नीतीश कुमार ने ललन सिंह पर भरोसा जताकर चकित कर दिया सियासी सुरमाभोपालियों को
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नीतीश कुमार ने ललन सिंह पर भरोसा जताकर चकित कर दिया सियासी सुरमाभोपालियों को
# जदयू के नवनियुक्त राष्ट्रीय अध्यक्ष राजीव रंजन सिंह उर्फ ललन सिंह के ऊपर नीतीश कुमार के राष्ट्रीय सपनों को साकार करने का आ गया नैतिक भार
@ कमलेश पांडेय/ वरिष्ठ पत्रकार व स्तम्भकार
आखिर एक अभियंता तमाम सियासी विद्रूपताओं व उलझनों को सहते-झेलते हुए कैसा राजनैतिक महल तैयार कर सकता है, जदयू इसका जीता जागता उदाहरण है। जब जनता पार्टी को निगलने के लिए आरएसएस पृष्ठभूमि वाले राजनेता गोलबंद हुए, जब जनता दल को कमतर दिखाने के लिए भारतीय जनता पार्टी सजग हुई और जब राष्ट्रीय जनता दल के सुप्रीमो लालू प्रसाद ने जनतादल युनाइटेड के सर्वेसर्वा नीतीश कुमार के समक्ष राजनीतिक अस्तित्व बचाने का संकट खड़ा कर दिया, तब भी नीतीश कुमार ने जो अप्रत्याशित फैसले लिए और अपना जनाधार बढ़ाया, शायद यह उन्हीं अर्जित तल्ख सियासी अनुभवों का तकाजा है कि पिछले लगभग डेढ़ दशकों से वह बिहार के निर्विवाद रूप से मुख्यमंत्री बने हुए हैं।
मैं यहां पर रामविलास पासवान, जॉर्ज फ़र्नान्डिस और शरद यादव जैसे नेताओं की चर्चा करना मुनासिब नहीं समझता, जिन्होंने नीतीश कुमार की लक्ष्मण रेखा तय करने की फितरत रखकर खुद ही सियासी तपिश में झुलस गए और दूसरों की मरहम पट्टी के सहारे सियासी सांस लेते रहने को अभिशप्त भी हुए। चाहे उपेंद्र कुशवाहा हों, या राजीव रंजन सिंह उर्फ ललन सिंह हों, इन्होंने भी नीतीश कुमार के बारे में निज गलतफहमियों के शिकार होकर अलग भी हुए, उन्हें लांछित भी किया, लेकिन अंततोगत्वा उन्हीं की सियासी सरपरस्ती में अपनी राजनीतिक साख बचाने व बढ़ाने में सफल भी हुए।
खैर, सियासी और व्यक्तिगत नूराकुश्ती के अपने-अपने मायने होते हैं और आपसी दांवपेंच की अपनी अपनी गुंजाइश, जिसे कोई सफल नेता किस एंगल से शह और मात दे रहा है, इसे समझने वाला ही सिद्धहस्त राजनेता बनता है। फिलवक्त बिहार के मुख्यमंत्री नीतीश कुमार ने पहले उपेंद्र कुशवाहा की घरवापसी, फिर आरसीपी सिंह को केंद्रीय मंत्रिमंडल में भेजने और अब राजीव रंजन सिंह उर्फ ललन सिंह को जदयू का राष्ट्रीय अध्यक्ष बनाने का फैसला किया है, वह बिहार भाजपा को स्पष्ट संकेत है कि उनका सियासी कद छोटा बनाने की कोई चाल वह सफल नहीं होने देंगे, क्योंकि राष्ट्रपिता महात्मा गांधी की तरह अपनी ही अनुभूत गलतियों को सुधारने की कला में वह पारंगत हैं।
कभी अपने धुर विरोधी लालू प्रसाद के साथ महागठबंधन सरकार चलाना और फिर राजद-जदयू को भिड़ानेवाली कांग्रेस की पैंतरेबाजी को समझते हुए उस भाजपा की शरण में आना, जिसे छोड़कर ही वह महागठबंधन के अंग बने थे। कहने का तातपर्य यह कि भले ही कुछ लोग व्यंग्य कसते रहे हों कि नीतीश कुमार की अंतड़ी में दांत है, लेकिन विभिन्न कालखंड और वक्त वक्त पर अपने अप्रत्याशित फैसलों का ही यह तकाजा है कि बिहार की सियासत में नीतीश कुमार का विकल्प सिर्फ नीतीश कुमार ही हैं।
