आश्चर्यजनक! गर्भ की जगह मां की आंत में पले बच्चे को सर्जरी कर बाहर निकाला
वरिष्ठ स्त्री रोग विशेषज्ञ डॉ अंजलि चौधरी ने किया शल्य चमत्कार
# गर्भ की जगह मां की आंत में पले बच्चे को सर्जरी कर बाहर निकाला
# जच्चा-बच्चा स्वस्थ, अस्पताल प्रबंधन ने गौरवांवित महसूस किया
@ कमलेश पांडेय/वरिष्ठ पत्रकार व स्तम्भकार
दिल्ली/गाजियाबाद। प्रकृति कभी कभी ऐसे करिश्मे कर डालती है कि स्वास्थ्य विशेषज्ञ भी हैरान रह जाते हैं। गत दिनों लक्ष्मीनगर,दिल्ली निवासी सोनी खान के साथ कुछ ऐसा ही हुआ। दरअसल उनके गर्भ में भ्रूण को जीवन बच्चेदानी की बजाय आंतों की झिल्लियों (पेरिटोनियम) में मिला, जो हैरत की बात है।
आलम यह कि भ्रूण पूरे नौ माह तक इसी जगह पर रहा। फिर, गर्भावस्था की अवधि पूरी होने पर चित्रा विहार स्थित आरोग्य अस्पताल में डॉक्टरों की टीम ने आपरेशन कर प्रसव कराया। उनके नवजात का वजन 2.65 किलो है। चिकित्सक ने बताया कि जच्चा-बच्चा दोनों पूरी तरह से स्वस्थ हैं और कुछ दिन अस्पताल में भर्ती रहे। फिर दोनों को छुट्टी दे दी गई। आरोग्य ग्रुप ऑफ हॉस्पिटल के सीएमडी डॉ उमेश वर्मा ने ऐसे अप्रत्याशित सफल आपरेशन के लिए डाक्टरों की टीम को बधाई दी है।
वहीं, आरोग्य अस्पताल के सीईओ डॉ अनूप सिंह ने बताया कि सीनियर गाइनोकोलाजिस्ट डा. अंजलि चौधरी के साथ बाल रोग विशेषज्ञ नीति अग्रवाल और एनेस्थीसिया विशेषज्ञ डा. निश्छल गुप्ता की टीम ने इस जटिल आपरेशन को अपनी लगन व मेहनत से सफल बनाया। इस सम्बन्ध।में पूछे जाने पर डॉक्टरों की टीम का नेतृत्व कर रहीं डॉ अंजलि चौधरी ने बताया कि यह उनके जीवन का पहला मामला है। इसे कुदरत का करिश्मा ही कहेंगे कि बच्चेदानी में कोई गड़बड़ी नहीं पाई गई है। सोनी का भ्रूण आंतों की झिल्लियों के बीच गर्भ पहुंच गया और उसने अपना समय भी पूरा किया है। सोनी खान अपने पति शेख असरार के साथ सातवें महीने में उनके पास पहुंची थी। इससे पहले छह बार उनका अल्ट्रासाउंड हो चुका था, लेकिन इसके बारे में पता नहीं चल पाया कि भ्रूण बच्चेदानी में नहीं है।
गत शुक्रवार को ही सोनी खान प्रसव पीड़ा के साथ अस्पताल पहुंची थी। जांच में पता चला कि भ्रूण उल्टा है और फिर बच्चे का जन्म लेना दुर्लभ है। ऐसे में आपरेशन करना जरूरी है। गौरतलब है कि सोनी का पहला बच्चा का जन्म भी आपरेशन से ही हुआ था, लेकिन वह बच्चेदानी में ही था। उधर, सोनी व उनके परिवार ने इसके लिए अस्पताल के डाक्टरों का आभार जताया है। जानकारों के मुताबिक, इस तरह के मामले दुर्लभ हैं। पांच साल पहले ऐसा ही एक मामला लखनऊ में सामने आया था।
