....तो क्या 'जूनियर मोदी' के बाद अब 'सीनियर मोदी' को भी निपटाएंगे अश्विनी चौबे?



......तो क्या 'जूनियर मोदी' के बाद अब 'सीनियर मोदी' को निपटा पाएंगे अश्विनी चौबे?
@ कमलेश पांडेय/वरिष्ठ पत्रकार व राजनीतिक विश्लेषक

बीजेपी के वरिष्ठ नेता और पूर्व केंद्रीय मंत्री अश्विनी कुमार चौबे ने कहा है कि बिहार के मुख्यमंत्री नीतीश कुमार को उपप्रधानमंत्री बनाया जाना चाहिए। चूंकि केंद्रीय राजनीति  में आने से पहले श्री चौबे बिहार में नीतीश कुमार के मंत्रिमंडल में अपनी सेवाएं दे चुके हैं, इसलिए उनकी ताजा और दिलचस्प टिप्पणी के सियासी मायने तलाशे जा रहे हैं। इस ताजातरीन बयानबाजी की टाइमिंग भी महत्वपूर्ण है।
तो क्या 'जूनियर मोदी' के बाद अब 'सीनियर मोदी' को निपटा पाएंगे अश्विनी चौबे, यह यक्ष प्रश्न सियासी गलियारों में तैर रहा है!

जहां एक ओर राष्ट्रीय भाजपा अध्यक्ष बदले जाने वाले हैं तो वहीं दूसरी तरफ बिहार विधानसभा चुनाव 2025 सिर पर है। इसके अलावा, वक्फ संशोधन बिल पर भाजपा के साथ अडिग रहकर जदयू ने दिखा दिया कि अब वह राजग के प्रति सियासी रूप से निष्ठावान है। ऐसे में अश्विनी चौबे ने एक तीर से कई सियासी शिकार करने की कोशिश की है, जिसके राजनीतिक निहितार्थ गम्भीर माने जा रहे हैं, क्योंकि यह सबकुछ अनायास नहीं, बल्कि भाजपा-जदयू के विक्षुब्ध गुट की एक सोची समझी सियासी रणनीति के तहत किया गया प्रतीत होता है।

ऐसा इसलिए कि अश्विनी कुमार चौबे ने कहा है कि वह जनता दल (यूनाइटेड) के प्रमुख व बिहार में सर्वाधिक समय तक मुख्यमंत्री पद पर जमे रहने वाले नीतीश कुमार को दिवंगत कांग्रेस नेता जगजीवन राम के बाद बिहार से दूसरे उपप्रधानमंत्री के रूप में देखना चाहते हैं। इतना ही नहीं, उन्होंने यहां तक कहा है कि राष्ट्रीय जनतांत्रिक गठबंधन (राजग) में नीतीश कुमार का उल्लेखनीय योगदान है। वह गठबंधन में एक महत्वपूर्ण भूमिका निभाकर प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी के हाथ मजबूत कर रहे हैं। इसलिए उनकी (चौबे की) व्यक्तिगत इच्छा है कि उन्हें उपप्रधानमंत्री बनाया जाए। यदि उनकी यह इच्छा पूरी हुई तो बिहार बाबू जगजीवन राम के बाद अपनी धरती के दूसरे बेटे को इस पद पर आसीन होते देखेगा। 

सवाल है कि अब तक पीएम मेटेरियल समझे जाने वाले नीतीश कुमार को श्री चौबे उपप्रधानमंत्री बनवाने को आखिर क्यों लालायित हैं? आखिर विगत सवा साल से भाजपा-संघ के सियासी बियावान में भटक रहे अश्विनी कुमार चौबे ने अपनी राजनीतिक सांझ में ऐसा बयान क्यों दिया? क्या आरएसएस के किसी नेता ने उन्हें इसके लिए उकसाया है? या फिर भाजपा के किसी दिग्गज नेता के इशारे पर उन्होंने यह बयान दिया है? या फिर पर पार्टी में अपनी उपेक्षा से वह इतने क्षुब्ध हैं कि जदयू में शामिल होने की पृष्ठभूमि तैयार कर रहे हैं? या फिर एक पुराने कांग्रेस नेता की तारीफ करके कांग्रेसियों के दिल में अपनी जगह बनाने में जुटे हैं, जो भागलपुर में मजबूत स्थिति में हैं और उनकी सीट पर काबिज भी हैं।

बता दें कि भागलपुर को अपनी कर्मभूमि बनाने वाले बक्सर पुत्र अश्विनी कुमार चौबे कोई साधारण राजनेता नहीं हैं। उनके मौसा प्रभाष चंद्र तिवारी भागलपुर के पूर्व सांसद रह चुके हैं, जिसका क्रेडिट उन्हें ही जाता है। क्योंकि संघ से जुड़े रहे श्री तिवारी के सहयोग से श्री चौबे भागलपुर में अपनी सियासी पैर जमाए थे और अपनी ऊंची सियासी उड़ान के साथ ही उन्होंने अपने मौसा श्री तिवारी को भी संसदीय पारी खेलवा दी। 