इस बात में भी कोई दो राय नहीं कि उपर्युक्त वर्णित नेताओं ने यदि नीतीश कुमार के पर दूसरे दलों से मिलकर न कतरवाये होते तो राष्ट्रीय राजनीति में भी नीतीश कुमार का विकल्प सिर्फ नीतीश कुमार ही होते और तब समाजवादी सियासत का पतन उतना नहीं हुआ होता, जितना कि बिहार-यूपी के जातिवादी सियासी घरानों ने करवा दिया है। मतलब यह कि कभी कांग्रेस को राष्ट्रीय स्तर पर चुनौती देने वाली और जनसंघ-भाजपा के लिए सियासी अछूत की नौबत पैदा करने वाली समाजवादी सियासत की आज इतनी दुर्गति हो चुकी है कि कुछ लोग यूपीए के तलवे चाट रहे हैं तो कुछ एनडीए के। लेकिन नीतीश कुमार पिछले 1 साल से जो तल्ख निर्णय ले रहे हैं, वह इस बात का आभास दिला रहे हैं कि उनके ही नेतृत्व में समाजवादी नेताओं के अच्छे दिन आएंगे। जदयू के नवनियुक्त राष्ट्रीय अध्यक्ष राजीव रंजन सिंह उर्फ ललन सिंह को उन्होंने कुछ ऐसा ही होम वर्क दिया भी होगा।
पार्टी सूत्र बताते हैं कि जदयू नेता व राज्यसभा के उपसभापति हरिवंश सिंह, पूर्व प्रधान संपादक, प्रभात खबर और नवनियुक्त केंद्रीय मंत्री आरसीपी सिंह और पार्टी के पूर्व राज्यसभा सदस्य के सी त्यागी ने राष्ट्रीय राजनीति में जदयू के लिए जो स्पेस नहीं बना पाए, उन्हीं अधूरे कार्यों को पूर्ण करने की जिम्मेदारी राजीव रंजन सिंह उर्फ ललन सिंह को सौंपी गई है। ऐसा इसलिए कि कोरोना की दूसरी लहर के पश्चात भाजपा की राष्ट्रीय साख लुढ़की है और क्षेत्रीय दलों के पौ बारह हुए हैं।
कमोबेश अरविंद केजरीवाल, ममता बनर्जी, उद्धव ठाकरे, शरद पवार, अखिलेश यादव, तेजस्वी यादव, हेमंत सोरेन आदि राजनेताओं ने कांग्रेस के समानांतर और भाजपा के खिलाफ जो राष्ट्रीय-अंतरराष्ट्रीय चाल चली है, उसके परिप्रेक्ष्य में देर-सबेर नीतीश कुमार की राष्ट्रीय महत्ता बढ़ेगी ही। इन सभी परिस्थितियों को नीतीश कुमार के हित में ललन सिंह उसी तरह भुनाएंगे, जैसा कि उन्होंने बिहार में करते हुए 2005 में मुख्यमंत्री की कुर्सी तक पहुंचा दिया और उसपर उन्हें जमाये रखने के लिए खुद को झोंकने में भी कभी नहीं हिचकिचाए।
अभी हाल ही में लोक जनशक्ति पार्टी को तोड़ने में जदयू ने कैसी दिलचस्प भूमिका निभाई, इसका अंदाजा शायद ही किसी को रहा होगा। इसलिए, इम्तियादे इश्क है रोता है क्या, आगे आगे देखिए होता है क्या। नीतीश कुमार की सबसे बड़ी खासियत यह है कि वह अपने सियासी शत्रुओं को भी माफ कर देने वाला उदार संस्कार रखते हैं, लेकिन किसी का व्यवहार उधार नहीं रखते, समय आते ही यादगार तौर पर चुकता करते हैं। लालू यादव, तेजस्वी यादव, रामविलास पासवान, चिराग पासवान, शरद यादव आदि दर्जनाधिक राजनेता इसके स्पष्ट उदाहरण हैं।
कभी बड़हिया की पगडंडियों पर विचरने वाले, फिर भागलपुर की गलियों में घूमने-फिरने वाले ललन सिंह, पटना की सड़कों और दिल्ली की कॉलोनियों के हर उस दांवपेंच से वाकिफ हैं, जिनसे कोई शख्स आगे बढ़ता रहता है। पहले सफल ठेकेदार और अब बेहद सफल राजनेता बन चुके ललन सिंह एक कुशल राजनीतिक व प्रशासनिक प्रबंधक भी समझे जाते हैं। उन्होंने कभी जातीय घरौंदे की सियासत नहीं की और न ही ऐसे चरित्र वालों को कभी अपने आसपास भी फटकने दिया। इसलिए अब उनके पास करने के लिए बहुत कुछ है। किसान नेता स्वामी सहजानन्द सरस्वती और समाजवादी नेता व भूतपूर्व केंद्रीय स्वास्थ्य मंत्री राजनारायण की भव्य सामाजिक-राजनैतिक विरासत से आगे भी कुछ कर गुजरने का एक मौका प्रकृति ने उनके समक्ष उपस्थित किया है। अब वे किस तरह इसे साधते हैं, देखना और इंतजार करना दिलचस्प रहेगा। (क्रमशः)
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