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जैविक खेती को प्रोत्साहित करने के लिए जिलाधिकारी डॉ दिनेश चंद्र सिंह ने लिया ढैंचा की खेती का सहारा

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जैविक खेती को प्रोत्साहित करने के लिए जिलाधिकारी डॉ दिनेश चंद्र सिंह ने लिया ढैंचा की खेती का सहारा @ डॉ दिनेश चंद्र सिंह, आईएएस, जिलाधिकारी, जौनपुर, उत्तरप्रदेश। आपको पता है कि अपने देश भारत में फसलों की पैदावार बढ़ाने के लिये यूरिया का इस्तेमाल बड़े पैमाने पर किया जाता है, क्योंकि इससे फसलों में नाइट्रोजन की आपूर्ति होती है, जो पौधों के विकास के लिये बेहद जरूरी है। लेकिन आपको यह भी पता होना चाहिए कि रासायनिक खाद यूरिया, फास्फोरस, पोटाश या पेस्टीसाइड्स आदि जैव उर्वरक व कीटनाशक नहीं है, जिसके कारण प्राकृतिक और जैविक खेती का मकसद पूरा नहीं हो पाता है। यही वजह है कि इसके दुरगामी सामाधान के तौर पर अब किसानों के बीच ढेंचा की खेती पर जोर दिया जा रहा है। इस प्रकार कृषक हित की दृष्टि से मेरा यह प्रयास अनुकरणीय है और इसी दिशा में किसानों के बीच जैविक खेती को प्रोत्साहित करने के लिए मैंने एक माह पहले किसान खरीफ फसल गोष्ठी के माध्यम से जनपद जौनपुर में जो ढैंचा की बुवाई को बढ़ावा देने का निर्णय लिया है, उसकी एक छोटी सी जानकारी मीडिया माध्यमों के सहारे अपने जनपद के किसान भाइयों को देना ...

राष्ट्रीय पक्षी मोर के जीवन से मानव समुदाय को मिलती हैं विभिन्न प्रेरणाएं, इसका हर पहलू अनुकरणीय

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राष्ट्रीय पक्षी मोर के जीवन से मानव समुदाय को मिलती हैं विभिन्न प्रेरणाएं, इसका हर पहलू अनुकरणीय @ डॉ दिनेश चन्द्र सिंह, आईएएस, डीएम, जौनपुर, यूपी। पक्षी राज मोर या मयूर, जो भारत का राष्ट्रीय पक्षी है, इसे किन कारणों से भारत का राष्ट्रीय पक्षी स्वीकार (आत्मसात) किया गया है, इसके पीछे की एक नितांत धार्मिक कहानी है जो रोचक, ज्ञानबर्द्धक और जिज्ञासा पूर्ण है| स्कन्द पुराण में वर्णित है कि पक्षीराज मोर भगवान शिव और माता पार्वती के पुत्र कार्तिकेय भगवान का वाहन है| कहा जाता है कि कार्तिकेय भगवान मन के बड़े चंचल थे| उन्होंने अपने मन को साधने के लिए बहुत प्रयास किया और मन की चंचलता को जीतने के लिए केन्द्रीय कृत रूप से साधना और प्रयास किया| पिता भगवान शिव और माता पार्वती का आशीर्वाद उनके ऊपर था ही|  कहा जाता है कि उनकी इसी कमी को दृष्टिगत रखते हुए भगवान शिव ने कार्तिकेय जी को वाहन के रूप में मोर पक्षी चयनित करके दिया| क्योंकि पक्षीराज मोर अपने मन की चंचलता, प्रेम और सौन्दर्य के साथ-साथ अपने नृत्य से निज मन की चंचलता को साधता है और इसे साधकर ही किसी शुभ संकेत के आने का एक संकेतक ...

