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क्या वाकई अमेरिका बदल रहा है या फिर कोई नया स्वांग रच रहा है?

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क्या वाकई अमेरिका बदल रहा है या फिर अपनी कमजोरी छिपाने के लिए नया स्वांग रच रहा है? @ कमलेश पांडेय/वरिष्ठ पत्रकार व राजनीतिक विश्लेषक दुनिया का थानेदार अमेरिका बदल रहा है! उसकी विदेश नीति बदल रही है! इससे दुनियाभर के देश प्रभावित हो रहे हैं! चूंकि अब वह 'चंद्रायण व्रत' कर चुका है! इसलिए युद्ध नहीं शांति की बात कर रहा है! वह तीसरा विश्व युद्ध टालना चाहता है, इसलिए अपने यूरोपीय सहयोगियों को सद्बुद्धि बांट रहा है! इससे नाटो के सदस्य देशों में खलबली मची हुई है! यूरोपीय संघ भी परेशान है! सवाल है कि क्या वाकई अमेरिका बदल रहा है या फिर अपनी कमजोरी छिपाने के लिए नया स्वांग रच रहा है? भारत में एक कहावत है कि नौ सौ चूहे खाकर बिल्ली हज को चली। मतलब स्वभाव से हिंसक प्राणी, अहिंसक होने का नाटक रच रहा है। इसकी को चंद्रायण व्रत करार दिया जाता है। अमेरिका के संदर्भ में यही बात लागू होती है। हालांकि, आपको यह जानकर हैरत होगी कि यह सब कुछ अनायास नहीं हो रहा है बल्कि इसके पीछे चतुर अमेरिकी लोगों, उनके अमेरिकी प्रशासन और वहां के रिपब्लिकन नेताओं की एक सोची-समझी रणनीति काम कर रही है। दरअ...

क्या जेलेन्सकी, इंदिरा गांधी की तरह अमेरिकी राष्ट्रपति को करारा जवाब दे पाएंगे?

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तो क्या जेलेन्सकी, इंदिरा गांधी की तरह अमेरिकी राष्ट्रपति को करारा जवाब दे पाएंगे?  @ कमलेश पांडेय/वरिष्ठ पत्रकार व राजनीतिक विश्लेषक अमेरिका के राष्ट्रपति ट्रंप और यूक्रेनी राष्ट्रपति जेलेंस्की में जो हालिया तीखी बहस देखी गई है, वह पहली बार नहीं है जब कोई देश अपने हितों के लिए अमेरिका से लड़ा है और अपमानित महसूस किया है। क्योंकि अपने वक्त में यानी 1970 के दशक में भारत की लौह महिला प्रधानमंत्री  इंदिरा गांधी ने भी जाने-अनजाने अमेरिका से सीधी टक्कर ली थी। उन्होंने तब अमेरिकी राष्ट्रपति को भारत के पीएम के तौर पर करारा जवाब दिया था और उन्हें घुटने टेकने पर मजबूर कर दिया। हालांकि, तब भी अमेरिका ने पाकिस्तान और चीन को भारत के खिलाफ भड़काने की कोशिश की थी, लेकिन इंदिरा गांधी की रणचंडी वाली भूमिका और रूस से अटूट दोस्ती की वजह से किसी की हिम्मत नहीं हुई थी कि वह भारत की ओर आंख तरेर ले। और जब अमेरिका ने ऐसी जुर्रत की तो रूस के डर से सहम गया। इसलिए दुनिया की मीडिया में यह सवाल उठाए जा रहे हैं कि क्या यूक्रेनी राष्ट्रपति ब्लोदिमिर जेलेन्सकी, भारत की पूर्व प्रधानमंत्री स्व. इंद...

बसपा की सियासी दुर्गति के लिए मायावती खुद जिम्मेदार!

