संदेश

हुमायूं कबीर, अरशद मदनी और महमूद मदनी के बयान आखिर कैसे भारत का माहौल खराब कर रहे हैं? समझिए विस्तार से

चित्र
हुमायूं कबीर, अरशद मदनी और महमूद मदनी के बयान  आखिर कैसे भारत का माहौल खराब कर रहे हैं? समझिए विस्तार से  @ कमलेश पांडेय/वरिष्ठ पत्रकार व राजनीतिक विश्लेषक भारत एक लोकतांत्रिक देश है। धर्मनिरपेक्ष राष्ट्र है। सहिष्णु मुल्क है, अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता का पक्षधर देश है, लेकिन इसका मतलब यह कदापि नहीं है कि राजनेताओं की दंगाई प्रवृत्ति को शह दिया जाए। गुलाम भारत में, आजाद भारत में जो राजनीतिक नौटंकी दिखाई दे रही है, इस जनद्रोही प्रवृत्ति पर अविलंब अंकुश लगना चाहिए। कहना न होगा कि जिस तरह से 'मुस्लिम नेता व धर्मगुरु' यथा- हुमायूं कबीर, अरशद मदनी और महमूद मदनी के सार्वजनिक बयान भारत का माहौल खराब कर रहे हैं, वह बेहद चिंता की बात है। ऐसा इसलिए कि पाकिस्तान के जनक मोहम्मद अली जिन्ना की तरह ही ये लोग विवादित और उत्तेजक बयान दे रहे हैं जो सामाजिक और राजनीतिक तनाव बढ़ाने वाले हैं।  लिहाजा, ऐसे बयानों पर हमारे सही राजनेताओं का खामोश रहना, प्रशासनिक अधिकारियों द्वारा त्वरित एक्शन नहीं लेना, और सक्षम न्यायिक अधिकारियों द्वारा ऐसे मसलों पर स्वतः संज्ञान नहीं लेना इस आशंका क...

दिल्ली-एनसीआर में बढ़ते प्रदूषण के मौलिक कारणों को समझे बिना निदान बेहद मुश्किल, समझिए हुजूर!

चित्र
दिल्ली-एनसीआर में बढ़ते प्रदूषण के मौलिक कारणों को समझे बिना निदान बेहद मुश्किल, समझिए हुजूर! @ कमलेश पाण्डेय/वरिष्ठ पत्रकार व राजनीतिक विश्लेषक दिल्ली-एनसीआर में बढ़ता वायु प्रदूषण अब केंद्र सरकार और राज्य सरकारों के गले ही हड्डी बन चुकी है, क्योंकि उनके मातहत कार्यरत प्रशासन निरंतर अदूरदर्शिता भरा निर्णय लेने का आदी बन चुका है। लिहाजा प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और मुख्य न्यायाधीश सूर्यकांत की चिंताएं स्वाभाविक हैं, लेकिन इन्हें भी प्रदूषण की बुनियादी बातों को समझना पड़ेगा और सर्वमान्य हल देने पड़ेंगे अन्यथा बात का बतंगड़ बनते देर नहीं लगेगी।  इसलिए सबको पहले दिल्ली-एनसीआर के बढ़ते प्रदूषण के मौलिक कारणों को समझना होगा, फिर उसका माकूल वैज्ञानिक हल निकालने का माकूल प्रयास करना होगा, अन्यथा इसका निदान बेहद मुश्किल प्रतीत होता रहेगा। आखिर बीते कई दशकों से 'सांप निकल जाने के बाद लाठी पीटने' की जो प्रशासनिक कवायद जारी है, उससे किसी का भी भला होने वाला नहीं है। खासकर राष्ट्रीय राजधानी क्षेत्र के प्रबुद्ध नागरिकों का तो कतई नहीं। क्योंकि दिल्ली का न तो मौसम अपना है, न पानी। बस ...

भारतीय संविधान का रक्षा कवच है नौवीं अनुसूची, लेकिन कतिपय सीमाओं के बाद नहीं!