शरारती दुनिया की क्षुद्र चालों को समझिए और इनकी मजबूत काट करते रहिए

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शरारती दुनिया की क्षुद्र चालों को समझिए और इनकी मजबूत काट करते रहिए @ कमलेश पांडेय/वरिष्ठ पत्रकार व राजनीतिक विश्लेषक भले ही अमेरिका पिछले एक सौ सालों से अंतरराष्ट्रीय महाशक्ति रहा है और उसने ग्रेट ब्रिटेन को पीछे धकेलकर यह महारत हासिल की है। वहीं, पूरी दुनिया में अपना एक छत्र राज बनाए रखने के लिए उसने हर उस देश को नष्ट कर दिया, जिसने उसे चुनौती दी, या फिर देने की हिमाकत की। उसके पूंजीपतियों की लॉबी इतनी मजबूत है कि अपने हथियार उद्योग को बढ़ावा देने के लिए इनलोगों ने पूरी दुनिया में अशांति और रक्तपात बांटी है। भारत एक मात्र ऐसा देश है, जिसने रूस के सहयोग से उसे टक्कर दी और महफूज रहा। उदाहरण स्वरूप, जब बीसवीं सदी के पूर्वार्द्ध में जब जापान ने उन्हें यानी अमेरिका-ब्रिटेन आदि की साम्राज्यवादी शक्तियों को चुनौती दी और भारत में सुभाष चन्द्र बोस जैसे उनके धुर विरोधियों को आर्थिक व सैन्य मदद दी तो उन्होंने परस्पर मिलकर जापान पर परमाणु बम गिराकर उसको घुटने टेकने पर मजबूर कर दिया। तब उनके इस पाप में सोवियत संघ (यूएसएसआर) भी भागीदार बना था।  लेकिन बीसवीं सदी के उत्तरार्द्ध में जब...

अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप के नए वैश्विक प्रतिरक्षा कवच 'गोल्डन डोम' के ऐलान के प्रतिरक्षात्मक मायने को ऐसे समझिए

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अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप के नए वैश्विक प्रतिरक्षा कवच 'गोल्डन डोम' के ऐलान के प्रतिरक्षात्मक मायने को ऐसे समझिए @ कमलेश पांडेय/वरिष्ठ पत्रकार व राजनीतिक विश्लेषक दुनिया के थानेदार अमेरिका की थानेदारी पर अब संकट के बादल मंडराने लगे हैं। इस नजरिए से उसे कभी रूस की चुनौती मिल रही है तो कभी चीन की, कभी भारत ताल ठोक देता है तो कभी यूरोपीय संघ और कभी कभार ईरान, उत्तरी कोरिया जैसे सनकी देश भी। यही वजह है कि अमेरिकी प्रशासन की चिंता बढ़ चुकी है। इस लिहाज से कभी वह रूस को पटाने की कोशिश करता है तो कभी चीन को। वहीं उसके साथ भारत जो शातिराना खेल खेल रहा है, उस चक्रब्युह में अमेरिका दिन ब दिन उलझता जा रहा है। देखा जाए तो इराक में जो अमेरिकी रणनीति को सफलता मिली, वह अफगानिस्तान में नहीं मिली। वहीं ईरान में भी वह औंधे मुंह गिरेगा, क्योंकि उस पर रूस का बरदहस्त है जिसे चीनी समर्थन हासिल है। यही वजह है कि कभी दुनिया को युद्ध और संघर्ष बांटने वाला अमेरिका अब कथित शांति की बात करते हुए युद्ध से भाग रहा है। वहीं, अपने दुनियावी स्लीपर सेल को रूस, चीन, भारत और यूरोपीय संघ के सामने...

क्या अब्राहमिक भाईचारे के मुकाबले हान-हिंदू-स्लाविक भाईचारे को मजबूत कर पाएंगे जिनफिंग-मोदी-पुतिन?

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क्या अब्राहमिक भाईचारे के मुकाबले हान-हिंदू-स्लाविक भाईचारे को मजबूत कर पाएंगे जिनफिंग-मोदी-पुतिन? @ कमलेश पांडेय/वरिष्ठ पत्रकार व राजनीतिक विश्लेषक भले ही विभिन्न सभ्यता-संस्कृति का सम्मिलन-संघर्ष और उनका राजनीतिक उपयोग-दुरुपयोग देश-दुनिया के लिए कोई नई बात नहीं है, लेकिन रूस-चीन के चक्रब्युह में फंसा अमेरिका अब जो भू-राजनीतिक खेल अब्राहमिक ब्रदरहुड की आड़ में खेलने की पृष्ठभूमि तैयार कर रहा है, वह यदि सफल होता है तो प्राचीनकाल लीन महाभारत, मध्ययुगीन धर्मयुद्ध, आधुनिक युगीन प्रथम-द्वितीय विश्वयुद्ध के बाद एक और बड़ा युद्ध दरवाजे पर दस्तक देने वाला है।  संभव है कि रूस-यूक्रेन युद्ध को ही निकट भविष्य में एक और बड़ा विस्तार मिल जाए। हाल ही में भारत के खिलाफ पाकिस्तान को उकसाने की जो उसकी पुरानी रणनीति पुनः प्रकाश में आई है, उसमें चीन-भारत ने यदि रूसी प्रभाववश आपसी समझदारी न दिखाई होती, तो अमेरिका अपने क्षुद्र चाल सफल हो जाता! इसलिए सवाल उठता है कि "अब्राहमिक भाईचारे" के मुकाबले "हान-हिंदू भाईचारे" को मजबूत करने में जिनफिंग-मोदी अपनी भावी भूमिका निभाएंगे, या फ...