इस बारे में पूछे जाने पर दिल्ली गाइनोकोलाजिस्ट फोरम की महासचिव डॉ शारदा जैन बताती हैं कि इस तरह का लाखों में एक मामला सामने आता है। दरअसल बच्चेदानी में छेद या अन्य कारण के दौरान ही हमें यह पता चला कि किसी कारण से भ्रूण आंतों की झिल्लियों के पास है। आतों के पास भ्रूण चिपक जाता है। ऐसे में बेहद सावधानी की जरूरत है। अगर रक्त की आपूर्ति में कोई व्यवधान नहीं है तो भ्रूण जीवित रह जाता है। इस मामले में भी ऐसा ही हुआ है।
देखा जाए तो आरोग्य अस्पताल, वैशाली सेक्टर 6 की एक अन्य इकाई चित्रा विहार, दिल्ली में एक ऐसे बच्चे का जन्म शल्यक्रिया के सहारे हुआ, जिसकी परवरिश मां की गर्भ के बजाय उसकी आंत में हुई है। वरिष्ठ स्त्री रोग विशेषज्ञ डॉ अंजलि चौधरी ने अपने सीज़र सेक्शन में जब इस रोगी का ऑपरेशन किया तो उनके पिछले अनुभवों के उलट एक नई स्थिति से उनका साक्षात्कार हुआ। उन्होंने अपनी हिम्मत नहीं हारी, क्योंकि अपने सीज़र सेक्शन में उन्होंने कई बार दुर्लभ ऑपरेशन किया है।
अपना अनुभव साझा करते हुए डॉ चौधरी ने विस्तार पूर्वक बताया कि इस महिला रोगी की जब पेट खोलने के तुरंत बाद रोगी को तेज रक्तस्राव होने लगा तो यह सोचा गया कि हो सकता है कि रोगी को प्लेसेंटा परक्रेटा हो। लेकिन उनकी खुशी का तब ठिकाना नहीं रहा जब 38 सप्ताह के 2.65 किलोग्राम स्वस्थ बच्चे का जन्म हुआ। इस प्रकार बदली परिस्थितियों में रक्त एवं रक्त उत्पादों की व्यवस्था के साथ जीवन रक्षक हिस्टेरेक्टॉमी शुरू हुई। तब यह महसूस किया गया कि यह आंत्र का पालन करने वाला प्लेसेंटा परक्रेटा नहीं था बल्कि यह था सेकेंडरी एब्डोमिनल इंट्रा पेरिटोनियल एक्स्ट्रा यूट्रीन प्रेग्नेंसी, जिसमें आंत्र और ओमेंटम से आहार वाहिकाओं को प्राप्त करना अहम था। आखिरकार यह सर्जरी सफल रही। फिलहाल मां और बच्चा दोनों स्थिर हैं।
चिकित्सक के मुताबिक, प्रारंभिक चिकित्सा साहित्य की समीक्षा करने पर इस तरह के मामलों की कभी-कभार ही रिपोर्ट उपलब्ध होती है। अब तक गर्भाशय में पूर्ण अवधि के अतिरिक्त उदर गर्भावस्था के लिए कोई भी मामला या रिपोर्ट किसी भारतीय चिकित्सक या लेखक द्वारा प्रकाशित नहीं मिली है। इस प्रकार यह चिकित्सा पेशा से जुड़े लोगों के लिए एक अत्यंत चुनौतीपूर्ण और उच्च ओकटाइन सर्जरी थी।
कहना न होगा कि डॉ अंजलि चौधरी ने जिस हौसले से कार्यभार संभाला और अंत अंत तक अपना नेतृत्व बनाए रखते हुए स्पष्टता के साथ सबसे कठिन क्षण को पार किया, जहां जच्चा और बच्चा के जीवन को बचाये रखने का सवाल अहम रहा, उससेे स्पष्ट हो गया कि वह आरोग्य अस्पताल का नाम रोशन करती है और हम सभी को गौरवान्वित करती है। इस टीम में डॉ अंजलि चौधरी, वरिष्ठ स्त्री रोग विशेषज्ञ के अलावा डॉ नीति अग्रवाल, बच्चों का चिकित्सक; डॉ निश्चल गुप्ता, निश्चेतना विशेषज्ञ और डॉ उमेश वर्मा, सीएमडी, आरोग्य ग्रुप ऑफ हॉस्पिटल, वैशाली सेक्टर 6 शामिल रहे। इस बात की जानकारी अनूप सिंह, सीईओ, आरोग्य अस्पताल सेक्टर 6 वैशाली, गाजियाबाद ने दी।
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