Were some cunning BJP and NDA leaders trying to pave the political way for the 'Bahujan Samaj Party' under the guise of the 'Bahujan Mahapanchayat'?
क्या 'बहुजन महापंचायत' की आड़ में 'बहुजन समाज पार्टी' की राजनीतिक जमीन तो नहीं तैयार करवा रहे थे कुछ शातिर भाजपा व एनडीए नेता?
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@ कमलेश पांडेय/वरिष्ठ पत्रकार व राजनीतिक विश्लेषक
जब हिंदी पट्टी में भगवा लहर चल रही हो, यूपी विधानसभा चुनाव 2027 में भाजपा बहुमत की अग्निपरीक्षा की तैयारी में जुटी हो, बिहार से लेकर बंगाल तक कमल खिल रहा हो, तब राजनीति की प्रयोगस्थली समझे जाने वाले बिहार में "बहुजन-बहुजन" की आवाज बुलंद करना बिहार के मुख्यमंत्री सम्राट चौधरी के खिलाफ सियासी साजिश है या उत्तरप्रदेश के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ पर दूर से दबाव बनाने की राजनीतिक फितरत या फिर एक तीर से दो शिकार करने का राजनीतिक अभ्यास, संघ/भाजपा इसकी जड़ें तलाश रही हैं?
पार्टी के शुभचिंतकों के समक्ष यह यक्ष प्रश्न समुपस्थित है कि क्या 'बहुजन महापंचायत' की आड़ में 'बहुजन समाज पार्टी' का परोक्ष प्रचार करने और उसके लिए बिहार में भी राजनीतिक जमीन तो नहीं तैयार करवा रहे थे कुछ शातिर भाजपा व एनडीए नेता? क्योंकि दौलत की बेटी समझी जानेवाली सुश्री मायावती, भाजपा की शुभ चिंतक रही हैं, यूपी में उन्होंने भाजपा की सरकार कभी प्रत्यक्ष तो कभी परोक्ष समर्थन देकर बनवाई है। चूंकि वह फिर से सक्रिय हैं, यूपी के अलावा बिहार भी उनके निशाने पर है, क्योंकि यहां के विभीषण भी सत्ता के लिए एक न एक राम की तलाश में भटकते फिरते हैं।
यही वजह है कि बिहार में भाजपा के नेतृत्व वाली सम्राट सरकार ने बेहद सूझबूझ का परिचय देते हुए अपने मौसमी विपक्षी समर्थकों और पक्षधर बनकर भितरघात करने की तमन्ना रखने वाले कतिपय एनडीए या पार्टीगत समर्थकों के मंसूबे को विफल करवाते हुए आरा (भोजपुर) के जगदीशपुर में आज 5 जुलाई 2026 को होने वाली बहुजन महापंचायत विफल करवा दिया है। ऐसा इसलिए किया गया, क्योंकि यह भाजपा और एनडीए की राजनीति के प्रतिकूल जातीय अभियान था और खुद मुख्यमंत्री सम्राट चौधरी के सर्वजातीय व्यक्तित्व पर कुठाराघात करने की सबसे बड़ी साजिश थी।
यही वजह है कि सम्राट प्रशासन के इस अप्रत्याशित फैसले के बाद बिहार के उन सभी विपक्षी नेताओं, जिनमें से कुछ ने भगवा चोला तक धारण कर रखा है, के चेहरे पर मुहर्रम (मातम) छा गया है। राजनीतिक विश्लेषकों का कहना है कि जिस तरह से सम्राट प्रशासन द्वारा पहले बहुजन महापंचायत की अनुमति दी गई और बाद में बढ़ते जातीय विवाद के दृष्टिगत अनुमति रद्द कर दी गई, जिसके कारण बहुजन महापंचायत स्थगित कर दिया गया है। उल्लेखनीय है कि यह बहुजन महापंचायत हाल ही में हुए "भरत भूषण तिवारी एनकाउंटर" के मामले में न्याय की मांग और राजनीतिक बयानबाजी से जुड़ी थी।
हालांकि, जब केंद्रीय भाजपा कार्यालय, नई दिल्ली और आरएसएस मुख्यालय, नागपुर को पार्टी के लिए 'सिर मुड़ाते ही ओले पड़ने' वाली कहावत और बिहार की नई ताजी जातीय गोलबंदी अभियान, जिसे राजद और जदयू मूल के वही राजनेता हवा दिलवा रहे थे, जो कल तक सम्राट चौधरी को मुख्यमंत्री नहीं बनने देने की लॉबिंग कर रहे थे, तो भाजपा-संघ समन्वयकों के हाथ पांव फूलने लगे। क्योंकि यदि यह अभियान सरजमीं पर सफल होता दिखाई देता, तो हिंदुत्व का बाजा बज जाता। जब सोशल मीडिया की क्लिपिंग पर गौर किया गया तो यह साफ हुआ कि इस अभियान से बिहार की लालू प्रसाद और नीतीश कुमार की भितरघाती लॉबी को ही मजबूती मिलती। वहीं, बहुजन शब्द सुनते ही उनके सामने यूपी की तस्वीर सामने आ गई, जहां बहुजन समाज पार्टी ने ब्राह्मणों को पटाकर सपा, भाजपा दोनों की खटिया खड़ा 2007-12 तक कर रखी थी।
