गोरों से आजादी मिली, कालों ने फिर गुलाम बना लिया!
गोरों से आजादी मिली, कालों ने फिर गुलाम बना लिया! @ आजादी मेरे सामने/कमलेश पांडेय, वरिष्ठ पत्रकार व स्तम्भकार आजादी एक भ्रम है! लोकतंत्र एक मृगतृष्णा! भीड़तंत्र एक ऐसी कड़वी सच्चाई है, जिससे सभ्य समाज आक्रांत है, लाचार है, किंकर्तव्यविमूढ़ भी! पहले रोटी, कपड़ा और मकान, फिर शिक्षा, स्वास्थ्य और सम्मान की बातें बेमानी हो चुकी हैं। अब तकनीकी गैजेट्स, सर्वसुलभ परिवहन और सुरक्षा के सवाल मुंह बाये खड़े हैं। अमूमन, जातिगत आरक्षण, धर्मगत अल्पसंख्यकवाद और भेदभावी व्यवस्था भारतीय लोकतांत्रिक प्रणाली की वह तल्ख सच्चाई है, जिससे मुंह मोड़ा नहीं जा सकता। लेकिन जब सत्ताधारी और व्यवस्था पर हावी जमात सर्व समावेशी सुव्यवस्था की जगह लक्षित कुव्यवस्था को बढ़ावा दे और तर्क की बजाय रूढ़िवादी कवच का सहारा ले, तो फिर कुछ भी कहना बेमामी बात है। सर्वविदित है कि कभी भारत को सोने की चिड़ियां कहा गया, तो कभी विश्वगुरु, और कभी दूध की नदियां बहने वाला देश! अनाज, फल-फूल और प्राकृतिक औषधियों से भरा पूरा देश। लेकिन पुरातन त्याग को तिलांजलि देकर आधुनिक लाभ को ही सबकुछ समझने वाला सत्ताधारी वर्ग जब राष्ट्री...