (जिसका कारण उन्हीं को पता होगा) के डॉक्टर के पास भेजेंगे। फिर उसका इलाज शुरू होगा. . .! इसमें पैसे, घर से दूरी का कितना बड़ा रोल होगा, यह आपको समझने में देर नहीं लगी होगी। 

# इंग्लैंड और भारत की स्वास्थ्य व्यवस्था में यह है तफरका

अब इंग्लैंड जैसे देश में क्या होगा, यह समझाते हैं। वहां पर या तो वह इमरजेंसी नंबर डायल करेगा, या फिर पास के स्वास्थ्य केंद्र तक जाएगा। उसे एक पैसा नहीं लगाने वाला है। साथ ही, उसे यह भी नहीं सोचना है कि कौन से डॉक्टर के पास जाना है और कैसा इलाज करवाना है। पूर्व निर्धारित नियमों के हिसाब से उसको दिशा निर्देश दिया जाएगा और उसका इलाज होगा। वहीं, हमारे देश में स्वास्थ्य सेवा की उपलब्धता, उसकी दूरी और पैसे के अभाव में अन्य मुद्दे जैसे इलाज में देरी, एलोपैथ या आयुर्वेद जैसे मुद्दे उठते हैं और विभिन्न मृत्युदर बढ़ते हैं और एवरेज आयु कम रहती है। 

# नीतिगत निर्णय की गलतियों को मत छुपाईये!

सवाल है कि जब लोगों को इतनी दिक्कत होगी तो जाहिर है कि स्वास्थ्य सेवा की जरुरत के अहसास से भी पहले अन्य मुद्दे, जैसे उपलब्धता या आर्थिक मुद्दे हावी हो जाएंगे और फैसला लेने में बाधा उत्पन्न करेंगे। चाहे वह फैसला रोगी और उसके परिवार वालों को लेना हो या उनके चिकित्सक को। लेकिन हमारी व्यवस्था ने लोगों को मुख्य मुद्दों से हटाकर स्वास्थ्य सेवा के लिए कभी डॉक्टर तो कभी अस्पताल को जिम्मेवार ठहराया और टॉप नीतिगत निर्णय की गलतियों को छुपाने की कोशिश की।

# आखिर में क्या करना होगा?

खैर, ऐसे में करना क्या है? यह बात सबके दिल को अवश्य टटोलती है! इसलिए हर किसी को हेल्थ इन्शुरन्स करना चाहिए, या तो सरकार करवाए या फिर व्यक्तिगत हो, यह अति आवश्यक है और तुरंत होना चाहिए! भले ही हमारे प्रधानमन्त्री ने आयुष्मान भारत योजना शुरू की है, जो न्यूनतम जरुरत भी है, और उम्मीद है कि आने वाले सालों में यह और बेहतर होगा। 

# प्रशिक्षित डॉक्टर की है बहुत जरूरत 

जी, यह जानना और समझना बहुत जरूरी है। यह योजना न्यूनतम है एवं इसको और बेहतर करने की जरुरत है। उसके बाद सेवा में सुधार की जरुरत पर ध्यान दें, तो हमारे यहाँ प्रशिक्षित डॉक्टर की बहुत जरूरत है। यद्यपि देश के विभिन्न भागों में स्वास्थ्य सेवा की उपलब्धता में बहुत फर्क है, पर सबसे अच्छे राज्य में भी विश्व मानकों से कम ही है। और यह बहुत जल्दी ठीक होने वाला भी नहीं है। हिंदी पट्टी में तो आज के केरल जैसी व्यवस्था भी अगले पचास सालों में उपलब्ध हो जाये, तो गनीमत है। 

# तो फिर क्या करना चाहिए? 

बात सिर्फ प्रशिक्षित डॉक्टरों की नहीं है। यदि हम कुल स्वास्थ्य और सामजिक सेवा में एम्प्लॉयमेंट देखें तो अमेरिका, इंग्लैंड जैसे देशों में लगभग एक चौथाई है! वहां पर 10 प्रतिशत लोग तो कोर हेल्थ सेक्टर रिलेटेड कामों में एम्प्लॉयड हैं! और यह आवश्यक सेवा है। यदि व्यवस्था की ओर से इसका इंतज़ाम नहीं किया जाता है तो एक खाली जगह बन जाता है जिसे कोई न कोई स्वतः भर देता है और इस तरह "झोला छाप" चिकित्सक या कंपाउंडर नाम का शब्द जन्म लेता है!

# तो उस झोला-छाप की शिकायत मत कीजिये!

आप मानिए या नहीं मानिए, पर "झोला-छाप" हमारे समाज की जरुरत है, इसीलिए अस्तित्व में है और निकट भविष्य में यह जरुरत समाप्त होता नहीं दिख रहा है। तो फिर क्या करना चाहिए? उसकी दक्षता को आंक कर उसे व्यवस्था का हिस्सा बनाइये और इसीलिए मैं व्यक्तिगत रूप से वर्त्तमान सरकार के मिक्सोपैथी को मजबूरी मानता हूँ। किसी "झोला-छाप" को जिम्मेवार बनाने का उपाय करना स्वास्थ्य सेवा में कमी का त्वरित उपाय हो सकता है। लेकिन एक पूरी तरह से कनेक्टेड स्वास्थ्य नेटवर्क बनाना जरूरी है, तभी स्वास्थ्य सेवा सुचारू रूप से काम करेगा। आज नहीं तो निश्चय कल!

(लेखक, नजफगढ़ न्यूरो केयर सेंटर, नजफगढ़, दिल्ली/शकाई न्यूरो केयर सेंटर, द्वारिका, दिल्ली के संस्थापक हैं। उनका सम्पर्क नम्बर है- +91-9810325181, +918882348324)

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