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# बसपा की सियासी दुर्गति के लिए मायावती खुद जिम्मेदार! @ कमलेश पांडेय/वरिष्ठ पत्रकार व राजनीतिक विश्लेषक उत्तरप्रदेश की पूर्व मुख्यमंत्री और बहुजन समाज पार्टी की नेत्री सुश्री मायावती भले ही दलित की बेटी हैं, लेकिन जब दलित राजनीति के रथ पर सवार होकर वह सूबाई सत्ता और पार्टी दोनों के शीर्ष तक पहुंचीं तो दौलत पसंद बन गईं। उन्होंने अपनी सारी नीतियों को दौलत बटोरने के ही इर्दगिर्द केंद्रित कर दिया। जिससे दृढ़ स्वभाव की इस महिला नेत्री ने न केवल अकूत धन बटोरीं, बल्कि अपनी पार्टी को भी खूब आगे बढ़ाया। इस क्रम में उन्होंने जायज-नाजायज का ख्याल तक नहीं रखा। क्योंकि दलित समर्थक एक कानून हमेशा उन जैसों की कानूनी ढाल बन जाती है।हालंकि, वक्त का पाशा पलटते ही अब वही दौलत उन जैसी अविवाहित महिला के गले की फांस बन चुका है। बहरहाल वह सत्ताधारी भाजपा के इशारे पर थिरकने को अभिशप्त हैं। कहना न होगा कि जिस बामसेफ ने देश की दलित राजनीति को एक मजबूत प्रशासनिक आधार दिया, उसकी भी मायावती काल में इसलिए एक न चली, क्योंकि परिवार और पार्टी से आगे की सोच-समझ उनमें विकसित ही न हो पाई। दरअसल, बसपा के संस्था...

जब नीति निपुण नीतीश कुमार सबके हैं तो फिर किसके नहीं होंगे.....ये भी जान लीजिए

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जब नीति निपुण नीतीश कुमार सबके हैं तो फिर किसके नहीं होंगे.....ये भी जान लीजिए @ कमलेश पांडेय/वरिष्ठ पत्रकार व राजनीतिक विश्लेषक बिहार की राजनीति में चाणक्य समझे जाने वाले जनता दल यूनाइटेड सुप्रीमो और कद्दावर मुख्यमंत्री नीतीश कुमार कब क्या करेंगे, कब किस ओर पाला बदलेंगे, यह दृढ़तापूर्वक नहीं कहा जा सकता है। क्योंकि पहले अपने व्यक्तिगत हितों, फिर अपनी पार्टी की सामूहिक जरूरतों और उसके बाद बिहार के समग्र हितों के अनुरूप ही वह अपना फैसला बदलते रहते हैं।  उनकी स्पष्ट सोच है कि जो आपको हल्के में ले, नेता मानने में आनाकानी करे, उसे अपने भारीपन का एहसास करवा दो। चाहे उनके दगाबाज राजनीतिक मित्र हों या मौकापरस्त गठबंधन सहयोगी, सबको उसके असली जूते की साइज में वो कुशलतापूर्वक फिट करते रहे। यही वजह है कि जहां कांग्रेस और भाजपा जैसे घाघ राष्ट्रीय दलों को उन्होंने अपने इशारे पर नचाया, वहीं उन समाजवादियों और क्षेत्रीय दलों को भी नहीं बख्शा, जो उनकी आंखों में खटकते गए।  सच कहूं तो ये सभी कार्य उन्होंने बड़ी ईमानदारी पूर्वक किया और सूबाई सियासत में निज सफलता की ऐसी लकीर खींच दी, जिस...

सत्तापक्ष-विपक्ष के 'सियासी पापों' से जनहित की रक्षा के लिए गठित करनी होगी स्वतंत्र एजेंसी?

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.....तो क्या सत्तापक्ष-विपक्ष के 'सियासी पापों' से जनहित की रक्षा के लिए गठित करनी होगी स्वतंत्र एजेंसी? @ कमलेश पांडेय/वरिष्ठ पत्रकार और राजनीतिक विश्लेषक भारत की संसदीय राजनीति एक बार फिर सवालों के घेरे में है। यहां राजनीतिक दलों और निर्वाचित जनप्रतिनिधियों को प्राप्त बेहिसाब अधिकार के दुरूपयोग की जिस तरह की दुनियावी खबरें मिल रही हैं, उससे पक्ष-विपक्ष दोनों की सियासी भूमिका संदेह के घेरे में है। सुलगता सवाल है कि जब राजनीतिक दलों और उनके द्वारा ही राष्ट्रीयता विरोधी कार्रवाई की जाएगी, राष्ट्रवाद की अवधारणा को मुंह चिढ़ाते हुए जनविरोधी फैसले लिए जाएंगे और कानून बनाए जाएंगे तो फिर इसकी निष्पक्ष जांच कौन करेगा?  चूंकि भारत में जिन दलित, आदिवासी और पिछड़े मतदाताओं का बहुमत है, उनकी कानूनी शिक्षा व राजनीतिक साक्षरता उस स्तर की नहीं है, जो किसी भी लोकतंत्र की सफलता के लिए जरूरी है। इसलिए उन्हें आरक्षण, जातिवाद और साम्प्रदायिकता जैसे मुद्दों पर सियासी समूहों द्वारा बरगलाया जाता है और जनविरोधी-राष्ट्रविरोधी कुकृत्य संपादित किये जाते हैं, इसलिए प्रबुद्ध सिविल सोसाइटी का जगन...

