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सपा सांसद रामजी लाल सुमन के खतरनाक मंसूबों से योगी और अखिलेश दोनों को सावधान रहना होगा!

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सपा सांसद रामजी लाल सुमन के खतरनाक मंसूबों से योगी और अखिलेश दोनों को सावधान रहना होगा! @ कमलेश पाण्डेय/वरिष्ठ पत्रकार और राजनीतिक विश्लेषक    समाजवादी पार्टी के राज्यसभा सांसद और दलित नेता रामजी लाल सुमन ने मेवाड़ के प्रतापी राजपूत शासक राणा सांगा को गद्दार बताते हुए जो विवादस्पद बयान दिया है, और क्षत्रियों की अखिल भारतीय ‘करणी सेना’ ने जिस तरह से उसे जातीय नायकों के अपमान का विषय ठहराते हुए श्री सुमन के घर पर धावा बोल दिया था, उस पर जारी प्रशासनिक  और सियासी खानापूर्ति  से यदि भारत गृहयुद्ध की आग में झुलस जाए तो किसी को हैरत नहीं होना चाहिए| क्योंकि यह सबकुछ पहले अमेरिकी-पाकिस्तानी एजेंडे और अब चीनी-बंगलादेशी एजेंडे के अनुरूप हो रहा है, जिसे भारत के कथित सेक्यूलर दलों के पृष्ठ पोषक अरब देशों का समर्थन प्राप्त है| समझा जाता है कि जब-जब भारत अपनी सही रणनीति के बल पर विकास की गति को प्राप्त करता है, तब-तब हमारे विघ्न संतोषी कुछ राजनेता विदेशी ताकतों की शह पर यहाँ जातीय और सांप्रदायिक उन्माद पैदा करने की कोशिश करते रहे हैं| यह बात मैं नहीं कह रहा हूँ बल्कि य...

न्यायपालिका को 'सुपर संसद' के रूप में काम करने की इजाजत आखिर किसने दी?

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आखिर न्यायपालिका को 'सुपर संसद' के रूप में काम करने की इजाजत किसने दी?   @ कमलेश पांडेय/वरिष्ठ पत्रकार व राजनीतिक विश्लेषक भारतीय लोकतंत्र में विधायिका, कार्यपालिका, न्यायपालिका, खबरपालिका और समाजपालिका में पारस्परिक टकराव कोई नई बात नहीं है, लेकिन यह जनहित में होना और दिखाई देना चाहिए। लेकिन अब जिस तरह से अपनी नाकामियों और चरित्रहीनता को छिपाने के लिए ये लोग संवैधानिक नियमों का दुरूपयोग कर रहे हैं, वह किसी वैचारिक त्रासदी से कम नहीं है। देश के प्रबुद्ध लोगों को इन संवैधानिक कमियों को पहचानना चाहिए और उसपर अविलंब लीगल सर्जिकल स्ट्राइक करने का दबाव भारतीय संसद और सुप्रीम कोर्ट दोनों पर बनाना चाहिए। इस बात में कोई दो राय नहीं कि राष्ट्रीय संसाधनों के न्यायपूर्ण बंटवारे, विधि-व्यवस्था को बनाए रखने और उसे तोड़ने वालों के खिलाफ सख्त कार्रवाई करने और सबको समान रूप से गुणवत्तापूर्ण जन सुविधाएं मुहैय्या करवाने में हमारी संसद और सर्वोच्च न्यायालय दोनों असफल साबित हुए हैं और इनके ऊलजलूल तर्कों से देश इस्लामिक चरमपंथियों के नापाक मंसूबों को साकार करने की दिशा में आगे बढ़ता हुआ ...

हे माननीय! अब आप खुद ही बता दीजिए कि विगत लगभग आठ दशकों की आपकी खता क्या-क्या है?

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हे माननीय! आप खुद ही बता दीजिए कि विगत लगभग आठ दशकों की आपकी खता क्या-क्या है? जानना चाहते हैं लोग! @ कमलेश पांडेय/वरिष्ठ पत्रकार व राजनीतिक विश्लेषक चाहे संसद हो या सर्वोच्च न्यायालय, 'निर्जीव' भारतीय संविधान के ये दो 'सजीव' पहरेदार अब खुद ही श्वेत पत्र जारी करके आमलोगों को बता दें कि विगत लगभग आठ दशकों की नीतिगत लापरवाहियों और प्रशासनिक-न्यायिक विफलताओं के लिए आखिर कौन-कौन और कितना-कितना जिम्मेदार है? क्योंकि तमाम तरह की नीतिगत उलटबांसियों की अब हद हो चुकी है, देशवासी निरंतर असुरक्षित होते जा रहे हैं और वीवीआइपी सुरक्षा से लैस लोगों को हर जगह तंगहाली नहीं, हरियाली दिखाई दे रही है। इसलिए अब भारतीय संविधान को वकीलों का स्वर्ग बनाए रखने की जिम्मेदारी किसी को भी और अधिक नहीं दी जा सकती है! दरअसल, देशवासियों को यह जानने-समझने का हक है कि आखिर पूरे देश में समान मताधिकार की तरह राष्ट्रीय कानूनी और सामाजिक-आर्थिक समानता स्थापित करने और जाति-धर्म-भाषा-क्षेत्र-लिंग-वर्ग भेद मुक्त धर्मनिरपेक्ष व समतामूलक समाज बनाने की दिशा में इन दोनों संस्थाओं का क्या और कितना-कितना...

आखिर सुसंस्कृत भारत की पुनर्स्थापना कब बनेगी हमारी प्रशासनिक प्राथमिकता?

आखिर सुसंस्कृत भारत की पुनर्स्थापना कब बनेगी हमारी प्रशासनिक प्राथमिकता? @ कमलेश पांडेय/वरिष्ठ पत्रकार व राजनीतिक विश्लेषक कभी भारत को विश्वगुरु कहा जाता था, लेकिन आज धर्मनिरपेक्ष खलनायक जो अपने मूल लोगों की हिफाजत में लाचार है। इस वास्ते वह उन नापाक देशों के समक्ष गिड़गिड़ा रहा है जो उसके मुकाबले कहीं नहीं ठहरते हैं। कभी भारत को सोने की चिड़ियां समझा जाता था, लेकिन आज हमारे बाजार विदेशी सामानों से भरे पड़े हैं! कभी भारत सुख-शांति और साधना स्थली के रूप में जाना जाता था, लेकिन आज यह दंगाई, आतंकी, नक्सली और आपराधिक भूमि मतलब संघर्ष भूमि बनने को अभिशप्त है।  जानते हैं क्यों, क्योंकि भारतीय संविधान के मूल स्रोत हमारे आक्रमणकारियों के नापाक फूट डालो और राज करो जैसे प्रतिगामी विचारों से अभिप्रेरित हैं। जब हम आक्रमणकारियों की बात करते हैं तो इन इस्लाम और ईसाई समाज से जुड़े क्रूर राजाओं और नौकरशाहों की याद तरोताजा हो जाती है जो सनातनियों के मौलिक शत्रु समझे जाते हैं। यथा- मूर्तिभंजक, मंदिर ध्वंसकर्ता, जनउत्पीडक आदि।  यह कड़वा सच है कि कथित धर्मनिरपेक्षता, अल्पसंख्यकवाद, अतार्किक आरक्षण आदि ...