जानिए, क्या होता है यूनिवर्सल बैंक और स्मॉल फाइनेंस बैंक? कैसे करते हैं ये काम और कहां है इनका ज्यादा प्रचलन?

जानिए, क्या होता है यूनिवर्सल बैंक और स्मॉल फाइनेंस बैंक? कैसे करते हैं ये काम और कहां है इनका ज्यादा प्रचलन?

@ कमलेश पांडेय/वरिष्ठ पत्रकार व स्तम्भकार

बैंकिंग प्रणाली में सार्वभौमिक बैंक का अपना महत्व है। इसे ही यूनिवर्सल बैंक भी कहते हैं। यह एक ऐसे सिस्टम के तहत काम करता है, जिसमें वो रिटेल, कॉमर्शियल और इन्वेस्टमेंट से जुड़ी विस्तृत फाइनेंशियल सेवाएं देता है। वैसे तो यूरोप और अमेरिका में यूनिवर्सल बैंकों का ज्यादा चलन है, लेकिन अब भारत ने भी इस बैंकिंग प्रणाली को अपना लिया है, ताकि इसकी मौलिक विशेषताओं का फायदा उठाया जा सके। 

वहीं, स्मॉल फाइनेंस बैंक, वो ​वित्तीय संस्थान होते हैं, जो उन लोगों और क्षेत्रों में वित्तीय (फाइनेंशियल) सेवाएं प्रदान करते हैं, जहां पारंपरिक या वाणिज्यिक (कॉमर्शियल) बैंक की पहुंच ही नहीं है। ये बैंक छोटे बिज़नेस, छोटे व सीमांत​ किसानों, सूक्ष्म, लघु व मध्यम स्तर की ईकाईयों और असंगठित क्षेत्र को बैंकिंग सर्विसेज, डिपॉजिट आदि की मूलभूत सुविधाएं देते हैं, जिसका प्रचलन भारत में भी बढ़ रहा है। इससे ग्रामीण इलाकों की महाजनी व्यवस्था भी प्रभावित हुई है।

देखा जाए तो यूनिवर्सल बैंकिंग (सार्वभौमिक बैंक पद्धति) एक वित्तीय शब्द है जिसका उपयोग किसी बैंक का वर्णन करने के लिए ही किया जाता है। दरअसल, यह एक ऐसा बैंक होता है जो वाणिज्यिक बैंक की तुलना में व्यापक प्रकार की सेवाएं प्रदान करता है। यहां पर जानने और समझने योग्य बात यह है कि यूरोप में लोकप्रिय, सार्वभौमिक बैंकिंग न केवल ग्राहकों के लिए व्यक्तिगत खातों का प्रबंधन कर सकती है, बल्कि कॉर्पोरेट सौदों को भी रेखांकित कर सकती है। इसके अलावा, ये निवेश सेवाएं भी प्रदान कर सकती है और स्टॉकब्रोकर के रूप में भी कार्य कर सकती है। यही वजह है कि इसे कभी-कभी वित्तीय सुपरमार्केट भी कहा जाता है। यह बात दीगर है कि सार्वभौमिक बैंकों के पास वित्तीय दुनिया की दुनिया भर में कई समर्थक और उत्कट अवरोधक भी हैं, जिससे यह अबतक पार उतरते आई है।

वहीं, कुछ क्षेत्रों में, स्टॉकब्रेकिंग और निवेश सेवाओं को भी कभी बचत और ऋण परिचालन के व्यवसाय से अलग नहीं किया गया है। उदाहरण स्वरूप, जर्मनी और स्विट्जरलैंड जैसे देशों में, बैंकों ने हमेशा एक ही छत के नीचे सार्वभौमिक सेवाओं की लगभग पेशकश की है। वहीं, अन्य देशों, जैसे कि संयुक्त राज्य अमेरिका (यूएसए) ने आम तौर पर नियमित बैंकिंग से निवेश सेवाओं को अलग करना ही पसंद किया है। यह बात अलग है कि बीसवीं और इक्कीसवीं सदी की शुरुआत में एक बार मजबूत लाइनें काफी धुंधली हो गई थीं, क्योंकि कई बैंकिंग समूह सेवाओं की व्यापक किस्मों की पेशकश करने लगे थे।