चित्र
भारतीय संविधान का रक्षा कवच है नौवीं अनुसूची, लेकिन कतिपय सीमाओं के बाद नहीं! @ कमलेश पांडेय/वरिष्ठ पत्रकार व राजनीतिक विश्लेषक भारतीय संविधान की नौवीं अनुसूची को उसका रक्षा कवच करार देते हुए उसे राजनेताओं द्वारा अत्यंत जरूरी ठहराया गया है, क्योंकि यह उन विशेष कानूनों की एक सूची है जिन्हें न्यायालयों में चुनौती नहीं दी जा सकती है। इस प्रकार से देखा जाए तो कतिपय व्यापक जनहितकारी निर्णयों के विरुद्ध सत्तागत बहुमत प्रेरित सियासी सोच को इसी नौवीं अनुसूची के माध्यम से राष्ट्र पर थोप दिया गया है और आगे भी ऐसा किया जा सकता है।  चूंकि संविधान की नौंवीं अनुसूची को वर्ष 1951 में प्रथम संविधान संशोधन के द्वारा ही शामिल किया गया था, खासकर भूमि सुधार और अन्य प्रगतिशील कानूनों को न्यायिक समीक्षा से बचाने के लिए ताकि इन्हें बिना किसी विघ्न के लागू किया जा सके। इसलिए इस पर एक स्वस्थ बहस अपेक्षित है। भले ही इसका उद्देश्य सामाजिक-आर्थिक असमानताओं को कम करना और किसानों तथा वंचित वर्गों को संरक्षण देना बताया जाता है, लेकिन कुछेक मामलों में इससे आम आदमी के प्राकृतिक अधिकारों का हनन भी हुआ ह...

हाइब्रिड वारफेयर क्या है? भारत इसमें कितना सक्षम है? विश्व के कौन-कौन से देश इस युद्ध तकनीकी में आगे हैं?

चित्र
हाइब्रिड वारफेयर क्या है? भारत इसमें कितना सक्षम है? विश्व के कौन-कौन से देश इस युद्ध तकनीकी में आगे हैं? @ कमलेश पांडेय/वरिष्ठ पत्रकार व स्तम्भकार हाइब्रिड वारफेयर वह युद्ध रणनीति है जिसमें पारंपरिक और गैर-पारंपरिक दोनों तरह की युद्धक तकनीकों का संयोजन होता है। यह पूर्ण युद्ध के बिना राजनीतिक, सैन्य या आर्थिक उद्देश्यों को हासिल करने के लिए किया जाता है, जिसमें साइबर अटैक, मीडिया प्रोपेगेंडा, आर्थिक प्रतिबंध, और अन्य अप्रत्यक्ष तरीके शामिल होते हैं।  हाइब्रिड वारफेयर में देश प्रत्यक्ष लड़ाई किए बिना भी विरोधी को कमजोर कर सकता है और इससे संघर्ष की संभावना भी नियंत्रित रहती है। इसमें कम लागत और कम जटिलता वाले तरीकों से किसी राष्ट्र को अस्थिर करने की क्षमता होती है। भारत ने हाइब्रिड वारफेयर की चुनौतियों के प्रति अपनी रक्षा क्षमताओं को आधुनिक बनाने पर काम शुरू कर रखा है। रक्षा अनुसंधान एवं विकास संगठन (DRDO) जैसे संस्थान अत्याधुनिक हथियार प्रणाली विकसित कर रहे हैं। भारतीय सेना में ‘हाइब्रिड वारफेयर डिवीजन’ की आवश्यकता बताई जा रही है, जिसमें साइबर सुरक्षा, ड्रोन, एआई तकनीक ...

आखिर भारतीय संविधान से अपेक्षित मौलिक संशोधन कबतक? समझिए कितने हैं जरूरी?

चित्र
आखिर भारतीय संविधान से अपेक्षित मौलिक संशोधन कबतक? समझिए कितने हैं जरूरी? @ कमलेश पांडेय/वरिष्ठ पत्रकार व राजनीतिक विश्लेषक भले ही भारतीय संविधान ने देश-काल-पात्र के परिप्रेक्ष्य में हम भारतीयों को बहुत कुछ दिया है, फिर भी इससे और अधिक लेने की अपेक्षा रखना लाजिमी है। इस दिशा में सुलगता हुआ सवाल यही है कि आखिर सिस्टम पर विगत लगभग आठ दशकों से कुंडली मार कर बैठने वाले लोगों या उनके उत्तराधिकारियों-परिजनों ने, जिसमें संविधान की आरक्षण व्यवस्था द्वारा पैदा किये हुए राजनीतिक, प्रशासनिक, न्यायिक और मीडियागत के 'अभिजात्य वर्गों' के विधिक शोषण से उनके ही वर्ग या समाज के संघर्षरत अन्य लोगों को आखिर मुक्ति कब तक मिलेगी! इतना ही नहीं, नियम कानून द्वारा इस देश में असली समाजवाद, समानतावाद और समरसतावाद कब तक लाया जाएगा? वहीं, पूरी व्यवस्था पर हावी होते परिवारवाद और सम्पर्कवाद को कब और कैसे हतोत्साहित किया जाएगा? चाहे अल्पसंख्यक वाद हो या पंथनिरपेक्षता/धर्मनिरपेक्षता का सवाल, इसे व्यवहारिक अमलीजामा कब तक पहनाया जाएगा? वहीं, पाकिस्तान-बंगलादेश के मुकाबिल इसे तुलनात्मक रूप से कबतक ला...