ऐसा इसलिए कि बिहार के कद्दावर भाजपा नेता और गुजरात के राज्यपाल रहे कैलाशपति मिश्रा की सियासी जड़ें खोदने वाले बिहार के पूर्व उपमुख्यमंत्री सुशील कुमार मोदी को अश्विनी कुमार चौबे की जरूरत एक सवर्ण चेहरे के तौर पर थी। क्योंकि बिहार विधानसभा अध्यक्ष नंदकिशोर यादव, कैबिनेट मंत्री प्रेम कुमार आदि जो उनके गुड बुक के नेता थे, वह उनके ओबीसी वर्ग से आते थे। अपनी इसी राजनीतिक दोस्ती का फायदा उठाते हुए श्री चौबे ने गोड्डा, झारखंड के मौजूदा सांसद निशिकांत दूबे का सियासी पांव भागलपुर में नहीं जमने दिया। 

हालांकि जब वक्त ने पलटा खाया तो चौबे को भागलपुर भी छोड़ना पड़ा और बक्सर लोकसभा सीट से केंद्रीय राजनीति में प्रवेश लेना पड़ा, जिसके बाद मोदी कैबिनेट में वो केंद्रीय मंत्री तक बने। हालांकि, जिस तरह से मोदी 3.0 पारी शुरू होने से पहले बक्सर से उनका टिकट काटा गया, फिर राज्यसभा में भी जगह न दी गई और न ही किसी राज्य का राज्यपाल ही उन्हें बनाया गया। इससे उनका सियासी प्रभाव अब कम हुआ है। 

एक बात और, भागलपुर के कद्दावर नगर विधायक और तेजतर्रार कैबिनेट मंत्री समझे जाने वाले अश्विनी चौबे अपने बेटे अर्जित शाश्वत उर्फ प्रिंस चौबे के लिए पार्टी का टिकट तो ले आए, लेकिन मतदाताओं ने उन्हें खारिज कर दिया, जिससे उनकी सियासी साख गिरी। यह सब तब हुआ जब भागलपुर की सियासी गंगा में भाजपा-संघ का राजनीतिक पानी बहुत बह चुका था। अपने राजनीतिक मित्र सुशील कुमार मोदी की सियासी जड़ें खोदने के चक्कर में भागलपुर का वैश्य मतदाता उनसे छिटक गया। 

वहीं, स्वभाव से शातिर पूर्व उपमुख्यमंत्री सुशील कुमार मोदी न केवल भागलपुर की सियासत में दिलचस्पी लेने लगे, बल्कि प्रभाष चंद्र तिवारी की जगह खुद भागलपुर  सांसद भी बन बैठे। जब वह उपमुख्यमंत्री बने तो पूर्व केंद्रीय कैबिनेट मंत्री शाहनवाज हुसैन को भागलपुर सांसद बनवा दिया, जो निशिकांत दूबे के मित्र माने जाते थे। इस प्रकार मोदी-हुसैन ने मिलकर भागलपुर से चौबे की विदाई सुनिश्चित कर दी। इसी का फायदा उठाकर कांग्रेस ने भागलपुर में अपनी सियासी जड़ें जमा ली। फिलवक्त कांग्रेसी नगर विधायक अजीत शर्मा उनके व उनकी पार्टी के लिए मजबूत चुनौती साबित हो रहे हैं।

इससे क्षुब्ध अश्विनी चौबे ने जूनियर मोदी समझे जाने वाले सुशील कुमार मोदी की ऐसी जड़ें खोदी की, पहले उन्हें उपमुख्यमंत्री पद से हटवाया। फिर जब वो बिहार छोड़कर राज्यसभा के रास्ते दिल्ली पहुंचे तो उनके कैबिनेट मंत्री बनने में अड़ंगा डाला। दरअसल, बिहार भाजपा की सियासत में मुख्य भूमिका में रहे उपमुख्यमंत्री सुशील कुमार मोदी ने पहले राजद सुप्रीमो व तत्कालीन मुख्यमंत्री लालू प्रसाद की ओबीसी स्वामी भक्ति में भाजपा में मजबूत हुए और फिर मुख्यमंत्री नीतीश कुमार की ओबीसी स्वामी भक्ति में अपनी पार्टी भाजपा को जदयू का पिछलग्गू बना दिया। 