इस प्रकार देखा जाए तो यह अवधारणा अपनी मुख्य भूमि यूरोप में सदियों से मौजूद है, लेकिन सार्वभौमिक बैंकिंग ने वर्ष 2008 के वैश्विक वित्तीय संकट के परिणामस्वरूप एक तेजी देखी है, जिसमें कई अमेरिकी वित्तीय संस्थान मंदी के मद्देनजर विफल रहे। इस दौर में आई वित्तीय आपदा से बचने के लिए, कई निवेश और वाणिज्यिक बैंकिंग समूहों का परस्पर विलय हुआ, जिससे यूनिवर्सल (सार्वभौमिक) बैंक बने। फिर इन विलयों ने कई प्रमुख वित्तीय संस्थानों को बचाए रखने का प्रबंधन किया। हालांकि, कुछ लोगों ने सुझाव दिया है कि इसमें शामिल होने से वाणिज्यिक और निवेश बैंकों के बीच कानूनी अंतर को नजरअंदाज कर दिया गया था, जो सन 1933 के ग्लास-स्टीगल अधिनियम द्वारा कानून बनाया गया था।

सच कहा जाए तो सार्वभौमिक बैंक उपभोक्ता या वित्तीय क्षेत्र के लिए बेहद अच्छे हैं या उससे भी बुरे, इस बारे में कई तर्क वितर्क दिए जा सकते हैं। वहीं, कुछ लोगों का तर्क है कि बैंक के वाणिज्यिक विंग में जमा की गई धनराशि, जैसे व्यक्तिगत बचत या चेकिंग खातों में, खराब निवेश निर्णय होने पर बैंक को बचाए रखने में मदद करते हैं। यह इसके  समर्थकों का तर्क है। निःसंदेह, एक खराब बाजार में संघर्षरत बैंक को बचाए रखकर इसके माध्यम वित्तीय संकट को रोका जा सकता है। वहीं, प्रस्तावक बताते हैं कि सार्वभौमिक बैंकिंग सभी वित्तीय जरूरतों के लिए वन-स्टॉप खरीदारी प्रदान करती है, जिसमें कागजी कार्रवाई में कटौती, प्रलेखन भ्रमित करना और एक सामान्य खाता होने से संपत्ति और जिम्मेदारियों को स्पष्ट करना शामिल है।

वहीं, सार्वभौमिक बैंकों में एक बड़ा खतरा यह भी है कि वे ठीक से चलाने के लिए बहुत बड़े हो सकते हैं, जिससे गंभीर ओवरसाइट त्रुटियों और वित्तीय तबाही की संभावना हो सकती है, अगर पूरे बैंक में तह दर तह निर्णय हो। जबकि, छोटे देशों में स्थित सार्वभौमिक बैंकों के साथ, जैसे कि स्विट्जरलैंड, बैंक का विकास बाजार के आकार से कुछ हद तक सीमित हो सकता है। वहीं, बड़े पैमाने पर, बहु-राष्ट्रीय बैंकिंग समूह, हालांकि, लगभग असीमित बाजार हैं और इसलिए ये सार्वभौमिक सेवाओं की पेशकश करके अविश्वसनीय रूप से बढ़ने का मौका देते हैं। सच कहा जाए तो एक विशाल सार्वभौमिक बैंकिंग समूह में, कमांड की श्रृंखला भ्रमित हो सकती है, जबकि जोखिम को आमतौर पर स्थिर बाजारों में धकेल दिया जा सकता है, जहां विफलता का प्रभाव कहीं अधिक होता है।

# भारत में ऐसे काम करते हैं यूनिवर्सल बैंक और स्मॉल फाइनेंस बैंक

भारतीय रिजर्व बैंक (आरबीआई) ने प्राइवेट सेक्टर के उन आठ आवेदकों के नाम जारी कर दिये हैं, जिन्होंने यूनिवर्सल बैंक व स्मॉल फाइनेंस बैंक के लिए आवेदन किया है। इसी साल यानी मार्च 2021 में ही आरबीआई की ओर इस सम्बन्ध में एक नई गाइडलाइंस भी जारी कर दी गई है। भारतीय रिज़र्व बैंक ने उसी समय प्राइवेट सेक्टर के यूनिवर्सल बैंकों और स्मॉल फाइनेंस बैंकों के ‘ऑन टैप’ लाइसेंसिंग प्रक्रिया के लिए नाम जारी कर दिया है। 

