देश व समाज में सौहार्दपूर्ण बौद्धिक विमर्श कीजिए, अनावश्यक वाद विवाद कतई नहीं
देश व समाज में सौहार्दपूर्ण बौद्धिक विमर्श कीजिए, अनावश्यक वाद विवाद कतई नहीं @ कमलेश पांडेय/वरिष्ठ पत्रकार व स्तम्भकार भारतीय लोकतंत्र में महज बहुमत प्राप्ति के उद्देश्य से विभिन्न दलों व संगठनों के प्रतिनिधियों द्वारा एक दूसरे पर अनीतिपूर्ण दोषारोपण आम बात है। इसी कड़ी में यदा कदा जिस तरह की अनर्गल टिपण्णी और उस पर जवाबी प्रतिक्रिया क्रमशः अनायास व सुनियोजित रूप से कर दी जाती है, उससे पारस्परिक मतभेदों में इजाफा होता है। इस आपसी वैमनस्यता से हर किसी का चिंतित होना स्वाभाविक है। दरअसल, विविधतापूर्ण भारतीय परिवेश में जिस तरह के राजनैतिक, सामाजिक, आर्थिक, सांस्कृतिक, साम्प्रदायिक व धार्मिक समन्वय की दरकार है, उससे हमारा संविधान कोसों दूर है। क्योंकि यह पुरातन भारतीय सांस्कृतिक मूल्यों से कम और आधुनिक पाश्चात्य दर्शन से ज्यादा प्रभावित है।समय समय पर इसमें किये गए लक्षित संशोधनों से वैचारिक व नीतिगत विरोधाभास और बढ़ा है। इन सबकी भरपाई के लिए अक्सर उठने वाली समान नागरिक संहिता बनाने की मांग भी नक्कारखाने में तूती की आवाज की मानिंद दबकर रह गई है। इन सब बातों का नकारात्म...