Mittimate: A true companion for children's bright future—from screen to creation.
🌹राजनैतिकदुनिया प्रायोजित परिशिष्ट 🌹
मिट्टीमेट (Mittimate): स्क्रीन से सृजन तक बच्चों के समुज्ज्वल भविष्य का सच्चा साथी
@ डॉ संघर्ष शर्मा, फाइन आर्ट्स जॉर्नलिस्ट, दिल्ली-एनसीआर
आजकल का बच्चा डिजिटल दुनिया में जन्म ले रहा है। इसलिए मोबाइल, टैबलेट, लैपटॉप और स्मार्ट टीवी उसकी दिनचर्या का सामान्य हिस्सा बन चुके हैं। ऑनलाइन शिक्षा, मनोरंजन और इंटरनेट ने सीखने के नए अवसर तो दिए हैं, लेकिन इसके साथ ही एक नई चुनौती भी सामने आई है; वह यह कि बढ़ता हुआ स्क्रीन टाइम हम सबकी जेहन में यक्ष प्रश्न बनकर समुपस्थित है।
अनेक विशेषज्ञों का मानना है कि लंबे समय तक स्क्रीन के सामने रहने से बच्चों की एकाग्रता, रचनात्मकता, सामाजिक व्यवहार, शारीरिक सक्रियता और मानसिक स्वास्थ्य पर प्रतिकूल प्रभाव पड़ सकता है। इसलिए परहेज भी जरूरी है। यदि अनुप्रयोग या अनुपालन अनुशासन विकसित कर लिया जाए, तो इससे अच्छा उनके लिए कुछ भी नहीं हो सकता। इससे बच्चे जमाने के साथ भी बने रहेंगे और जमाने के अलावा भी उनकी सेहत कुछ करने-करवाने लायक बची रहेगी।
ऐसे समय में अभिभावकों के सामने सबसे बड़ा प्रश्न यह है कि बच्चों को तकनीक से पूरी तरह दूर रखना न तो संभव है और न ही आवश्यक। लिहाजा आवश्यकता इस बात की है कि उन्हें ऐसे विकल्प दिए जाएँ जो मनोरंजन के साथ-साथ सीखने, सोचने और सृजन करने के अवसर भी प्रदान करें। इसी सोच के साथ मिट्टीमेट (Mittimate) के "यह अपने आप करो" (Do It Yourself), संक्षिप्त नाम डीआईवाई (DIY) लकड़ी के शैक्षणिक मॉडल और पज़ल गेम बच्चों के लिए एक सकारात्मक और रचनात्मक विकल्प प्रस्तुत करते हैं।
दरअसल, मिट्टीमेट (Mittimate) का उद्देश्य केवल बच्चों को व्यस्त रखना नहीं है, बल्कि "उन्हें करके सीखना" (Hands-on Learning), "समस्या को सुलझाना"
(Problem Solving) और "रचनात्मक सोच"
(Creative Thinking) जैसी क्षमताओं की ओर प्रेरित करना है। जब कोई बच्चा अपने हाथों से किसी लकड़ी के मॉडल को जोड़ता है, उसके प्रत्येक भाग को समझता है और अंततः उसे सफलतापूर्वक तैयार करता है, तब वह केवल एक मॉडल नहीं बना रहा होता, बल्कि धैर्य, तार्किक सोच, सूक्ष्म अवलोकन और आत्मविश्वास जैसी जीवनोपयोगी क्षमताएँ भी विकसित कर रहा होता है।
आज अधिकांश बच्चों का खाली समय मोबाइल गेम, वीडियो या सोशल मीडिया में बीत जाता है। यदि उसी समय उन्हें कोई रोचक "DIY" मॉडल या पज़ल बनाने का अवसर दिया जाए, तो उनका ध्यान स्वाभाविक रूप से स्क्रीन से हटकर वास्तविक गतिविधि की ओर आकर्षित होता है। यह परिवर्तन किसी प्रतिबंध के कारण नहीं, बल्कि रुचि और आनंद के कारण होता है।
मनोवैज्ञानिकों का मानना है कि जब बच्चे अपने हाथों से कुछ बनाते हैं, तब उनके मस्तिष्क के अनेक हिस्से एक साथ सक्रिय होते हैं। मॉडल तैयार करते समय उन्हें आकार पहचानना, निर्देशों का पालन करना, छोटे-छोटे भागों को सही स्थान पर लगाना तथा अंतिम परिणाम की कल्पना करनी होती है। इससे अनेक महत्वपूर्ण क्षमताओं का विकास होता है, जैसे- एक, तार्किक सोच (Logical Thinking); दो, समस्या समाधान क्षमता (Problem Solving Skills); तीन, एकाग्रता और धैर्य (Concentration and Patience); चार, हाथ और आँखों का समन्वय (Hand-Eye Coordination) और पांच, सूक्ष्म मोटर कौशल (Fine Motor Skills)।