भारत-रूस-चीन सम्बन्धों की राह के रोड़ों को समझिए और उन्हें समझदारी पूर्वक दूर हटाइए

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भारत-रूस-चीन सम्बन्धों की राह के रोड़ों को समझिए और उन्हें समझदारी पूर्वक दूर हटाइए @ कमलेश पांडेय/वरिष्ठ पत्रकार व राजनीतिक विश्लेषक चूंकि रूस, भारत का सबसे भरोसेमंद देश है, इसलिए उसकी चिंता को भारत हमेशा अपनी चिंता समझते आया है। ठीक इसी प्रकार से रूस को भी भारत की चिंताओं को अपनी चिंता समझनी चाहिए, भले ही वह चीन से ही जुड़ीं  हुईं क्यों न हो! अक्सर देखा जाता है कि भारत-पाकिस्तान मामलों में रूस मुखर हो जाता है, लेकिन भारत-चीन मामलों में मौन! आखिर ऐसा क्यों और कबतक? वहीं, भारत का नया दोस्त अमेरिका, भारत-चीन मामलों में तो मुखर रहता है, लेकिन भारत-पाकिस्तान मामलों में वह थोड़ा पाकिस्तान की तरफ झुक जाता है, ताकि युद्ध बढ़े, हथियार बिके! भारत इन कूटनीतिक चतुराइयों को बखूबी समझते आया है, इसलिए वह गुटनिरपेक्ष बने रहते हुए भी अमेरिका के मुकाबले रूस से ज्यादा सहानुभूति रखता है। कूटनीतिक मामलों के जानकारों के मुताबिक, भारत-रूस जैसे मजबूत देशों के 'कॉमन शत्रु' अमेरिका-ग्रेट ब्रिटेन समझे जाते हैं। इसलिए यूरोप-अमेरिका खासकर यूएसए-यूनाइटेड किंगडम से मुकाबले के लिए रूस को भारत की जरू...

आखिर भारत-पाकिस्तान युद्ध विराम के बावजूद भारत की जीत के कुछ शानदार मायने क्या हैं?

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आखिर भारत-पाकिस्तान युद्ध विराम के बावजूद भारत की जीत के कुछ शानदार मायने क्या-क्या निकलते हैं? @ कमलेश पांडेय/वरिष्ठ पत्रकार व राजनीतिक विश्लेषक भारत-पाकिस्तान के बीच अकस्मात भड़के युद्ध और उसके बाद भारत द्वारा अप्रत्याशित ढंग से पाकिस्तान की, की गई ठुकाई के बीच अमेरीकी दबाव या सद्भावना वश किए गए युद्ध विराम यानी सीजफायर के अपने-अपने मायने निकाले जा रहे हैं। इस बात को लेकर भले ही भारतीयों में नाराजगी है, लेकिन भारत सरकार के इस सूझबूझ भरे फैसले से दोतरफा बर्बादी का मंजर टल गया है। हालांकि मोदी सरकार ने स्पष्ट कर दिया है कि युद्ध के बिल्कुल करीब पहुंच चुके भारत और पाकिस्तान के बीच भले ही सीजफायर समझौता हो गया हो, लेकिन आतंकवाद के खिलाफ जंग जारी रहेगी और निकट भविष्य में इसके किसी भी स्वरूप का मुंहतोड़ जवाब दिया जाएगा। यदि कोई भारतीयों पर गोली दागेगा तो उसका जवाब गोले से दिया जाएगा। यह आदेश भारत सरकार ने अपनी सेना और अर्द्धसैनिक बलों को दे दिया है।  वहीं, इस बात से भी इंकार नहीं किया जा सकता है कि युद्ध विराम के समझौते तक भारत ने 'ऑपरेशन सिंदूर' के जरिये काफी कुछ महत्वपू...