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'भारतीय संस्कृति में अहंकार और विद्वेष के लिए कोई जगह नहीं, राष्ट्रप्रेम-परिवार प्रेम सर्वोपरि!'

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'भारतीय संस्कृति में अहंकार और विद्वेष के लिए कोई जगह नहीं, राष्ट्रप्रेम-परिवार प्रेम सर्वोपरि!' @ डॉ दिनेश चंद्र सिंह, आईएएस धर्म आधारित पहलगाम आतंकी हमले से मर्माहत हूँ और यह समझ में नहीं आता कि धर्माधारित द्विराष्ट्र के सिद्धांत का प्रबल पक्षधर पाकिस्तान अपने अहंकार पूर्ण व्यवहार से भारत पर और कितने प्रहार करवाएगा, जबकि हर हमले के बाद भी भारत ने उसे समझाने की कोशिश की है और एहतियाती सैन्य कार्रवाई भी समझदारी पूर्वक किया है ताकि पाकिस्तानियों को ज्यादा क्षति नहीं हो, लेकिन वह विदेशी ताकतों की शह पर भारत विरोध पर इस कदर आमादा है कि उसे भाई, पड़ोसी और मित्र धर्म की भी याद नहीं रही। इसलिए कुछ धार्मिक आख्यानों से उसे समझाने का एक और साहित्यिक प्रयास करता हूँ जो प्रासंगिक भी है। कहा गया है कि "यस्यांतः स्यादहंकारो न करोति करोति स:। निरहंकारधीरेण न किंचिद कृतं कृतम।।" अर्थात जिसके अंतःकरण में अहंकार है, वह कर्म नहीं करते हुए भी कर्म करता है और अहंकार रहित धीर पुरुष कर्म करते हुए भी कर्म नहीं करता है। यानी कि अहंकार ही पाप का मूल है। वह ही असली जड़ है जिससे मनुष्...

जब राजा का धर्म प्रजा की रक्षा करना है तो जनभक्षकों को नहीं मिटाने के लिए दोषी कौन? बताए सरकार

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जब राजा का धर्म प्रजा की रक्षा करना है तो जनभक्षकों को नहीं मिटाने के लिए दोषी कौन? बताए सरकार @ कमलेश पांडेय/वरिष्ठ पत्रकार व राजनीतिक विश्लेषक कभी हिंदुत्व और राष्ट्रवाद का प्रतीक समझा जाने वाला राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ अब सौ वर्ष का हो चुका है, लेकिन अपने गठन के मौलिक उद्देश्यों से भटक चुका है। यह बात मैं नहीं कह रहा, बल्कि वक्त वक्त पर आए इसके विरोधाभाषी बयानों से स्पष्ट होता है। यूँ तो अपने गठन के उद्देश्यों में यह एक हद तक सफल रहा है, लेकिन इसके चेले-चपाटियों ने यानी जनसंघ और भारतीय जनता पार्टी (भाजपा) के नेताओं ने लोकतांत्रिक सत्ता हासिल करने के बाद भी कोई उल्लेखनीय भूमिका नहीं निभाई,  चाहे इसका कारण जो भी रहा हो। लिहाजा यह सामूहिक चिंता का विषय है, क्योंकि उनकी इस मौकापरस्त प्रवृति से राष्ट्रीय सुख-शांति व समृद्धि प्राप्ति का दिशा में बाधा पहुंची है! भले ही हम कभी सोने की चिड़ियां और विश्वगुरु रहे हों, लेकिन आज संघर्षभूमि मतलब दंगा-फसाद और बर्बर हत्याकांड भूमि के रूप में अभिशप्त कर दिए गए हैं।  इसलिए अब यह समझ में नहीं आता कि इस्लाम और ईसाई मतावलंबियों द्वारा...

जब द्विराष्ट्र सिद्धांत पर पाकिस्तान अटल, तो भारत ढुलमुल क्यों और कबतक हिन्दू चुकाएंगे इसकी कीमत! (भाग-1)

जब द्विराष्ट्र सिद्धांत पर पाकिस्तान अटल, तो भारत ढुलमुल क्यों और कबतक हिन्दू चुकाएंगे इसकी कीमत! (भाग- एक) @ कमलेश पांडेय/वरिष्ठ पत्रकार व राजनीतिक विश्लेषक जब द्विराष्ट्र सिद्धांत पर 1947 में भारत विभाजन अधिनियम द्वारा भारत से पाकिस्तान को दो हिस्सों में अलग कर दिया गया, तब भारत के सुप्रीम कोर्ट ने इसका विरोध क्यों नहीं किया, यक्ष प्रश्न है! वहीं, जब भारत के तत्कालीन क्षुद्र राजनेताओं ने हिन्दू राष्ट्र की जगह धर्मनिरपेक्ष राष्ट्र का गठन किया, तब भी सुप्रीम कोर्ट ने इस सवाल क्यों नहीं उठाया, यह दूसरा ज्वलंत प्रश्न है।.....और आज जब भारत में मुसलमानों द्वारा पुनः हिंदुओं को जगह-जगह प्रताड़ित किया जा रहा है, लक्षित सांप्रदायिक दंगे किये जा रहे हैं जिससे 1947 के पूर्व की विभाजनकारी परिस्थितियों की यादें तरोताजा हो जाती हैं और भारत के राजनेता इस पर अपनी-अपनी सियासी रोटियां सेंक रहे हैं, जिससे भारतीय प्रशासन भी किंकर्तव्यविमूढ़ बना रहता है, तो ऐसे में सुप्रीम कोर्ट स्वतः संज्ञान नहीं लेकर न्यायपूर्ण दिशा निर्देश क्यों नहीं दे रहा है, यह तीसरा सुलगता हुआ सवाल है।  दरअसल, यह बात मैं इसलिए उ...