मिट्टीमेट (Mittimate) के प्रमुख वत्सल जैन बताते हैं कि इसके अधिकांश मॉडल केवल विज्ञान या इंजीनियरिंग तक सीमित नहीं हैं, बल्कि उनमें सौंदर्यबोध, डिजाइन, रंग संयोजन और रचनात्मक प्रस्तुति भी शामिल होती है। कहने का तातपर्य यह कि मसलन बच्चा मॉडल तैयार करने के बाद उसे रंग सकता है, सजा सकता है और अपनी कल्पना के अनुसार नया रूप दे सकता है। इस प्रकार वह विज्ञान और कला दोनों से एक साथ जुड़ता है। इससे उसके व्यक्तित्व का सहजता पूर्वक विकास होता है।
उदाहरण के लिए, यदि कोई बच्चा घर बनाता है, तो वह केवल उसकी संरचना नहीं समझता, बल्कि वास्तुकला, रंगों के चयन और सांस्कृतिक विरासत के प्रति भी संवेदनशील बनता है। बच्चों का भविष्य केवल तकनीक से नहीं, बल्कि अनुभव, कल्पना, सृजन, संवेदनशीलता और परिवार के साथ बिताए गए सार्थक समय से निर्मित होता है। यदि हम उन्हें स्क्रीन के साथ-साथ सृजन का अवसर भी देंगे, तो निश्चित ही हम एक अधिक आत्मविश्वासी, जिज्ञासु, संवेदनशील और नवाचारी पीढ़ी का निर्माण कर सकेंगे।
आइए, एक प्रेरक उदाहरण से इसे समझते हैं- 11 वर्षीय गोपाल प्रतिदिन स्कूल से लौटने के बाद लगभग चार घंटे मोबाइल पर वीडियो देखता था। उसके माता-पिता ने निर्णय लिया कि सप्ताह में दो दिन मोबाइल के स्थान पर उसे Mittimate का एक DIY मॉडल दिया जाएगा। शुरुआत में उसे इसमें विशेष रुचि नहीं थी, लेकिन पहला मॉडल पूरा करने के बाद उसने स्वयं अगला मॉडल बनाने की इच्छा व्यक्त की।
ततपश्चात कुछ ही सप्ताह में उसका स्क्रीन टाइम कम हो गया, उसकी एकाग्रता बढ़ी और विद्यालय की विज्ञान परियोजनाओं में उसकी रुचि भी पहले की अपेक्षा अधिक हो गई। यह दर्शाता है कि यदि बच्चों को आकर्षक और रचनात्मक विकल्प दिए जाएँ, तो वे स्वाभाविक रूप से बेहतर आदतों की ओर बढ़ सकते हैं। इन अर्थों में Mittimate का एक DIY मॉडल देश का भविष्य समझे जाने वाले बच्चों में रचनात्मकता का संस्कार विकसित करके राष्ट्र की बहुत बड़ी परोक्ष सेवा कर रहा है। अब यह अभिभावकों और शिक्षकों का दायित्व है कि वह बच्चों को दूरदर्शिता पूर्ण विकल्प उपलब्ध करवाएं। Mittimate के DIY मॉडल को रिकमेंड करें।
# राष्ट्रनीति/राष्ट्रहित में इसे निम्नलिखित प्लेटफार्म पर शेयर करें।
🌎 ग्लोबल प्रसार लिंक 🌎
# फेसबुक
https://www.facebook.com/share/1LaHMj8gLM/
# एक्स (ट्विटर)
https://x.com/kamleshforworld
# लिंक्डइन
https://www.linkedin.com/help/linkedin/?trk=p_settings_helpcenter_globalnav_android
# थ्रेड्स
https://www.threads.com/@kamlesh_pande_word_kamleshvani
# इंस्टाग्राम https://www.instagram.com/kamlesh_pande_word_kamleshvani?igsh=MWgyanM3NGxtb2JybA==
# यूट्यूब चैनल https://youtube.com/@rajnaitikduniyatv?si=gHYPbMKOKb4pm-ps
टिप्पणियाँ
एक टिप्पणी भेजें