बता दें कि इससे पहले सुशील मोदी नेता प्रतिपक्ष और बाद में उपमुख्यमंत्री तो बने रहे, लेकिन पार्टी का बहुत ही रणनीतिक अहित किया। यही वजह है कि पूर्व केंद्रीय रविशंकर प्रसाद, पूर्व केंद्रीय मंत्री राधामोहन सिंह आदि को तो बहुत राजनीतिक ऊंचाई मिली। लेकिन मौजूदा केंद्रीय मंत्री गिरिराज सिंह आदि को कड़ी राजनीतिक मशक्कत करनी पड़ी। यही वजह है कि अश्विनी कुमार चौबे ने टीम सुशील मोदी को तोड़कर बिहार की भाजपा राजनीति में एक संतुलन स्थापित किया, जिसका लाभ अभी नंदकिशोर यादव व प्रेम कुमार आदि को भी मिल रहा है। 

वहीं, मौजूदा उपमुख्यमंत्री सम्राट चौधरी व उपमुख्यमंत्री विजय सिन्हा की खोज इसी राजनीतिक कशमकश का नतीजा समझा जाता है। शायद इससे उपजी सियासी कुंठा से भी जूनियर मोदी शीघ्र ही परलोक वासी हो गए। उनके दिल्ली संरक्षक पूर्व केंद्रीय वित्त मंत्री अरुण जेटली पर भी यही बात लागू होती है। इसलिए चर्चा है कि अश्विनी कुमार चौबे ने अपने मन से यह बात नहीं बोली है। या तो मुख्यमंत्री नीतीश कुमार के लोगों ने उन्हें उकसाया है या फिर राष्ट्रीय भाजपा का अध्यक्ष बनने के दावेदार संजय जोशी या फिर कैबिनेट मंत्री नितिन गडकरी की संघ समर्थित लॉबी ने उन्हें इस बयानबाजी के लिए राजी किया है।

चूंकि खुद भी अश्विनी चौबे एक सुलझे हुए नेता हैं, जो भाजपा और संघ दोनों के प्रति समर्पित समझे जाते हैं। पार्टी की केंद्रीय राजनीति से जहां बिहार में कभी उन्हें सियासी ग्रेस मिला, तो कभी मुँहकी भी खानी पड़ी। अभी पूर्वी बिहार और उत्तरी झारखंड की राजनीति में भागलपुर मूल के गोड्डा सांसद निशिकांत दूबे की जो राजनीतिक धमक दिखाई दे रही है, उससे भी अश्विनी चौबे अपने बेटे के सियासी भविष्य को लेकर चिंतित हैं। शायद इसलिए वो पीएम नरेंद्र मोदी व उनके गुट से नाराज चल रहे हैं। 

मसलन, जिस भागलपुर में भाजपा का मतलब अश्विनी चौबे समझा जाता रहा हो, वहां पर ही किसी और के साथ पीएम-राष्ट्रपति का नाम जुड़ना भला कोई दूसरा कद्दावर नेता कैसे बर्दाश्त कर सकता है। इसलिए उन्होंने जूनियर मोदी को निपटाने के दौरान अर्जित सियासी अनुभवों से सीख लेते हुए सीनियर मोदी यानी प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी पर अप्रत्यक्ष हमला बोला है। जिस तरह से पूर्व प्रधानमंत्री अटल बिहारी बाजपेयी की तरह उन्हें भी उपप्रधानमंत्री बनाने की जरूरत बताई है और वह भी अल्पमत वाली भाजपा के लिए गठबंधन सहयोगी जदयू के उस व्यक्ति का नाम सुझाया है, जिसे प्रधानमंत्री फूटे आंखों नहीं सोहाते। 

यदि अपना अपना राजनीतिक अस्तित्व बचाने की दोनों की मजबूरी नहीं होती तो ये कभी भी एक साथ, एक मंच पर नहीं दिखते। 2014 से पहले नीतीश कुमार ने क्या किया, उसके बाद फिर क्या क्या किया, यह बात किसी से छिपी हुई नहीं है। वहीं, उपप्रधानमंत्री रहे गृहमंत्री लालकृष्ण आडवाणी का सियासी हश्र क्या हुआ, यह उनसे ज्यादा कौन समझ सकता है। इसलिए यह भी समझा जा रहा है कि क्या नीतीश कुमार को उनकी असली औकात में रखने की राजनीतिक कवायद एक बार फिर तेज हो चुकी है, क्योंकि वक्फ बिल पर भाजपा के समक्ष जिस तरह से उन्होंने धर्मनिरपेक्ष हथियार डाले हैं, उसके दृष्टिगत इस तरह की ललकार सही नहीं है। 

हो सकता है भाजपा द्वारा भागलपुर से उनके बेटे का टिकट पिछली बार काट दिए जाने के बाद इस बार वो जदयू या कांग्रेस से टिकट दिलवाने के जुगाड़ में नई पैंतरेबाजी की है। अब उनके मन में क्या है, ये तो चौबे जानें, लेकिन टीम मोदी के लिए चौबे ने एक नई कब्र खोद दी है, मिट्टी उसपर कौन कौन डालेगा, आये दिन बदलते सियासी वक्त का इंतजार कीजिए।

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