संदेश

आखिर कब तक जटिल पूर्वाग्रहों से परेशान रहेगा भारत गणतंत्र?

चित्र
आखिर कब तक जटिल पूर्वाग्रहों से परेशान रहेगा भारत गणतंत्र? @ कमलेश पांडेय/वरिष्ठ पत्रकार व राजनीतिक विश्लेषक भारत का गणतंत्र पूर्वाग्रहों जैसे जातिवाद, सांप्रदायिकता, भाषा जनित क्षेत्रवाद, वंशवाद, राजनीतिक पक्षपात और सामाजिक असमानताओं से जूझ रहा है, जो संवैधानिक मूल्यों को कमजोर कर रहे हैं। खासकर गणतंत्र दिवस जैसे अवसरों पर ये मुद्दे अकसर उभरकर सामने आ जाते हैं,जहां लोकतंत्र की चुनौतियां स्पष्ट दिखती हैं। इसलिए कतिपय प्रमुख पूर्वाग्रहों पर चर्चा लाजिमी है जो इसे समदर्शी और सर्वसम्मत लोकतंत्र बनने देने की राह के सबसे बड़े रोड़े तब भी थे, आज भी हैं और अगर यही हालात बने रहे तो भविष्य में भी रहेंगे। लिहाजा प्रबुद्धजनों से लेकर आम आदमी के दिलोदिमाग में यह यक्ष प्रश्न बना हुआ है कि आखिर कबतक जटिल पूर्वाग्रहों से परेशान रहेगा भारत गणतंत्र? पिछली शताब्दी के अंतिम तीन भागों से लेकर मौजूदा शताब्दी के प्रथम भाग तक यानी पूरे सौ सालों में भारतीय शासन-प्रशासन की जो पूर्वाग्रही गतिविधियां दिखाई-सुनाई पड़ीं, उससे स्पष्ट प्रतीत होता है कि भारतीय गणतंत्र को दलित-आदिवासी-पिछड़े-अल्पसंख्यक- सवर्ण ...

गाजा बोर्ड ऑफ पीस पर वैश्विक कशमकश के मायने

चित्र
गाजा बोर्ड ऑफ पीस पर वैश्विक कशमकश के मायने @ कमलेश पांडेय/वरिष्ठ पत्रकार व राजनीतिक विश्लेषक गाजा बोर्ड ऑफ पीस अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप की एक महत्वाकांक्षी पहल है, जो गाजा संघर्ष को सुलझाने के साथ-साथ वैश्विक स्तर पर शांति स्थापना का एक नया मॉडल प्रस्तुत करती है। चूंकि यह बोर्ड संयुक्त राष्ट्र संघ के पारंपरिक ढांचे से बाहर काम करने का अदद प्रयास है, जिससे अंतरराष्ट्रीय कूटनीति में नई बहस छिड़ गई है। खासकर वैश्विक कशमकश बढ़ चुकी है, जिसके वैश्विक प्रभाव आने वाले वक्त में महसूस किए जाएंगे। सवाल है कि आखिर अपनी ही बनाई पुरानी विश्व व्यवस्था की अनदेखी करते हुए अमेरिका बिल्कुल नई तरह की विश्व व्यवस्था क्यों बनाना चाहता है? ब्रेक के बाद वह अपनी ही नीतियों को क्यों बदल देता है। आखिर वह शेष दुनिया को अमेरिकी मुगालते में क्यों रखना चाहता है? आखिर चीन, रूस, भारत, फ्रांस, जर्मनी, नॉर्वे, स्वीडन जैसे कद्दावर देश ऐसे पीस बोर्ड से दूरी क्यों बनाए हुए हैं? खास बात यह कि आखिर गाजा बोर्ड ऑफ पीस के अंतर्राष्ट्रीय मायने क्या हैं? और इसके पीछे के वैश्विक निहितार्थ से किसको क्या फायदा औ...

