जानिए, पूर्व व्यापी कर (रेट्रो टैक्स) क्या है? सरकार ने इसे क्यों समाप्त किया? एफडीआई पर इसका क्या असर होगा?

जानिए, पूर्व व्यापी कर (रेट्रो टैक्स) क्या है? सरकार ने इसे क्यों समाप्त किया? एफडीआई पर इसका क्या असर होगा?

@ कमलेश पांडेय/वरिष्ठ पत्रकार व स्तंभकार

पूर्व व्यापी कर यानी रेट्रो टैक्स एक अस्वाभाविक टैक्स समझा जाता है जो लगभग एक दशक तक केन्द्र सरकार के गले की हड्डी बनी रही। पूर्व अर्थशास्त्री प्रधानमंत्री डॉ मनमोहन सिंह और उनके बीरबल नुमा वित्तमंत्री प्रणव मुखर्जी (अब पूर्व राष्ट्रपति) की शानदार सियासी जोड़ी द्वारा थोपे गए रेट्रो टैक्स ने विदेशों में भारत की इतनी जगहंसाई कराई कि मौजूदा प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और उनकी काबिल वित्तमंत्री निर्मला सीतारमण को पिछले 8-9 साल से हतोत्साहित एफडीआई को प्रोत्साहित करने की गरज से इस कानून को ही वापस लेना पड़ा। 

यहां पर एक दिलचस्प सवाल उठ रहा है कि जब तत्कालीन राष्ट्रपति प्रणव मुखर्जी और वर्तमान प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी एक दूसरे के मुरीद समझे जाते हों और पूर्व अर्थशास्त्री  प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह और वर्तमान वित्तमंत्री निर्मला सीतारमण की विद्वता संदेह से परे हो, तो फिर इस दादागिरी भरे कर कानून को लाना गलत था, या फिर इसे वापस लेना गलत है। वह इसलिए कि इस कानून को समाप्त किये जाने के बाद अब भारत सरकार को निजी कंपनियों को हजारों करोड़ रुपये लौटने भी पड़ेंगे। इसलिए भारतवासी जानना चाह रहे होंगे कि इस मामले में यूपीए की सरकार गलत थी या एनडीए की सरकार गलत है और पूंजीपतियों के हित में फैसले ले रही है। इस बातों का  उत्तर आपको आगे मिलेगा।

इस बात में कोई दो राय नहीं कि भारत में सरकारी खजानों को भरने के लिए नाना प्रकार के कर यानी टैक्स लगाए जाते रहे हैं। लेकिन तत्कालीन अर्थशास्त्री प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह और उनके चतुर वित्तमंत्री प्रणव मुखर्जी (अब पूर्व राष्ट्रपति) के सियासी चलती के दौर में एक ऐसा भी टैक्स लगाया गया, जिसका आधार ही वाकई काल्पनिक था। और आरोप यह कि इसने देश में एफडीआई के प्रवाह को ही धीमा कर दिया था। इससे देश की वित्तीय स्थिति जो यूपीए टू की सरकार के समय लड़खड़ाई, वह एनडीए टू की सरकार के 2 साल गुजर जाने के बाद भी पटरी पर नहीं लौटी है। 

दरअसल, यह टैक्स था- रेट्रो टैक्स। हिंदी में इसे पूर्व व्यापी कर कहा जाता है। इसे वर्ष 2012-13 के बजट में तत्कालीन वित्तमंत्री प्रणब मुखर्जी ने मूर्त रूप दिया था। इसके तहत भारत में सन 1962 यानी भारत-चीन युद्ध के बाद जितने बड़े कॉरपोरेट सौदे हुए, यानी कि शेयरों के ट्रांसफर हुए, उन सभी पर कर विभाग को पीछे की तिथि से टैक्स लगाने का अधिकार दे दिया गया था। प्रथम दृष्टया तो यही लगता है कि पिछले दरवाजे से भारत में चीन द्वारा करवाये जा रहे विदेशी निवेश को हतोत्साहित करने के लिए ऐसा जटिल कानून लाया गया हो। क्योंकि कर विभाग ने अपने इस अधिकार का खूब इस्तेमाल किया। हालांकि, दो कंपनियों का मामला उम्मीद से बहुत ज्यादा गरमा गया। इसमें एक थी बहुराष्ट्रीय दूरसंचार कंपनी वोडाफोन और दूसरी थी ऑयल कंपनी केयर्न। इनसे जुड़ा मामला वैश्विक अदालतों तक भी पहुंचा, जहां भारत सरकार को मुंहकी खानी पड़ी।