जानकारों की मानें तो खुद हम के केंद्रीय मंत्री और पूर्व मुख्यमंत्री जीतनराम मांझी ने जिस तरह की अनर्गल बयानबाजी मोदी सरकार के चरित्र के विपरीत किया, उससे भाजपा की समझ में यह बात आ गई कि वह भविष्य में राजद के साथ जाने की पृष्ठभूमि तैयार कर रहे हैं। यही वजह है कि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के हनुमान और लोजपा रामविलास के सुप्रीमो चिराग पासवान को पीड़ित के घर भिजवाया गया। यह बिहार की राजद की उस ओबीसी राजनीति के लिए स्पष्ट संकेत भी समझाया गया कि एनडीए के पास दलित मुख्यमंत्री का चेहरा भी तैयार है।
भाजपा के रणनीतिकारों ने बिना कुछ कहे संकेत दे दिया कि जो लोग मुख्यमंत्री पद की आड़ लेकर जातीय विषबमन की मुहिम में कूद पड़ने वाले लालू यादव के संस्कार में पले बढ़े हैं, उन्हें भाजपा एक सीमा के बाद नहीं झेलेगी। क्योंकि किसी भी जातीय मुहिम में भाजपा यदि बदनाम होती है तो नीतीश कुमार की जदयू स्वतः मजबूत हो जाएगी, क्योंकि उन्होंने अपने 20 वर्षीय शासनकाल में कभी लवकुश उन्माद पैदा नहीं होने दिया। चूंकि यादववाद के विरुद्ध वह मजबूत चेहरे बने, यही वजह है कि 20 वर्षों तक निष्कंटक राज किया।
चाहे उपेंद्र कुशवाहा हों या नागमणि, सबको नीतीश कुमार ने संपेरिये की तरह नचाया। और जब भाजपा के चक्रब्यूह में फंस गए, तब बहुत सोच समझकर नीतीश कुमार ने सम्राट चौधरी को अपना एनडीए का उत्तराधिकारी चुनवाया। लेकिन सरकार बनते ही जो विवाद उपजा, वह उस एनडीए के लिए दुर्भाग्यपूर्ण स्थिति समझी गई जिसको सभी जातियों ने मिलकर भारी बहुमत तो दिया, लेकिन उसके बाद बनी भाजपा सरकार जातिवाद के आरोपों से घिरने लगी। इसलिए रणनीतिकारों ने हार्ड ब्रेक लगवाया और कार्यक्रम स्थगित करवाया।
जहां तक मुख्य घटनाक्रम की बात है तो महापंचायत का कारण बिलौटी गांव निवासी 28 वर्षीय भरत तिवारी की एक पुलिस एनकाउंटर में मौत हो गई थी। इसके विरोध में और न्याय की मांग को लेकर परिजनों व विभिन्न संगठनों ने इससे पहले भी एक विशाल महापंचायत की थी। इसी आयोजन से विवाद बढ़ा। आरोप लगा कि मुख्यमंत्री को गाली दी गई। इसी मामले को लेकर 5 जुलाई को जगदीशपुर में 'बहुजन महापंचायत' बुलाई गई थी। इस कार्यक्रम में केंद्रीय मंत्री जीतन राम मांझी सहित अन्य नेताओं के शामिल होने की चर्चा थी।
यही वजह है कि मोदी प्रशासन के सख्त इशारे के बाद बहुजन महापंचायत पर प्रशासनिक रोक लगा दी गई। चूंकि उत्तरप्रदेश व हरियाणा में महापंचायत के बाद उपद्रव होते हैं, शुक्रवार के जुम्मे के बाद भी कभी कभार ऐसा हो जाता है, इसलिए भारी बहुजन भीड़ जुटने से कानून-व्यवस्था बिगड़ने की आशंका के चलते स्थानीय प्रशासन (एसडीएम और थानाध्यक्ष) ने एनओसी (NOC) देने से इनकार कर दिया। साथ ही कार्यक्रम स्थल और उसके आस-पास धारा-144 लागू कर दी गई।
यही वजह है कि आयोजकों को अपना फैसला पलटना पड़ा। चूंकि प्रशासन द्वारा अनुमति रद्द करने और निषेधाज्ञा लागू करने के बाद, आयोजकों ने आपसी सहमति से महापंचायत को तत्काल प्रभाव से स्थगित करने का निर्णय लिया। आयोजन समिति का कहना है कि प्रशासन से अनुमति मिलने के बाद इस महापंचायत की नई तारीख की घोषणा की जाएगी। अलबत्ता इस पूरे प्रकरण को लेकर इलाके में तनाव और राजनीति तेज है। खुद मुख्यमंत्री सम्राट चौधरी को भी यह बात समझ में आ गई है कि लोग सोशल मीडिया पर उनके नाम की फर्जी पेज बनाकर उनके सर्वजातीय व्यक्तित्व पर चोट पहुंचा रहे हैं।