‘महाशिवरात्रि’ का आध्यात्मिक और वैज्ञानिक रहस्य जनकल्याणक है!

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‘महाशिवरात्रि’ के आध्यात्मिक और वैज्ञानिक रहस्यों को ऐसे समझिए, जनकल्याणक है! @ कमलेश पांडेय/वरिष्ठ पत्रकार एवं स्तम्भकार शिव पूजा का तातपर्य हमेशा लोककल्याणकारी-जनकल्याणकारी कार्यों से है। इसलिए 'महाशिवरात्रि’ के आध्यात्मिक और वैज्ञानिक रहस्यों को अवश्य समझना चाहिए। यथासम्भव दूसरों को बतलाना चाहिए। शिवकथा का उद्देश्य यही है जो जन कल्याणक और लोकमंगलकारी है। शिवरात्रि अर्थात् भगवान शिवजी की रात्रि। पौराणिक कथाओं के अनुसार इसी तिथि की रात्रि को भगवान शिवजी का विवाह पार्वती जी से हुआ था।  लिहाजा, यह भगवान शिवजी की आराधना की रात्रि है जो फाल्गुन कृष्ण पक्ष की चतुर्दशी (चौदस) को मनायी जाती है। क्या आपको पता है कि जब अन्य देवताओं का पूजन-यजन दिन में होता है तो फिर शिवजी का पूजन रात्रि में ही क्यों, अक्सर यह विचार आपके मन में उत्पन्न हो सकता है। इसलिए आपको बता दें कि भगवान शिव तमोगुण प्रधान संहार के देवता हैं। अत: तमोमयी रात्रि से उनका ज्यादा स्नेह है।  चूंकि रात्रि संहारकाल का प्रतिनिधित्व करती है। कृष्ण पक्ष की चतुर्दशी में रात्रिकालीन प्रकाश का स्रोत चन्द्रमा भी पूर्ण ...

तो क्या वंशवादी लोकतंत्र की अगली कड़ी बनेंगे निशांत कुमार?

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यक्ष प्रश्न: निशांत कुमार की सियासी लॉन्चिंग से वंशवादी लोकतंत्र को मजबूती मिलेगी? @ कमलेश पांडेय/वरिष्ठ पत्रकार व राजनीतिक विश्लेषक वंशवादी लोकतंत्र का क्रांतिकारी भूमि बिहार में अपनी गहरी जड़ें जमाना बेहद दुर्भाग्यपूर्ण है! यह लोकतंत्र की जननी वैशाली की मूल भावनाओं को मुंह चिढ़ाने जैसा है। ऐसा इसलिए कि सूबाई राजनीति को विगत 4 दशकों तक प्रभावित करते रहने वाले राजद सुप्रीमो लालू प्रसाद, पूर्व मुख्यमंत्री बिहार, जदयू के मुखिया नीतीश कुमार, मुख्यमंत्री बिहार और लोजपा आलाकमान रहे स्व. रामविलास पासवान, पूर्व केंद्रीय मंत्री भारत सरकार ने अपने-अपने लाडले क्रमशः तेजस्वी यादव, पूर्व उपमुख्यमंत्री बिहार, चिराग पासवान, केंद्रीय कैबिनेट मंत्री, भारत सरकार और निशांत कुमार, सीएम इन वेटिंग, बिहार को अपनी राजनीतिक विरासत (सियासी जमींदारी) सौंप चुके हैं!  इस मामले में मुख्यमंत्री नीतीश कुमार ने भले ही देरी से फैसला किया हो, लेकिन देर आयद दुरुस्त आयद की भांति  वो निशांत कुमार के लिए अपने समर्थकों से मजबूत फील्डिंग भी करवा रहे हैं। इससे प्रदेश की राजनीति में कई सवाल पैदा हो रहे हैं, ...