संसद का शीतकालीन सत्र: स्वस्थ बहस हो पर सियासी बाजीगरी नहीं!
क्या संसद का शीतकालीन सत्र कोई नया मानक स्थापित कर पाएगा या फिर वही घिसी-पिटी सियासत दोहरायी जाएगी? @ कमलेश पांडेय/वरिष्ठ पत्रकार व राजनीतिक विश्लेषक कभी लोकतंत्र की जनभावनाओं को स्पष्ट करते हुए फ्रांसीसी दार्शनिक वॉल्टेयर ने कहा था कि "मैं आपके विचार से सहमत नहीं हो सकता, लेकिन उसे कहने के आपके अधिकार की रक्षा आखिरी दम तक करूंगा।" लेकिन यह विशुद्ध रूप से संस्कारवान नीति की बात है। आज जबकि लोकतांत्रिक सियासत का विकृत चेहरा घटना दर घटना सामने आ चुका है और चाहे उच्च सदन हो या निम्न सदन, दोनों की विभिन्न कुसंस्कारी घटनाएं कुछ गलत नजीर/नजरिया प्रदान कर चुकी हैं तो इनकी निरन्तरता को लेकर अब प्रशासनिक और न्यायिक सख्ती की जरूरत आन पड़ी है। क्योंकि अब राजनीतिक अचार संहिता भी पक्षपात पूर्ण प्रतीत होने लगी हैं। ऐसे में फ्रांसीसी दार्शनिक वॉल्टेयर के विचारों से पूर्णतया सहमत नहीं हुआ जा सकता है। चूंकि भारतीय संसद का शीतकालीन सत्र आगामी 1 दिसंबर 2025 से शुरू होगा। इसलिए सदन के कामकाज को सुचारू ढंग से चलाने के लिए सत्ता पक्ष और विपक्ष को अपनी नकारात्मक अतीत से सबक लेकर सकारात्म...