खेल को शौकिया मत खेलिए, बल्कि प्रोफेशन के रूप में अपनाइए: अभिषेक कुमार
जानिए कैसे एक खिलाड़ी बन गया अधिशासी अधिकारी?
# खेल को शौकिया मत खेलिए, बल्कि प्रोफेशन के रूप में अपनाइए: अभिषेक कुमार
# जब ये आपका जुनून बन जाएगा, तब आप सफलता के शिखर पर होंगे: अभिषेक कुमार
कमलेश पांडेय/भास्कर ब्यूरो
गाजियाबाद। भले ही समय और परिस्थितियों पर कभी भी किसी का वश नहीं चलता है, लेकिन जो उनके अनुरूप खुद को ढाल लेता है, जिंदगी में वही आगे बढ़ता है और सफलता दर सफलता प्राप्त करता है। मुरादनगर नगरपालिका परिषद के अधिशासी अधिकारी अभिषेक कुमार एक ऐसे व्यक्ति हैं, जिनकी पूरी अभिरुचि तो रही खेल के मैदान में, लेकिन जीवन की कुछ अनहोनी और कुछ पारिवारिक प्रेरणा ने उन्हें खिलाड़ी के बजाय आमलोगों के काम आने वाला अधिशासी अधिकारी बना दिया।
अंबेडकरनगर जनपद के मूल निवासी अभिषेक कुमार की पारिवारिक पृष्ठभूमि भले ही कृषक और शिक्षक परिवार की रही हो, लेकिन उनका मन पढ़ाई-लिखाई में कम और खेल-कूद के मैदान में ज्यादा लगता था। क्रिकेट, फुटबॉल और कबड्डी के जबर्दस्त खिलाड़ी रहे श्री कुमार का दाहिना अंगूठा यदि घास काटने वाली मशीन से नहीं कटा होता तो वह खेल की दुनिया में अपनी किस्मत आजमाते, जनसेवा की दांवपेंच वाली दुनिया में नहीं।
वर्ष 1992 में दशवीं और वर्ष 1996 में स्नातक करने वाले ईओ अभिषेक कुमार इंटर करते करते यूपी कबड्डी टीम की तरफ से विभिन्न अंतर जनपदीय व अंतरराज्यीय खेल प्रतिस्पर्धा में शिरकत करके और बाजी जितवाकर अपना नाम काफी रौशन कर चुके थे। वहीं, स्नातक करते करते क्रिकेट के खेल में भी माहिर हो चुके थे। उन्होंने इलाहाबाद विश्वविद्यालय की अंतर विश्वविद्यालय क्रिकेट खेल प्रतिस्पर्धा में भी कई बार हिस्सा लिया और मैच जीते। वह रणजी ट्राफी के लिए चयनित 24 लोगों की टीम में भी विश्वविद्यालय की ओर से शामिल किए जाते थे।
लेकिन वर्ष 1997 में उनके दाहिना अंगूठा का कटना उनके खेल करियर के लिए अभिशाप साबित हुआ। उनके सारे खेल सम्बन्धी अरमान धरे के धरे रह गए। इसी बीच उनके भाई और चचेरे भाई ने प्रतिष्ठित केंद्रीय प्रशासनिक सेवा और राज्य प्रशासनिक सेवा में बाजी मार ली। जिससे उनके सोचने का नजरिया भी बदल गया और उन्होंने प्रशासनिक सेवाओं की तैयारी शुरू कर दी। वर्ष 1998 से 2002 तक उन्होंने प्रारंभिक परीक्षा, मुख्य परीक्षा और साक्षात्कार तक के सुनहरे लम्हे तो देखे, लेकिन कभी 7 अंक से तो कभी 2 अंक के अंतिम परिणाम में पिछड़ गए। फिर भी जब उन्होंने हिम्मत नहीं हारी तो वर्ष 2002 में उन्होंने पीसीएस की परीक्षा में बाजी मार ली। और आज इस मुकाम तक पहुंचे हैं। 1998 में उनका चयन यूपी में सब-इंस्पेक्टर पद के लिए हो चुका था, लेकिन उन्होंने वहां जॉइन नहीं किया। क्योंकि अच्छे खिलाड़ी के सपने के बिखर जाने के बाद एक नेक दिल अधिकारी बनने की चाह उनके मन में जगी, जिसे उन्होंने पूरा किया। वे एक बार आईएएस और 5 बार पीसीएस की परीक्षा में बैठ चुके हैं।
हाल ही में संपन्न ओलंपिक खेल के कारण जब देश के युवाओं पर खेल का शुरुर सवार हो तब नवोदित प्रतिभाशाली खिलाड़ियों तक वो अपने जीवन का चंद अनुभव साझा करते हुए कहा कि हमारे समय में खेल के लिए उचित तकनीकी की कमी थी और आवश्यक सुविधाओं की किल्लत। लेकिन आज स्थिति बदल चुकी है।अब खिलाड़ियों के लिए समुचित सुविधाएँ और अत्याधुनिक तकनीकी दोनों उपलब्ध हैं, जिन्हें साधकर खिलाड़ी अव्वल प्रदर्शन भी कर रहे हैं।
आलम यह है कि बैडमिंटन, टेनिस, रेसलिंग, बॉक्सिंग आदि क्षेत्रों में तो देश के खिलाड़ियों के पास अंतरराष्ट्रीय स्तर की सुविधाएं व कोच भी उपलब्ध हैं। अन्य क्षेत्रों के लिए भी सरकार यथोचित उपाय कर रही है। इसलिए आज के प्रतिभावान खिलाड़ियों को मैं इतना ही सुझाव दूंगा कि खेल को शौकिया मत खेलिए, बल्कि प्रोफेशन के रूप में अपनाइए। एक बार ऐसा करना शुरू करेंगे तो ये आपका जुनून बन जाएगा। जब ये आपका जुनून बन जाएगा तब आप सफलता के शिखर पर होंगे। यही सोचिए और अपने साथियों की सोच को भी बदल दीजिये।
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