बता दें कि वोडाफोन ने भारत में 'हचिसन व्हामपो' कंपनी से उसके 67 फीसदी शेयर खरीदे थे और केयर्न को वेदांत समूह ने खरीद लिया था। इसप्रकार वोडाफोन को आयकर विभाग ने पहले तो महज 8,000 करोड़ रुपये का नोटिस पकड़ाया और फिर वर्ष 2016 आते-आते यह रकम 22,000 करोड़ रुपये हो गई। कहा जाता है कि यह टैक्स दादागीरी का एक ऐसा अद्भुत नमूना था, जिसमें कर विभाग ने अपनी कल्पना के तमाम घोड़े दौड़ा दिए थे। 

इसी प्रकार से केयर्न इंडिया पर भी 10,247 करोड़ रुपये का टैक्स जड़ दिया गया। फिर केयर्न कम्पनी ने इसके खिलाफ न्यायालय का दरवाजा खटखटाया तो सही, पर उसे वहां पर कोई राहत नहीं मिली। नतीजतन कर विभाग ने बकाया रकम पर जुर्माना वगैरह लगा दिया, जिससे यह रकम बढ़कर 24,500 करोड़ रुपये हो गई। 

वास्तव में यह दोनों इतनी बड़ी रकम है, जिसे देने में बड़ी से बड़ी कंपनियों के छक्के छूट जाएं। और दोनों कम्पनियों के वाकई छक्के छूट गए। एक ओर वोडाफोन अपनी कारोबारी बर्बादी के कगार पर पहुंच गई, वहीं दूसरी ओर वर्ष 2015 में कर अधिकारियों ने केयर्न के एक अरब डॉलर के शेयर भी जब्त कर लिए। इतना ही नहीं, उसके लाभांश में से 1,140 करोड़ रुपये भी हड़प लिए। यही वजह है कि दोनों कंपनियों ने अंतरराष्ट्रीय अदालतों के दरवाजे पर दस्तक दिए। दोनों कम्पनी सबसे पहले हेग स्थित स्थायी आरबिट्रेशन में जा पहुंची, जहां फैसला उनके हक में आया। 

बताया जाता है कि भारत सरकार को अंतरराष्ट्रीय अदालत ने केयर्न एनर्जी को उसके नुकसान की भरपाई के लिए 1.4 अरब डॉलर देने का आदेश दिया। यही नहीं, फ्रांस की एक अदालत ने तो इस मामले में भारत सरकार की पेरिस स्थित संपत्तियां, जिनकी कीमत दो करोड़ तीस लाख यूरो आंकी गई, को जब्त करने और उन्हें बेचने का आदेश दिया, ताकि केयर्न के घाटे को पूरा किया जा सके। समझा जाता है कि इससे भारत की काफी जगहंसाई हुई, जिससे भाजपा सरकार इस मामले में फौरन फैसला लेने को मजबूर हुई।

खास बात यह कि वित्तमंत्री निर्मला सीतारमण ने पिछले दिनों लोक सभा में एक बिल पेश करके इस पूर्व व्यापी कर यानी रेट्रो टैक्स के ड्रामे का नाटकीयता पूर्वक पटाक्षेप कर दिया। उनके द्वारा संसद में प्रस्तुत किए गए इस बिल में कहा गया है कि ऐसे संशोधन की आवश्यकता इसलिए पड़ी कि यह टैक्स निश्चितता के सिद्धांत का हनन करता है और देश में आने वाले विदेशी निवेश की राह में रोड़े अटकाता है। वस्तुतः यह एक आकर्षक निवेश केंद्र के तौर पर स्थापित हो रहे भारत की ख्याति पर गहरा धब्बा है। विधेयक में यह भी कहा गया कि इससे संभावित निवेशकों के लिए किसी तरह का व्यवधान न हो, इसलिए यह व्यवस्था बहुत जरूरी है। 

याद दिला दें कि भाजपा ने वर्ष 2014 के चुनाव के समय ही यह वादा किया था कि अगर उसकी पार्टी सत्ता में आई, तो वह इस अतिवादी टैक्स (पूर्व व्यापी कर-रेट्रो टैक्स) को समाप्त कर देगी। यहां पर यह सवाल स्वाभाविक तौर पर यह उठ रहा है कि जब ऐसा था तो फिर उसने इतना लंबा वक्त यानी 7 साल क्यों लगाया? जानकार भी हैरानी जताते हुए कहते हैं कि हो सकता है कि इसके पीछे वित्त मंत्रालय को भारी-भरकम रकम दिख रही हो। उनके मुताबिक, इस मामले में दो बातें स्पष्ट थीं। पहली तो यह कि क्या पहले की तिथि से टैक्स वसूला जा सकता है? और दूसरा यह कि विदेशी संस्थागत निवेशकों से ऐसे किसी टैक्स की वसूली हो सकती है? 