भारतीय संविधान की सफलता और विफलता दोनों को कतिपय प्रमुख बातों से ऐसे समझिए

चित्र
भारतीय संविधान की सफलता और विफलता दोनों को कतिपय प्रमुख बातों से ऐसे समझिए @ कमलेश पांडेय/वरिष्ठ पत्रकार व राजनीतिक विश्लेषक संविधान दिवस 2025 पर प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने देशवासियों को एक विस्तृत पत्र लिखा, जिसमें उन्होंने संविधान की महानता, नागरिकों के मौलिक कर्तव्यों और पहली बार मतदाता बनने वाले युवाओं के लिए संदेश दिया। उन्होंने संविधान की शक्ति का उदाहरण देते हुए बताया कि कैसे एक गरीब परिवार से आने वाला व्यक्ति प्रधानमंत्री पदतक पहुंच सकता है। इसलिए उन्होंने मताधिकार को अधिकार के साथ-साथ जिम्मेदारी बताते हुए युवाओं में लोकतंत्र के प्रति गर्व और जिम्मेदारी जागृत करने की बात कही।  इसके अलावा, पीएम मोदी ने सरदार पटेल और भगवान बिरसा मुंडा की 150वीं जयंती और संविधान के प्रति कर्तव्यों का पालन करने पर जोर दिया, जो देश के सामाजिक और आर्थिक विकास के लिए आवश्यक है। उन्होंने कहा कि हमें संविधान को मजबूत करने वाला हर कदम उठाना चाहिए और संविधान निर्माताओं के सपनों को साकार करने का दायित्व सबका है। वहीं, राष्ट्रपति द्रौपदी मुर्मू ने कहा कि हमारा संविधान राष्ट्रीय अस्मिता की ...

संसद का शीतकालीन सत्र: स्वस्थ बहस हो पर सियासी बाजीगरी नहीं!

चित्र
क्या संसद का शीतकालीन सत्र कोई नया मानक स्थापित कर पाएगा या फिर वही घिसी-पिटी सियासत दोहरायी जाएगी? @ कमलेश पांडेय/वरिष्ठ पत्रकार व राजनीतिक विश्लेषक कभी लोकतंत्र की जनभावनाओं को स्पष्ट करते हुए फ्रांसीसी दार्शनिक वॉल्टेयर ने कहा था कि "मैं आपके विचार से सहमत नहीं हो सकता, लेकिन उसे कहने के आपके अधिकार की रक्षा आखिरी दम तक करूंगा।" लेकिन यह विशुद्ध रूप से संस्कारवान नीति की बात है। आज जबकि लोकतांत्रिक सियासत का विकृत चेहरा घटना दर घटना सामने आ चुका है और चाहे उच्च सदन हो या निम्न सदन, दोनों की विभिन्न कुसंस्कारी घटनाएं कुछ गलत नजीर/नजरिया प्रदान कर चुकी हैं तो इनकी निरन्तरता को लेकर अब प्रशासनिक और न्यायिक सख्ती की जरूरत आन पड़ी है। क्योंकि अब राजनीतिक अचार संहिता भी पक्षपात पूर्ण प्रतीत होने लगी हैं। ऐसे में फ्रांसीसी दार्शनिक वॉल्टेयर के विचारों से पूर्णतया सहमत नहीं हुआ जा सकता है। चूंकि भारतीय संसद का शीतकालीन सत्र आगामी 1 दिसंबर 2025 से शुरू होगा। इसलिए सदन के कामकाज को सुचारू ढंग से चलाने के लिए सत्ता पक्ष और विपक्ष को अपनी नकारात्मक अतीत से सबक लेकर सकारात्म...