विश्व आर्थिक मंच पर भारतीय ट्रेड कूटनीति के मायने

चित्र
विश्व आर्थिक मंच पर भारतीय ट्रेड कूटनीति के मायने @ कमलेश पांडेय/वरिष्ठ पत्रकार व राजनीतिक विश्लेषक दावोस में चली विश्व आर्थिक मंच (WEF) की बैठक में भारत ने अपनी मजबूत कूटनीतिक और आर्थिक उपस्थिति दर्ज कराई है। यहां पर भारतीय ट्रेड कूटनीति ने जो पॉलिसी नैरेटिव सेट किए और ग्लोबल इमेज विकसित किया, वह यहां कई मायने में अहम है। सबसे बड़ी बात तो यह कि यहां पर भारत ने वैश्विक निवेशकों के सामने खुद को चीन का वैकल्पिक हब के रूप में प्रस्तुत किया और विकसित भारत होने का स्थायी नजरिया पेश किया। दरअसल, इस अंतर्राष्ट्रीय मंच पर भारत ने जिस आर्थिक स्थिरता, वैश्विक लोकतंत्र और 'वसुधैव कुटुंबकम' की भावना पर बल दिया, उससे वैश्विक नीति-निर्धारण में इंडिया की भूमिका और अधिक मजबूत हुई। जब संयुक्त राष्ट्र संघ की कीमत पर अमेरिका नई विश्व व्यवस्था को बढ़ावा देने हेतु एक से बढ़कर एक जोखिम भरे दांव चल रहा हो, उस दौर में भी भारत की यह अहम उपस्थिति बहुत कुछ चुगली करती है। क्योंकि अंतर्राष्ट्रीय मंच पर भारत को उभरती हुई वैश्विक शक्ति के रूप में स्थापित करने के मोदी सरकार के इरादे स्पष्ट हैं, जिसे ...

क्या हिंदुओं की जातीय मानसिकता को बदल पाएंगे संघ प्रमुख मोहन भागवत?

चित्र
क्या हिंदुओं की जातीय मानसिकता को बदल पाएंगे संघ प्रमुख मोहन भागवत? @ कमलेश पांडेय/वरिष्ठ पत्रकार व राजनीतिक विश्लेषक प्राचीनकाल में मनुस्मृति से लेकर आधुनिक काल के संविधान तक हिंदू समुदाय में जिस जातिवाद को प्रत्यक्ष या परोक्ष रूप में बढ़ावा दिया गया, वह अब दुनिया के तीसरे बड़े धर्म सनातन (हिन्दू) के लिए अभिशाप साबित हो रहा है। जिस तरह से सियासी गोलबंदी के लिए जातिवाद को हवा दी जा रही है, वह किसी लोकतांत्रिक कलंक से कम नहीं है। अब तो प्रशासनिक और न्यायिक निर्णय भी इसे हवा देते प्रतीत हो रहे हैं।  मसलन, इससे निरंतर कमजोर हो रहे हिन्दू समाज की एकजुटता के दृष्टिगत राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ प्रमुख मोहन भागवत की चिंता स्वाभाविक है। यह उन जैसे सैकड़ों मशहूर लोगों के लिए भी सार्वजनिक चिंता का विषय रहा है। लेकिन हमारी संसद और सरकार के लिए यह कोई मुद्दा नहीं है क्योंकि जातिवादी खिलौने से मतदाताओं को फुसलाने के संवैधानिक तरकीब उसने विकसित कर लिए हैं और आधिकारिक निर्णयों में भी इसका भौंडा प्रदर्शन दिखाई दे जाता है। बता दें कि विगत 18 जनवरी 2026 को छत्रपति संभाजीनगर में संघ सरचालक मोहन...

आखिर पश्चिम बंगाल को 'महाजंगलराज' से निजात कब और कैसे मिलेगा?

चित्र
आखिर पश्चिम बंगाल को 'महाजंगलराज' से निजात कब और कैसे मिलेगा? @ कमलेश पांडेय/वरिष्ठ पत्रकार व राजनीतिक विश्लेषक पश्चिम बंगाल में 'महाजंगलराज' व्याप्त है। इससे कब और कैसे निजात मिलेगी, यक्ष प्रश्न है। वर्ष 2026 के जनवरी महीने में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने पश्चिम बंगाल की इस स्थिति पर गहरी चिंता जताई। उन्होंने लोगों से टीएमसी की निर्मम ममता सरकार को उखाड़ फेंकने का आह्वान किया है ताकि पश्चिम बंगाल की सूरत और सीरत दोनों बदला जा सके। उल्लेखनीय है कि पश्चिम बंगाल के पड़ोसी राज्य बिहार को जंगलराज से मुक्ति दिलाने का श्रेय भाजपा नीत एनडीए गठबंधन में शामिल जदयू की नीतीश सरकार को जाता है। इसलिए पश्चिम बंगाल के लोगों को भी उम्मीद है कि भाजपा सरकार ही उन्हें सुशासन व विकास की गारंटी दे सकती है। आपको याद होगा कि वर्ष 2019 में संसदीय आमचुनाव केदौरान केंद्रीय चुनाव पर्यवेक्षक रहे बिहार कैडर के 1984 बैच के आईएएस अधिकारी और बिहार के पूर्व मुख्य निर्वाचन अधिकारी (सीईओ) अजय वी नायक ने भी जंगलराज सम्बन्धी कुछ बात कही थी। तब उन्होंने चुनाव आयोग के विशेष पर्यवेक्षक के रूप में क...