ऐसा इसलिए कि जब एक वैश्विक कारोबारी कोई सौदा तय करता है, तो वह मौजूदा नियमों व कानूनों को देखकर ही ऐसा करता है। वास्तव में, उस समय के ही कानून उस पर लागू भी होते आये हैं। ऐसे में कोई नया कानून, जो अतीत में हुए सौदों पर छाया डालता हो, अतिरिक्त कर वसूलने को उत्प्रेरित करता हो, किसी के लिए भी स्वाभाविक व स्थापित न्याय की भावना के विरुद्ध होता है। खुशी की बात यह है कि देश-विदेश में अब काफी कुछ हो जाने के बाद मौजूदा नरेंद्र मोदी सरकार चेत गई है और उसने इसे वापस ले लिया है। निःसंदेह, ऐसा करना बहुत जरूरी था, क्योंकि वैश्विक महामारी कोरोना वायरस की मार से त्रस्त भारतीय अर्थव्यवस्था को इस समय विदेशी निवेश की काफी आवश्यकता है। समझा जाता है कि वोडाफोन, केयर्न समेत कुल 17 मामलों में पुरानी तारीखों से कैपिटल गेन पर टैक्‍स वसूली को लेकर जारी विवाद के खत्म होने से भारत में बहुराष्ट्रीय कम्पनियों की दिलचस्पी फिर बढ़ेगी, जिससे भारतीय अर्थव्यवस्था को आशातीत गति मिलेगी।

 मोदी सरकार ने कई कंपनियों के साथ चल रहे टैक्‍स विवाद को खत्‍म करने की दिशा में एक बड़ी पहल की और रेट्रोस्‍पेक्टिव टैक्‍स डिमांड के प्रावधान को वापस लेने के लिए रेट्रो टैक्‍स रोलबैक बिल गत दिनों लोकसभा में पेश किया। जिसके संशोधन प्रस्‍ताव के मुताबिक, पुरानी तारीखों से कैपिटल गेन पर टैक्स वसूली का नियम खत्म होगा। इसमें एक खास बात यह है कि सरकार पुराने वसूले गए टैक्स बिना ब्याज वापस कर सकती है। इसके लिए कंपनियों को लिखित में देना होगा कि आगे वो कोई क्लेम नहीं करेंगी। 

# जानिए, क्‍या था वोडाफोन और केयर्न टैक्‍स विवाद और क्या निकला हल

साल 2012 में सुप्रीम कोर्ट ने वोडाफोन ग्रुप के इनकम टैक्‍स कानून की व्‍याख्‍या को सही माना और कहा कि कंपनी को हिस्‍सेदारी खरीदने पर कोई टैक्‍स नहीं देना है। इसके बाद तत्‍कालीन वित्‍त मंत्री प्रवण मुखर्जी ने फाइनेंस बिल में एक संशोधन का प्रास्‍ताव किया, जिसमें टैक्‍स अधिकारियों को इस तरह की डील पर रेट्रो टैक्‍स वसूली का अधिकार दिया गया। आश्चर्यजनक बात यह है कि उसी साल यह बिल संसद से पास भी हो गया। भारत सरकार और वोडाफोन के बीच यह मामला तकरीबन 20,000 करोड़ के रेट्रोस्पेक्टिव टैक्स को लेकर था। वोडाफोन और सरकार के बीच कोई सहमति ना बन पाने के कारण 2016 कंपनी ने इंटरनेशनल कोर्ट ऑफ जस्टिस का रुख किया था। जहां चली लंबी सुनवाई के बाद वोडाफोन को राहत मिली।

इसी तरह का मामला केयर्न एनर्जी पीएलसी के शेयर ट्रांसफर को लेकर भी था। केयर्न ने 2006 में अपनी भारतीय इकाई का बीएसई पर लिस्‍ट कराया था। पांच साल बाद सरकार ने एक रेट्रोस्‍पेक्टिव टैक्‍स कानून पारित किया और केयर्न पर 10,247 करोड़ रुपये के ब्याज और जुर्माना लगाया। यह टैक्‍स डिमांड कंपनी पैटर्न यानी प्राइवेट से पब्लिक लिमिटेड बनाने और दोबारा से गठन करने को लेकर थी। यह मामला भी हेग के एक आर्बिट्रेशन ट्रिब्‍यूनल में गया। इंटरनेशनल आर्बिट्रेशन ने दिसंबर 2020 में केयर्न एनर्जी के पक्ष में फैसला सुनाया था और कहा था कि भारत सरकार उसके 1.2 अरब डॉलर यानी 8,800 करोड़ रुपये से जयादा वापस करे। हालांकि, तब सरकार ने पैसे लौटाने पर सहमत नहीं थी।

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