मजे की बात तो यह है कि दिल्ली से समझाया गया है कि बिहार के मुख्यमंत्री सम्राट चौधरी की कुर्सी के लिए कोई भी सवर्ण नेता खतरा नहीं है, क्योंकि जबतक उत्तरप्रदेश में सवर्ण मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ अपने पद पर बने हुए हैं, तबतक बिहार में सवर्ण मुख्यमंत्री भाजपा दे ही नहीं सकती है। हाँ, इतना जरूर है कि कुछ घाघ और मंजे मंजाये ओबीसी-दलित नेता हैं, जो पूर्व उपमुख्यमंत्री विजय सिन्हा आदि के नाम को हवा देकर मुख्यमंत्री सम्राट चौधरी को दबाव में रखना चाहते हैं। उधर, यही लोग बहुजन महापंचायत की सफलता के बाद भाजपा के कमजोर हो जाने की आशंका पैदा करते हुए केंद्रीय गृहमंत्री अमित शाह की कान भर रहे हैं। चूंकि भाजपा के राष्ट्रीय अध्यक्ष नितिन नवीन का गृह प्रदेश बिहार है, इसलिए अमित शाह भी यहां के बारे में फूंक फूंक कर कदम रखते हैं।
कई बार यह होता आया है कि प्रशासनिक दबाव में कार्यक्रम रद्द हो जाने के बाद समर्थक जुटते हैं। यही राजनीति है। इसलिए इस बहुजन महाजुटान पर दिल्ली की नजर थी। मजे की बात तो यह बताई गई कि आखिर वो कौन से लोग हैं जो भाजपा की कीमत पर बहुजन समाज पार्टी के बहुजन शब्द का प्रचार कर रहे हैं, जिससे सवर्ण भड़क जाते हैं। वहीं, यादव-सवर्ण एकता के पोस्टर देखकर खुद अमित शाह और आरएसएस के रणनीतिकार भौचक्के रह गए। अब वो जानना चाह रहे हैं कि आखिर नीतीश कुमार के जिस भूक भूक समीकरण यानी भूमिहार/ब्राह्मण और कुर्मी-कोइरी के बल पर नीतीश दो दशकों तक बिहार के मुख्यमंत्री बने रहे, उसकी जड़ में मट्ठा कौन डाल रहा है?
नीतीश कुमार की भलमनसाहत देखिए कि जाते जाते भी उन्होंने भूक भूक समीकरण को ही मुख्य नेतृत्व सौंपा। हाँ, जदयू के राजनीतिक भविष्य के लिये भूमिहार और यादव को उपमुख्यमंत्री बनवाया। चूंकि बिहार में भूक भूक समीकरण के हिलने का मतलब है 2024 वाली यूपी दुर्गति को 2029 में बिहार में आमंत्रित करना। क्योंकि मोदी शाह ने इसमें क्षत्रिय, कायस्थ, वैश्यों को जोड़कर मजबूत किया है। राजद को कमजोर करने के लिए ही अत्यंत पिछड़ों पर ज्यादा योजनाएं न्यौछावर किये हैं।
चूंकि बिहार के लोग ही पूर्वी भारत की हवा का रुख तय करते हैं, इसलिए सम्राट विरोधी दलित/ओबीसी नेतागण, जिसमें एक कुशवाहा, एक दलित, एक यादव और एक वैश्य नेता ही नीतीश कुमार से लेकर नरेंद्र मोदी व उनके करीबियों को कन्फ्यूज किए हुए हैं, इसलिए मुख्यमंत्री सम्राट चौधरी को आस्तीन के सांपों की ओर फोकस रखना होगा।
चूंकि विपक्ष के इशारे पर विवादास्पद जातीय स्वाभिमान की बात करने और मुख्यमंत्री सम्राट चौधरी के समर्थन में बहुजन महापंचायत बुलाए जाने की अटकलें थीं, जिसमें कुछ सामाजिक संगठनों के शामिल होने की बात कही गई थी। इसलिए भाजपा रणनीतिकारों के दिलोदिमाग में यह सवाल उठा कि क्या इसे सम्राट सरकार और प्रशासन का समर्थन प्राप्त है? तो जवाब मिला कि बढ़ते जातीय विवाद के बाद मुख्यमंत्री सम्राट चौधरी ने अपना नाम नहीं घसीटने के इशारे किये हैं।
यही वजह है कि प्रशासन का आधिकारिक रुख रहा है कि बिना अनुमति कार्यक्रम आयोजित नहीं किया जा सकता और कानून-व्यवस्था बनाए रखना उसकी प्राथमिकता है। वहीं, सम्राट चौधरी के समर्थन में आयोजित बताए जा रहे कथित बहुजन महापंचायत जैसे कार्यक्रम को लेकर जो गलत सलत राजनीतिक दावे किए जा रहे थे, उसको सरकार की ओर से आधिकारिक समर्थन देने की पुष्टि नहीं होते ही आयोजक पलट गए और भविष्य में कार्यक्रम होने की बात कही। बताया जाता है कि अगला मोदी मंत्रिमंडल विस्तार भी इसके साइड इफेक्ट्स से अछूता नहीं रहेगा।
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