डोनाल्ड ट्रंप की कूटनीतिक ब्लैकमेलिंग का वैश्विक फलाफल

चित्र
डोनाल्ड ट्रंप की कूटनीतिक ब्लैकमेलिंग का वैश्विक फलाफल @ कमलेश पांडेय/वरिष्ठ पत्रकार व राजनीतिक विश्लेषक अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप की कथित ब्लैकमेलिंग वाली कूटनीतिक रणनीति, विशेष रूप से टैरिफ़ और क्षेत्रीय दावों के माध्यम से, उनके मित्र देश रह रह कर परेशान हो उठते हैं। जबकि अमेरिका के शत्रु देश उनको आंख दिखाकर अपनी मनवाने से भी नहीं चूकते, खासकर चीन, रूस और ईरान जैसे दबंग देश। इससे जहां वैश्विक कूटनीति चौराहे पर खड़ी प्रतीत होती है, वहीं उनकी ढुलमुल नीति व्यापार को गहराई से प्रभावित कर रही है। यही वजह है कि यूरोपीय देश, जापान, भारत आदि अंदर से बेचैन हैं। सच कहूं तो राष्ट्रपति ट्रंफ का यह अव्यवहारिक व मतलबपरस्त रुख आर्कटिक सुरक्षा, नाटो एकता और बहुपक्षीय व्यापार नियमों को खुली चुनौती दे रहा है।  सबसे पहले इसी कसौटी पर यूरोप व नाटो देशों से जुड़े ग्रीनलैंड विवाद को समझते हैं, जहां ट्रंप ने ग्रीनलैंड को अमेरिका में मिलाने की मांग क्या रख दी, उनके इस अटपटी सोच से उनके मित्र भी बौखलाहट दिखाने लगे। जिससे परेशान अमेरिका ने सहयोगी से विरोधी बन रहे आठ यूरोपीय देशों (डेनमार्...

बीएमसी समेत महाराष्ट्र नगर निकाय चुनावों में एआईएमआईएम की अप्रत्याशित बढ़त के राजनीतिक निहितार्थ

चित्र
बीएमसी समेत महाराष्ट्र नगर निकाय चुनावों में एआईएमआईएम की अप्रत्याशित बढ़त के राजनीतिक निहितार्थ @ कमलेश पांडेय/वरिष्ठ पत्रकार व राजनीतिक विश्लेषक एआईएमआईएम ने महाराष्ट्र के हालिया नगर निकाय चुनावों में बीएमसी सहित कई जगहों पर उल्लेखनीय सफलता हासिल की है, जहां इसने कुल 95 से 126 सीटें जीतीं। यह जीत मुस्लिम वोटों के एकीकरण और स्थानीय मुद्दों पर फोकस को दर्शाती है। एआईएमआईएम ने छत्रपति संभाजीनगर में 33, मालेगांव में 21, अमरावती में 15, नांदेड़ में 13, धुले में 10, सोलापुर में 8, और मुंबई में 6-9 सीटें जीतीं। वहीं, बीएमसी में पहली बार मजबूत प्रवेश करते हुए पार्टी ने 8 अल्पसंख्यक बहुल वार्डों से जीत हासिल की, जहां पहले कांग्रेस या एनसीपी का दबदबा था।  देखा जाए तो एआईएमआईएम का यह राजनीतिक उभार पारंपरिक विपक्षी दलों जैसे कांग्रेस, एनसीपी(एसपी) और समाजवादी पार्टी के मुस्लिम वोट बैंक को कमजोर करता प्रतीत होता है। खासबात यह कि कई छोटे निकायों में यह पार्टी किंगमेकर बन गई है, जहां महायुति या महाविकास अघाड़ी को बहुमत नहीं मिला। इस बीच भाजपा के साथ संभावित गठजोड़ की चर्चा भी उभरी है...