जहां, यूनिवर्सल बैंकों के तहत ऑन टैप लाइसेंसिंग के लिए यूएई एक्सचेंज एंड फाइनेंशियल सर्विसेज लिमिटेड, द रेपाट्रिएट्स कोऑपरेटिव फाइनेंस एंड डेवलपमेंट बैंक लिमिटेड (रेपको) बैंक, चैतन्य इंडिया फिन क्रेडिट प्राइवेट लिमिटेड और श्री पंकज वैश एंड का नाम जारी किया गया है। वहीं, स्मॉल फाइनेंस बैंकों के तहत ऑन टैप लाइसेंसिंग की लिस्ट में वीसॉफ्ट टेक्नोलॉजी प्राइवेट लिमिटेड, कैलिकट सिटी सर्विस को-ऑपरेटिव बैंक लिमिटेड, श्री अखिल कुमार गुप्ता एंड द्वारा क्षेत्रीय ग्रामीण फाइनेंशियल सर्विसेज प्राइवेट लिमिटेड का नाम जारी किया गया है। तब आरबीआई की ओर से इन नामों के बारे में जानकारी देते हुए कहा गया था कि अब इनके एप्लीकेशंस को आरबीआई की पैनल रिव्यू करेगी।

# मार्च 2021 में हुआ गाइडलाइंस का ऐलान

आरबीआई ने 1अगस्त 2016 और 5 दिसंबर 2019 को प्राइवेट सेक्टर के यूनिवर्सल बैंक और स्मॉल फाइनेंस बैंकों के तहत ऑन टैप लाइसेंसिंग के लिए गाइडलाइंस जारी किया था। जबकि, 22 मार्च 2021 को इन गाइडलाइंस के मूल्यांकन के लिए एक्सटर्नल एडवाइजरी कमेटी के कॉन्स्टिट्यूशन व कंपोजिशन का ऐलान किया गया था। इस एडवाइजरी कमेटी की अगुवाई पूर्व डिप्टी गवर्नर श्यामल गोपीनाथ कर रहे हैं।

# आरबीआई की गाइडलाइंस में ये हैं प्रमुख बातें

इसके पहले अंतिम बार आरबीआई ने आईडीएफसी बैंक और बंधन फाइनेंशियल एप्लीकेशंस को 2015 में यूनिवर्सल बैंक का लाइसेंस जारी किया था। बता दें कि आरबीआई की गाइडलाइंस के अनुसार, इन बैंकों के लिए वही लोग योग्य प्रोमोटर्स होंगे जो भारतीय प्रोफेशनल्स होंगे। जिनके पास बैंकिंग व फाइनेंस क्षेत्र में सीनियर लेवल पर कम से कम 10 साल का अनुभव होगा। वहीं, पिछले 10 साल में इनका ट्रैक रिकॉर्ड भी बेहतर होना चाहिए। 

आरबीआई ने यह भी स्पष्ट कर दिया है कि केवल वही ईकाई लाइसेंस के लिए आवदेन कर सकती हैं, जिनके पास 5,000 करोड़ रुपये या इससे ज्यादा की संपत्ति हो। साथ ही, ग्रुप के कुल संपत्ति या ग्रॉस इनकम में नॉन-फाइनेंशियल बिजनेस की हिस्सेदारी 40 फीसदी से अधिक न हो। इसके अलावा, यूनिवर्सल बैंक खोलने के लिए कम से कम 500 करोड़ रुपये की पेड-अप वोटिंग मल्टीपल कैपिटल होनी चाहिए। इसके अतिरिक्त, बैंक का नेटवर्थ हमेशा 500 करोड़ रुपये से ज्यादा होना चाहिए।

वहीं, स्मॉल फाइनेंस बैंकों के लिए पेड-अप वोटिंग कैपिटल और नेटवर्थ कम से कम 200 करोड़ रुपये होनी चाहिए।
यदि कोई अबर्न को-ऑपेरटिव बैंक स्‍मॉल फाइनेंस बैंक में बदलना चाहता है तो उसके पास 100 करोड़ रुपये की नेटवर्थ होनी चाहिए। इसके अलावा, बैंक को अपनी नेटवर्थ बढ़ाकर अगले 5 साल में 200 करोड़ रुपये करनी चाहिए।

# क्या होता है ऑन टैप लाइसेंस?

बता दें कि स्मॉल फाइनेंस बैंकों की स्थापना के लिए आरबीआई ऑन टैप लाइसेंस देता है। जिसका मतलब होता है कि कोई ईकाई तय गाइडलाइंस को पूरा करने के बाद स्मॉल फाइनेंस बैंक का लाइसेंस ले सकती है। इसके तहत, उन्हें कोई अतिरिक्त मंजूरी लेने की जरूरत नहीं होती है। ऑन टैप लाइसेंस लेने वाले के पास बैंकिंग व वित्तीय सेक्टर की जानकारी होनी चाहिए।

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